IIMC 2011-12 बैच के पत्रकार अनिल के साथ ये सब क्या हो रहा है… मदद करें

यशवंत भाई,

आपको याद होगा जब वर्ष 2014 में मैंने आपसे बात की थी और मदद मांगी थी, मेरी जान को खतरा है, तो आपने कहा था कि पूरा मैटर लिखकर भेज दो। फिर अचानक धमकी और लैपटॉप खराब हो जाने के कारण मैं आपको मैटर नहीं भेज पाया था मैं डर गया था। मैं अपनी लाइफ फिर से नए सिरे से शुरु कर चुका था। लेकिन वर्ष 2017 में कर्नाटक से ये कुछ लोग जयपुर आ गए। वहां मेरा दो तरह से हैरासमेंट हुआ था कुछ लोगों ने मेरे पर जानलेवा अटैक किया था, औऱ फिर जान से मारने की धमकी दी औऱ बीच में डिफेंस ने दो महीने के लिए नवंबर माह से पहले मुझे नजर बंद कर दिया था।

अनिल कुमार अमरोही

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अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना IIMC के प्रोफेसरों से सीखें

पत्रकारिता के क्षेत्र में चोटी का संस्थान माने जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में इन दिनों प्लेसमेंट हो रहे हैं. यूं तो संस्थान अपने विवरणिका में 100 फीसदी प्लेसमेंट का दावा नहीं करता फिर भी कंपनियां आती हैं और विद्यार्थियों को अपने यहां नौकरी देती हैं. यहां कई भाषाओं, मसलन उर्दू,मलयालम, मराठी (संभवतः पिछले साल या इस साल से शुरू हुआ है या होगा), उड़िया अंग्रेजी, हिन्दी की पढ़ाई होती है. इसके साथ विज्ञापन और रेडियो टीवी के विभाग हैं.

हर साल कोई ना कोई नया हंगामा होता है. सो इस बार भी हो रहा है. इसमें गलती विद्यार्थियों की नहीं है. गलती उन लोगों की है जो प्लेसमेंट सेल के हेड होते हैं. मसलन कभी श्रीमती सुरभी दहिया जी तो कभी रिंकू पेगू जी. अपनी भाषाई सभ्यता को बाकी लोगों पर थोपना हो तो ईस्ट इंडिया कंपनी से नहीं IIMC के प्रोफेसरों से सीखना चाहिए.

आप उस कंपनी की परीक्षा में नहीं बैठ सकते (ऐसी पुष्ट-अपुष्ट जानकारी है. विद्यार्थियों और प्रोफेसरों के इनकार करने पर बदल सकती है.) जिस विभाग के आप छात्र नहीं हैं. मसलन विज्ञापन के प्लेसमेंट कंपनी में हिन्दी और रेडियो टीवी विभाग के लोगों को नहीं बैठने दिया गया. छात्रों ने एक पत्र लिखा है.

हिन्दी का इतना बड़ा बाजार होने पर भी अगर विद्यार्थियों को विज्ञापन विभाग की परीक्षाओं में बैठना पड़ रहा है तो यह भी अपने आप में एक चोटी के संस्थान लिए शर्म की बात है, वो भी तब जबकि संस्थान के महानिदेशक श्री केजी सुरेश जी खुद DD समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं.

खैर, अभी तो बात सिर्फ विज्ञापन विभाग की है. दावा कर रहा हूं जो सच होगा भी कि रेडियो और टीवी की प्लेसमेंट परीक्षाओं में भी ऐसी कारगुजारियां होंगी. IIMC में प्लेसमेंट उसी दिन संपन्न मान लिया जाता है जब विज्ञापन और कुछ एक अन्य विभागों में छात्रों की नियुक्तियां अथवा इंटर्नशिप की व्यवस्था संपन्न हो जाती है.

हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों को RTV से जुड़ी क्लासेज में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इक्विपमेंट नहीं दिलाए जाते. यह सब तब है जबकि IIMC एक स्वायत्त संस्थान हैं. (समझ रहे हैं ना जो बीते दिनों 60 संस्थाओं के साथ किया गया है. फायदा नुकसान यहीं देख लें.)

अंग्रेजी में पीपीटी मुहैया करा देने वाले प्रोफेसर, आपसी लड़ाई (मसलन नेताओं और राजनीतिक दलों से संस्थागत करीबी, HOD और DG के पद के लिए ) में बिजी रहते हैं. लेकिन किसी के पास इतना वक्त नहीं होता कि कोई नौकरियों पर ध्यान दे ले. सबके बहुत संपर्क है. इतना की एक बार में मेरे सरीखे शख्स का गूगल कॉन्टैक्ट भर जाए (अगर ऐसा होता हो तो) लेकिन सब संपर्क नौकरी के नाम पर ना जाने कहां गायब हो जाते हैं.

क्लास में लेक्चर के समय विद्यार्थी अक्सर (मैंने सुना है) प्रोफेसर का इतिहास सुनते रह जाते हैं. फिर प्लेसमेंट के समय खुद इतिहास होकर रह जाते हैं. बेहतर हो कि आने वाली बैच यह सोच कर बिल्कुल ना आए कि उसे यहां से नौकरी मिलेगी. प्रोफेसर लोगों की आपसी खींचतान, EG0 (काम शुरू करे 6 सेकेंड में) और DG की लफ्फाजियों के चलते विद्यार्थियों का जीवन चौपट होता है.

मेरी राय है कि संस्थान इस साल जारी किए जा रहे विवरणिका में यह स्पष्ट कर दे कि हम नौकरी नहीं दे सकते. हम अभी आपसी लड़ाई, खींचतान और EGO में बिजी हैं. जब खुद इन सबसे मुक्त हो जाएंगे तो आपकी चर्चा करेंगे.

विभागों में प्रोफेसर नहीं हैं. जो बाहर से पढ़ाने आते हैं उनका भी मानदेय का बिल देख कर साहबान-मालिकान भड़क जाते हैं. मिड टर्म में एक हिन्दी विभाग के एक शिक्षक का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने वाले हैं ऐसी खबर है. हो सकता है कोई अपना बेरोजगार बैठा हो.

फिलहाल इस प्लेसमेंट में अब तक जो कारगुजारियां हुई हैं उन पर रोक लगाया जाए और फेयर प्लेसमेंट कराया जाए. बाद बाकी मुझे उनकी बड़ी चिंता हो रही है जो ‘हंगामा नहीं नौकरी चाहिए’ का पोस्टर पीठ पर टांगे घूम रहे थे.

सादर

राहुल सांकृत्यायन

युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार राहुल सांकृत्यायन की एफबी वॉल से.

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रवीश कुमार और सुप्रिय प्रसाद वाले बैच के iimc स्टूडेंट्स का मिलन समारोह (देखें तस्वीरें)

Vikas Mishra : 6 अगस्त को हर साल की तरह इस साल भी हम दोस्त मिले। भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) में हम लोग पहली बार अगस्त 1994 में मिले थे। सारे संगी आज 40 साल की उम्र पार कर चुके हैं, लेकिन जब मिलते हैं तो फिर उम्र 22-23 साल पीछे चली जाती है। शेरो-शायरी, गाने बजाने के बीच चुटुकले और चुटकियों की बारिश में हर चेहरा खिला मिलता है और ठहाकों से पूरी महफिल गूंज उठती है।

इस बार के मिलन समारोह में खास बात ये थी कि अमरेंद्र किशोर का जन्मदिन था। इस आयोजन में सबसे प्रमुख भूमिका हमेशा की तरह राजीव रंजन की रही। जिसने दोस्तों को जुटाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। अमरेंद्र उसके साथ रहा, कदम दर कदम। हर बार की तरह इस बार भी अमृता का कैमरा चमकता रहा। सबको पता था कि अमृता का कैमरा आएगा, फिर तो किसी ने ज्यादा तस्वीरें खींचने की कोशिश भी नहीं की।

इस बार हमारे कई मित्र नहीं आ पाए, एक तो रक्षा बंधन का त्योहार, ऊपर से उनकी कोई विवशता। खैर, अगली बार फिर मिलेंगे। ये हमारे लिए गौरव की बात है कि हमारे बैच के सभी मित्र जहां हैं, झंडे गाड़े हुए हैं। देश के नंबर वन चैनल आजतक के संपादक सुप्रिय प्रसाद हमारे बैच के हैं तो नंबर वन अखबार के मेरठ संस्करण के संपादक मुकेश सिंह भी इसी बैच के हैं।

अमरेंद्र, उत्पल, संगीता, रवीश कुमार, नलिन, अमृता, सतीश, अमन, रत्नेश, दो दो राजीव, सरोज, शालिनी, शिव कहां तक नाम गिनाएं, हमारे बैच के जितने भी मित्र हैं, सभी बैच का नाम चमचमाए हुए हैं, लेकिन जब हम मिलते हैं तो कौन कहां है, ये भूल जाते हैं, ऐसा ही तो हुआ 8 की रात। ये मेरे लिए बहुत आत्मीय पल रहे हैं, जिन्हें मैं अपने फेसबुक के मित्रों के साथ बांट रहा हूं। फोटो स्लाइड शो के लिए नीचे क्लिक करें :

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र की एफबी वॉल से.

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आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान हास्टल वार्डन के प्रशासनिक दायित्व से मुक्त

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन यानि आईआईएमसी में इन दिनों महानिदेशक केजी सुरेश के चमड़े का सिक्का चल रहा है. शिक्षकों से उनकी सीधी भिड़ंत है लेकिन सत्ता शह के बल पर वह लगातार अपनी मनमानी चलाते जा रहे हैं. ताजी सूचना के मुताबिक प्रोफेसर आनंद प्रधान को हॉस्टल वॉर्डन के प्रशासनिक कार्यों के दायित्व से मुक्त कर दिया गया है. चौदह वर्षों से आईआईएमसी से जुड़े और छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय आनंद प्रधान फिलवक्त बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं.

आनंद प्रधान ने सात शिक्षकों के साथ मिलकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव को पत्र भेजकर केजी सुरेश की मनमानी का जिक्र किया था जिससे सुरेश नाराज हो गए. प्रधान ने यह भी कहा था कि केजी सुरेश ने मीडिया में जो बयान दिया उससे उनका अपमान हुआ और प्रतिष्‍ठा को ठेस पहुंची. शिक्षकों ने पत्र में केजी सुरेश पर एक पक्षीय और अपारदर्शी प्रशासन चलाने का आरोप लगाया. उधर, केजी सुरेश ने सारे आरोपों का सिरे से खंडन किया.

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संघ के कार्यक्रम में IIMC की रहस्यमयी सहभागिता का पर्दाफाश RTI से हुआ

दिनांक 5 अप्रैल 2017 को आरएसएस के थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन ने “Communicating India” विषय पर एक कांफ्रेंस कराया। इस कांफ्रेंस में कैबिनेट मंत्री वैंकेया नायडू, डॉ जीतेन्द्र सिंह आदि बड़ी हस्तियां सम्मिलित हुई थी। उस कांफ्रेंस के विभिन्न प्रचार सामग्रियों में IIMC का ऑफ़िसियल लोगो (चिह्न) लगाकर, IIMC को in association with बताया गया था।

5 अप्रैल को शाम जब हमें इस कार्यक्रम की सूचना लगी, तो हम RTV विभाग के छात्र अंकित और साकेत तुरंत डीजी साहब के ऑफिस गए। उस समय डीजी साहब चैम्बर में मौजूद नहीं थे, लेकिन उनके पीए K M Sharma सर मिले, जिन्होंने इस कांफ्रेंस के बारे में पूछे जाने पर अनभिज्ञता जाहिर कर दी। संयोगवश उसी समय वहां पर IIMC की डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स सुरभि दहिया मैम भी मिली, उन्होंने भी सीधे- सीधे इस कांफ्रेंस के बारे में अनभिज्ञता जाहिर कर दी।

तत्पश्चात हम तुरंत एडीजी सर से मिलने उनके ऑफिस गए। जहां उनके पीए गोपाल जी को हमने इस कांफ्रेंस के बारे में बताते हुए सर से मिलने के लिए बोला, लेकिन गोपाल जी ख़ुद ही एडीजी सर के पास गए और चैम्बर से निकलकर हमें यह सूचना दी कि इस कांफ्रेंस के बारे में वह (एडीजी) भी अनभिज्ञ हैं। कुछ दिन बाद हमने पड़ताल की, तो विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन के ऑफ़िसियल वेबसाइट और कुछ अन्य लोगों के ट्विटर और फ़ेसबुक पोस्ट से हमें जानकारी लगी कि हमारे डीजी साहब स्वयं उस कांफ्रेंस में मौजूद थे, जिससे संबंधित फ़ोटोग्राफ़ और वीडियो हमने फ़ेसबुक पर पब्लिकली पोस्ट और शेयर किया था।

इस कांफ्रेंस में VIF के साथ IIMC भी सहभागी था, इसकी पुष्टि प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) ने अपने ऑफ़िसियल ख़बर से कर दी है। कुछ और मीडिया वाले जैसे APN News ने भी इसकी पुष्टि की थी। मैंने (अंकित) डीजी साहब को इस कांफ्रेंस को लेकर विभिन्न भ्रामक स्थितियों के लिए एक ईमेल भी किया था और साथ ही साथ संस्थान में एक आरटीआई (RTI) भी फ़ाइल किया था। जब 10 अप्रैल को हम (रोहिन, आर्य भारत, साकेत, अंकित) छात्र डीजी साहब से उनके ऑफ़िस में मिले तो उन्होंने बोला कि कांफ्रेंस के बारे में ईमेल से जवाब न देकर आरटीआई से जवाब दे दिया जाएगा।

आरटीआई में इस कांफ्रेंस से मुख्यतः 3 सवाल थे-

1. विवेकानंद इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन ने 5 अप्रैल 2017 को IIMC का ऑफिशियल लोगो लगाते हुए तथा IIMC को in association with बताते हुए, ‘Communicating India’ विषय पर जो कांफ्रेंस कराया था, उसके बारे में क्या IIMC प्रशासन को जानकारी थी या नहीं?

2. यदि IIMC प्रशासन को इस कांफ्रेंस के बारे में जानकारी थी, तो IIMC को उस फ़ाउंडेशन के साथ कांफ्रेंस के लिए ‘in association with’ होने की अनुमति किस सक्षम प्राधिकारी (competent authority) के द्वारा दी गई थी? प्राधिकारी का नाम व पद (Name & Post) बताने की कृपा करें।

3. यदि कांफ्रेंस को लेकर कोई अनुमति दी गई थी, तो उस अनुमति पत्र की छायाप्रति देने की कृपा करें।

ये मिला आरटीआई (RTI) से जवाब….

