अशोक पांडे-
आज दलाई लामा को याद करने का दिन है. चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो आज नब्बे बरस पूरे कर रहे हैं. कल शाम उन्होंने कहा कि बोधिसत्व की कृपा से वे अब भी तंदुरुस्त हैं और उन्हें अगले चालीस बरस और जी पाने की उम्मीद है.

उनके अनुयायियों और उनसे प्रेरणा हासिल करने वाले, दुनिया भर में फैले तमाम लोगों के लिए यह कैसी हौस जगाने वाली बात है!
उनकी मुस्कराती हुई तस्वीरें बीसवीं-इक्कीसवीं शताब्दियों की सुन्दरतम छवियों में हैं. उनके जैसा पूरी दुनिया में कोई नहीं. वे उम्मीद और रोशनी का अजस्र स्रोत हैं. बच्चों सरीखी उनकी खिलखिलाहट दुनिया के सबसे ताकतवर लोगों को निहत्था बना देती है.
मशीनों ने दलाई लामा को बचपन से ही आकर्षित किया. पोटाला महल में जो भी मशीन दिखाई देती, पेंचकस वगैरह लेकर उसके उर्जे-पुर्जे खोल कर अलग करना और उन्हें फिर से जोड़ने का खेल उन्हें पसंद था.
वे दलाई लामा बन कर 1940 में पोटाला पहुंचे. पूरे ल्हासा में तब कुल तीन कारें थीं. तीनों उन्हीं की थीं. उन्होंने इन कारों को भी कई दफा खोला-जोड़ा.
ऑस्ट्रियाई पर्वतारोही हाइनरिख हैरर एक बेहद मुश्किल और दुस्साहस-भरे अभियान के बाद 1946 में जब तिब्बत पहुंचे तो उनकी मुलाक़ात किशोर दलाई लामा से हुई. यह मुलाक़ात एक बेहद अन्तरंग मित्रता में तब्दील हुई और 2006 में हुए हैरर के देहांत तक बनी रही. हैरर ने तिब्बत के अपने अनुभवों को ‘सेवेन ईयर्स इन तिब्बत’ के नाम से प्रकाशित किया. इस बेस्टसेलर पर इसी नाम से फिल्म भी बनी है.
हाइनरिख हैरर और दलाई लामा के बीच पच्चीस साल का फासला था. दोनों की जन्मतिथि इत्तफाकन एक ही थी – 6 जुलाई. किशोर दलाई लामा के लिए हैरर एक ऐसी खिड़की बन गए जिसकी मदद से आधुनिक संसार को देखा-समझा जा सकता था. हैरर को तिब्बत सरकार में बाकायदा नौकरी दी गई और बहुत सारे महत्वपूर्ण काम सौंपे गए. उन्हें विदेशी समाचारों का अनुवाद करना होता था, महत्वपूर्ण अवसरों के फोटो खींचने होते थे और दलाई लामा को ट्यूशन पढ़ाना होता था. इस तरह खेल-विज्ञान के ग्रेजुएट हाइनरिख हैरर तिब्बत के किशोर धर्मगुरु के अंग्रेज़ी, भूगोल और विज्ञान अध्यापक बने. हैरर ने दलाई लामा के लिए स्केटिंग रिंक तैयार करने के अलावा एक सिनेमाहॉल भी बनाया जिसके प्रोजेक्टर को जीप इंजिन की सहायता से चलाया जाता था.
उधर अमेरिका किसी तरह भारत के रास्ते चीन तक सड़क बनाने के मंसूबे देख रहा था. तिब्बत से होकर जाने वाले रास्ते में उसे संभावना दिखाई दी तो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अपने दो प्रतिनिधियों को ल्हासा भेजा. प्रसंगवश इन दो में से एक आदमी रूसी मूल का था जिसका नाम इल्या था और वह लियो टॉलस्टॉय का पोता था. रूजवेल्ट ने बालक दलाई लामा के लिए एक विशेष उपहार भेजा. जेनेवा की मशहूर घड़ीसाज़ कम्पनी पाटेक फिलिप ने उस एक्सक्लूसिव मॉडल की 1937 और 1950 के बीच कुल 15 घड़ियाँ बनाई थीं. ऐसी एक घड़ी 2014 में पांच लाख डॉलर में नीलाम हुई थी.
बहरहाल पोटाला महल की एक-एक घड़ी के अस्थि-पंजर ढीले कर चुके दलाई लामा ने इस घड़ी के साथ भी वही सुलूक किया. हैरर की संगत में अब वे एक विशेषज्ञ घड़ीसाज़ बन चुके थे. उसके बाद से पुरानी घड़ियों को इकठ्ठा करना और उनकी मरम्मत करना दलाई लामा का सबसे बड़ा शौक है.
चीन के दुष्ट साम्राज्यवादी मंसूबों के कारण उन्हें अपना देश छोड़ना पड़ा. उनका तिब्बत आज भी बीसवीं शताब्दी में मानवीय विस्थापन की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है. दुनिया भर के मसले निबटाने के बाद आज भी फुर्सत मिलती है तो वे घड़ियाँ ठीक करते हैं. कभी-कभी इनमें बेहद आम लोगों की घड़ियाँ भी होती हैं.
“अगर मैं भिक्षु नहीं बनता तो मुझे पक्का इंजीनियर बनना था” वे अक्सर कहते हैं.
दलाई लामा आज जीवन के 91 साल में दाखिल होंगे। बारिश के बावजूद धर्मशाला में जश्न का माहौल है। तिब्बती और गैर तिब्बती–दोनों ही उन्हें अपना संरक्षक मानते हैं। लेकिन, चीन उनके मरने का बेसब्री से इंतजार कर रहा है। उसे उनकी जगह एक ऐसे व्यक्ति को गद्दी पर बिठाना है, जिसे उसने 1995 में अगवा किया था। नाम है पंचेन लामा। चीन की यह कोशिश बिल्कुल वैसी है, जैसे इटली सरकार यह तय करे कि अगला पोप कौन होगा।जब सत्ता आपकी संस्कृति पर कब्जा कर ले तो आजादी, अभिव्यक्ति बिना जंग लड़े सब छिन जाती है। भारत में ऐसा होते हम देख ही रहे हैं। दलाई लामा ने कल कहा कि वे 40 साल और जीयेंगे। भारत की मोदी सत्ता ने इस मामले में टांग अड़ाने से मना कर दिया है। उधर, कैलाश मानसरोवर घूमकर बीते दिनों लौटे कुछ सरकारी पत्रकार बंधु तिब्बत की रौनक देखकर हैरत में हैं। तिब्बती भी खून के आंसू पीकर वहां विकास में गोते लगा रहे हैं। 1999 में चीन ने करमापा को भागने दिया या वे खुद भागकर भारत पहुंचे, ये सवालों में है। लेकिन, 2018 में नरेंद्र मोदी की सरेंडर सत्ता ने करमापा से कन्नी काट ली। हमारे पत्रकार बंधुओं ने जो नहीं कहा–वह यह कि तिब्बत में चीनी भाषा का बोलबाला है। तिब्बती बच्चे अपनी संस्कृति और परंपरा नहीं अपना सकते। 1959 में चीन से भागकर भारत पहुंचे दलाई लामा दुनियाभर में चीन से बगावत और तिब्बती संस्कृति की जीती–जागती मिसाल हैं। वे 40 नहीं, 400 साल और जीएं। लेकिन, क्या तब तक तिब्बती संस्कृति बची रहेगी? -सौमित्र रॉय


