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परिवार, कला और दोस्ती पर राजनीति का साया; द स्टेट्समैन में छपी अहम टिप्पणी!

The Statesman article page header showing masthead, nav menu, ad banner, and headline 'Should we not put politics in its place?'

हितेंद्र पटेल-

The Statesman कोलकाता का अखबार अब उतना लोकप्रिय नहीं है। एक समय यह प्रबुद्ध बंगालियों का सबसे प्रिय अखबार था। अंग्रेजी सीखने के लिए सब इसको पढ़ने की सलाह देते थे। अब भी देते हैं।

आज भी इस अखबार में कुछ खास बातें हैं। कम से कम संपादकीय पृष्ठ और उसके सामने का पृष्ठ। मैं इसे युवाओं को नियमित पढ़ने की सलाह देता हूँ। अकादमिक लोग लिखते हैं अधिकतर। विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों के लिखे में वह चटपटापन कम होता है जिसे लोकप्रिय पत्रकारिता में अधिक महत्त्व दिया जाता है।

आज पर्सपेक्टिव वाले पृष्ठ में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है We Not Put Politics in Its Place?

लेखक हैं त्रिसूर में रहने वाले नारायणन किझुमुंडयूर जो अकाउंटेंट हैं और फ्रीलांसर हैं।

इस लेख के मूल कथ्य है :

आधुनिक समाज में राजनीति ने जीवन के लगभग हर क्षेत्र पर अत्यधिक प्रभाव स्थापित कर लिया है। पहले राजनीति मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण लेकिन सीमित हिस्सा थी; परिवार, मित्रता, धर्म, कला, साहित्य, विज्ञान, मनोरंजन और व्यक्तिगत संबंधों के अपने स्वतंत्र क्षेत्र थे। आज स्थिति यह है कि सामाजिक मीडिया और चौबीसों घंटे चलने वाले राजनीतिक विमर्श के कारण जीवन की लगभग हर घटना को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाने लगा है।

राजनीतिक जागरूकता आवश्यक है, क्योंकि इससे नागरिक अधिकारों, न्याय और सार्वजनिक उत्तरदायित्व की रक्षा होती है। लेकिन जब राजनीति जीवन का एकमात्र चश्मा बन जाती है, तब वह मनुष्य की दृष्टि को संकुचित कर देती है। लोग दूसरों को पहले मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक समर्थक या विरोधी के रूप में देखने लगते हैं। मित्रता, पारिवारिक संबंध और सामाजिक संवाद भी वैचारिक मतभेदों से प्रभावित होने लगते हैं। परिणामस्वरूप संवाद की जगह विवाद, समझ की जगह संदेह और सह-अस्तित्व की जगह ध्रुवीकरण बढ़ता है।
अत्यधिक राजनीतिकरण कला, साहित्य, संगीत, आध्यात्मिकता और चिंतन जैसी मानवीय गतिविधियों के महत्व को कम कर देता है। जब हर विषय को राजनीतिक संघर्ष के मैदान में बदल दिया जाता है, तब मनुष्य के आत्मिक विकास, सौंदर्य-बोध और रचनात्मकता को क्षति पहुँचती है। इतिहास का उदाहरण देते हुए लेखक कहते हैं कि महान सभ्यताएँ केवल राजनीतिक शक्ति के कारण नहीं, बल्कि दर्शन, कला, नैतिकता और आध्यात्मिक परंपराओं के कारण भी विकसित हुईं।

राजनीति को समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसे उसकी उचित सीमा में रखने की आवश्यकता है। राजनीति समाज की एक महत्वपूर्ण सेवक होनी चाहिए, स्वामी नहीं। मनुष्य केवल मतदाता या राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं है; वह परिवार का सदस्य, मित्र, कलाकार, पाठक, साधक और स्वप्न देखने वाला प्राणी भी है। यदि जीवन राजनीति से बड़ा बना रहे, तभी मानव गरिमा, स्वतंत्रता और मानवीय अनुभवों की समृद्धि सुरक्षित रह सकेगी।

संक्षेप में, यह लेख राजनीति-विरोधी नहीं है, बल्कि अतिरंजित राजनीतिकरण के विरुद्ध चेतावनी है। लेखक नागरिक भागीदारी और राजनीतिक सजगता का समर्थन करते हुए यह आग्रह करता है कि मानव जीवन की व्यापकता को राजनीति के भीतर समेट देने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए।

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