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वर्मा और अस्थाना, घाघ तो दोनों हैं!

वर्मा और अस्थाना। घाघ तो दोनों हैं। अपने-अपने आकाओं के इशारे पर नाचने वाले. सीबीआई में रहकर अपनों पर करम, ग़ैरों पर सितम करने में इतने उलझे कि एक दूसरे का ही सिर फोड़ने पर उतर आए. मगर वर्चस्व की लड़ाई में मीडिया के शातिराना इस्तेमाल के मामले में वर्मा का कोई जोड़ नहीं।

वर्मा ने मीडिया को इस कदर मोहरा बनाया कि एक धड़े ने तो उन्हें जांच और सुनवाई से पहले ही ‘महात्मा गांधी’ मान लिया है. सुप्रीम कोर्ट में सीलबंद जवाब दाख़िल करने से पहले ही उसका अंश मीडिया को लीक कर निजी फायदे और विशेष दिशा में माहौल बनाने की कोशिश बता रही है डायरेक्टर साहब भी बड़े वाले खिलाड़ी है।

मीडिया को मोहरा बनाकर यह खेल यूं तो राकेश अस्थाना भी कर सकते थे. जब उन्होंने 25 अगस्त को ही सतीश साना के कथित बयान के आधार पर सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और ज्वाइंट डायरेक्टर एके शर्मा के खिलाफ शिकायतें कैबिनेट सचिव से लेकर सीवीसी तक को भेजी थी. तब उनके खिलाफ डायरेक्टर साहब ने मुकदमा भी नहीं किया था. उन्हीं शिकायतों से खार खाने के बाद ही आलोक वर्मा ने सतीश साना लिंक निकालकर अस्थाना पर केस ठोकवा दिया.

अस्थाना की शिकायतों से पहले वर्मा को सुधि ही नहीं थी कि मोइन कुरैशी…सतीश साना…दो करोड़…तीन करोड़ घूस …वगैरह…वगैरह की. इन शिकायतों पर अस्थाना ने जुबान तब खोली, जब उनके खिलाफ केस हुआ. यानी पहले मीडिया में अपने आरोपों को लेकर कुछ लीक नहीं किया.

मजे की बात है कि राकेश अस्थाना की जांच रिपोर्ट में सतीश साना बयान देता है कि उसने डायरेक्टर साहब को दो करोड़ रुपये दिए और फिर डायरेक्टर साहब की ओर से कराई गई जांच रिपोर्ट में वही सतीश साना कहता है कि उसने स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना जैसे दिखने वाले व्यक्ति( व्हाट्सअप डीपी देखकर अनुमान लगाया) को पैसे दिए. यानी दोनों अफसरों के बीच मोहरा सतीश साना ही हुआ.

डायरेक्टर साहब का कहना है कि राकेश अस्थाना ने सतीश साना का फर्जी बयान लिया, जबकि बाद में जो बयान लिया गया वह असली था. अब सच भगवान जानें….

कहा जा रहा वर्मा की हर रणनीति मे उनके वकील के अलावा प्रशांत भूषण और एक रिटायर्ड प्रिंट एडिटर शामिल हैं। प्रशांत कानूनी दांव-पेंच तो पत्रकार महोदय, इस केस में मीडिया से जुड़ी रणनीति बना रहे हैं. सूत्रों के हवाले से क्या उड़ाकर कहां निशाना साधा जाए और अपनी इमेज बिल्डिंग और दूसरे की धराशायी करने के लिए क्या किया जाए, इन सब की प्लानिंग में जुटे हैं. लक्ष्य’ एक होने के कारण दोनों इस क़दर वर्मा के करीबी हो गए हैं कि सुप्रीम कोर्ट में दिया जाने वाला सीलबंद जवाब का पेपर भी उनके हाथों से गुजरकर गया.

आलोक वर्मा के बेचारे बुजुर्ग 89 साल के वकील फली नरीमन को यह पता ही नहीं रहा होगा जिस जवाब को वह एक्सक्लूसिव बताकर सुप्रीम कोर्ट में मी लार्ड को सौंपने जा रहे हैं, वह जवाब तो वर्मा जी की कृपा से कई आंखों से होकर गुजरा है. बस फिर क्या था कि सबसे बड़े वाले मी लार्ड के मुंह से वर्मा के वकील फली नरीमन को फटकार सुननी पड़ गई. सीजआई ने खबर का प्रिंट आउट दिखाते हुए पूछ दिया कि ये जो आप जवाब दे रहे हैं, यह पहले से ही कैसे छप गया है. खुद उन्हें कोर्ट में कहना पड़ गया कि अब तक उनके जीवन में ऐसी शर्मिंदगी कभी नहीं झेलनी पड़ी.

नरीमन साहब को संभवतः पता नहीं रहा होगा कि जिसका केस वह लड़ रहे हैं, वह उनके अलावा और कई पॉवर सेंटर के हाथों में खेल रहे हैं. बहरहाल, यह देखना दिलचस्प है कि मीडिया का एक धड़ा जांच और सुनवाई पूरी होने से पहले ही आलोक वर्मा को महात्मा गांधी मान बैठा है और दूसरा धड़ा मोदी कनेक्शन के चलते राकेश अस्थाना को नाथूराम.

प्रतिभाशाली पत्रकार नवनीत मिश्रा की एफबी वॉल से. 

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