प्रश्न संख्या “1- 3” के बारे में संस्थान के रिकॉर्ड के अनुसार इस तरह की सूचना उपलब्ध नहीं है।

हम छात्रों की इस विषय पर यह सोच उभर कर सामने आती है कि —

1. यह कैसे संभव है कि IIMC किसी दूसरे फ़ाउंडेशन, NGO या संस्था के साथ कोई कांफ्रेंस या सेमिनार सहभागी होकर करती है और इसके बारे में कोई रिकॉर्ड ही इसके पास नहीं होता है। वो भी उस कांफ्रेंस में जिसमें कैबिनेट मिनिस्टर वैंकेया नायडू और जीतेन्द्र सिंह जैसे लोग शामिल होते हैं।

2. यह कैसे संभव है कि जिस कांफ्रेंस में IIMC सहभागी थी और इसके (IIMC) डीजी ख़ुद मौजूद होकर मंचासीन थे, उस कांफ्रेंस के बारे में IIMC के रिकॉर्ड में कोई सूचना ही नहीं है।

3. यह कैसे संभव है कि IIMC के डीजी जिस कांफ्रेंस में गए, उस कांफ्रेंस के बारे में IIMC के एडीजी, DSW और ख़ुद उनके पीए को सूचना नहीं हो।

4. यह कैसे संभव है कि IIMC ने VIF के साथ सहभागी होकर ‘Communicating India’ जैसे शैक्षणिक विषय पर कांफ्रेंस में भाग लिया हो, जिसकी पुष्टि PIB (Press Information Bureau) जैसे सरकारी भोंपू ने भी कर दी हो, से संबंधित रिकॉर्ड IIMC के पास मौजूद ही न हो। तब तो IIMC और PIB दोनों में से कोई एक ही सही हो सकता है। संयोग से दोनों ही सूचना प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं, अब सही- ग़लत का फ़ैसला मंत्रालय ही कर सकता है।

इस मुद्दे में एक मज़ेदार और साथ ही गंभीर विषय सामने आया है। वो है IIMC के लोगो (चिह्न) को लेकर। विवेकानंद फ़ाउंडेशन ने उस कांफ्रेंस में IIMC को ‘in association with’ दिखाते हुए, IIMC का ऑफिशियल लोगो भी यूज़ किया था। जब हमने इस कांफ्रेंस में IIMC के रहस्यमयी सहभागिता को लेकर सवाल खड़ा किया था, तो हमने यह भी सवाल उठाया था कि क्या उस फ़ाउंडेशन ने IIMC के ऑफिशियल लोगो को कांफ्रेंस से संबंधित अपने विभिन्न प्रचार सामग्री पर यूज़ करते समय IIMC प्रशासन से अनुमति ली थी या नहीं।

इसी दौरान हमने आरटीआई में IIMC प्रशासन से यह सवाल भी पूछा कि IIMC अपने जिस लोगो (चिह्न) को प्रॉस्पेक्टस, मुख्य भवन एवं तमाम दस्तावेजों पर प्रयोग में लाती है, क्या वह…

1. भारत में स्थापित किसी विधिक प्राधिकारी (Legal authority) या विधिक संस्था के समक्ष रजिस्ट्रीकृत है? या भारत के किसी विधिक अधिनियम (Legal Act) के तहत कभी रजिस्टर्ड हुआ है?

2. यदि IIMC का लोगो (चिह्न) रजिस्टर्ड है, तो उसके रजिस्ट्रेशन प्रमाण- पत्र की छायाप्रति उपलब्ध कराइए।

RTI से ये मिला जवाब…..

IIMC प्रशासन को लोगो (चिह्न) के पंजीकरण के बारे में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है।

हम छात्र यह सोचते हैं कि IIMC प्रशासन थोड़ा सतर्क होकर अपने आफ़िशियल लोगो (चिह्न) के पंजीकरण के बारे में सूचना उपलब्ध कर ले, नहीं तो समाज में तमाम फ़र्ज़ी संगठन और व्यक्ति मौजूद हैं जो इस लोगो (चिह्न) के मिसयूज़ के ज़रिए IIMC का गुडविल ख़राब कर सकते हैं।

I love IIMC, लेकिन दो निवेदन है…

1. एक तो सीधे- सीधे कांफ्रेंस में IIMC के रहस्यमयी सहभागिता को लेकर ज़िम्मेदार लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई हो।

2. दूसरा IIMC के ऑफ़िसियल लोगो (चिह्न), यदि रजिस्टर्ड नहीं है तो इसे तुरंत रजिस्टर्ड कराया जाय।

अंकित कुमार सिंह
Radio tv journalism
IIMC, Delhi
mob.n. 9205800380
mail ankit.deaddiction@gmail.com

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छात्र द्वारा महानिदेशक को लिखे गए पत्र से आईआईएमसी फिर सुर्खियों में, आप भी पढ़ें

पिछले कुछ महीनों से भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) लगातार कई वजहों से खबरों में है. इन दिनों संस्थान के एक छात्र द्वारा महानिदेशक को लिखा गया एक पत्र चर्चा का विषय बना हुआ है. पूरा पत्र इस प्रकार है…

सेवा में,
श्री के जी सुरेश जी
महानिदेशक,
भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
विषय: संस्थान में व्याप्त असीमित गुंडागर्दी के संदर्भ में

श्रीमान महोदय,

प्रार्थी आशुतोष कुमार राय, हिंदी पत्रकारिता का विद्यार्थी हूँ| महोदय मैं एक सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखता हूँ| यहां से मिली कर्तव्य और ईमानदारी को बचाये रखने के लिए प्रतिबद्ध हूँ| श्रीमान  मध्यम वर्गीय परिवार के ताने-बाने ने मेरे अंदर स्वाभिमान भी कूट-कूट कर भरा है| मेरी यह कोशिश भी रहती है कि खुद को इस प्रकार बना सकूं जिससे मेरे अभिभावक मुझ पर फक्र महसूस कर सकें| महोदय मैं एक विद्यार्थी हूँ और बहस के साथ विचारों के आदान-प्रदान के हरेक माध्यमों में गहरी आस्था रखता हूँ| गाँधी के आदर्शों पर खड़ी की गयी लोकतंत्र के संसद और बाबा साहब के संविधान को अपना धर्म और धर्मग्रंथ मानता हूँ| यह मेरे लिए गीता और कुरान से सर्वोपर है क्योंकि संविधान ने मुझे सबके समान बताया है और अभिव्यक्ति और आलोचना करने की स्वतंत्रता दी है| व्यक्ति से लेकर शासन-प्रशासन की निरंकुशता पर सवाल उठाना हरेक प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थी का आवश्यक लक्षण है| बात जब पत्रकारिता के विद्यार्थी की हो तो यह उसका लक्षण नहीं परम कर्तव्य है.

महोदय लेकिन अब यह कर्तव्य का निर्वहन कुछेक लोगों के लिए गले की हड्डी बनती हुई नजर आ रही| हमारे द्वारा लिखे गए  लेखों पर वह गुंडों की तरह संस्थान परिसर में मारपीट की धमकी और गाली-गलौज करते हैं| गाय को माँ कहने  वाले राघवेंद्र सैनी (हिंदी पत्रकारिता) और मुदित शर्मा (हिंदी पत्रकारिता) हमें माँ-बहन की गालियां देते हुए हाथापाई पर उतर आते हैं| साथ ही साथ आरएसएस के साथ अपने दिव्य संबंधों का हवाला देते हुए आप के संरक्षण का गुणगान करते हैं| उनको लेकर यह मेरी व्यक्तिगत शिकायत नहीं है |आये दिन वह यह अव्यवहारिक दुस्साहसिक कार्य को अंजाम देते हैं|यह देखा भी गया है की प्रशासन की तरफ से भी इनकी सक्रियता का बकायदे सहयोग लिया जाता है| ताज़ा उदाहरण है विवेकानंद फाउंडेशन और भारतीय जनसंचार संस्थान के सहयोग से कराया गया ‘कम्युनिकेटिंग इंडिया’ सेमिनार जिसमें इन दो चार लोगों की उपस्थिती पर हमने सवाल उठाये थे| हमारा सवाल था की जब दो सौ से भी ज्यादा विद्यार्थी संस्थान में मौजूद हैं फिर यहीं गिने-चुने ही लोग हर सेमिनार को किसकी अनुमति से अटेंड करते हैं| इस सवाल से तिलमिलाए विशेषकर इन दो लोगों ने मुझसे निपटने की धमकी दी|

इनकी धमकियों में जो गुंडई का पुट था वह कुछ ऐसा था की पहले तो यह पुस्तकालय के बाहर हमारे साथी अंकित कुमार सिंह से हाथापाई और फिर बाद में मारपीट की धमकी दी, साथ ही साथ उनके फेसबुक पोस्ट को हटाने की मांग की| चूंकि पोस्ट को मैंने भी सराहा था इसलिए उसके अगले दिन मुझको भी ”अगला नजीब” बनाने की चेतावनी दी| मुदित शर्मा और राघवेंद्र सैनी ने गाली देते हुए संस्थान से बाहर मेरी औकात बताने के लिए अपनी बात रखी जिसको मैं सिर्फ त्वरित उत्साह का परिणाम नहीं मानता|

महोदय मैं एक निर्भीक विद्यार्थी हूँ जो कहीं से भी इस संस्थान और भारतीय लोकतंत्र केलिए अपराध की श्रेणी में नहीं आता| इस स्थिति में अगर मेरे साथ कोई भी दुर्घटना घटित होती है तो इसके लिए सीधे तौर पर संस्थान प्रशासन जिम्मेदार होगा| साथ ही साथ मैं यह जानना भी चाह रहा की जिस तरह से इनको हमारे ऊपर वरीयता दी जा रही इसके पीछे के मुख्य कारण क्या है? क्या सच में इनको असीमित छूट दी जा चुकी है क्योंकि न तो पिछली शिकायतों पर कोई कारावाई होती है न ही इनको कोई सजा होती है| महोदय सरकारी और गैर सरकारी हरेक सेमिनारों में आपके साथ इनकी खिलखिलाती तस्वीरें सोशल मीडिया पर बकायदे प्रकाशित और सम्पादित होती रहती है, इसलिए आपकी घनिष्टता को लेकर एक आश्चर्यजनक आश्वस्ति जेहन में उतरती है|

महोदय आर टी वी विभाग के वैभव ने भी मुदित की शिकायत की थी जिसमें मुदित ने वैभव को हॉस्टल में आकर मारने की धमकी दी थी |इस पर अनुशासनात्मक कारावाई का आज तक इंतज़ार है| मैं इंतज़ार का धीरज नहीं रख पाऊंगा| मैं चाहता हूँ की आप इन पर अनुशासनात्मक कारावाई करें| यह कार्यवाई निष्पक्ष रूप से हो इसके लिए दोनों लोगों को तत्काल प्रभाव  निलंबित कर जाँच होने तक संस्थान से बाहर रखा जाय| मैं संस्थान से उम्मीद रखता हूँ की मेरी शिकायत पर तत्काल प्रभाव से कार्यवाई की जायेगी अन्यथा मुझे सुचना प्रसारण मंत्रालय का दरवाजा खटखटाना होगा | अगर मेरी बातों को वहां भी अनसुना किया जायेगा तो अंततः मुझे संस्थान परिसर में भूख़ हड़ताल पर जाना पड़ेगा |

प्रार्थी
आशुतोष कुमार राय
हिंदी पत्रकारिता
९५४०४१५४७२

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सोशल मीडिया पर लिखने के कारण IIMC से सस्पेंड होने वाले रोहिन वर्मा देश के पहले स्टूडेंट

Dilip Mandal : सोशल मीडिया पर लिखने के कारण अपने इंस्टिट्यूट से सस्पेंड होने वाले रोहिन वर्मा देश के पहले स्टूडेंट हैं। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत काम करने वाले IIMC ने यह क़दम उठाया है। रोहिन अपने कॉलेज के श्रेष्ठ स्टूडेंट रहे हैं। रोहिन पर लिखने का आरोप है। रोहिन ने ऐसा क्या आपत्तिजनक लिख दिया है, वह IIMC को सार्वजनिक करना चाहिए।

प्रचारक ने कहा- लडका ख़तरनाक है। इसे इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्यूनिकेशन यानी IIMC से हटाओ। इसे लाइब्रेरी में तो क़तई न घुसने दो। क्यों? क्यों क्या? वह लिखता है। पत्रकार है और लिखता है। The Hoot और News Laundry में छपता है। जहाँ IIMC के सबसे बड़े अफ़सर और कई प्रोफ़ेसर तक अपना लिखा नहीं छपवा सके। नाम रोहिन वर्मा है। मैंने लड़के की टाइम लाइन देखी। ऐसा क्या लिख दिया बंदे ने। ख़ास कुछ नहीं है। यही कुछ संस्थान की बातें। सब संविधान के मौलिक अधिकार के दायरे में। अपनी माँ के साथ सेल्फी। कुछ खान पान की तस्वीरें। कुछ JNU वाले नजीब की अम्मा। एक ही ख़तरनाक चीज़ नज़र आई। सावित्रीबाई फुले। वह पत्र जो सावित्रीबाई ने ज्योतिबा फुले को लिखे थे।

Abhishek Ranjan Singh : रोहिन वर्मा पर भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) प्रशासन ने जो कार्रवाई की है. वह गलत ही नहीं, बल्कि ग़ैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव है. उन्हें चाहिए कि तत्काल रोहिन का निलंबन वापस लिया जाए. एक छात्र के लिए इससे अधिक पीड़ादायक कुछ और नहीं हो सकता. आईआईएमसी के मौजूदा एवं पूर्व छात्रों को भी इस घड़ी में रोहिन के साथ खड़ा होना चाहिए. मैं IIMCAA यानी भारतीय जनसंचार संस्थान पूर्व छात्रसंघ की गंभीरता के बारे में कुछ भी कहना व्यर्थ है, क्योंकि छात्रहित के नाम पर गठित यह पूर्व छात्रसंघ नहीं, बल्कि विशुद्ध रूप से एक गैर सरकारी संगठन (NGO) है जो आईआईएमसी का नाम लेकर, आईआईएमसी के भ्रष्ट अधिकारियों की सरपरस्ती में सिर्फ़ और सिर्फ़ आयोजनों के नाम पर सरकारी और निजी कंपनियों से प्रायोजन के नाम पर धन उगाही करता है.

जिस तरह किसी मंदिर और मठ में चंद महंथ होते हैं, उसी तरह यहां भी कुछ स्वयंभू मठाधीश बैठे हैं. यह संगठन सब कुछ करता है, सिवाय छात्र हित के. सवाल चाहे ढाई दशकों से बंद पड़े लड़कों के लिए छात्रावास का हो. या फिर हर साल प्रवेश परीक्षा में बढोतरी की जाने वाली राशि हो या कोर्स फीस की. इन तमाम बुनियादी सवालों से IIMCCAA के हाकिमों को सख्त परहेज़ है. उनके मुताबिक़, ये तमाम सवालात आईआईएमसी के आंतरिक मसले हैं. ज़नाब-ए-आली फिर आप हर रविवार को आईआईएमसी के वातानूकुलित मीटिंग रूम और ऑडिटोरियम किस हैसियत से प्रयोग करते हैं? नियमानुसार आपसे इसका किराया वसूला जाना चाहिए? यह संगठन आईआईएमसी के प्रतीक चिन्ह यानी लोगो का ग़लत इस्तेमाल करता है. यह भी आपत्ति का विषय है, क्योंकि यह संगठन एक तिजारती यानी कारोबारी संगठन है जिसका एक ही उद्देश्य है व्यापार करना और धन जमा करना.

रोहिन वर्मा के पक्ष में इनसे किसी प्रकार की उम्मीद न करें. मेरा एक सुझाव है अगर चाहें तो इस पर अमल कर सकते हैं. रोहिन का निलंबन वापस होना चाहिए. इस बाबत एक छात्रों का शिष्टमंडल संस्थान के महानिदेशक से मिले उनसे वार्ता करे और एक सप्ताह का समय दे निलंबन की वापसी के लिए. अगर उसके बाद भी इस दिशा में संस्थान कोई पहल नहीं करता है, तब उस परिस्थिति में मौजूदा एवं पूर्व छात्रों को विरोध-प्रदर्शन करना चाहिए. क्योंकि यह सवाल सिर्फ रोहिन का नहीं है अगर आज विरोध के स्वर नहीं निकलेंगे, तो कल कोई और छात्र इसका शिकार होगा!

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल और अभिषेक रंजन सिंह की एफबी वॉल से.

