दया एस शुक्ला ‘सागर’-
अयोध्या से खबरें आ रही हैं वह हैरान करने वाली हैं।
ट्रस्ट ने दिखावे के लिए बैंक को चढ़ावे की निगरानी के लिए सीन में रखा। न जाने किस राजनीतिक दवाब में बैंक ने निगरानी का काम एक निजी कंपनी को आउटसोर्स कर दिया। आउटसोर्स कंपनी ने उन लोगों को इस काम के लिए नियुक्त किया जिनकी सिफारिश ट्रस्ट के सदस्यों ने की थी। यानी वो ट्रस्ट के ही रिश्तेदार और कारिंदे थे।
कंपनी के इन कर्मचारियों का काम चढ़ावे की राशि की गिनती पर नज़र रखना था। न इनका सत्यापन कराया गया न गिनती खत्म होने के बाद इनकी तलाशी ली जाती थी।
चूंकि कर्मचारी ट्रस्ट की तरफ से रखे गए थे, इसलिए बैंक अधिकारियों की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह इस पर सवाल उठा सकें।
चंदे की गिनती रात दिन चलती थी। ये देखने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी नहीं था जो देखे कि कितना चंदा आया है और कितना वास्तव में रजिस्टर पर दर्ज किया गया है।
भक्तों द्वारा सोने के जेवर भी चढ़ाए जाते थे उसमें भी वजनी सोना चांदी चोरी हुआ। अब कुछ 12 हजार महीना वेतन पाने वाले आउटसोर्स कर्मियों की अंतरात्मा पर छोड़ दिया गया था।
अस्वीकरण… ये सभी सूचनाएं अयोध्या और लखनऊ से छपने वाले अखबारों की खबरों पर आधारित है।
रामराज्य में राममंदिर में चढ़ावे की चोरी के प्रकाश में आने के बाद पूरे नौ दिन बीत चुके हैं। अभी तक कहीं किसी थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) हुई?
यह सुविधा इस तरह के आरोपों में कितनों को, किस किस को प्राप्त है?
राम मंदिर ट्रस्ट में किस जाति के कितने लोग हैं? मेरिट में कोई कमी रह गई हो तो स्पष्ट कर दीजिए!
-शीतल पी सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
अयोध्या में श्रीराम मंदिर में चाहे करोड़ों की चोरी हो या अरबों की लूट, इतना तय है कि यूपी में जिस तरह की जांच प्रणाली है, उसमें कुछ होना-हवाना नहीं है. यहां अमूमन जांच वही करता है जिसके खिलाफ शिकायत होती है. जन सुनवाई की सरकारी व्यवस्था में बरसों से यही होता आया है.
मामला अपराधिक रंग न पकड़े इसलिए ट्रस्ट और विशेष जांच दल आदि बनाकर इसे आपस में ही सुलटाए जाने की पूरी बिसात बिछा दी गई है. जांच जो लोग करेंगे , बेशक वही लोग आरोपों के घेरे में आए ट्रस्ट और उससे जुड़े लोगों के सामाजिक राजनीतिक दायरे के ही लोग हैं. यानी जांच भी आपसदारी में ही हो रही है.
ऐसे में जन सुनवाई व्यवस्था की तरह आरोप भी लगेंगे, जांच भी होगी लेकिन न्याय और सजा दूर दूर तक कहीं नजर आएंगे. फिर भी मामला फाइलों में निस्तारित हो जाएगा. यूपी में न्याय व्यवस्था का जैसा मजाक जन सुनवाई सिस्टम बनाकर उड़ाया गया है वैसा ही नजारा संभवतः मंदिर चंदे के इस प्रकरण में देखने के बाद कम से कम यूपी के लोगों को तो कोई हैरत नहीं होगी.
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