पुलिस की यह अराजक कार्रवाई और बरताव स्वतंत्र रिपोर्टिंग रोकने-दबाने का कुत्सित प्रयास है!

नयी दिल्ली : देश भर में जब छात्र और युवा नागरिकता कानून में हुए संशोधन (सीएए) का विरोध करने के लिए सड़कों पर शांतिपूर्ण तरीके से उतरे हुए हैं और जिस तरीके से नरेंद्र मोदी की सरकार राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को साथ में लागू करने की मंशा रखती है, इस बीच पुलिस ने उन मीडियाकर्मियों के खिलाफ हिंसक प्रतिक्रिया दी है जो देश भर में युवाओं के इस आंदोलन को रिपोर्ट कर रहे थे। पुलिस की यह अराजक कार्रवाई और बरताव निंदनीय है जो दिखाता है कि यह स्पष्ट रूप से स्वतंत्र रिपोर्टिंग को रोकने और दबाने का एक कुत्सित प्रयास है।

जिनके हाथ में कानून व्यवस्था को लागू करने की जिम्मेदारी थी उन्होंने कुछ खास राज्यों की सरकारों के साथ मिलकर जैसा व्यवहार किया है, वह दिखाता है कि वे संदेशवाहक को ही निशाना बनाने पर आमादा हैं। ध्यान देने वाली बात है कि प्रदर्शनकारियों और मीडियाकर्मियों दोनों के खिलाफ ही सबसे बुरे हमले उन राज्यों में हुए हैं जहां भारतीय जनता पार्टी का शासन है, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में, जहां सबसे ज्यादा मौतें हुई हैं। शांतिपूर्ण छात्रों को सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करने वाले तत्वों के रूप में दिखाकर पुलिस ने कुछ के खिलाफ फर्जी मुकदमे भी दायर किए हैं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र भी शामिल हैं। इसी तरह पुलिस पत्रकारों को निष्पक्ष तरीके से अपना काम करने से रोक रही है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया प्रतिष्ठानों और यहां तक कि आम तौर से सरकार समर्थक समाचार एजेंसियों के लिए काम कर रहे पत्रकारों को भी पुलिस ने नहीं बख्शा है।

पुलिस की यह कार्रवाई दरअसल पिछले पांच वर्षों के दौरान मोदी सरकार द्वारा बरती गयी असहिष्णुता की लीक पर ही है। इस अवधि में ज्यादातर मीडिया को सरकारी विज्ञापन एजेंसियों और जन संपर्क एजेंसियों में तब्दील कर दिया गया। मुट्ठी भर पत्रकार हालांकि अब भी ऐसे हैं जो सत्ता के समक्ष सच कहना चाहते हैं लेकिन उनके संस्थानों को या तो वित्तीय रूप से कमज़ोर किया जा चुका है या फिर घुटने टेकने को मजबूर किया जा चुका है। जून 1975 से जनवरी 1977 के बीच 19 महीने की अवधि में इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा लगाये गये आपातकाल के अलावा देखें तो कभी भी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को इस बुरे तरीके से दमित नहीं किया गया जैसा वर्तमान में हो रहा है। हालात को और बुरा बनाने में सोशल मीडिया काम आ रहा है जिसे मौजूदा सत्ता के समर्थन में दुष्प्रचार के एक औज़ार में तब्दील कर दिया गया है।

देश में हर सच्चे व विवेकवान इंसान को मीडियाकर्मियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई का कड़ा विरोध करना चाहिए तथा देश भर की सड़कों पर दैनंदिन घट रहे सच को जस का तस रिपोर्ट करने के उनके अधिकार व कर्तव्य का समर्थन करना चाहिए। अन्यथा, हमें खुद को लोकतंत्र कहना बंद कर देना चाहिए− वो भी दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र− चूंकि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा असहमत स्वरों को बर्बर तरीके से दबाने के प्रयास बहुसंख्यकवादी, तानाशाही और फासिस्ट तरीकों से जारी हैं।

पत्रकारों पर हमले के विरुद्ध समिति नागरिकता संशोधन कानून की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमलों की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा करती है और पत्रकार बिरादरी से अनुरोध करती है कि वे भारत के संविधान में वर्णित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करें।

आनंद स्वरूप वर्मा

एके लारी

परंजय गुहा ठाकुरता

राजेश वर्मा

संतोष गुप्ता

शेष नारायण सिंह

(CAAJ की वक्तव्य समिति)

CAAJ Statement condemning attacks on media-persons during anti CAA-NRC protests in India

New Delhi : As students and young people across India have taken to the streets to peacefully protest the amendment to the Citizenship Act (CAA) and the manner in which the Narendra Modi government intends putting together the National Register of Citizens (NRC) and the National Population Register (NPR), police personnel have responded violently against media-persons who have been reporting and recording audio-visual evidence of the agitations by the youth across the country. The condemnable high-handed behaviour by the police is a clear attempt at attempt at suppressing and censoring independent reportage.

The actions of those responsible for law and order – but who have been complicit with particular state governments – represent a clear instance of “shooting the messenger.” It is noteworthy that the worst attacks against both the protesters as well as media-persons have taken place in states ruled by the Bharatiya Janata Party, in particular, Uttar Pradesh where most deaths have taken place. In their insidious attempts to paint peaceful students as violent destroyers of public property, police personnel have registered false cases against many of them, including those belonging to the minority community. This explains the attempts by the police to prevent journalists from performing their professional duties in an unbiased manner. Media-persons working with international news organisations as well as those in news agencies that are usually supportive of the government, have not been spared the heavy hand of the police.

The actions of the police are in keeping with the intolerance displayed by the Modi government over the last four and a half years. Not only has much of the media been reduced to advertising agencies and public relations offices of the ruling regime, the small section of journalists that are still willing to hold truth to power, and the news organisations employing them or supporting them, have been financially squeezed and sought to be bludgeoned into submission. Never since the days of Indira Gandhi’s Emergency that lasted 19 months between June 1975 and January 1977, has the right of the media to uphold the fundamental right to free expression of each and every Indian citizen that has been enshrined in Article 19(1)(a) of the Constitution, been sought to be so brutally put down as it is at present. Making matters worse, the social media has been weaponised and converted into a propaganda tool for disinformation, almost invariably favouring the ruling regime.

Every right-thinking person in the country must strongly condemn the police action against media-persons and uphold their rights and responsibilities to report and record the truth as it is unfolding on streets every day across the length and breadth of India. Otherwise, we should stop describing ourselves as a democracy – that too, the world’s largest one – as attempts are made by those in power to ruthlessly stifle dissenting voices in authoritarian, majoritarian and Fascist ways.

Committee Against Assault on Journalists condemns police action upon journalists covering anti CAA-NRC protests in all possible terms and urges the journalist fraternity to come out and defend their Right to Freedom of Expression and Speech as enshrined in the Constitution of India.

Anand Swaroop Verma

AK Lari

Paranjoy Guha Thakurta

Rajesh Verma

Santosh Gupta

Shesh Narain Singh

(CAAJ Statement Committee)

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