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टर्मिनेट किए जाने के बाद IIMC के शिक्षक नरेंद्र सिंह राव ने डीजी केजी सुरेश को लिखा खुला पत्र

My Open Letter to the Director General, IIMC

To

Mr KG Suresh
The Director General
Indian Institute of Mass Communication
JNU New Campus, New Delhi-67

Dated: December 25, 2016

Dear Mr. KG Suresh,

I, Narendra Singh Rao, so far, had been teaching in a full-time basis as Academic Associate at the Indian Institute of Mass Communication, (IIMC), New Delhi, since August 2010. I am in receipt of the office order F.No.I/Consultancy/ 2012 dated 21stDecember, 2016 (mailed to me on the evening of 22nd December, 2016) “terminating my services with immediate effect without assigning any reason”.

I can well understand why you have decided to terminate my six-and-a-half years long continuous services in such an abject and callous manner at a time when I was officially on medical leave as I was suffering from acute headache and fluctuating blood pressure due to a month long continuous and brute harassment, and gross victimization thrust upon me by the illegally and-newly appointed Course Director of the department of Ad/PR, Ms. Surbhi Dahiya, about which I had filed a complaint with you via e-mail dated December 18, 2016.  And, in turn, in order to protect the victimizer and harasser, Ms. Surbhi Dahiya, you have terminated my services without any reason. I could never imagine the institute I had been serving for so long with all honesty and integrity would be sacking me in such a crude and medieval manner, wherein, I, the complainant, have been sacked from my job undemocratically and illegally just because I dared to file a complaint against harassment and victimization.   

Essentially, your decision of terminating my services in such a ruthless and illegal manner clearly reflects the spirit of vendetta which motivated you to ‘punish’ and victimize me as I had raised my voice against a number of atrocities being committed against vulnerable people in the campus, which include the recent illegal sacking of 25 Dalit safai karmacharis, constant victimization of a Dalit rape survivor, harassment of  a Muslim student, who was forced to contemplate suicide, by the reactionary and brahmanical forces of IIMC nurtured and supported by you, the illegal appointment of Course Director of Ad/PR, Ms. Surbhi Dahiya (who does not even have basic qualification or experience in Ad/PR and has been rejected for the lectureship in the department as recently as 2013), pressure tactics used by your administration to force a female student to withdraw the case of cyber-sexual harassment, rampant attempts being made to saffronise the media education and ethos in the campus (wherein only journalists with Right-wing, Hindutva/RSS leanings are invited for special lectures), rampant contractualization and bureaucratization of academics, and many other such issues on which I took pro-democracy, secular and pro-academic positions which were not in sync with your personal and  political agenda.

I am proud of the fact that I could live by my lifelong ideals of equality, liberalism, fraternity, secularism and social justice, and did not compromise even for the sake of saving my job. You can surely remove me from my job, but you shall never be able to remove the imprints of intellect I have left on the young minds through more than 500 classroom lectures and tutorials I have delivered during my teaching career at IIMC in the last six-and-a half years during which I was promoted three times for my teaching skills and academic contribution to the institute.

The past tells us about where the people who stand by their ideals of social justice, democratic, liberalism, and academic excellence go down in history. History never forgets and forgives people like you who undemocratically and illegally snatch away jobs from dissenting voices in order to fulfill their petty personal and political agenda. The world is full of dissenting voices which speak against all kinds of injustices, atrocities and oppressions, come what may. You can never scare them by snatching away their jobs. For me, this ‘punishment’ given by you is a badge of honour which I will wear with pride all my life. It reassures my faith in myself that I am a man of integrity who believed in academic excellence, and who refused to compromise in the face of direct assaults by communal-fascist forces and the tyranny of crass mediocrity.

If you are terminating my services for my unshakable and non-negotiable faith in humanistic ideals and academic freedom, I, without any qualms, accept your decision; and, thereby, pledge to fight back with all vigour and legal means.     

Sincerely,

Narendra Singh Rao
IIMC, New Delhi
December 25, 2016

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Dalit Atrocities taking place at IIMC, New Delhi.

Rampant Dalit atrocities (including Sexual Harassment of a Dalit woman)  in open are taking place at the premier government media institution, the Indian Institute of Mass Communication (IIMC), New Delhi. Request you to kindly investigate and do the necessary for a justice-seeking Dalit woman. Given below is the detail…

This is to bring to your kind attention that at the Indian Institute of Mass Communication (IIMC), New Delhi, a premier government institution of media and journalism studies of the country, run by the Ministry of Information and Broadcasting, Government of India, rampant Dalit atrocities (including sexual harassment of a Dalit woman) have been taking place with full backing of the administrators helming the affairs including the Chairperson and the Director General of IIMC.

As recently as 30th of September 2016, in abject violation of Indian Law and Constitution, IIMC has arbitrarily and illegally decided to terminate the services of more than 25 Dalit manual laborers / safai karamcharis who had dedicatedly been working at IIMC for more than the past ten years (some more than fifteen years) under dismal contractual working conditions with a meager salary of 6000/- to 8000/- Indian rupees per month. On the eve of 30th of September, 2016 without any prior intimation or notice, the above mentioned Dalit laborers were verbally ordered by the Additional Director General with the approval of the competent authority i.e. Director General to stop coming to job permanently from next day onwards i.e. 1st of October, 2016. Ironically such a grave injustice was meted out to them just a day before the Swachh Bharat Abhiyan drive and Gandhi Jayanti.

Clearly, the termination of the services of the above mentioned Dalit laborers was a motivated move which in actuality was designed to ‘punish’ and ‘teach a lesson’ to a Dalit contractual laborer, Ms. Minaxi who for the past one year has relentlessly been fighting for justice against a rape committed upon her by a highly influential permanent employee of IIMC, Mr. Sagar Rana who happens to be the son of the Official Driver of the Secretary, Ministry of Information and Broadcasting. This is kindly also to be noted that the complainant Ms. Minaxi and her family in the past have consistently been intimidated, harassed and humiliated by the various influential officials and babus of  IIMC and Ministry of Information and Broadcasting which a few months back was reported by the section of the national media. Similarly, this time again after sacking her from the job, she has been publically humiliated, threatened and stopped from even entering in the campus by the IIMC administration.

As per the Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013, any  workplace by no means can terminate the services of the woman complainant until the final verdict is delivered by the Court of Law. This entire ploy of terminating the services of all contractual Dalit laborers in the name of ‘routine change’ of contractor (which has happened previously as well for many times but each time the new contractor retained the existing laborers as per the contract-understanding with IIMC administration) is essentially and evidently a clever maneuvering designed by the castiest-patriarchal forces operating at the highest echelons of IIMC to harass and ‘punish’ a Dalit woman, who ‘dared’ to file a rape case against an upper caste influential permanent employee of IIMC, to such an extent that she feels threatened, alienated and ultimately compelled to withdraw the case.

This matter is not just confined to the grave injustice being meted out with the justice-seeking innocent Dalit rape victim but also about the livelihood of the scores of fellow-Dalit laborers toiling for years at IIMC.

Whistleblowers
(Concerned People, IIMC) 
iimcwhistleblower@rediffmail.com

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जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी और शाहरुख़ खान जैसों संग जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में फांसी के फंदे से झूल गया!

एक था सोमू…. जिसकी तस्वीरें मुकेश अम्बानी, शाहरुख़ खान, आमिर खान जैसी नामी गिरामी हस्तियों और धनकुबेरों के साथ उसके फेसबुक प्रोफाइल पर जगमगा रही हों, वह शख्स पैसे के अभाव में गरीबी से घबरा के यूँ किसी असहाय और अनाथ शख्स की तरह फांसी के फंदे से झूल जाए तो भला कौन यक़ीन कर पायेगा। यही वजह है कि मुम्बई, दिल्ली और लखनऊ के बड़े बड़े अखबारों में बरसों तक वरिष्ठ पत्रकार और कॉलमिस्ट रह चुके बेहद हैंडसम, मिलनसार, जिंदादिल और सौम्य व्यवहार के सौमित सिंह की 40 बरस में उमर में ख़ुदकुशी से हुई मौत पर अभी भी उनके बहुत से मित्रों को यकीन नहीं हो पा रहा।

मगर त्रासदी यही है कि यही सच है। उसकी मौत के खबर आते ही सोशल मीडिया पर इस देश के छोटे बड़े अखबारों, टीवी चैनलों, वेब पोर्टल के पत्रकारों, संपादकों, फ़िल्मी और उद्योग जगत की कई हस्तियों ने दुःख जताना शुरू कर दिया। एक दो को छोड़कर हर किसी ने रस्मी तौर पर उसकी तारीफों के पुल बाँध दिए, उसकी मदद न कर पाने पर अफ़सोस जताया। एक बड़े अखबार से उसकी नौकरी छूटने के बाद से लेकर उसके मरने तक के पिछले महज दो ढाई साल के संघर्ष में उसके इतना अकेले पड़ जाने पर लोगों ने हैरानी भी जताई।

मगर मुझे कोई हैरानी नहीं है। क्योंकि मीडिया ने बहुतों की जान ऐसे ही ले ली है। मैं खुद मीडिया के इसी जानलेवा पेशे से अपनी जान छुड़ा कर 2011 में भाग चुका हूँ और इन दिनों अपने बिज़नस में जूझ रहा हूँ। सौमित, जिसे मैं अपनी क्लास 6th की उमर से सोमू के नाम से जानता हूँ, मेरा बचपन का बहुत करीबी दोस्त था। मगर हमारा साथ मेरे क्लास 12th पास करने के बाद बहुत कम रह गया था।

मैं पढाई और नौकरी के सिलसिले में जब इलाहाबाद से लेकर दिल्ली का सफ़र कर रहा था, तभी मुझे पता चला कि सोमू लखनऊ में पायनियर में पत्रकार हो गया था। मेरी गाहे बगाहे उससे बात मुलाक़ात हो जाती थी मगर नियमित संपर्क नहीं था। फिर मैं भी दुर्भाग्य से इसी पेशे में आ गया। दिल्ली में जैसे ही टाइम्स समूह से मैंने अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की तो उसी समय प्रेस क्लब में हुई एक मुलाक़ात में मुझे पता चला कि सोमू भी अब दिल्ली में ही है। फिर कई बार मेरी उसकी मयकशी की देर रात की महफ़िलें जमीं, कभी दिल्ली के प्रैस क्लब में, कभी उसके नए ख़रीदे फ्लैट में तो कभी कभी लखनऊ में भी।

उसका वह चमकदार दौर था। वह बहुत खुश रहता था और जिंदादिली से जी रहा था। हालांकि 2007 आते आते तक खुद मेरा जी मीडिया से घबराने लगा था। ऐसा भी नहीं था कि मेरा कैरियर का ग्राफ गिर रहा था बल्कि उस दौर में तो वह बढ़ ही रहा था। टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह, हिंदुस्तान टाइम्स समूह से होते हुए बिज़नस स्टैण्डर्ड आते आते तक मेरी पोस्ट और सैलरी में काफी इजाफा हुआ भी था। फिर भी गुटबाजी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, चमचागिरी, एक दूसरे के प्रति बर्बाद कर देने तक का द्वेष, भेदभाव और सबसे बड़ी बात नौकरी पर हमेशा लटकती तलवार के चलते मैं बहुत परेशान रहने लगा था। संपादकों और अपने बॉसेस के अहंकारी स्वाभाव और अपने सहकर्मियों में कौन दुश्मन है कौन दोस्त इसको लेकर बढ़ता दिन रात का तनाव चैन से जीने ही नहीं दे रहा था। फिर मैंने घबरा कर 2011 में मीडिया को अलविदा कह दिया। तब सोमू अपने जीवन के बेहतरीन दौर में था और बहुत संतुष्ट भी रहता था। मैं तो खैर वापस लखनऊ ही लौट आया, कुछ भी छोटा मोटा काम करके शान्ति से जिंदगी बिताने की चाह लिए।

उसी लखनऊ में जहां मेरी सोमू से तब मुलाक़ात हुई थी, जब मेरे पिताजी ने एक किराए का छोटा सा मकान लिया था और मेरा एडमिशन उन्होंने लखनऊ के उस समय में सबसे प्रतिष्ठित स्कूल महानगर बॉयज में क्लास 6th में कराया था। बहुत ही पॉश कॉलोनी में मेरे किराए के घर के सामने एक 10-15 हजार वर्गफीट में बनी आलीशान कोठी थी, जिसमे संयोग से अपना सोमू ही न सिर्फ रहता था बल्कि मेरे ही स्कूल में एक ही क्लास मगर अलग सेक्शन में पढता भी था। इसी वजह से हम दोनों बच्चों में गहरी दोस्ती भी हो गयी। मेरे पिता गाँव से पढ़कर निकले थे और लखनऊ में सरकारी विभाग में इंजीनियर थे। इसलिए मेरा परिवेश गांव और शहर का मिक्स था मगर सोमू एकदम अंग्रेजीदां और संपन्न घराने का बच्चा था।

वह कुछ ही समय पहले ढाका से आया था, जहां उसके नाना वर्ल्ड बैंक में थे। उसने अपना बचपन नाना नानी के यहाँ बिताया था फिर मेरे घर के सामने रहने वाले अपने मामा मामी के विशाल घर में आ गया था। उसके मामा बहुत पैसे वाले थे। विदेशी कार और सोमू के बर्थडे की भव्य पार्टियों समेत उनके रहन सहन से तो मुझे यही लगता था। सोमू के माता पिता कौन थे, क्या थे और वह क्यों शुरू से अपने नाना नानी और मामा मामी के यहाँ रहा, इसकी मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। हाँ, शायद 9th या 10th क्लास के आसपास वह मुझे अपने मम्मी पापा से मिलाने ले गया था, जो कि कानपुर में एक छोटे से मकान में रहते थे। यहीं वह भी उसी दौर में रहने लगा था।

मैंने आधुनिकता के सारे तौर तरीके उसी से सीखे थे। टेबल टेनिस जैसा खेल हो या अंग्रेजी की कॉमिक्स किताबें पढ़ना, अंग्रेजी म्यूजिक-गाने, पहनावा सब सोमू को देख देख कर ही 9वीं-10वीं क्लास तक मैंने भी सीख लिया था। शायद यही वजह है कि धन के अभाव में ख़ुदकुशी कर लेने की खबर आने तक जीवन भर सोमू की मेरे दिलो दिमाग में ऐसी ही छवि थी कि वह न बहुत अभिजात्य वर्ग से है, जहां पैसा कोई समस्या ही नहीं है। तभी तो मैं कभी सपने में भी सोच नहीं पाया कि उसके इतने रसूखदार या धनाढ्य संपर्कों या नाते रिश्तेदारों के चलते या इतने बरसों तक उसके इतने अच्छे पदों पर नौकरी करते रहने के बावजूद वह इस कदर अकेला और अभावग्रस्त हो जाएगा।

मैं आज भी नहीं जानता कि उसके साथ ऐसा कैसे हुआ। मेरे मन औरों की तरह बहुत से सवाल है, मसलन क्यों वह इतने कम अरसे में ही इतना अकेला और अभावग्रस्त हो गया? कहाँ चले गए उसके सारे मददगार, दोस्त या रिश्तेदार? या क्यों वह अपने लिए इतने पैसे भी नहीं जोड़ पाया या कहीं चल अचल सम्पत्ति ले पाया, जिसे बेच कर दो ढाई साल तक वह बिना किसी के सामने हाथ पसारे जीवन यापन कर पाये? माना कि नौकरी छूटने के बाद शुरू की गयी उसकी वेबसाइट फेल हो गयी मगर क्यों उसे लगने लगा कि अब सब ख़त्म हो गया? क्यों उसने ये नहीं सोचा कि वह लखनऊ जैसे छोटे शहर में ही लौट जाए, जहाँ वह फिर से पत्रकारिता या फिर कुछ भी छोटा मोटा करके अपनी बाकी की जिंदगी चैन और शान्ति से गुजार सकता है? जैसे कि उसके बाकी के ढेरों दोस्त कर ही रहे हैं। यहां चकाचौंध और बड़ी बड़ी सफलताएं या नाम नहीं है, मगर चंद रिश्ते नाते और दोस्त तो हैं।

मुझे ये पता है कि अब ये सवाल हमेशा मेरे लिए सवाल ही रह जाएंगे क्योंकि इनका जवाब देने वाला मेरा बचपन का दोस्त मुझे रूठकर हमेशा के लिए इस दुनिया से ही चला गया है। उसका रूठना लाजिमी भी है। मैंने बहुत बड़ी गलती की, जो सिर्फ सोशल मीडिया और पुरानी जिंदगी के जरिये ही उसकी खुशहाल जिंदगी का भ्रम पाले रहा और कभी उससे पूछ ही नहीं पाया कि भाई कैसे हो। 2011 के बाद से अपनी नौकरी छोड़ने रियल एस्टेट कंपनी शुरू करने से लेकर अब तक चले अपने जीवन के झंझावातों में  मैं खुद भी इतना घिरा रहा कि कभी व्हाट्सएप्प या फोन पर भी मैंने उससे बचपन के दोस्त के नाते उसके सुख दुःख नहीं जाने।

2014 के बाद से अपनी वेबसाइट फेल होने के बाद से ही वह संकटों में घिरने लगा था मगर दुर्भाग्य से 2015 या 16 में मेरी न तो उससे एक बार भी मुलाक़ात हो पायी और न ही कभी फ़ोन पर बात हो पायी। हाँ, फेसबुक पर उसने 2015 में मेरे एक बार स्वाइन फ्लू होने की पोस्ट पर चिंता जताते हुए लिखा था कि भाई अपना ध्यान रखना।

मैंने तो अपना ध्यान रखा मेरे भाई मगर तुमने क्यों नहीं रखा? क्यों नहीं ध्यान रखा अपने छोटे छोटे बच्चों और बीबी का? क्यों जिंदगी से अचानक हार गए?

