IIMC में महत्वहीन भारतीय गणतंत्र

ये है भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) जहां कि भारत के साथ ही विश्व के सुदूर कोनों से भी लोग पत्रकारिता पढ़ने आते हैं। और ये तस्वीर है 26-01-2015 सुबह 11:20 बजे की जहां भारत के हर कोने में गणतंत्र दिवस की धूम थी। हर तरफ झंडारोहण हो चुका था और मिष्ठान्न वितरण के बाद लोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठा रहे थे। हम आईआईएमसी में पढ़ने वाले बच्चे जो कि छात्रावास में रहते हैं। रोज की तरह नाश्ते पर इकट्ठा हुये। आमतौर पर मैं नाश्ता नहीं करता महीनों में कहीं एक बार कर लिया तो कर लिया, लेकिन आज मैं सुबह बहुत जल्दी उठ गया था क्योंकि आज गर्व का दिन था, जश्न मनाने का दिन था।

नाश्ते पर मेरी बात हुई नीरज से वो बोला कि यार कोई तैयारी नहीं दिख रही अपने यहां। मैंने कहा यार यहां 15 अगस्त को 11 बजे के बाद ध्वजारोहण हुआ था, हो सकता है आज भी वही हो। फिर संस्थान में उपस्थित कर्मचारियों से बात की तो पता चला कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। थोड़ी निराशा हुई और ज्यादा दुख। फिर हमने सोचा कि 11 बजे तक देख लेते हैं फिर करते हैं जो करना है। लेकिन 11:20 तक कुछ नहीं हुआ तो हम निकल पड़े झंडे की तलाश में। हालांकि मेरी जेब में पड़े हुये आखिरी 200 रुपये इस बात की इजाजत तो नहीं दे रहे थे कि हम ऐसा करें, लेकिन हम निकल पड़े ये सोचकर कि ये दिन बार-बार नहीं आता। मैं, नीरज प्रियदर्शी और हमारे अनन्य सहयोगी महापंडित (राहुल सांकृत्यायन) पैदल नजदीकी बाजार कटवरिया सराय पंहुचे पूरा बाजार छान मारा लेकिन एक अदद झंडा नहीं मिला।

हमने वहां चाय पी और विचार किया कि आज तो झंडा लेकर ही चलना है। फिर हम वहां से निकले और पंहुचे बेर सराय लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी झंडा नहीं मिला। वहीं पुराने जेएनयू परिसर में स्थित सीआरपीएफ के कैंप में भी हम पंहुच गये झंडे की खोज में लेकिन, उन्होंने कहा कि उनके पास एक ही झंडा था जो कि फहराया जा चुका है। हम बाहर निकले और फिर महापंडित ने कहा कि यार अब ना बस से चलते हैं मुनीरका। हम उनकी बात मानकर बस में बैठे और मुनीरका पंहुचे वहां की गलियों की खाक छानी बहुत खोजने पर एक जगह झंडा मिला उसे लेकर हम वाया ऑटो संस्थान वापस लौटे। यहां कर्मचारियों ने देखा तो कहा कि आ गये गणतंत्र दिवस मनाकर ? हमने कहा कि नहीं तो अभी तो बाकी है यहीं फहरायेंगे तिरंगा। उन्होंने मना कर दिया कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। लेकिन हम जिद पर थे कि आज तो झंडारोहण करके रहेंगे। वैसे भी अब हम तीन ही नहीं थे हमारे अन्य साथी प्रशांत, जितेश, विकास, चंद्रभूषण, अमन, धर्मेंद्र, अमित,  इम्तियाज भी थे।

हम जोर-शोर से डंडे की खोज में लग गय जिसे झंडे में लगाया जा सके। फाइनली हमारे साथी इम्तियाज को मिल ही गया डंडा। हमने झंडे को डंडे में लगाया और फिर हमने ऊपर चढ़ने के जुगाड़ की सोची क्योंकि चढ़ने के लिये कोई शॉर्टकट तो है नहीं और ऊपर ताला लगा था। हम अंदर घुसे तो हमें एक सीढ़ी मिल गई बस फिर क्या था? सीढ़ी थी तो छोटी लेकिन हमारे देसी स्पाइडरमैन नीरज उसके सहारे ही चढ़ गये और हमने फिर थोड़ा सा ऊपर चढ़कर झंडा पकड़ाया। अभी ये सब चल ही रहा था कि एक महाशय अंदर से दौड़ते हुये निकले और बोले कि परमीशन कहां है ? बिना परमीशन कैसे कर रहे हो ? और भी तमाम सवाल लेेकर वो कूद पड़े। हमारे महापंडित और अन्य साथियों ने उनसे शब्दों में मुकाबला कर उन्हें निरुत्तर कर दिया फिर भी वो माने नहीं और किसी प्रशासनिक अधिकारी को फोन कर हमारी शिकायत कर दी। लेकिन अधिकारी ने मामले में दखल देने से मना करते हुये कहा कि झंडा ही तो फहरा रहे हैं। कौन सा गलत कर रहे हैं करने दो। हालांकि तब तक हम झंडा फहरा चुके थे।

