रोहित जोशी-
मैं बस ऑफिस के लिए निकल ही रहा था कि हमारी सोसाइटी में पुलिस की गाड़ी दिखाई दी. ‘मैंने गार्ड से पूछा ये पुलिस क्या कर रही है इधर?’ उसने जवाब दिया ‘सर! पता नहीं सुबह से आई हुई है.’
मैं ऑफिस पहुंच गया. लगभग डेढ़ दो बजे मुझे एक अननोन नम्बर से कॉल आया. दूसरी तरफ मेरी ही सोसाइटी में रहने वाली मेरी एक दोस्त जर्नलिस्ट थी. उसने बताया उसके घर पर पुलिस की रेड पड़ी है सुबह-सुबह. सारे इलैक्ट्रॉनिक गैजेट्स, फोन, लैपटॉप वगहैरा जब्त कर लिए हैं. मेरा और कुछ दोस्तों का नम्बर उसने उन्हें रिक्वेस्ट करके ले लिया था. और वहां से किसी तरह एक दूसरे दोस्त के घर पर पहुंचकर वह मुझे कॉल कर रही थी.
अब तक खबरों की सुर्खियों में आ चुका था कि दिल्ली और देश के तकरीबन 40 से ऊपर पत्रकारों के घरों में छापे पड़े थे और इसी तरह सबके गैजेट्स जब्त कर लिए गए थे. इनमें Urmilesh, Abhisar Sharma जैसे बड़े पत्रकार भी शामिल थे.

असल में ये रेड सरकार की संतुलित और तथ्यात्मक आलोचना करने वाले डिजिटल मीडिया हाउस, NewsClick.in न्यूज़ क्लिक से जुड़े पत्रकारों के घरों पर पड़ी थी. ईडी और दिल्ली पुलिस की इकॉनॉमिक ऑफेंस विंग का आरोप था कि यह संस्थान देश विरोधी गतिविधियों में शामिल था और इसके लिए विदेशी फंडिंग ली जा रही थी. संस्थान और इसके संपादक Prabir Purkayastha पर मनीलॉंड्रिंग और यूएपीए जैसी धाराओं में मुकदमें दर्ज कराए गए. संस्थान के अकाउंट सीज़ कर दिए गए और हालत यह हो गई कि एक ज़रूरी पत्रकारिता का संस्थान धीरे-धीरे धराशाई हो गया. उससे जुड़े तकरीबन 100 पत्रकार बेरोजगार हो गए और तौहमत ऐसी कि दूसरी जगह नौकरी पाना भी उनके लिए मुश्किल हो गया.
मेरी दोस्त ने अपने करियर के शुरूआती दिनों में महज 6 महीने न्यूज़ क्लिक के साथ एक जूनियर लेवल पर काम किया था. इन दिनों वह एक स्टार्टअप के साथ खेती किसानी के डॉक्युमेंटेशन पर एक इंट्रस्टिंग काम कर रही थी. जैसे ही स्टार्टअप के मालिक को इस वाकिए का पता चला उसने अपने हाथ खींच लिए और उसे नौकरी से निकाल दिया. इंडिपेंडेंटली अकेले ज़िदगी जी रही मेरी दोस्त के लिए उसके बाद का समय बहुत ही चुनौती भरा रहा. मैंने उसे बहुत जूझते हुए देखा है. अब तक भी वह पूरी तरह सम्हल नहीं पाई है.
हालांकि उसी के ज़रिए न्यूज़ क्लिक के कुछ और पत्रकारों से मेरी दोस्ती हुई थी और वे बताते थे कि न्यूज़ क्लिक का वर्क एन्वायर्नमेंट बहुत ही डेमोक्रेटिक और हेल्दी है. दूसरे इंडियन कॉरपोरेट मीडिया हाउसेज़ की तुलना में वहां जर्नलिज़्म, डिस्कोर्सेज़ और वर्क कल्चर कमाल का है जिसकी कल्पना करना भी इंडिया में मुश्किल है.
इस संस्थान पर ईडी और दिल्ली पुलिस ने जो आरोप लगाए थे उन्हें पिछले दिनों दिल्ली हाईकोर्ट ने सिरे से नकार दिया है. कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि ईडी और दिल्ली पुलिस ने अपनी ताकत और कानून का घनघोर गलत इस्तेमाल किया है.
हाईकोर्ट का ये फैसला स्वागत योग्य है. लेकिन अब न्यूज़ क्लिक ढह चुका है उसके पीछे अडानी, अम्बानी जैसे बड़े कॉरपोरेट नहीं हैं कि वे इतना सब झेलने के बाद भी वापस सम्हल पाए. इसके संस्थापक संपादक Prabir Purkayastha ने 80 साल की उम्र में भी ढेर सारी चुनौतियां झेलते हुए इस केस को मजबूती से लड़ा है और इसलिए हाईकोर्ट दिल्ली पुलिस, ईडी और असल में केंद्र सरकार की बदनीयती के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी कर पाया है.
न्यूज़ क्लिक संस्थान ढहा दिया गया है. अभी उस पर और भी केसेज़ हैं. ये पत्रकार, अपना तन, मन, धन पत्रकारिता के बजाय अब भी इन केसेज को लड़ने में ही लगाते रहेंगे.
मीडिया में अपने आलोचकों को शांत करने के लिए मोदी सरकार शाम, दाम, दंड, भेद सब कुछ अपना रही है. मीडिया फ्रीडम इंडेक्स में भारत की गिरती पोजिशन यूं ही नहीं है. 180 देशों में उसका पायदान 156वें नम्बर पर है और ये और गिरता जा रहा है..
बिना स्वतंत्र मीडिया के एक स्वस्थ लोकतंत्र नहीं हो सकता. भारत में लोकतंत्र धीरे-धीरे भीड़तंत्र बनाता गया है.. यही सच है.. और मीडिया को कुचल कर या खरीदकर ही इसे ऐसा बनाया गया है..