दो दिन पहले तुम्हारी मौत की हतप्रभ कर देने वाली खबर सुनी। एक दिन बहुत हल्ला और दुःख जताने वालों की चीखें सुनीं। मगर अब सब खामोश हो गए। अपनी अपनी जिंदगी में फिर से यूँ ही मगन हो गए, जैसे तब थे, जब तुम संघर्ष करके लगातार मौत की ओर बढ़ रहे थे।

मुझसे भारी गलती हुई जो मैंने अपने अनवरत चलने वाले संघर्षों में डूब कर तुमसे कभी तुम्हारा सुख दुःख नहीं पूछा। शायद तुम्हे मेरी याद नहीं थी या ये भरोसा नहीं था कि मैं तुम्हारे कुछ काम आ सकूँगा, इसीलिए तो तुमने मुझसे कभी कोई मदद नहीं मांगी न अपना दुःख बताया। सुचित्रा कृष्णमूर्ति जैसी मशहूर हस्ती की तरह मैं ये भी नहीं कह रहा कि एक फ़ोन ही कर दिया होता। तुम्हारे अलविदा कहने के बाद कल मुझे पुराने दोस्तों से ही पता चला कि तुमने उनसे पिछले महीने फ़ोन करके कुछ हजार रुपये मांगे थे अपने मेडिकल बिल चुकाने के लिए।

तुम्हारे जाने का दुःख तो है ही मगर इस बात का भी गहरा दुःख है मुझे कि तुम इस कदर टूटते गए, हारते गए और मैं जान तक नहीं पाया। पता नहीं पैसे रुपये से मैं तुम्हारे कितने काम आ पाता मगर मुझे इतना पता है कि अगर तुम्हारे ऐसे घनघोर दुःख का ज़रा भी अंदाजा होता तो मैं बचपन के दोस्त होने का पूरा फर्ज निभाता और तुम्हारा मनोबल न टूटने पाये, इसके लिए जी जान लगा देता। मन के हारे हार है और तुम मन से हार गए सोमू। वरना दुनिया में इतनी क़ुव्वत ही नहीं है, जो तुम जैसे जिंदादिल और बहादुर इंसान को हरा सके। मैं तुम्हे यही समझाता सोमू कि बहुत रास्ते हैं दुनिया में जीने के। जब तक शरीर काम करने लायक है, तब तक कुछ भी करो मगर जिन्दा रहो। झोपडी में भी रहकर अपने बच्चों को पालेगो तो भी कभी न कभी हालात फिर बदल ही जाएंगे मगर यूँ दुनिया ही छोड़ कर चले जाओगे तो उन बच्चों का क्या भविष्य होगा?

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। अब मेरे जैसे तुम्हारे कई दोस्त, हितैषी, नाते रिश्तेदार झूठे सच्चे आंसू बहा रहे है, दुःख जता रहे हैं, अपने अपने कारण-किस्से बता रहे हैं कि क्यों वह तुम्हे बचा नहीं पाये, क्यों उन्होंने तुम्हारा साथ नहीं दिया, क्यों तुम अकेले पड़ गए। लेकिन अब कड़वी हकीकत यही है कि तुम्हारे पीछे तुम्हारे बच्चे और बीबी अंधकारमय भविष्य की ओर चल पड़े हैं। और तुम…..माना कि बहुत बड़े खबरनवीस थे। बड़ी बड़ी ख़बरें तुमने ब्रेक कीं, जिनकी टीआरपी जबरदस्त थी…. मगर तुम्हारी जिंदगी में तो कोई टीआरपी नहीं है मेरे दोस्त….. तुम्हारी दर्दनाक ख़ुदकुशी में भी नहीं। इसलिए किसी के लिए खबर भी नहीं हो। हाँ, मेरे जैसे चंद लोग जरूर कुछ दिनों और यही किस्सा सुनाएंगे कि ……. एक था सोमू।

लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आईआईएमसी से प्रशिक्षित, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे अखबारों में दिल्ली में 12 साल तक पत्रकारिता कर चुके हैं. फिलहाल अपने गृह नगर लखनऊ में अपना व्यवसाय कर रहे हैं. अश्विनी से संपर्क srivastava.ashwani@gmail.com के जरिए किया जा सकता है. 

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IIMC के दीक्षांत समारोह से मीडिया को दूर रख मीडिया के खिलाफ खूब भड़ास निकाली मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने

नयी दिल्ली : ‘स्व नियमन’ की हिमायत करते हुए सरकार ने मीडिया से कहा कि वह कोई नियमन नहीं लाएगी, बल्कि प्रेस को अपने पास मौजूद व्यापक जिम्मेदारी को पहचानना चाहिए। सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने यह सुझाव भी दिया कि मीडिया कवरेज में अक्सर आंकवादियों की छोटी हरकतों को प्रचारित कर आतंकवादियों का समर्थन किया जाता है, जिससे डर फैलता है।

भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के दीक्षांत समारोह को यहां संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि देश में प्रेस की स्वतंत्रता कभी ‘नहीं सिकुड़ेगी’। संस्थान के कुछ एससी एसटी छात्रों के खिलाफ उनके कुछ सहपाठियों द्वारा की गई ‘जातिवादी’ टिप्पणी के आरोपों से पैदा हुए हालिया विवाद के मद्देनजर कार्यक्रम से मीडिया को दूर रखा गया। मंत्री ने छात्रों को पत्रकारों की जिम्मेदारी याद दिलाने की कोशिश की।

उन्होंने कहा, ‘‘21 वीं सदी का अभिशाप आतंकवाद है। एक आतंकवादी एक छोटी सी घटना का व्यापक प्रभाव छोड़ना चाहता है। एक व्यक्ति की जान लो और एक लाख आबादी को आतंकित करो। आतंकवादी इस तथ्य से अवगत होता है कि उसकी इस छोटी सी हरकत को प्रचारित कौन करेगा।’’ राठौर ने कहा कि दहशत का सीधा कारण डर है और हममें से एक हिस्सा आतंकवादियों को इस डर को उन लोगों में फैलाने में सहायता करता है जो आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं।

पेरिस हमलों के फ्रांसीसी मीडिया की कवरेज का जिक्र करते हुए राठौर ने कहा, ‘‘क्या आपने अपने टीवी पर खून का एक कतरा तक देखा? गोली का एक भी निशान या इससे भी महत्वपूर्ण चीज.. एक शोकाकुल मां, एक शोकाकुल पत्नी, एक शोकाकुल बेटी को देखा? आपने नहीं देखा होगा।’’

उन्होंने कहा कि भारत में चैनलों के बीच ऐसी प्रतिस्पर्धा है कि कोई हद नही रहती है और यदि एक चैनल मां से बात करता है तो दूसरा चैनल पत्नी या बेटी से बात करता है। उन्होंने कहा कि सरकार कोई नियमन लाकर हालात को ठीक नहीं कर सकती। यह सिर्फ स्व नियमन के जरिए संभव होगा। उन्होंने कहा, ‘‘एक चीज निश्चित है कि प्रेस की आजादी इस देश में कभी नहीं सिकुड़ेगी.. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के जरिए आप जितनी शक्ति रखते हैं, वो सीमाओं से आगे जाता है..इस तरह आपके पास काफी जिम्मेदारी होनी चाहिए।’’

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Sadbhavana March at IIMC (see pictures)

· Sadbhavana March held at 5 PM outside campus.
· More than 100 students present at protest march.
· March was held to highlight the harmony amongst students.
· Posters stating ‘zero bias on campus’ and ‘just IIMCians’ displayed.
· Condemned the actions of both parties.
· Expression of the liberal feeling in society.

Following recent developments over the alleged discrimination of a certain caste at the Indian Institute of Mass Communication, the students here held a peace march today against the perception of the existence of a divisionary atmosphere at the Institute. More than 100 students gathered outside the campus and conducted a candle march.

The march was held to reinforce the fact that no bias or discrimination exists among the students, who respect diversity and welcome constructive debate. Students who participated in this movement explicitly mentioned that they had no other intention except to showcase the peace and harmony prevalent at the institute.

At the gathering, the remarks made in the offending Facebook post were strongly condemned, with the students stressing that they supported neither party involved in this controversy. The over‑riding sentiment at the meeting was one of solidarity in the interests of tranquility. It was an appeal for everyone to come together and protect the social fabric of the Institute.

Regards,
IIMCians

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एक फेसबुक पोस्ट पर IIMC में घमासान, दलित छात्रों ने की कंप्लेन, कमेटी गठित

आईआईएमसी छात्रों के बीच एक फेसबुक पोस्ट से घमासान मच गया है. दलित छात्रों ने पूरे मामले की एससी-एसटी एक्ट में शिकायत की है. इस पूरे मामले की जड़ में एक टीचर का हाथ होने की बात कही जा रही है. एक टीचर द्वारा छात्र को धमकी दिए जाने का घटनाक्रम भी हो गया है. दरअसल IIMC में पढ़ने वाले एक छात्र ने कुछ दिनों पहले रोहित वेमुला की आत्महत्या पर सोशल मीडिया में सवाल उठाने वालों की नीयत पर एक फेसबुक पोस्ट लिखी थी. इस पोस्ट पर कुछ छात्रों ने आपत्ति जाहिर की और इसे लेकर कॉलेज के साथ ही एससी-एसटी कमीशन, आदिवासी मामलों के मंत्रालय, और सामाजिक न्याय मंत्रालय तक शिकायत कर दी.

दलित छात्रों कहना है कि उस पोस्ट से उनकी भावनाएं आहत हुईं और वो संबंधित छात्र के खिलाफ कड़ी कार्रवाई चाहते हैं. उनकी शिकायत के बाद कॉलेज ने इस मामले की सुनवाई के लिए एक कमेटी का गठन किया, जिसमें आरोपी छात्र के विभागाध्यक्ष को ही नहीं शामिल किया गया. अब आरोपी छात्र का कहना है कि उसे कुछ बोलने नहीं दिया जा रहा और उसे ऐसे माहौल में बहुत डर लग रहा है. ऐसा बताया जा रहा है कि बुधवार शाम को IIMC के ही एक छात्र ने अंग्रेजी पत्रकारिता विभाग के टीचर अमित सेनगुप्ता को दूसरे पक्ष के लोगों को भड़काते हुए सुना. उसने इस बात की लिखित शिकायत ओएसडी अनुराग मिश्रा और अन्य विभागाध्यक्षों से की. इस शिकायत के बाद कथित आरोपी टीचर अमित सेनगुप्ता ने छात्र को कैंपस में ही घेर लिया और शिकायत वापस लेने की बात कहने लगे.

छात्र के मुताबिक टीचर ने कहा कि अगर वो शिकायत वापस नहीं लेता है, तो वो उस पर मानहानि का मुकदमा कर देंगे. इस मुद्दे पर उनकी और कुछ छात्रों की तीखी बहस भी हुई. अब सुनने में आ रहा है कि टीचर ने छात्र को देख लेने की धमकी दी है. प्लेसमेंट का वक्त करीब होने के चलते छात्र घबराया हुआ है और उसने इस बात की फिर से शिकायत करने की बात कही है. केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला यह संस्थान में बीते कुछ समय से चर्चा में है. पहले तो संस्था के डीजी पर सवाल उठे थे और फिर उनकी विदाई के बाद अभी तक नया डीजी ना आने के चलते पिछली बैच के छात्रों का दीक्षांत समारोह भी काफी देरी से हो रहा है.

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IIMC में कुछ गड़बड़ हो रहा है

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IIMC Alumni Association Condemns attack on Journalist and IIMCian Kishan Barai

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IIMC में कुछ गड़बड़ हो रहा है

Abhishek Srivastava : IIMC में कुछ गड़बड़ हो रहा है, इसकी मुझे आज सुबह से बू आ रही है। जिन लोगों ने भी मामले को प्रेस में सरकाया है, उन्‍होंने जानबूझ कर बड़ी गलती की है। अब छूटा हुआ तीर वापस नहीं आने वाला। इस मामले का राजनीतिकरण किया जा चुका है जबकि इसे संस्‍थान के भीतर आरोपी छात्र के माफ़ीनामे के बाद ही खत्‍म कर दिया जाना चाहिए था। अगर इस छात्र का निष्‍कासन किया जाता है, तो उसके संभावित परिणाम का जवाबदेह कौन होगा?