फिर उन्होंने खुद ही चाभी मंगाई और ताला खुलवाया और हम सारे कॉमरेड ऊपर गये।।

ये तो रही आज के झंडारोहण की कहानी

अब बात करते हैं थोड़ी सामाजिक और संवैधानिक गरिमाओं की।  हर सरकारी संस्थान में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को ध्वजारोहण का प्रावधान है। लेकिन आईआईएमसी हेडक्वार्टर 15 अगस्त को दिन में 11 बजे के बाद, अमरावती में इस साल हुआ ही नहीं बाकी सालों का पता नहीं। 2 अक्टूबर तो खैर स्वच्छता दिवस में निकल गया और 26 जनवरी को तो हद ही हो गई यहां ना तो कोई समारोह ना कुछ गणतंत्र दिवस बस एक छुट्टी बनकर रह गया। वजह पूछने पर गोल मोल जवाब कि यहां नहीं होता,कुछ वजह है, ये है, वो है जाने क्या क्या। लेकिन असल वजह कोई नहीं बता रहा।

कितनी शर्मनाक बात है कि ना तो कोई प्रशासनिक अधिकारी और ना ही महान रूप से एक्टिव रहने वाला आईआईएमसी एलुम्नाई एसोसिएशन (इम्का) इस दिन संस्थान में झंडारोहण करने के लिये आगे आया। जबकि 4-5 दिसंबर 2014 की रात में यहां कुछ शिक्षकों और कुछ छात्रों के सौजन्य से धूम-धाम से बोनफायर का आयोजन हुआ था जहां क्या-क्या हुआ था सबको पता है। और तो और विरोध करने पर मारने-पीटने तक की धमकियां दी गईं। शिकायत करने पर कोई कार्यवाही नहीं की गई अपितु पीड़ित पक्ष को डांट कर चुप करा दिया गया।  24 जनवरी को वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा करना चाहते थे तो उनको ये कहते हुये मना कर दिया गया कि संस्थान सेक्यूलर है यहां बस राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, और 26 जनवरी ही मनाये जाते है। फिर अब आप ही बताओ कि 26 जनवरी क्यों नहीं मनाई गई ? क्या इससे भी देश की सेक्यूलर इमेज को खतरा है? बंद कक्षाओं में एथिक्स और मोरलिटी के लेक्चर देना बहुत आसान है लेकिन आम जीवन में उनका पालन करना बेहद मुश्किल।। यहां आप वामपंथी कविताओं के पोस्टर लगा सकते हैं किसी अनुमति की जरूरत नहीं।लेकिन तिरंगा फहराने के लिये आपको एक दिन पहले आवेदन देना पड़ेगा। पूरा कैंपस धूम्रपान मुक्त है लेकिन यहां शिक्षक छात्रों को और छात्र शिक्षक को सिगरेट के साथ ही वीड का भी लेन-देन करते हैं। गाजा-सीरिया पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं और अपने देश से किसी को कोई लेना देना ही नहीं। आईआईएमसी हॉस्टल के तो कहने ही क्या ? कहने को तो हॉस्टल में रहने वालों के लिये 32 नियम हैं जिनमें नशाखोरी नहीं करने,10 बजे के बाद बाहर तो दूर किसी और के कमरे में जाने की मनाही लिखी है लेकिन यहां लोग पूरी रात बाहर घूमते रहते हैं। नशाखोरी तो बेहद आम बात है यहां। अब ऐसे में सवाल ये है कि आईआईएमसी में पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार की जाती है या नशाखोर, अराजक, और नक्सली विचारधारा को मानने वाले नौजवानों की फौज ??

लेखक चंदन सूरज पांडेय आईआईएमसी के छात्र हैं. उनसे संपर्क chandu.suraj11@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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