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AI की आंधी में भारतीय IT कंपनियाँ: क्यों हिल गई है कोडिंग से लेकर मेंटेनेंस तक की पूरी इंडस्ट्री, अब आगे क्या होगा!

नया “कोडिंग वाला AI” क्या है, SaaS मॉडल क्यों ढह रहा है और भारत की पारंपरिक IT कंपनियों के लिए यह बदलाव अस्तित्व का संकट कैसे बनता जा रहा है

भारतीय IT इंडस्ट्री जिस मॉडल पर तीन दशक से खड़ी रही, वही मॉडल अब तेज़ी से अप्रासंगिक होता जा रहा है। वजह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का वह नया रूप, जो अब सिर्फ़ सवालों के जवाब देने वाला चैटबॉट नहीं, बल्कि इंसानों की जगह काम करने वाला “AI वर्कर” बन चुका है। कोडिंग, टेस्टिंग, मेंटेनेंस, अकाउंटिंग, लीगल ड्राफ्टिंग जैसे काम, जिन पर लाखों लोगों की नौकरियाँ टिकी थीं, अब मिनटों में मशीनें करने लगी हैं। इसी बदलाव ने भारत की पारंपरिक IT कंपनियों के भविष्य पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

पिछले दिनों एक टेक मैनेजर और उसके सहयोगी की बातचीत इस बदलाव की सच्चाई को उजागर करती है। मैनेजर ने बताया कि उसने 50 साल से अधिक उम्र के एक सीनियर प्रोग्रामर को क्यों हटाया। उसका कहना था कि जिस काम को वह प्रोग्रामर पूरे हफ्ते में करता था, वही काम उसने अपने AI वर्कर को साधारण अंग्रेज़ी में निर्देश देकर दस मिनट से भी कम समय में करवा लिया, और तैयार कोड गुणवत्ता में बेहतर निकला। मैनेजर के मुताबिक, इंसानी स्टाफ के साथ मीटिंग, स्टेटस अपडेट और निगरानी में समय और पैसा दोनों खर्च होते हैं, जबकि AI के साथ ऐसा कुछ नहीं है। यहाँ तक कहा गया कि अगर वह प्रोग्रामर मुफ़्त में भी काम करने को तैयार होता, तब भी अब उसे नौकरी नहीं मिलती।

इसी पृष्ठभूमि में पिछले सप्ताह टेक कंपनियों, खासकर भारतीय IT कंपनियों के शेयरों में तेज़ गिरावट देखी गई। इसकी बड़ी वजह AI कंपनी Anthropic द्वारा लॉन्च किए गए नए टूल्स माने जा रहे हैं। ये टूल्स पारंपरिक AI एजेंट से आगे बढ़कर “AI वर्कर” बन चुके हैं। अब तक Software as a Service यानी SaaS मॉडल पर काम करने वाली कंपनियाँ, जैसे एंटरप्राइज़ सॉफ्टवेयर देने वाली वैश्विक कंपनियाँ, यूज़र को टूल देती थीं और उसके इस्तेमाल व मेंटेनेंस के बदले फीस लेती थीं। Anthropic के नए टूल्स ने इस मॉडल को ही चुनौती दे दी है, क्योंकि AI अब खुद सॉफ्टवेयर बना भी सकता है और उसे चला व मेंटेन भी कर सकता है।

इस बदलाव का सबसे गहरा असर भारत की IT कंपनियों पर पड़ रहा है। भारतीय कंपनियों का बड़ा कारोबार विदेशी कंपनियों के सॉफ्टवेयर सिस्टम के मेंटेनेंस पर टिका है। यहाँ इंसानों की टीमें लगती हैं, घंटों के हिसाब से बिल बनता है और उसी से रेवेन्यू आता है। लेकिन जब वही काम AI मिनटों में करने लगे, तो घंटों की जरूरत ही खत्म हो जाती है। यही कारण है कि निवेशकों को लगने लगा है कि इस नए AI दौर में पारंपरिक IT बिज़नेस मॉडल टिक नहीं पाएगा।

