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सुख-दुख

इस देश के अधिकतर अफ़सर इसी मानसिकता के हैं!

शम्भूनाथ शुक्ला-

ये भारत के घोंघा अफ़सर! पिछले दिनों एक प्रोग्राम में भारत सरकार के एक अफ़सर मिले। बुढ़ापे तक वे संयुक्त सचिव के स्तर तक पहुँच पाए थे। क्योंकि वे एलायड सर्विसेज़ से थे इसलिए कुछ ज़्यादा ही अफ़सरी झाड़ रहे थे।

बातचीत के बीच वे बोले, कि वे साउथ दिल्ली में रहते हैं, और सदैव आर्गेनिक खाद्य यूज करते हैं। एनसीआर में उनके यूपी व हरियाणा में कई एकड़ के फार्म हाउसेज हैं। कांग्रेस के अमुक नेता या तो उनके चाचा थे या चचियाससुर। और सोनिया गांधी तो उन्हें नाम से बुलाती हैं, अक्सर वे पूछती रहती हैं और बबलू क्या हाल हैं? मगर आज के अफ़सर उनकी सुनते नहीं।

अचानक उन्हें प्रतीत हुआ, कि मैं एक पत्रकार हूँ। बोले, कहाँ हैं? मैंने कहा, अब कहीं नहीं हूँ। पहले ज़रूर था। उन्होंने कहा, दरअसल वे हिंदी अख़बार पढ़ते नहीं हैं। मैंने पूछा, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, असमी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी और गुजराती अख़बार पढ़ते होंगे। अब पंडित जी बोले, नहीं मैं सिर्फ़ अंग्रेज़ी अख़बार बांचता हूँ।

मैंने कहा कि आज इंडियन एक्सप्रेस का अमुक लेख शानदार था! क्षमा माँगते हुए बोले, नहीं मैं यह अख़बार नहीं मंगाता। मैंने पूछा, हिंदू मंगाते होंगे? फिर वे बग़लें झाँकने लगे। मैं उठते हुए बोला, आप मुग़ालते में हैं। घनघोर रूप से आत्म मुग्ध हैं। सच बात यह है कि आप घोंघा हो। आप को इस देश की मिट्टी, देश की जनता और उसकी सोच की क़तई समझ नहीं है। आपसे क्या बात की जाए।

इस देश के अधिकतर अफ़सर इसी मानसिकता के हैं। जन प्रतिनिधि मजबूत और समझदार होता है तो इन पर अंकुश रखता है। अन्यथा ये अफ़सर उन्हें अंधेरे में रखते हैं और मनमानी चलाते हैं। जब तक इनकी अफ़सरी चलेगी, जनता का भला नहीं हो सकता।

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