इतनी राजनीति तो हम सब समझते हैं कि रोहित वेमुला कांड के बाद सरकार व संस्‍थानों के भीतर बैठे पंडों की नींद हराम है। ब्राह्मणवाद को हमेशा ऐसे हालात से निपटने के लिए अपनों के बीच से ही एक बलि की ज़रूरत होती है। मुझे शक़ है कि आइआइएमसी के मामले के बहाने कुछ दक्षिणपंथी तत्‍व आरोपी छात्र को घेरघार कर अलगाव में धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। इसे तत्‍काल रोका जाना चाहिए।

हम नहीं चाहते कि किसी भी युवा के साथ ज्‍यादती हो, ब्राह्मणवाद के नाम पर या आंबेडकरवाद के नाम पर। मुझे शक़ है कि रोहित वेमुला की एंटी-थीसिस दिल्‍ली के भारतीय जनसंचार संस्थान ‍में लिखी जा रही है। हो सकता है मेरा आकलन ग़लत भी हो, लेकिन सब मिलकर कम से कम वहां हालात को बिगड़ने से ज़रूर रोकें।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Deepak Singh IIMC में ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए, कुछ लोग फ़र्ज़ी में नेतागीरी झाड़ रहे हैं। जिसका नुकसान संस्थान और छात्रों को ही होगा

Atul Chaurasia स्कूल कॉलेज के झगड़े वहीं निपट जाएं इससे बेहतर कुछ नहीं होगा. जब लड़के ने लिखित माफी मांग ली है तब बात आगे बढ़ने की गुंजाइश और भी खत्म हो जाती है. उन लड़कों की भूमिका भी संदेहास्पद है जो पहले सिर्फ ओपेन माफी की मांग कर रहे थे और अब उन्हेंं छात्र का निलंबन चाहिए. संस्थान के भीतर से या बाहर से जो लोग भी इस मसले को अब तूल दे रहे हैं वो दरअसल आग से खेल रहे हैं…

Manshes Kumar छूटा तीर तो वापस आने से रहा अब लगातार न्यूज़ चैनलों पर चलने लगा है। उसका क्या। और आपने बहुत सही बात कही कि कुछ दक्षिणपंथी छात्र किसी न किसी की बलि चढाने में लगे हैं।

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‘स्वर्ण-बैच’ दीक्षांत समारोह में आईआईएमसी किसी कायदे के मुख्य अतिथि को आमंत्रित करने पाने में असफल

आईआईएमसी के ‘स्वर्ण-बैच’ का दीक्षांत समारोह होना सुनिश्चित हो गया है। लम्बे अरसे के बाद यह फैसला लिया गया है। प्रतीत होता है की आईआईएमसी के स्तम्भ इस क़दर कमज़ोर हो गए हैं कि अब इसे इतराना नहीं आता, उम्मीद है कि कोई सिकन्दर इसे अपना लक्ष्य भी बना बैठे। आलम यह है कि एक तो इतनी लतीफी के बाद दीक्षांत समारोह होना सुनिश्चित हो पाया हो, उसमें भी पंगु प्रशासन ने किसी क़ायदे के मुख्य अतिथि को आमंत्रित कर पाने में अपनी असफलता का परिचय दिया है।

उम्मीद यह भी है कि शायद संस्थान में मतैक्य न होने से इसकी शक्तियां बिखरी पड़ी हैं, जिसका परिणाम हमारे सामने दिख रहा है कि जहां स्वर्ण दीक्षांत में माननीय प्रधानमंत्री या महामहिम राष्ट्रपति के बतौर मुख्य अतिथि आने के बजाय उसके मंत्रालय के एमओएस से ही काम चलाया जा रहा है, केन्द्रीय मंत्री तक भी अब इनकी संप्रेषण-शक्ति नहीं रही या फिर ये कहें कि हमने तो कहा था वो हमारी सुने ही नहीं। मुझे लगता है कि राज्यमंत्री भी शायद इसलिए चले आ रहे हैं कि उनका आवास वहीं पड़ोस में बसन्त कुंज में है वरना… हे भगवान!

बेहतर होता कि आप आईआईएमसी की धरोहर को ही तवज्जो देते। एमओएस से ठीक तो यही था कि आप हमारे किसी बेहतरीन पुरा छात्र को ही बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित कर लेते, विदित है कि संस्थान के पुरा छात्र इस पद को संभाल पाने में एक एमओएस से काफी खरे हैं। निश्चित है कि यह स्वर्ण-बैच अपने अभिभावक से यह सम्मान पाकर गर्व का अनुभव करता। लेकिन आपने तो ऐसी स्तरहीनता दिखाई है कि मन खिन्न हो गया है। उत्साह जाने किस लोक में जा दुबका है कि उसे ढूढ़ने जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे हैं हम।

यही प्रक्रिया होती है किसी संस्थान की गुणवत्ता और उसके अतीत या वर्तमान के उन्माद पर दीमक लगने की। ज़िम्मेदार कौन-कौन..?? आत्म मन्थन का वक़्त शेष है।

सादरः एक आईआईएमसिएन।

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आईआईएमसी में मैग्सैसे अवार्ड विजेता अंशु गुप्ता का सम्मान समारोह

नई दिल्ली, 5 सितंबर, 2015. रैमन मैग्सैसे अवार्ड विजेता और गूंज के संस्थापक अंशु गुप्ता का आईआईएमसी में सम्मान किया गया. श्री गुप्ता आईआईएमसी के एलुम्नाई हैं और समारोह का आयोजन आईआईएमसी एलुम्नाई एसोसिएशन ने किया था. सम्मान समारोह में आईआईएमसी की सहपाठी और पत्नी मीनाक्षी गुप्ता के साथ पहुंचे श्री गुप्ता को आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टंडन, एलुम्नाई एसोसिएशन की अध्यक्ष सुनीला धर और संस्थान की शिक्षिका प्रो. जयश्री जेठवानी ने सम्मानित किया.

इस मौके पर श्री गुप्ता ने कहा कि हमें समाज के लिए कुछ करना चाहिए और समाज को बेहतर बनाने के रास्ते तलाशने चाहिए. उन्होंने कहा कि स्कूल सरकारी हो या प्राइवेट, हर आदमी सरकारी पैसे से पढ़ा है इसलिए उसे समाज को लौटाना चाहिए. श्री गुप्ता ने कहा कि जब भी वो रात में सोते हैं तो इस कर्ज के साथ सोते हैं कि उनकी पढ़ाई पर आम लोगों का पैसा सब्सिडी के रूप में खर्च हुआ है जिसे समाज के लिए कुछ करके उन्हें चुकाना है. आईआईएमसी के महानिदेशक सुनीत टंडन ने कहा कि हमें गर्व है कि हमारे यहां से ऐसे एलुम्नाई निकले हैं जो सिर्फ पैसे या पद के पीछे नहीं भाग रहे हैं. उन्होंने अंशु गुप्ता और गूंज को बधाई दी. एसोसिएशन की अध्यक्ष सुनीला धर ने कहा कि अंशु जैसे लोग किसी संस्थान या देश के नहीं होते बल्कि ऐसे लोग दरअसल पूरी मानव जाति के होते हैं. इस मौके पर श्री गुप्ता के आईआईएमसी के सहपाठी रहे इंडियन एक्सप्रेस के संपादक उन्नी राजन शंकर, बीबीसी हिन्दी के संपादक निधिश त्यागी, हिन्दुस्तान कोका कोला के एवीपी कल्याण रंजन ने श्री गुप्ता के साथ के अनुभव सुनाए और भरोसा जताया कि अंशु आगे और बेहतर काम करेंगे.

Magsaysay Award Winner Anshu Gupta felicitated by IIMC Alumni Association

New Delhi, 5th September 2015:  The Indian Institute of Mass Communication Alumni Association today felicitated its distinguished alumni & Goonj Founder Mr. Anshu Gupta for receiving the prestigious Ramon Magsaysay Award 2015. Mr. Gupta was at his first media interaction after returning from Phillipines with the award. On the occasion, Mr. Gupta urged the audience to give back, and stand up for the right issues. He said, “It’s a really great feeling for both of us to be honoured by the IIMC Alumni Association. I must say that I had my best days here and learnt many new lessons of life here.”

He further added, we get subsidies for education, health and what not, hence when I wake up in the morning, I feel the need to repay and look for ways to do something in that direction. Anshu urged the youth to look for ways to do something for society. Mr. Gupta and Mrs. Meenakshi Gupta were felicitated by IIMC DG Mr. Sunit Tandon, IIMCAA President Ms. Sunila Dhar and Senior Most Faculty Ms. Jaishri Jethwaney.

IIMC DG Mr. Tandon said: “It’s a great honour to have alumni like Mr. Anshu who have carved a new path- of giving instead of just running after wealth. He congratulated Anshu for the award and hoped that Goonj will be the frontrunner as always in the endevour to make a  positive difference to society.

IIMCAA President Ms. Dhar said, “People like Anshu don’t belong to any particular institute, any country, they belong to mankind and we are honoured that they are part of this illustrious institute.’

Mr. Gupta’s batch-mates Indian Express Editor Mr. Unni Rajen Shankar, BBC Hindi Editor Mr. Nidheesh Tyagi, Hindustan Coca-Cola AVP Mr. Kalyan Ranjan recounted their experiences with Anshu at IIMC and later in life.  Mr. Gupta, fondly known as the clothing man of India, left his corporate stint as a media person in 1998 and started a non-profit ‘GOONJ’ with the prime support of his wife Meenakshi. He has successfully made the mostly passive urban and rural masses a prime stakeholder in creating a pipeline to generate resources and creating employment.

About IIMC Alumni Association
IIMC Alumni Association aspires to work as the dynamic link between IIMC’s Past and Present. It allow its members and the institute to benefit from the enriched experience of its meritorious and well-placed students, besides offering an unparalleled platform to the alumni to share their expertise, knowledge and experiences and forge an enduring relationship with their alma mater, as also with other alumni. In the past, a large number of IIMC alumni who have either cherished good learning, bonding or experience during their year at this Institution have been rather detached as they have been unsure how to continue a meaningful association with their alma mater. The IIMC Alumni Association gives them a chance to do all that, as well as keep up with the happenings at IIMC, reunite with their batch mates.

Press Release

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IIMC की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए प्रो. राघव चारी

Nadim S. Akhter : “आह !!! प्रो Raghav Chari आज IIMC की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए. लेकिन मेरे लिए इसके अलग मायने हैं. मतलब अाज के बाद जब मैं उनके कमरे में जाऊंगा तो गर्मजोशी से भरी उनकी आवाज, उनका इस्तकबाल और उनका मुस्कुराता चेहरा वहां नहीं होगा. अब मुझे ये कहने का मौका नहीं मिलेगा कि सर, ये शर्ट आप पे बहुत जंच रही है. स्मार्ट लग रहे हैं और फिर हंसते हुए वे कहेंगे कि अरे यार !!! मैं तो स्मार्ट ही हूं हमेशा से !!! IIMC का सिर्फ वो कमरा ही खाली नहीं हुआ, हमारे दिलों के कई कोने वीरान हो गए. क्या कहूं उनके बारे में. अगर वे ना होते तो आज, मैं, मैं ना होता. आईआईएमसी तो एक बहाना था.

मेरे जैसा आदमी अगर इतने दिनों तक यहां टिका तो इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ चारी साब थे. कई दफा मैं उनसे कह भी देता कि अगर आप यहां ना होते, तो मैं सब कुछ छोड़छाड़ कर कब का यहां से चल देता. और फिर वो मुस्कुरा देते. कहते- अरे नहीं, ऐसा भी कभी होता है !!! आप लोग टैलेंटेड लोग हो और जो कुछ भी हो, अपनी काबलियत के बल पर हो. मैं खुशनसीब हूं कि पत्रकारिता में जहां मृणाल पांडे और मधुसूदन आनंद जैसे गुणी सम्पादकों के साथ काम करने का मौका मिला, उनका बेहिसाब प्यार मिला, पग-पग पर मार्गदर्शन मिला वहीं जब एकेडेमिक्स में accidentally आया (वो भी एक करीबी मित्र की सलाह पे) तो IIMC में राघवचारी साहब का साथ मिल गया. पहले में यहां बतौर एक छात्र पढ़ाई करके गया था लेकिन अब उनके मार्गदर्शन में मुझे रेडियो-टीवी डिपार्टमेंट के संचालन में अपना योगदान देना था.

मैं असमंजस में था कि IIMC जॉइन करूं या ना करूं क्योंकि मैं active journalism छोड़कर यहां आने से कतरा रहा था. फिर एक दिन चारी साहब ने बुलावा भेजा कि एक बार आकर उनसे मिलूं. मैं आया, उनसे मिला, उन्होंने कॉफी पिलाई और फिर ढेर सारी बातें हुईं. और उस मुलाकात के बाद मैंने फैसला कर लिया कि Journalism से ब्रेक लेकर मुझे IIMC आना चाहिए. और फिर मैं यहां आ गया. चारी साहब मेरे गुरु हैं. साल 2000-2001 के दौरान IIMC में उन्होंने मुझे पढ़ाया था लेकिन इस दफा वो बिलकुल एक अलग अवतार में दिख रहे थे. एक-एक चीज समझाते कि एकाडेमिक्स में कहां क्या-क्या करने की जरूरत है, किन चीजों को नजरअंदाज करना चाहिए और एक शिक्षक के रूप में आपसे छात्रों की क्या अपेक्षा रहती है. एक पत्रकार के रूप में आप अलग अवतार में रहते हैं और एक टीचर के रूप में बिलकुल अलग रूप में, ये उन्हीं से सीख-जान पाया. बस ये समझिए कि उन्होंने उंगली पकड़कर मुझे सबकुछ सिखाया. और सम्मान-प्यार-दुलार-स्नेह इतना दिया कि पूछिए मत !!! कभी लगा ही नहीं कि वे मेरे टीचर-गुरु-कलीग-बॉस हैं.

हमेशा एक दोस्त की तरह व्यवहार किया, एक अभिभावक की तरह मेरे साथ खड़े रहे. इसी बीच वो दौर भी आया, जब मेरे व्यक्तिगत जीवन में तूफान उठ खड़ा हुआ. लगा सब कुछ बिखर रहा है. चीजें मेरे कंट्रोल के बाहर जा रही थीं. वो ताड़ तो गए थे कि कुछ गड़बड़ है, पूछा भी कि सब ठीक है ना !!! पर मैं असमंजस में था कि उन्हें बताऊं या ना बताऊं. फिर एक दिन उनसे लम्बी बात हुई. सारा हाल कह सुनाया. और पता है, मेरी बातें सुनने के बाद उन्होंने जो बातें मुझे बताईं-समझाईं, वह कोई पिता ही अपनी सगी औलाद को बता सकता है. उन्होंने मुझे उस मानसिक स्थिति से निकलने में मदद की, जिसमें मैं बुरी तरह फंस गया था. हिम्मत तो थी मुझमें, खुद को संभाले हुए भी था, किसी और को पता नहीं चलने दिया लेकिन गुरु की नजर पारखी होती है. चारी साहब समझ गए थे कि मेरे साथ सब कुछ ठीक नहीं है. और ये उनका प्यार ही था कि मैंने अपना दिल खोलकर उनके सामने रख दिया. उन्होंने मुझे जीवन और परिस्थितियों से compromise करने की सलाह दी, बहुत कुछ बताया, अपने निजी जीवन के अनुभव साझा किए पर फैसला मुझ पर छोड़ दिया और कहा कि जो ठीक लगे, आप करो. पर वे चाहते रहे कि मैं समझौता कर लूं और मेरा स्वभाव है कि मैं टूट जाऊंगा पर समझौता नहीं करूंगा और ना मैंने किया. पर उनकी कही एक-एक बात मेरे लिए किसी अमृत से कम ना थी.

और इसी का कमाल था कि मैं दुबारा उठ खड़ा हुआ. लोग कहते हैं कि आप बहुत मैच्योर हैं, समझदार हैं लेकिन चारी साहब के सामने मैंने कभी नहीं चाहा कि मैं मैच्योर बनूं. हमेशा यही चाहता रहा कि उनसे liberty लूं. के ऐसा करूंगा तो क्या होगा, वैसा करूंगा तो क्या होगा. और इसी क्रम में उनसे बहुत कुछ सीखता चला गया. इसे यूं भी कह लें कि उन्होंने अपने जीवन के सारे अनुभवों का निचोड़ मुझे बता दिया-सिखला दिया-समझा दिया. गुणी सम्पादकों (मुृणाल पांडे-मधुसूदन आनंद-बालमुकुंद सिन्हा आदि क्योंकि इनके बाद की पीढ़ी वाले सम्पादक दूसरों को कितना बता-सिखा पाएंगे, मुझे नहीं पता. हां, Qamar Waheed Naqvi साहब के साथ टीवी में काम नहीं कर पाया, इसका मलाल ताउम्र जरूर रहेगा और जब उनसे मिला था तो ये बात मैंने उनसे कही भी थी) की एक पीढ़ी के साथ काम करने का फायदा ये रहा कि जिस तरह पत्रकारिता में अब कोई मेरा हाथ नहीं पकड़ सकता, ठीक उसी तरह राघवचारी साहब के साथ काम करने का असर ये हुआ कि अब Academics में भी कोई मेरा हाथ पकड़ नहीं पाएगा.