AI की इस नई पीढ़ी को समझने के लिए Claude का उदाहरण अहम है। Claude एक AI चैटबॉट है, ठीक वैसे ही जैसे ChatGPT या Gemini, लेकिन Anthropic ने इसमें एक कदम आगे बढ़ते हुए Claude Code और Claude Co Work जैसे टूल्स लॉन्च किए हैं। फर्क यह है कि जहाँ चैटबॉट सिर्फ़ जवाब देता था और यूज़र को खुद कॉपी-पेस्ट कर काम करना पड़ता था, वहीं Co Work सीधे यूज़र के सिस्टम का हिस्सा बन जाता है। इसे एक जूनियर कर्मचारी की तरह पेश किया जा रहा है, जो कोडिंग, लीगल, अकाउंटिंग और मार्केटिंग जैसे कई काम खुद कर सकता है।

हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि Meta जैसी बड़ी कंपनियों में मैनेजर की भूमिका भी सीमित होती जा रही है। AI खुद तय कर लेता है कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है। कोडिंग के मामले में Claude मॉडल को फिलहाल सबसे आगे माना जा रहा है। Anthropic के CEO का दावा है कि आने वाले छह महीनों में इस स्तर की ऑटोमेशन, उनकी AI टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करने वाली हर कंपनी के लिए उपलब्ध होगी। संकेत साफ हैं कि पारंपरिक प्रोग्रामिंग जॉब्स तेजी से खत्म हो रही हैं।

जॉब मार्केट के आंकड़े भी यही कहानी कहते हैं। आज अगर किसी शहर में “Programmer” सर्च किया जाए, तो मुश्किल से सौ के आसपास नौकरियाँ दिखती हैं, जबकि 2021 में यही संख्या तीन हजार से ज्यादा हुआ करती थी। यानी जिस नौकरी को कभी सबसे सुरक्षित और सबसे ज़्यादा कमाई वाली माना जाता था, उसे AI ने लगभग निगल लिया है। सबसे ज़्यादा मार 45 प्लस उम्र के प्रोफेशनल्स पर पड़ी है, जिन्हें नौकरी से निकाला जा रहा है और दोबारा अवसर बहुत कम मिल रहे हैं। फ्रेशर्स के लिए तो यह दरवाज़ा लगभग बंद ही हो चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम को बाजार में “SaaS-pocalypse” कहा जाने लगा है। तुलना सौ साल पहले के दौर से की जा रही है, जब मोटर कार आने के बाद घोड़े ज़िंदा तो रहे, लेकिन काम के नहीं रहे। SaaS कंपनियों के साथ भी कुछ वैसा ही होने की आशंका जताई जा रही है। भारतीय IT कंपनियों की मुश्किल यह है कि उनके पास खुद के “घोड़े” यानी प्रोडक्ट कम हैं, उनका ज़्यादातर कारोबार “अस्तबल” यानी मेंटेनेंस पर टिका है। अगर सॉफ्टवेयर खुद AI बना और संभाल लेगा, तो मेंटेनेंस का काम भी घटेगा।

हालाँकि जानकार मानते हैं कि संकट सिर्फ़ नौकरियों का नहीं, पूरे बिज़नेस मॉडल का है। यह भी उम्मीद जताई जा रही है कि भारतीय IT कंपनियाँ धीरे-धीरे इस बदलाव के साथ खुद को ढाल लेंगी। AI लागू करने के लिए कंसल्टेंसी, इंटीग्रेशन और रणनीति जैसी सेवाओं की जरूरत बनी रहेगी। लेकिन इतना तय है कि AI के इस नए दौर ने भारतीय IT इंडस्ट्री को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहाँ पुराने रास्तों पर लौटना अब संभव नहीं है।

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