
नीरेंद्र नागर-
एक गिफ़्ट बेटे के लिए भी माँग लिया…
हाल ही में नवभारत टाइम्स के एक पुराने सहकर्मी के लिखे पर कुछ चर्चा हुई तो उस दौर के दो क़िस्से याद आ गए। एक आँखों देखा है, दूसरा कानों सुना।
पहला क़िस्सा दिल्ली में काँग्रेस की बीट देखने वाले एक संवाददाता का है। उस दौरान मोबाइल फ़ोन नए-नए आए थे और बहुत कम लोगों के पास हुआ करते थे। वह संवाददाता एक दिन एक मोबाइल लेकर ऑफ़िस आए और सबको दिखाने लगे कि कैसे यह किसी का नाम लेकर बोलने पर उस व्यक्ति को कॉल कर देता है यानी उसमें नंबर डायल करने की ज़रूरत नहीं है। हम सबके लिए यह एक दिलचस्प जानकारी थी और सब देखने लगे। संवाददाता साहब ने उसका डेमो करके भी दिखाया।
लेकिन यह फ़ोन उनके पास आया कैसे? पता चला, एक बड़े काँग्रेसी नेता ने उनको गिफ़्ट दिया है। सोचिए, काँग्रेस की बीट कवर करने वाला एक संवाददाता काँग्रेस के ही एक नेता से महँगा गिफ़्ट ले रहा है और सबको बता भी रहा है बिना किसी संकोच या शर्म के।
दूसरा किस्सा भी दिल्ली टीम का ही था लेकिन यह सज्जन कोई संवाददाता नहीं थे, बल्कि डेस्क प्रभारी थे। यानी सारी ख़बरें उनके द्वारा ओके करने के बाद ही छपती थीं। एक दिन उनको पता चला कि किसी कपड़ा मिल की प्रेस कॉन्फ़्रेंस है। जनाब रिपोर्टर न होते हुए भी वहाँ पहुँच गए और जब वहाँ आए सभी प्रेस वालों को पैंट का एक-एक पीस बतौर गिफ़्ट दिया जाने लगा तो वह भी लाइन में लग गए।
नवभारत टाइम्स से उस दिन तीन लोग उस कॉन्फ़्रेंस में गए थे और बेचारे मेज़बान ने तीनों को एक-एक पीस दिया।
लेकिन जब प्रभारी साहब को पैंट पीस मिला तो वह आगे नहीं बढ़े बल्कि तैश से बोले, ‘घर पर लड़ाई करवाओगे क्या?’
गिफ़्ट बाँटने वाला समझा नहीं। पूछा, ‘लड़ाई क्यों होगी?’
जनाब ने कहा, ‘भई, घर में यह पीस लेकर जाऊँगा तो बेटा लड़ाई नहीं करेगा कि मेरा गिफ़्ट कहाँ है?’
‘तो यह पीस आप उसको दे दीजिएगा।’
‘मैं अपना गिफ़्ट उसे क्यों दूँ?’
गिफ़्ट देने वाले ने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा और उनको एक और पीस दे दिया।
एक तरफ़ राजेश अवस्थी जैसे पत्रकार हैं जो कम वेतन और सुविधाओं के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर होते हैं और दूसरी तरफ़ ये पत्रकार हैं जो बड़े संस्थान में अच्छा वेतन पाने के बावजूद ऐसी टुच्ची हरकतें किया करते थे।
पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़ें..
देवप्रिय अवस्थी-
प्रगति मैदान में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले और कारपोरेट सेक्टर की प्रेस कांफ्रेंस में एक अखबार से दो-तीन रिपोर्टरों की मौजूदगी आम रही है. इसी चक्कर में मुझे जनसत्ता की व्यापार डेस्क के एक साथी को वहां से हटाकर जनरल डेस्क पर लगाना पड़ा था. कभी-कभी प्रेस कांफ्रेंस के आयोजकों को शराब के नशे में धुल पत्रकारों को उनके घर पहुंचाने के इंतजाम भी करने पड़ते थे.
पत्रकारों और खासतौर पर संवाददाताओं को, किसी बड़ी कॉन्फ्रेंस या एक्सपो में भोजन और गिफ्ट बटोरने के लिए जंग करते देख ले कोई, तो उसका भरोसा उठ जाए पत्रकारिता से. कोविड से पहले ऐसे एक-दो आयोजनों में मेरा जाना हुआ था, वहां का नज़ारा देख मेरी रूह कांप गई और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि मैं फील्ड रिपोर्टर नहीं हूं. -शिवम भट्ट
इक़बाल हिंदुस्तानी-
ऐसे लालची बेशर्म और ढीठ लोग आपको सब क्षेत्रों में मिल जायेंगे लेकिन पत्रकारिता में ऐसे लोग नाजायज़ लाभ लेने के लिए ब्लैकमेल आराम से कर लेते हैं वैसे भी समाज इन बातों को गैर कानूनी अनैतिक और असामाजिक अब नहीं मानता है, हम तो ऐसे लोगों के हमारे घर भेजे गिफ्ट लौटा देते थे और उनका चाय पानी और खाना तक अक्सर छोड़ देते थे नहीं तो उनके खिलाफ़ लिखने में हमारी कलम अटकने का खतरा बना रहता था।