उन्होंने मुझे इस काबिल बना दिया कि अब मैं अपने दम पर पत्रकारिता का पूरा कोर्स स्ट्रक्चर बनाकर एक पूरा डिपार्टमेंट सफलतापूर्वक चलाने का हौसला रखता हूं. छोटी से छोटी बारीक बातें, जो आपको कहीं किसी किताब में नहीं मिलेंगी, उन्होंने मुझे बताईं-समझाईं और बहुत कुछ करके दिखाया. लोग समझते हैं कि मैं यहां IIMC में पढ़ा रहा हूं लेकिन सच्चाई तो ये थी कि मैं यहां Prof. Chari का स्टूडेंट था और यहां मेरी ट्रेनिंग चल रही थी. चारी साहब आज भले IIMC से चले गए हों लेकिन मेरी ये ट्रेनिंग ताउम्र जारी रहेगी. वे मुझे जीवनभर पढ़ाते रहेंगे. आज जब उनको छोड़ने कार तक गया तो मैंने उनसे हाथ मिलाया और उनकी मुलायम हथेली को दबाते हुए कहा कि –Thank you so much Sir for everything !!! इसके अलावा मेरे मुंह से कोई और शब्द नहीं निकला और ना ही कुछ बोल पाया. मेरी बात सुनकर चारी साहब मुस्कुरा दिए, थोड़ा इमोशनल हुए, जवाब में Thank you बोला और गाड़ी में बैठ गए. लेकिन मेरे इस Thank you का मतलब वहां खड़ा दूसरा कोई समझ नहीं पाएगा. ये बात सिर्फ और सिर्फ चारी सर समझ रहे थे. और मैं समझ रहा था. Once again Thank you Chari Sir for everything you have done for me. I will miss you but I know you are around.

अभी अलविदा मत कहो दोस्तों, के फिर हमारी मुलाकात होनी है
के फिर वो मंजर बनने हैं, के फिर कई दौर की बात होनी है.

(आज पहली दफा चारी साब के साथ IIMC के मेन गेट पर फोटुक खिंचवाई. और एक शानदार लम्हा कैमरे की इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में कैद हो गया)”

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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An Open Letter To Media about the autocratic behaviours of bureaucrats (related to IIMC)

The Editor,

Dear Sir

The IIMC Executive Council members spoke vocally against the conspiracy against me and sought quashing of the September 29, 2011 vindictive and illegal order at the EC meeting on July 2, 2015. (Secy I&B-cum-chairman was the spoilsport). Eminent editor, Mr H K Dua, forcefully said that the order needed to be quashed immediately as gross injustice has been done by the then chairman Raghu Menon (also then I&B secy) and director Sunit Tandon. He also called for reinstatement of Prof Sarkar. Mr. Dua opposed the setting up of any committee. He said that the EC had erred and the EC itself should correct its own decision.

The two faculty members on the EC – Ms Sunetra Narayan and Prof Raghavachari – also forcefully said that there was no requirement for a committee as the action itself was conspiracy and vindictive to oust Prof Sarkar. They also wanted that the action be immediately quashed by the EC. But secy I&B and chairman, Mr Bimal Julka,  doggedly tried to protect Raghu Menon and Tandon. He said, “It was not nice that a previous chairman (since he is also from his IAS fraternity) is undone by a subsequent EC.” He forced the decision to have a committee, which would give report in a month’s time..

Apparently the entire procedure was vitiated by the secy-cum-chairman. In reality, IIMC itself has reportedly found that the so-called legal opinion that Sunit Tandon had sought was not from its legal counsel. The supposed lawyer was a rank outsider and had given his so-called opinion on lines dotted by Tandon on pieces of papers that were not signed by that lawyer. It was also noted that normal judicious procedures were not at all followed.

As such the decision of the secy-cum chairman against the wishes of the house to set up the committee is once again illegal and seems to be in continuation of the part of the conspiracy hatched by Menon and Tandon. My fervent request to you is to kindly intervene and have the order of September 29, 2011 quashed now itself, Prof Sarkar reinstated and ensure minutes of the EC meeting be recorded honestly. A committee later can be set up to pinpoint the masters of the conspiracy and for action against them.

I am indebted to you for all that has happened. My final request to you is to take it to the logical conclusion and have this EC record the decision of the quashing of the vindictive order. (The EC has the power to record the minute in proper legal perspective}.. Secy-cum chairman forcing a  decision on a democratic discussion and decision is illegal and seemingly with motives that is ultra vires.

PS : It is apparent that the vindictive action was taken for his association and to deny him promotion and other benefits.

Shivaji Sarkar

shivajisarkar@yahoo.com

Shivaji Sarkar is a prominent Political Analyst and Course Director (Head of the Deptt.) English at IIMC

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आईआईएमसी के लिए आखिरी डेट 8 मई

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन ने जर्नलिज्म की पढ़ाई के लिए हाल ही में आवेदन मंगवाए हैं। आईआईएमसी के विभिन्न पीजी डिप्लोमा कोर्सेज में आवेदन की अंतिम तिथि 8 मई 2015 निर्धारित की गई है। प्रिंट, टीवी, रेडियो समेत विभिन्न संचार माध्यमों से जुड़कर जर्नलिज्म करने या एड एजेंसीज, कॉरपोरेट कंपनियों व एनजीओज  से  जुड़कर एडवर्टाइजमेंट या पब्लिक रिलेशन के फील्ड में कॅरियर बनाने के इच्छुक लोगों अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पढ़ाई कर सकते हैं। 

गौरतलब है कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास क यूनिकेशन भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का एक स्वायत्त संस्थान है, जो कि कम्यूनिकेशन से जुड़े प्रमुख कोर्सेज करवाता है। संस्थान के कोर्सेज के उपरांत स्टूडेंट्स को पीजी डिप्लोमा दिया जाता है, जिसे देशभर के प्रमुख मीडिया संस्थानों एवं कंपनियों में मान्यता प्राप्त है। संस्थान की शाखाएं- नई दिल्ली, ढेंकनाल (ओडिशा), अमरावती (महाराष्ट्र), आइजोल (मिजोरम), जम्मू  (जम्मू-कश्मीर) व कोट्टयम (केरल)।

आईआईएमसी में आवेदन करने वाले आवेदक एक से अधिक कोर्सेज के लिए आवेदन कर सकते हैं। हिंदी और इंग्लिश जर्नलिज्म का पेपर एक ही होता है इसलिए आप इनमें से किसी एक पेपर में ही बैठ सकते हैं। इसके अलावा आप अन्य किसी पेपर में भी बैठ सकते हैं। जितने कोर्सेज में आप आवेदन करना चाहते हैं, आपको उतने ही फॉर्म भरने होंगे और उतनी ही प्रवेश परीक्षाओं में बैठना होगा। इन कोर्सेज को सफलतापूर्व पूरा करने वाले स्टूडेंट्स के लिए आईआईएमसी में ही कैंपस प्लेसमेंट की सुविधा दी जाती है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिष्ठित कंपनियां संस्थान के कैंपस में आती हैं। आवेदन करने वाले लोगों को प्रवेश परीक्षा देनी होगी। प्रवेश परीक्षा का आयोजन 31 मई 2015 को विभिन्न शहरों में किया जाना है। उडिय़ा जर्नलिज्म में प्रवेश के लिए परीक्षा का आयोजन एक जून 2015 को सिर्फ भुवनेश्वर में किया जाएगा। लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले चयनित आवेदकों को इंटरव्यू के लिए बुलाया जाएगा।

उडिय़ा जर्नलिज्म के अलावा सभी कोर्सेज के लिए इंटरव्यूज का आयोजन नई दिल्ली में किया जाएगा। उडिय़ा जर्नलिज्म के लिए इंटरव्यू ढेंकनाल ब्रांच में ही होगा। इसके बाद अंतिम चयन सूची बनाई जाएगी, जिसके आधार पर विभिन्न कोर्सेज में प्रवेश दिया जाएगा। एक से अधिक क ोर्स के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके लिए आपको अलग-अलग फॉर्म भरने होंगे और अलग-अलग प्रवेश परीक्षा देनी होगी।

आईआईएमसी की प्रवेश परीक्षा 31 मई को होनी है। उडिय़ा जर्नलिज्म के लिए प्रवेश परीक्षा सिर्फ भुवनेश्वर में होगी और इसकी तिथि 1 जून रखी गई है। आईआईएमसी के इन कोर्सेज में आवेदन के फॉर्म ऑनलाइन भी प्राप्त किए जा सकते हैं और  ऑफलाइन भी। फॉर्म भरने के बाद इसे 1200 रुपए के डिमांड ड्राफ्ट के साथ संस्थान के पते पर भेज दें। एससी/एसटी/ओबीसी/ शावि आवेदकों के लिए आवेदन शुल्क 1100 रुपए है। 

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अंशु की आत्माशान्ति के लिए आईआईएमसी में शोक सभा

नई दिल्ली : पिछले दिनों आईआईएमसी की पूर्व छात्रा और सामाजिक लीडर अंशु सचदेवा के निधन पर भारतीय जनसंचार संस्थान परिसर में शोक सभा का आयोजन किया गया। इस दुखद मौके पर सचदेवा के नेतृत्व और उनसे जुड़ीं यादों को ताज़ा किया गया। दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए परिसर में कुछ क्षण का मौन रखने के साथ ही उनके अधूरे सपनों के लिए प्रार्थना की गई।

शोक सभा का आयोजन हिन्दी पत्रकारिता विभाग के कक्षा-प्रतिनिधि सूरज पाण्डेय द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि अंशु हमारे संस्थान की गरिमा थीं। उन्होंने हमेशा हमारा मार्गदर्शन किया और शिद्दत से काम करने की सलाह देती रहीं। वो हिन्दी पत्रकारिता के 2010-11 बैच की हमारी सीनियर रही हैं। उनका इस तरह से अचानक हमारा साथ छोड़ जाना हमें बहुत अखर रहा है। उनकी मौत से पूरा संस्थान शोक संतप्त है।

आईआईएमसी परिसर में अंशु सचदेवा की तस्वीर पर पुष्प अर्पित करते हुए सभी विभागों के छात्र-छात्राएं, पूर्व छात्रा कामिनी पाटिल, पूर्व छात्र जयन्त जिज्ञासु, राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मेन्द्र पांचाल, आकाश देवांगन, नीरज प्रियदर्शी, प्रज्ञा श्रीवास्तव, फरहाना रियाज़, मेहर ख़ान, सुभायन चक्रवर्ती, अभिनव गोयल, रिज़वान पुण्डीर, प्रशान्त शाण्डिल्य, अमित राजपूत आदि उपस्थित रहे।

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सफलता के मुहावरे गढ़ते हैं आईआईएमसीएन… कभी इश्क़ की बात कभी खबरों से मुलाक़ात…

Amarendra A Kishore : बात की शुरुआत करने के पहले राजकमल प्रकाशन परिवार को बधाई– आज उसकी प्रकाशन यात्रा के ६६ वर्ष पूरे करने पर। जब भी किसी बड़े पुरस्कार या सम्मान की घोषणा होती है तो अमूमन भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) का नाम उभर कर सामने आता है– चाहे गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार की बात हो या रामनाथ गोयनका सम्मान की– आईआईएमसी एक अनिवार्यता बन जाता है।

यह सुखद संयोग है कि हाल ही में जब रामनाथ गोयनका सम्मान की घोषणा हुई तो उसमें पांच नाम ऐसे थे जिन्होंने पत्रकारिता की शिक्षा भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) में पूरी की थी। आज एक ख़ास अवसर है। इस साल का राजकमल प्रकाशन सृजनात्मक गद्य सम्मान रवीश कुमार की गुलाबी कृति ‘इश्क़ में शहर होना’ को देने की घोषणा हुई है। रवीश भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के छात्र रह चुके हैं। आज से ३ साल पहले इसी मंच पर मुझे भी सम्मानित होने का अवसर मिला था, मेरी कृति “बादलों के रंग हवाओं के संग” के लिए। इसलिए आज एक बार फिर से आईआईएमसी सम्मानित हो रहा है। आईआईएमसी में सहपाठी होने के नाते मेरी ओर से रवीश को बहुत सारी बधाई। राजकमल प्रकाशन पुरस्कार निर्णायक समिति को साधुवाद– जिन्होंने एक आईआईएमसीएन की कृति को सम्मान के योग्य एक बार फिर से समझा। रविश लगातार इश्क़ की दास्ताँ लिखते रहें, मेरी शुभ कामनाएं। बाकी बातें रवीश तुमसे मिलकर।

अमरेंद्र किशोर के फेसबुक वॉल से.

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आईआईएमसी के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू, 3 मार्च से फार्म मिलेगा, 8 मई तक जमा होगा, 31 मई को इंट्रेंस एग्जाम

इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर मास कम्यूनिकेशन (आईआईएमसी) में प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. जो छात्र पत्रकारिता के फील्ड में अपना करियर संवारना चाहता है वह इस प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश के लिए अप्लाई कर सकता है. प्रवेश परीक्षा 31 मई, 2015 को होगी. अप्लीकेशन फार्म 3 मार्च से बिकने लगेगा. 8 मई तक प्रवेश फार्म बिकेगा और 8 मई तक ही जमा किया जा सकेगा.

हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ के पीजी डिप्लोमा कोर्स में प्रवेश की परीक्षा 31 मई को सुबह 9 से 11 बजे के बीच है. रेडियो एंड टीवी जर्नलिज्म का एग्जाम उसी दिन 12 बजे से 2 बजे के बीच है. ऐडवर्टाइजिंग एंड पब्लिक रिलेशंस की परीक्षा उसी रोज 3 से 5 बजे के बीच है. हिंदी और उड़िया भाषा में पत्रकारिता के लिए 1 जून को 9 से 11 बजे के बीच है.

लिखित परीक्षा को पास करने के बाद इंटरव्यू देना होगा. पास स्टूडेंट्स के लिए इंटरव्यू जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के पहले हफ्ते के बीच आयोजित किए जाएंगे. एकेडमिक सेशन जुलाई के आखिरी हफ्ते या अगस्त के पहले हफ्ते में शुरू होगा. इन परीक्षाओं में बैठने के लिए स्नातक होना अनिवार्य है. जो लोग स्नातक अंतिम वर्ष में हैं, वे भी प्रवेश परीक्षा दे सकते हैं. लिखित परीक्षा में जनरल नालेज, जनरल एवेयरनेस, एप्टीट्यूट, भाषा पर पकड़ और एनालिटिकल स्किल देखी जाएगी. परीक्षा के बारे में अन्य जानकारी के लिए आईआईएमसी की अधिकृत वेबसाइट http://www.iimc.nic.in पर जा सकते हैं.

