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सुख-दुख

बीते चार दशक से बीबीसी का पूरा तामझाम नव-उदारवाद का भोंपू बन गया था!

Prakash K Ray : कोई भी अख़बार, रेडियो, चैनल या वेबसाइट बंद होता है, दुख होता है। बीबीसी हिंदी रेडियो तो सालों से नहीं सुनता था, पर बीबीसी और अन्य अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर से इसी के माध्यम से परिचय हुआ था। बहरहाल, तकनीक व बाज़ार के बदलने से ऐसे बदलाव स्वाभाविक हैं।

लेकिन, बीते चार दशक से बीबीसी का पूरा तामझाम नव-उदारवाद का भोंपू बन गया था, और इसी नव-उदारवाद ने इसके रेडियो व अन्य सेवाओं को अपना ग्रास बनाया है। इस संस्था का वेबसाइट बेहद स्तरहीन है। इसके लेख व रिपोर्ट औसत से भी नीचे हैं। इस संस्था का ब्रिटेन में एक ही काम रह गया है, दक्षिणपंथ का प्रोपेगैंडा करना, वैसे यह दोष अरसे से था।

अब भी यह कुल मिलाकर आक्रामक, औपनिवेशिक और श्वेत-श्रेष्ठता का माध्यम है। ख़ैर, आगे देखते हैं, यह कितना ख़तरनाक होता है।

BBC की हिंदी रेडियो या भाषायी सेवाएं अच्छी थीं। बीबीसी फ़्यूचर और कुछ साइटें भी ठीक है। पर हिंदी साइट का डिज़ाइन और सामग्री औसत है तथा बड़ी ग़लतियाँ भी होती हैं। इसके ब्रिटिश पॉलिटिकल चैनल्स बहुत ख़तरनाक हैं। इस कारण इसकी विश्वसनीयता नहीं बची है।

Sarvapriya Sangwan : Rajesh Joshi bowing head to the microphone after his last bulletin on BBC Hindi radio. BBC Hindi radio service ended today after almost 80 years. Such an emotional picture.

Rajesh Priyadarshi : शॉर्ट वेब रेडियो, अलविदा. 23 साल का जुड़ाव, मन भारी है. सुनने वालों और दिल खोलकर स्नेह और सम्मान देने वाले सभी लोगों का ह्रदय से आभार. डिजिटल माध्यमों से साथ बनाए रखिएगा. एक खूबसूरत सफ़र था, लेकिन हर सफ़र का अंत तो होता ही है. आज हो गया. हर वो व्यक्ति जिनके साथ मैंने रेडियो प्रसारण किया, जिन सीनियरों से सीखा, सबको याद करता रहूँगा.

सौजन्य : फेसबुक

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