उर्मिलेश-
पिछले दिनों दिल्ली में I.N.D.I.A. एलायंस की बैठक हुई. राहुल गांधी ने इस बैठक में एक बेहद विचारोत्तेजक भाषण दिया. एक संक्षिप्त ‘अटपटी टिप्पणी’ के अलावा उनका पूरा भाषण पढ़ने और सुनने लायक है. देश के तबाह होते लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति में यह भाषण राजनीतिक हस्तक्षेप का रास्ता सुझाता है. उससे कोई सहमत या असहमत हो सकता है पर भाषण के महत्व को नजरंदाज नहीं कर सकता!
चूंकि मैं एक पत्रकार हूं, राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं; इसलिए राहुल के भाषण में मीडिया, खासतौर पर सोशल मीडिया और लोकतंत्र के संदर्भ में की गई उनकी एक बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी पर मेरी निगाह टिक गई! पहले उनकी इस खास टिप्पणी को आप जरूर पढ़ लें:

“मेरे 1 करोड़ YouTube फॉलोअर्स हैं, लेकिन मेरा अकाउंट पूरी तरह दबाया गया है। अगर आप यह सोच रहे हैं कि सोशल मीडिया निष्पक्ष है और विपक्ष को सपोर्ट मिल रहा है, तो आप दूसरी दुनिया में जी रहे हैं। पूरा आर्किटेक्चर — मीडिया, सोशल मीडिया, कानूनी व्यवस्था, नौकरशाही, खुफिया एजेंसियां — सब इस सरकार को सत्ता में बनाए रखने के लिए संरेखित हैं।”
-(Rahul Gandhi के भाषण का एक अंश).
लोकसभा में विपक्ष के नेता(LoP) की मीडिया/सोशल मीडिया के संदर्भ में कही बात सौ फीसदी सच है.
अपन एक साधारण पत्रकार ठहरे, इसलिए यह बात मेरी किसी पोस्ट से निकलती तो बहुत सारे लोग शायद उतनी गंभीरता से नहीं लेते लेकिन यहां तो देश का सबसे प्रमुख विपक्षी नेता भी कह रहा है कि मीडिया क्या सोशल मीडिया भी कत्तई निष्पक्ष नहीं है. मैं इसमें एक वाक्य यह भी जोड़ूंगा कि अपने यहां सोशल मीडिया के ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स प्रोफेशनल और पारदर्शी ढंग से काम नहीं करते! वे भी बहुत तरीके से सत्ता द्वारा निर्देशित हो रहे हैं.
सोशल मीडिया के लगभग सभी लोकप्रिय प्लेटफॉर्म्स के भारत स्थित दफ़्तरों में ‘एक ही किस्म’ के लोगों का दबदबा है. समय-समय पर यहां के विवादों या मसलों पर अमेरिका में बैठे दफ़्तरों से यहां के लोगों की ओपिनियन ली जाती है और निर्णय लेने में उनके सुझावों को महत्व दिया जाता है. इसका निजी तौर पर मुझे पहली बार अनुभव पिछले साल हुआ.
सोशल मीडिया के ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स बेमतलब, अनाप-शनाप और फालतू लिखने-बोलने वालों के लिए उतनी मुश्किलें नहीं खड़ी करते, जितनी समाज और देश के जटिल मसलों पर बेलाग और ठोस बात कहने या लिखने वालों के लिए खड़ी करते हैं. इसमें ‘व्यूज’ नियंत्रित करने से लेकर और भी बहुत सारी मुश्किलें शामिल होती हैं. पर इन मुश्किलों को संबोधित करने और इनके त्वरित और न्यायसंगत समाधान के लिए सोशल मीडिया समूहों के प्रबंधन ने कोई ठोस संरचना नहीं बनाई है.
इसलिए सोशल मीडिया नेटवर्क के हर फैसले पर उसके नीति-निर्देशकों-प्रबंधकों का एकाधिकार कायम रहता है. लोकतंत्र और सामाजिक-संवाद के लिए स्पेस मुहैय्या कराने का दावा करने वाले सोशल मीडिया का संचालन और समूचा कारोबार निहायत अपारदर्शी और अलोकतांत्रिक ढंग से चलता है.
राहुल गांधी की पूरी स्पीच यहां सुनी जा सकती है…