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आईआईएमसी में प्रशासन ने नहीं फहराया राष्ट्रीय ध्वज

नई दिल्ली । 26 जनवरी को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्वायत्तशासी संस्था भारतीय जन संचार संस्थान में तिरंगा नहीं फहराया गया। प्रशासन की तरफ़ से कोई भी अधिकारी या उसका प्रतिनिधि तक संस्थान में बारह बजे भी मौजूद नहीं था। तब ऐसे में आईआईएमसी के छात्रावास में रह रहे कुछ जागरुक प्रशिक्षुओं ने इस मामले को संज्ञान में लिया और अपने ही खर्च में बाज़ार से तिरंगा झण्डा और कुछ फूल ख़रीद कर संस्थान में वापस आए और तिंगा फहराया।

सुबह बारह बजे तक जब आईआईएमसी में राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया तो वहां के छात्रावास में रह रहे प्रशिक्षुओं ने इसका संज्ञान लिया। उन्होने संस्थान की प्रचीर में तिरंगा फहराने केलिए सर्वसम्मति से योजना बनाई और इसके लिए संस्थान में मौजूद कुछ कर्मचारियों और गार्ड्स से प्रशिक्षुओं ने इसकी सूचना दी कि वह संस्थान में तिरंगा फहराना चाह रहे हैं। किन्तु गार्डों का कहना था कि हमें कोई आदेश नहीं दिया गया है और न ही ऐसी कोई सूचना ही है कि आज झंडारोहण होना है। गार्डों की बात सुनकर प्रशिक्षु हैरत में आ गए और उन्होने गार्डों से कहा कि क्या इसके लिए किसी आदेश और योजना की ज़रूरत पड़ती है? आज हमारा गणतंत्र दिवस है और हम इसके लिए सुबह से इंतज़ार में हैं कि अभी राष्ट्रध्वज फहरेगा और राष्ट्रगान के बाद मिष्ठान वितरित किया जाएगा, किन्तु ऐसा नहीं हुआ, जबकि दोपहर के एक बज चुके हैं। अंत तक दोनो पक्षों में बात नहीं बन पाई और प्रशिक्षु तिरंगा फहराने के अपने निर्णय और धर्म पर टिके रहे।

इसके बाद का सिलसिला ये रहा, कि प्रशिक्षु संस्था के मुख्य द्वार से ही तिरंगा फहराने के स्थल तक चढ़ गए और क्रान्तिकारी तरीके से आईआईएमसी के माथे पर तिरंगा बांधा। इसको लेकर इन युवाओ में काफी उत्साह देखने को मिल रहा था। इन्होने प्रशासन पर संवेदनहीनता का आरोप लगाया है। इस मामले में सबसे पहले झंडारोहण स्थल तक पहुंच कर झंडा फहराने वाले नीरज प्रियदर्शी का कहना है कि आज गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर जहां देश के हर कोने में बैठा युवा जोश और देश-प्रेम के रंग में डूबा है, वैसी स्थिति के बरक्स हम यहां पर संवेदनहीनता का पाठ सा पढ़ रहे हैं, ये सब सीखने को हमे प्रशासन मजबूर कर रहा है। लेकिन वास्तव में हम संवेदनहीन हैं नहीं। इसीलिए हमने यह निर्णय किया है कि अपने संस्थान में हम तिरंगा अवश्य फहराएंगे, और इसीलिए हमने ऐसा किया। वहीं इस युवा दल का नेतृत्व कर रहे सूरज पाण्डेय ने भी प्रशासन सहित आईआईएमसी एलुमनी एसोसिएशन(इम्का) की निश्क्रियता पर भी सवाल उठाएं हैं और कहा है कि इम्का भी जब हर कदम पर हमारे साथ रहता है तो इस तरह के गम्भीर मामलों में भी उसे संस्था की ख़बर लेनी चाहिए। उन्होने कह कि हम जानना चाहते हैं कि प्रशासन ने क्यूं तिरंगा नहीं फहराया और यदि कोई भी अपिहार्य कारण रहा भी तो हम छात्रों को इसकी कोई सूचना क्यों नहीं दी गई।

बहरहाल ज्ञात हो कि 66वें गणतंत्र दिवस के दिन पत्रकारिता का मक्का कहे जाने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया गया, ऐसी स्थिति में वहां के छात्रावास में रह रहे प्रशिक्षुओं के एक दल ने वहां स्वयं से तिरंगा फहराया और मिष्ठान स्वरूप चॉकलेट्स आपस में तथा कर्मचारी और गार्डों के बीच बांटकर पर्व का जश्न मनाया।  

आईआईएमसी छात्र अमित राजपूत की रिपोर्ट.

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IIMC में महत्वहीन भारतीय गणतंत्र

ये है भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) जहां कि भारत के साथ ही विश्व के सुदूर कोनों से भी लोग पत्रकारिता पढ़ने आते हैं। और ये तस्वीर है 26-01-2015 सुबह 11:20 बजे की जहां भारत के हर कोने में गणतंत्र दिवस की धूम थी। हर तरफ झंडारोहण हो चुका था और मिष्ठान्न वितरण के बाद लोग विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठा रहे थे। हम आईआईएमसी में पढ़ने वाले बच्चे जो कि छात्रावास में रहते हैं। रोज की तरह नाश्ते पर इकट्ठा हुये। आमतौर पर मैं नाश्ता नहीं करता महीनों में कहीं एक बार कर लिया तो कर लिया, लेकिन आज मैं सुबह बहुत जल्दी उठ गया था क्योंकि आज गर्व का दिन था, जश्न मनाने का दिन था।

नाश्ते पर मेरी बात हुई नीरज से वो बोला कि यार कोई तैयारी नहीं दिख रही अपने यहां। मैंने कहा यार यहां 15 अगस्त को 11 बजे के बाद ध्वजारोहण हुआ था, हो सकता है आज भी वही हो। फिर संस्थान में उपस्थित कर्मचारियों से बात की तो पता चला कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। थोड़ी निराशा हुई और ज्यादा दुख। फिर हमने सोचा कि 11 बजे तक देख लेते हैं फिर करते हैं जो करना है। लेकिन 11:20 तक कुछ नहीं हुआ तो हम निकल पड़े झंडे की तलाश में। हालांकि मेरी जेब में पड़े हुये आखिरी 200 रुपये इस बात की इजाजत तो नहीं दे रहे थे कि हम ऐसा करें, लेकिन हम निकल पड़े ये सोचकर कि ये दिन बार-बार नहीं आता। मैं, नीरज प्रियदर्शी और हमारे अनन्य सहयोगी महापंडित (राहुल सांकृत्यायन) पैदल नजदीकी बाजार कटवरिया सराय पंहुचे पूरा बाजार छान मारा लेकिन एक अदद झंडा नहीं मिला।

हमने वहां चाय पी और विचार किया कि आज तो झंडा लेकर ही चलना है। फिर हम वहां से निकले और पंहुचे बेर सराय लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी झंडा नहीं मिला। वहीं पुराने जेएनयू परिसर में स्थित सीआरपीएफ के कैंप में भी हम पंहुच गये झंडे की खोज में लेकिन, उन्होंने कहा कि उनके पास एक ही झंडा था जो कि फहराया जा चुका है। हम बाहर निकले और फिर महापंडित ने कहा कि यार अब ना बस से चलते हैं मुनीरका। हम उनकी बात मानकर बस में बैठे और मुनीरका पंहुचे वहां की गलियों की खाक छानी बहुत खोजने पर एक जगह झंडा मिला उसे लेकर हम वाया ऑटो संस्थान वापस लौटे। यहां कर्मचारियों ने देखा तो कहा कि आ गये गणतंत्र दिवस मनाकर ? हमने कहा कि नहीं तो अभी तो बाकी है यहीं फहरायेंगे तिरंगा। उन्होंने मना कर दिया कि यहां 26 जनवरी को कोई समारोह नहीं होता। लेकिन हम जिद पर थे कि आज तो झंडारोहण करके रहेंगे। वैसे भी अब हम तीन ही नहीं थे हमारे अन्य साथी प्रशांत, जितेश, विकास, चंद्रभूषण, अमन, धर्मेंद्र, अमित,  इम्तियाज भी थे।

हम जोर-शोर से डंडे की खोज में लग गय जिसे झंडे में लगाया जा सके। फाइनली हमारे साथी इम्तियाज को मिल ही गया डंडा। हमने झंडे को डंडे में लगाया और फिर हमने ऊपर चढ़ने के जुगाड़ की सोची क्योंकि चढ़ने के लिये कोई शॉर्टकट तो है नहीं और ऊपर ताला लगा था। हम अंदर घुसे तो हमें एक सीढ़ी मिल गई बस फिर क्या था? सीढ़ी थी तो छोटी लेकिन हमारे देसी स्पाइडरमैन नीरज उसके सहारे ही चढ़ गये और हमने फिर थोड़ा सा ऊपर चढ़कर झंडा पकड़ाया। अभी ये सब चल ही रहा था कि एक महाशय अंदर से दौड़ते हुये निकले और बोले कि परमीशन कहां है ? बिना परमीशन कैसे कर रहे हो ? और भी तमाम सवाल लेेकर वो कूद पड़े। हमारे महापंडित और अन्य साथियों ने उनसे शब्दों में मुकाबला कर उन्हें निरुत्तर कर दिया फिर भी वो माने नहीं और किसी प्रशासनिक अधिकारी को फोन कर हमारी शिकायत कर दी। लेकिन अधिकारी ने मामले में दखल देने से मना करते हुये कहा कि झंडा ही तो फहरा रहे हैं। कौन सा गलत कर रहे हैं करने दो। हालांकि तब तक हम झंडा फहरा चुके थे।

फिर उन्होंने खुद ही चाभी मंगाई और ताला खुलवाया और हम सारे कॉमरेड ऊपर गये।।

ये तो रही आज के झंडारोहण की कहानी

अब बात करते हैं थोड़ी सामाजिक और संवैधानिक गरिमाओं की।  हर सरकारी संस्थान में 15 अगस्त, 26 जनवरी और 2 अक्टूबर को ध्वजारोहण का प्रावधान है। लेकिन आईआईएमसी हेडक्वार्टर 15 अगस्त को दिन में 11 बजे के बाद, अमरावती में इस साल हुआ ही नहीं बाकी सालों का पता नहीं। 2 अक्टूबर तो खैर स्वच्छता दिवस में निकल गया और 26 जनवरी को तो हद ही हो गई यहां ना तो कोई समारोह ना कुछ गणतंत्र दिवस बस एक छुट्टी बनकर रह गया। वजह पूछने पर गोल मोल जवाब कि यहां नहीं होता,कुछ वजह है, ये है, वो है जाने क्या क्या। लेकिन असल वजह कोई नहीं बता रहा।

कितनी शर्मनाक बात है कि ना तो कोई प्रशासनिक अधिकारी और ना ही महान रूप से एक्टिव रहने वाला आईआईएमसी एलुम्नाई एसोसिएशन (इम्का) इस दिन संस्थान में झंडारोहण करने के लिये आगे आया। जबकि 4-5 दिसंबर 2014 की रात में यहां कुछ शिक्षकों और कुछ छात्रों के सौजन्य से धूम-धाम से बोनफायर का आयोजन हुआ था जहां क्या-क्या हुआ था सबको पता है। और तो और विरोध करने पर मारने-पीटने तक की धमकियां दी गईं। शिकायत करने पर कोई कार्यवाही नहीं की गई अपितु पीड़ित पक्ष को डांट कर चुप करा दिया गया।  24 जनवरी को वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा करना चाहते थे तो उनको ये कहते हुये मना कर दिया गया कि संस्थान सेक्यूलर है यहां बस राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, और 26 जनवरी ही मनाये जाते है। फिर अब आप ही बताओ कि 26 जनवरी क्यों नहीं मनाई गई ? क्या इससे भी देश की सेक्यूलर इमेज को खतरा है? बंद कक्षाओं में एथिक्स और मोरलिटी के लेक्चर देना बहुत आसान है लेकिन आम जीवन में उनका पालन करना बेहद मुश्किल।। यहां आप वामपंथी कविताओं के पोस्टर लगा सकते हैं किसी अनुमति की जरूरत नहीं।लेकिन तिरंगा फहराने के लिये आपको एक दिन पहले आवेदन देना पड़ेगा। पूरा कैंपस धूम्रपान मुक्त है लेकिन यहां शिक्षक छात्रों को और छात्र शिक्षक को सिगरेट के साथ ही वीड का भी लेन-देन करते हैं। गाजा-सीरिया पर लंबी-लंबी बहसें होती हैं और अपने देश से किसी को कोई लेना देना ही नहीं। आईआईएमसी हॉस्टल के तो कहने ही क्या ? कहने को तो हॉस्टल में रहने वालों के लिये 32 नियम हैं जिनमें नशाखोरी नहीं करने,10 बजे के बाद बाहर तो दूर किसी और के कमरे में जाने की मनाही लिखी है लेकिन यहां लोग पूरी रात बाहर घूमते रहते हैं। नशाखोरी तो बेहद आम बात है यहां। अब ऐसे में सवाल ये है कि आईआईएमसी में पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार की जाती है या नशाखोर, अराजक, और नक्सली विचारधारा को मानने वाले नौजवानों की फौज ??

लेखक चंदन सूरज पांडेय आईआईएमसी के छात्र हैं. उनसे संपर्क chandu.suraj11@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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आईआईएमसी में छात्रों ने खुद किया ध्वजारोहण, प्रशासन को चेताया

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आईआईएमसी में छात्रों ने खुद किया ध्वजारोहण, प्रशासन को चेताया

नयी दिल्ली। राष्ट्र का पर्व हो और राष्ट्र ध्वज न फहराया जाये, ये बात सभी को अखरती है। खुद को पत्रकारिता का सर्वश्रेष्ठ संस्थान कहने वाले भारतीय जनसंचार संस्थान में भी कुछ ऐसा ही हुआ। 26 जनवरी की सुबह परिसर में कोई हलचल नहीं थी, न किसी प्रकार के  आयोजन की सुगबुगाहट। परिसर के सुरक्षाकर्मियों से पूंछा गया तो बताया गया  कि संस्थान में 26 जनवरी को किसी भी प्रकार का आयोजन नहीं होता।

यह सुनते ही छात्रों में रोष फैल गया और सभी ने बिना प्रशासनिक मदद के ध्वजारोहण करने की ठानी। छात्रों ने संस्थान के एक शिक्षक से इस सम्बन्ध में बात की तो उन्होंने भी कहा कि परिसर में 26 जनवरी का आयोजन नहीं होता लेकिन छात्रों ने किसी की न सुनी और संस्थान के मुख्य परिसर में क्रांतिकारी तरीके से ध्वजारोहण किया।

छात्रों की जागरूकता की चर्चा पूरे परिसर में है। सवाल ये है  कि 26 जनवरी केवल राजपथ के लिये मनाया जाता है। अगर ऐसा है तो क्यों हैं ? सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार के अंतर्गत आने वाले संस्थान में 26 जनवरी के दिन ध्वजारोहण न होना एक सवाल है सभी के लिये जो इसे राष्ट्रीय पर्व कहतें हैं। सुरक्षाकर्मियों से जब इस बावत जानकारी लेनी चाही गयी तो पूर्व में किसी हादसे की दुहाई देकर ध्वाजारोहण करने से मना किया गया।

बात केवल 26 जनवरी की ही नहीं है, बल्कि 15 अगस्त को भी यहां केवल औपचारिकता निभाई जाती है। यहां उस दिन ध्वजरोहण 11 बजे के आस पास किया जाता है और देरी का कारण ये बताया जाता है कि  महानिदेशक सुबह राजपथ चले जातें हैं। क्या परिसर में महानिदेशक कि अनुपस्थिति में कोई और ध्वजारोहण नहीं कर सकता? आखिर और भी अधिकारी हैं संस्थान में।

26 जनवरी को परिसर में ध्वजारोहण न होना कई सारे सवाल छोड़ जाता है। सबसे बड़ा तो ये कि जिस संस्थान में पत्रकारिता के मानदण्ड पढ़ायें जातें हैं अगर उसी संस्थान में ये हालात है तो बाकी से क्या उम्मीद करें। संस्थान के अमरावती केन्द्र जो कि महाराष्ट्र में हैं वहां भी 26 जनवरी को ऐसे ही हालात रहे और 15 अगस्त भी नहीं मनाया गया था।

ध्वजारोहण करने वाले छात्रों का कहना था कि वे चाहते तो संस्थान प्रशासन के खिलाफ कर्रावाई जैसा सख्त कदम भी उठा सकते थे लेकिन उन्होंने किसी पर दोष मढ़ने से बेहतर खुद ही ध्वजारोहण समझा। छात्रों का कहना है कि प्रशासन अगर ये काम भी नहीं कर सकता तो किस हक से पत्रकारिता का उच्च संस्थान होने का दावा करता है। उन्होंने कहा कि अगर आगे से ऐसी गलती हुई तो हम ध्वजारोहण भी करेंगे और कार्रवाई भी। ध्वजारोहण के दौरान सूरज, नीरज, अमित, चंद्रभूषण,जीतेश, प्रशांत, विकास, धर्मेन्द्र, अभिनव इम्तियाज, अमन समेत कई  छात्रगण मौजूद रहे। ध्वजारोहण के पश्चात मिष्ठान वितरण भी हुआ।

लेखक राहुल सांकृत्यायन से संपर्क itirahulubaach@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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आईआईएमसी से निकलते ही होनहार पत्रकार हिमांशु ने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठा लिया!

