दादा का जाना : वे क्राइम रिपोर्टिंग के धर्मेंद्र थे, हैंडसम, डैशिंग, बिंदास और महफ़िल जमाने वाले स्मार्ट रिपोर्टर!

दीपक शर्मा-

इस दुनिया में लोग अपनी शर्तों पर अक्सर कम जी पातें हैं। दफ्तर से लेकर घर और दस्तूर से लेकर मजबूरियां, खुद की शर्तों पर जीने की स्पेस कम देती हैं। दादा को मैं इस मामले में खुशकिस्मत कहूंगा कि उन्होंने मजबूरियों के गिले शिकवे ताक पर रख कर, जिंदादिल जिंदगी जी, और बहुत हद तक अपनी शर्तों पर।

दादा ने ताकतवर, रसूखदारों की ज़्यादा परवाह नहीं की और ज़रूरतमंदो के लिए वो सब कुछ किया जिसकी उम्मीद आज के ज़माने में कम ही की जा सकती है।

वे क्राइम रिपोर्टिंग के धर्मेंद्र थे , हैंडसम, डैशिंग, बिंदास और महफ़िल जमाने वाले स्मार्ट रिपोर्टर।

अमूमन लोग पत्रकारिता को एक लास्ट ऑप्शन के तौर पर देखते हैं। अक्सर कहीं नौकरी न मिलने के बाद किसी छोटे मोटे अख़बार से जुड़ जाते हैं। पर दादा के साथ ऐसा बिलकुल नहीं था। उन्होंने सीआरपीएफ में अफसर की नौकरी छोड़कर लखनऊ के अंग्रेजी अखबार The Pioneer, Times of India और Hindustan Times में क्राइम रिपोर्टिंग का मोर्चा संभाला।

वे जब Hindustan Times में थे, तब मैं The Pioneer में क्राइम रिपोर्टर था। हम अखबारों की कारपोरेट वॉर के बीच प्रतिस्पर्धी तो थे पर फिर भी गहरे दोस्त थे। अक्सर नाईट रिपोर्टिंग के बाद वे मेरे दफ्तर के बाहर चाय पीने के लिए आते थे। फिर दिन भर की ख़बरें डिस्कस करते, मूड होता तो हेमंत कुमार का कोई गीत गुनगुनाते और फिर कुछ देर बाद हम दोनों अपने अपने घर निकल जाते।

दादा यानि बिश्वादीप घोष की कुछ बातें उन्हें बिंदास रिपोर्टर बनाती थीं। वे हनक और कॉन्फिडेंस के साथ फील्ड में काम करते थे।मंत्री हो, डॉन हो या कोई भी स्वयं भू ‘सुपर कॉप’ वे ठोंक कर रिपोर्टिंग करते और किसी दबाव का उन पर कभी असर नहीं होता।

अफसर चाहे आईएएस हो या आईपीएस और चाहे जितनी ताकतवर कुर्सी पर बैठा हो , दादा ने हमेशा उसे फर्स्ट नेम से सबके सामने बुलाया। मैंने अक्सर देखा कि दादा से पुलिस अफ़सर घबराते थे। एकाध आईपीएस तो ऐसे थे जिन्होंने दादा के ट्रान्स्फ़र के लिए अख़बार के मालिकों तक शिकायत की। कुछ ने उनके ख़िलाफ़ खेल भी किया। पर दादा को उसका कभी रंज नहीं था।

बहरहाल भ्रष्ट सियासत और उसके मोहरों से उनका सलूक सख़्त हो, पर व्यक्तिगत जीवन में वो विनम्र थे। दोस्तों और सहयोगियों के बीच मैंने कभी उन्हें तल्ख लहजे में नहीं सुना। सच ये है कि दोस्त किसी तबके या क्लास का हो, उसकी मदद के लिए उन्होंने बहुत कुछ गँवाया भी।

आज के दौर में जब मीडिया में चापलूसी हर जगह छाई है और अधिकतर पत्रकार अपने निजी फायदों के लिए सत्ता के आगे झुके है , दादा जैसे रिपोर्टर की कमी हमेशा महसूस होगी।

दो दिन पहले, उन्हें छाती में दर्द हुआ , लखनऊ में वे सिविल अस्पताल पहुंचे, कुछ देर के लिए लगा हालात काबू में आ जाएँगे, लेकिन अगली सुबह मेदांता में फिर दिल का दौरा पड़ा और उन्हें बचाया ना जा सका।

अभी तो उनकी उम्र 15-20 साल और पत्रकारिता करने की थी। वे जहाँ रहें, अपनी शर्तों पर ही रहें, पर इस बार थोड़ा कम तकलीफ़ों के साथ।

अलविदा दादा।



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