Abhishek Srivastava : स्‍वागत कीजिए Indian Institute Of Mass Communication(IIMC) से निकले इस होनहार पत्रकार Himanshu Shekhar का, जिसने ‘सही’ समय पर ‘सही’ कदम उठाते हुए पूरे साहस के साथ ऐसा काम कर दिखाया है जो अपनी शर्म-लिहाज के कारण ही सही, बड़े-बड़े पुरोधा नहीं कर पा रहे। मैं हमेशा से कहता था कि संस्‍थान में पत्रकारिता के अलावा बाकी सब पढ़ाया जाता है। बस देखते रहिए, और कौन-कौन हिंदू राष्‍ट्र की चौखट पर गिरता है।

 

युवा मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर खुद हिमांशु शेखर ने जो प्रतिक्रिया दी है, वह इस प्रकार है…

Himanshu Shekhar : अभिषेक श्रीवास्तव जी से एकाध बार मुलाकात हुई है। इनके बोलचाल और लेखन से मैं इन्हें गंभीर पत्रकार ही नहीं इंसान भी समझता था। लेकिन ये सज्जन तो एक ऐसे जज की तरह बर्ताव कर रहे हैं जिसे साक्ष्यों से कोई लेेना—देना ही नहीं। उसे तो साक्ष्यों को देखने तक में अपने श्रम के जाया होने का भय है। प्रथम दृष्टया कोई मामला आया और सुना दिया फैसला। काश! अभिषेक जी आप ये फैसला किताब कम से कम एक बार देख कर सुनाते। अगर थोड़ी फुर्सत होती तो भूमिका मात्र ही पढ़ लेते। लेकिन फेसबुक पर कमेंट करने की जल्दबाजी रही होगी शायद आपको, इसलिए आपने ऐसा जहमत नहीं उठाया। खैर, इतनी जल्दबाजी में सुनाए गए निर्णय के बारे में क्या ही कहना! जब आप एक व्यक्ति का सही आकलन नहीं कर सकते तो फिर आईआईएमसी जैसे संस्थान के आकलन में गलती होना स्वाभाविक ही है।

मूल पोस्ट…

हिमांशु शेखर की किताब ‘मैनेजमेंट गुरू नरेंद्र मोदी’ का विमोचन अमित शाह ने किया

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पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

आज पता चला कि वे अचानक हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के ”मीडिया सलाहकार” बन गए हैं। उनका नाम अमित आर्य है। जागरण की साइट पर आज इस आशय की एक ख़बर है जिसमें उन्‍होंने हिमाचल की छात्र राजनीति में एबीवीपी के अपने अतीत को इस फल का श्रेय दिया है और जेपी नड्डा को ससम्‍मान याद किया है। संयोग से आज ही हरियाणा पुलिस ने मीडिया को भर हिक पीटा है। सोच रहा हूं कि ”सिर मुंड़ाते ओले पड़ना” का उदाहरण क्‍या इससे बेहतर कुछ होगा?

अच्‍छे दिनों की ऐसी कहानियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, आज शाम एनडीटीवी इंडिया के पैनल पर जो लोग बाबा प्रकरण पर जिरह करने बैठे थे, उनमें एक के नाम के नीचे परिचय लिखा था ”धर्म गुरु”। इस शख्‍स का नाम है आचार्य शैलेश तिवारी, जो भारतीय जनसंचार संस्‍थान यानी IIMC का कुछ साल पुराना हिंदी पत्रकारिता का छात्र है। पत्रकारिता पढ़ कर पांच साल में धर्म गुरु बन जाना हमारे देश में ही संभव है। ज़ाहिर है, अच्‍छे दिनों का असर रवीश कुमार जैसे ठीकठाक आदमी पर भी पड़ ही जाता है, जिन्‍होंने प्राइम टाइम पर अपनी रनिंग कमेंट्री के दौरान आज मार खाने वाले पत्रकारों के नाम गिनवाते हुए ”एबीपी” चैनल को ‘एबीवीपी” कह डाला। बहरहाल, जितने पत्रकारों को आज मार पड़ी है, उनमें मुझे इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़ और इंडिया न्‍यूज़ का कोई व्‍यक्ति नहीं दिखा। किसी को पता हो तो नाम ज़रूर गिनवाएं।

Abhishek Srivastava : ‘पाखी’ पत्रिका के दफ्तर में साढ़े तीन घंटे तक चले अपने सामूहिक साक्षात्‍कार के दौरान कुमार विश्‍वास ने दिल्‍ली के खिड़की एक्‍सटेंशन और सोमनाथ भारती वाली कुख्‍यात घटना का जि़क्र करते हुए अफ्रीकी नागरिकों को ‘नीग्रो’ कहकर संबोधित किया। जब मैंने इस पर प्रतिवाद किया, तो उन्‍हें अव्‍वल यह बात ही समझ में नहीं आई कि आपत्ति क्‍यों की जा रही है। तब मैंने उन्‍हें एक और उदाहरण दिया कि कैसे कमरे में प्रवेश करते वक्‍त उन्‍होंने अपूर्व जोशी को ‘पंडीजी’ कह कर पुकारा था। इस पर वे कुछ बैकफुट पर तो आए, लेकिन अपने इन जातिसूचक और नस्‍लभेदी संबोधनों पर उन्‍होंने कोई खेद नहीं जताया। यह प्रकरण प्रकाशित साक्षात्‍कार में गायब है। ऐसे कई और सवाल हैं, प्रतिवाद हैं जिन्‍हें संपादित कर के हटा दिया गया। ज़ाहिर है, इतने लंबे संवाद से कुछ बातें हटनी ही थीं लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हटा दी गईं जिनसे कुमार विश्‍वास के एक रचनाकार, राजनेता और सार्वजनिक दायरे की शख्सियत होने के कारणों पर शक़ पैदा होता हो।

अपने देश-काल की औसत और स्‍वीकृत सभ्‍यता के पैमानों पर कोई व्‍यक्ति अगर खरा नहीं उतरता, तो यह बात सबको पता चलनी ही चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जो लोग लिखे में ‘पॉपुलर’ का समर्थन कुमार विश्‍वास की पूंछ के सहारे कर रहे हैं, उन्‍हें शायद समझ में आए कि दरअसल वे अंधेरे में अजगर को ही रस्‍सी समझ बैठे हैं। ‘पॉपुलर’ से परहेज़ क्‍यों हो, लेकिन कुमार विश्‍वास उसका पैमाना कतई नहीं हो सकते। मेरा ख़याल है कि अगर साढ़े तीन घंटे चले संवाद की रिकॉर्डिंग जस का तस सार्वजनिक की जाए, तो शायद कुछ धुंध छंटने में मदद मिले। जो प्रश्‍न औचक किए गए लग रहे हैं, जो बातें संदर्भहीन दिख रही हैं और कुमार को जो ”घेर कर मारने” वाला भाव संप्रेषित हो रहा है, वह सब कुछ पूरे साक्षात्‍कार के सामने आने के बाद परिप्रेक्ष्‍य में समझा जा सकेगा। उसके बाद पॉपुलर बनाम क्‍लासिकी पर कोई भी बहस विश्‍वास के समूचे व्‍यक्तित्‍व को ध्‍यान में रखकर और उन्‍हें इससे अनिवार्यत: बाहर रखकर की जा सकेगी।

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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आईआईएमसी के कॉन्वोकेशन में प्रकाश जावड़ेकर का क्या काम है?

20 अक्टूबर को आईआईएमसी में कॉन्वोकेशन है इस बार इस फंक्शन में सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भी शामिल हो रहे हैं जो कि इस पद की गरिमा के खिलाफ है. अभी तक आईआईएमसी के कॉन्वोकेशन में सेक्रेटरी या उस रैंक के अधिकारी ही शिरकत करते आये हैं.

यहां तक कि खुद आईआईएमसी के टीचिंग व नॉन टीचिंग स्टाफ भी नहीं चाहते कि मंत्री जी इस फंक्शन में शामिल होकर अपने पद की गरिमा को गिरायें. दरअसल आईआईएमसी के स्टाफ के बीच ये चर्चा आम है कि निदेशक सुनीत टंडन ”आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं” के गीत गाने वाले के तौर पर शोहरत हासिल कर चुके हैं. ऐसे में आईआईएमसी के फैकल्टी और बाकी दूसरे स्टाफ इस विवाद में मंत्री को शामिल नहीं होने देना चाहते. 

जावड़ेकर को निदेशक महोदय ने खुद कॉन्वोकेशन में शामिल होने के लिये बुलाया है. कांग्रेसी राज में नियुक्त हुए सुनीत टंडन इस तीर से दोहरा निशाना साधने की फिराक में हैं. एक तो वे जावड़ेकर से नजदीकी बढ़ा कर अपनी नियुक्ति पक्की करना चाहते हैं और मंत्री को कॉन्वोकेशन में शामिल कर अपने खिलाफ चल रही चर्चाओं को खत्म करना चाहते हैं. दूसरे वे मंत्रालय के उन अधिकारियों को भी जवाब देने चाहते हैं जो उनकी नियुक्ति के खिलाफ हैं.

सुनीत टंडन शुरु से ही विवादों में रहे हैं. माधव राव सिंधिया के परिवार से करीबी संबंधों के चलते अंबिका सोनी के कार्यकाल में नियुक्ति पाये इन निदेशक महोदय को पिछले सूचना-प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी भी पसंद नहीं करते थे. इन्होंने अपने कार्यकाल में पांच जगहों पर आईआईएमसी की शाखाएं शुरु करवायीं, लेकिन सभी एक एक कर बंद हो गये क्योंकि उन्हें डिप्लोमा तक की मान्यता नहीं मिल पायी. यहां तक कि दिल्ली का डिप्लोमा कार्यक्रम भी बंद करना पड़ा. 

आईआईएमसी के लिये ये एक शर्मनाक बात थी और संस्थान के स्टाफ उम्मीद कर रहे थे कि मोदी सरकार इस विवादित नियुक्ति को विदा करेगी, लेकिन मंत्री महोदय उसी निदेशक के साथ मंच साझा कर रहे हैं जिसे लेकर सब को हैरानी है.

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आईआईएमसी में अराजकता, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का बोलबाला

नई दिल्ली, १६ अक्टूबर : भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) की छात्राओं ने संस्थान के एक लोअर डिविजन क्लर्क सागर राणा पर दुर्व्यवहार और डराने-धमकाने का आरोप लगाया है. संस्थान के छात्र-छात्राओं में इसे लेकर भारी गुस्सा है लेकिन संस्थान के उच्च अधिकारी आरोपी को बचाने में जुटे हैं. राणा संस्थान के चेयरमैन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव बिमल जुल्का के ड्राइवर का बेटा है जिसे संस्थान के ओ.एस.डी जयदीप भटनागर का खुला संरक्षण मिला हुआ है और इसके बल पर उसने संस्थान में आतंक और धौंस-धमकी का माहौल बना रखा है.

IIMC में हिंदी का हाल : जैसे छात्र हैं, वैसे ही शिक्षक. सब आंख पर पट्टी बांधे हैं, नौकरी बजा रहे हैं.

संस्थान की छात्राओं का आरोप है कि आरोपी राणा ने एक छात्रा की बिना अनुमति के न सिर्फ मोबाइल पर फोटो खींची बल्कि उसे लोगों को बताने की भी धमकी दी. आरोप है कि परिसर में रहनेवाला सागर राणा शाम को छात्र-छात्राओं से न सिर्फ बदतमीजी से पेश आता है बल्कि मोरल पुलिसिंग करने की कोशिश करता है. यही नहीं, उस पर संस्थान के कर्मचारियों पर भी धौंस जमाने का आरोप है.

सूत्रों के मुताबिक, आरोपी सागर राणा को संस्थान के चेयरमैन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव की कार के ड्राइवर का बेटा होने के नाते संस्थान में तमाम नियमों को धता बताते हुए लोअर डिविजन क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया था. संस्थान में उसके प्रभाव का आलम यह है कि उसे वरिष्ठता का उल्लंघन करके न सिर्फ परिसर में क्वार्टर आवंटित किया गया बल्कि हजारों रूपये खर्च करके उसमें टाइल्स आदि भी लगवाए गए. यही नहीं, वह खुद को संस्थान का केयर-टेकर भी बताता है.

राणा का दावा है कि उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता है क्योंकि उसके पिता संस्थान के चेयरमैन की कार के ड्राइवर हैं. उल्लेखनीय है कि इनदिनों संस्थान में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अनियमितताओं और अराजकता का बोलबाला है. हालात यह है कि पिछले दो-तीन सालों में संस्थान में लोअर डिविजन कलर्क और दूसरे कर्मचारियों की जितनी भी भर्तियाँ हुईं हैं, उसमें से ८० फीसदी भर्तियाँ संस्थान के अधिकारियों और कर्मचारियों के बेटे-बेटियों की हुई हैं. सागर राणा भी उनमें से एक है और इनलोगों ने संस्थान में मनमानी और अनियमितताओं की गंध मचा रखी है.

मजे की बात है कि संस्थान के ही एक कर्मचारी देवराज ने संस्थान में हुई भरतियों में मची धांधली के बारे में चार महीने पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को शिकायत भेजी थी जिसपर पी.एम.ओ ने जांच का आदेश दिया था. लेकिन संस्थान के चेयरमैन बिमल जुल्का के ड्राइवर का मामला होने के कारण न सिर्फ जांच के नाम पर मामले को रफा-दफा करने और शिकायतकर्ता को डराने-धमकाने की कोशिश हो रही है. हालात यह हो गई कि शिकायतकर्ता देवराज को पुलिस में अपनी जान पर खतरे की शिकायत करनी पड़ी जिसमें संस्थान के ओ.एस.डी जयदीप भटनागर और सहायक कुलसचिव बी.डी जोशी (इनके बेटे और भांजे की भी भर्ती हुई है) को नामित किया गया है. 

आईआईएमसी में कार्यरत एक अध्यापक की तरफ से भेजे गए पत्र पर आधारित.

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