हमें तीनों वक्त मुसलमान चाहिए!

राकेश कायस्थ-

आप कितने भी नफरती हों, नाश्ते, खाने और शाम की चाय यानी तीनों वक्त मुसलमान हजम नहीं कर सकते। लेकिन लोग बकायदा हजम कर रहे हैं, यही नया भारत है। अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं है तो इसके दो ही मतलब हैं, या तो आप बहुत भोले हैं या फिर ज़हर कि लत आपको इस तरह लग चुकी है कि सब कुछ स्वभाविक लग रहा है।

फैमिली व्हाटएस एप ग्रुप या पुराने दोस्तों के किसी भी ग्रुप पर नज़र डालिये, पता चल जाएगा कि भारत किस तरह बदल चुका है। नाश्ते-खाने और चाय तीनों वक्त मुसलमान चाहिए।

अगर मुसलमान ना हो तो किराये का मुसलमान या फिर मुसलमानों का कोई ऐसा प्रतिनिधि भी चलेगा जिसकी धुलाई की जा सके।

बुल्ली बाई प्रकरण किसी भी सभ्य समाज के लिए नींद उड़ाने वाली घटना है। 18 साल की लड़की और 21 साल के इंजीनियरिंग स्ट्यूडेंट का इस घटना में शामिल होना बताता है कि आग आपके घर तक पहुंच चुकी है, लेकिन आप मंद-मंद मुस्कुराते हुए हाथ सेंक रहे हैं।

यह समाज के विघटन, सामूहिक उन्माद और हिंसा के सामान्यीकरण का दौर है। आप खुश हैं कि ये उस समुदाय के खिलाफ हो रहा है, जिससे नफरत की कहानियां सुन-सुनकर आप बड़े हुए हैं। आपकी समझ में नहीं आ रहा है कि यही नफरत आपको इस कदर ज़हरीला बना देगा कि आप एक-दूसरे को डंसने लगेंगे।

आखिर बरसों पुराने संबंध एक झटके में क्यों टूट रहे हैं? हर किसी का अनुभव है कि किसी के मामा, फूफा और ताऊ ने उसके साथ इतनी गाली-गलौच की कि संबंध हमेशा के लिए टूट गया। यह घृणा का प्रसाद है, जो घर-घर बंटना शुरू हो चुका है।

सरकार समर्थक पढ़े लिखे लोगों के नज़रिये पर गौर कीजिये। जहां समाज को विभाजित करने वाली बड़ी घटनाओं पर उनमें स्वीकार्यता की हद तक चुप्पी है। अब ज़रा सोचिये बुल्ली बाई प्रकरण के बाद कोई विघटनकारी ऐसा एप्प बनाये और उसमें हिंदू महिलाओं की तस्वीरें हो और उनकी बोली लगाई जाये तो क्या होगा?

सरकार समर्थक बुद्धिजीवियों का तबका अचानक सोशल मीडिया पर जाग जाएगा। वह सरकार से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग नहीं करेगा बल्कि इस बात के लिए चीख-पुकार मचाएगा कि उस समय तो इतना बोले अब इतना कम क्यों बोल रहे हो या चुप क्यों हो।

यह बहुसंख्यकवादी समाज में हिंसा को वैधता दिलाने, सांप्रादायिक दरार गहरी करने और सरकार को तमाम जिम्मेदारियों से परे रखने का एक व्यवस्थित डिजाइन है। फिलहाल इस खेल में बहुत लोगों को मज़ा आ रहा है।

1980 और 1990 के दौर में पाकिस्तान के खाते-पीते तबकों को भी ऐसा ही मज़ा आ रहा था। अब हाल ये है कि पाकिस्तानी होने के नाम पर अमेरिका और ब्रिटेन का वीजा लेने में उनकी नानी याद आ जाती है।

पेंशन के पैसे बढ़िया स्मार्ट फोन खरीदकर ये रात-दिन ज़हर की सप्लाई करने वाले बुजुर्ग तो कुछ साल में पतली गली पकड़ लेंगे लेकिन उनकी आनेवाली पीढ़ियां रोएंगी। जब तक समझ में आएगा तब तक शायद बहुत देर हो चुकी होगी।


मोनिषा प्रांशु-

बात राम मंदिर के फैसला आने के दिन की है, मैंने उसके वॉट्सएप स्टेटस में राम भगवान के सामने दिए जला कर रखे हुए फोटो लगा हुआ था उस पर कैप्शन था जिंदगी का सबसे बड़ा पल भगवान घर आए….

उस पर मैंने इतना सा लिखा, क्यों भगवान को क्या आज पहली बार घर मिला वो तो भगवान हैं, उनका तो पूरा संसार है.. उस पर स्माइली बना दिया..

इसपर उसके रिप्लाई में मुझे मेरा नाम बदलकर खातून रखने के साथ पाकिस्तान जाने को कहा गया और जाने क्या क्या कितनी सारी गालियों जैसी बातें,… मैं हैरान थी, उस बच्चे .. हां बच्चा ही क्योंकि आंखों के सामने बड़ा हुआ वो, कहीं से भी ऐसी नफरती बातें करने वाला नहीं था.. वो महज 20- 21 साल का था.. मेरे लिए उस से ऐसी बातें सुनना सदमे जैसा ही था…

समझ नहीं आया इतनी नफरत आखिर आई कैसे,
इतनी नफरत- घृणा एक खास वर्ग से एक दिन में तो नहीं हुई होगी,, 16-24 साल ये उम्र का वो पड़ाव है जहां से कितना कुछ सीखा या अपने करियर को नई दिशा दी जा सकती है,…पर कैसा विषैला वातावरण तैयार हो रहा, इनकी नसों में ही जहर घुल चुका है

bulli Bai एप के आरोपी के बारे में जानकर मुझे सबसे पहले वही घटना याद आई…जाने क्यों मैं इस बार हैरान नहीं हूं पर सोच रही किस तरह की पौध तैयार हो रही, क्या सोचते होंगे जब ऐसे एप तैयार करते होंगे , अपने बच्चों के इस राह पर चलने की जानकारी क्या उनके माता पिता को नहीं होती, उनके बातचीत हाव भाव बदलाव का इशारा नहीं करते … समय मंथन करने का है, खुद में , परवरिश के तरीकों में।

नोट: प्लीज राममंदिर के नाम आहत होकर पर ज्ञान देने मत आईयेगा …


कनुप्रिया-

कल बुल्ली बाई App मामले पर लिखी एक पोस्ट पर एक भक्त का कमेंट देख रही थी, वो कह रहा था इस मामले में संघ को न घसीटिये, शाखा में ये सब कुछ नहीं सिखाया जाता, आप एक बार जॉइन करके देखिए आपको पता चलेगा कि ये सब महज प्रोपेगैंडा संघ के ख़िलाफ़.

मज़ेदार बात ये है कि ठीक ऐसी ही बात मैं दूसरे धार्मिक संगठनों के बारे में भी सुनती हूँ. सभी धार्मिक संगठन दावा करते हैं कि वो सिर्फ़ जीवन शैली, नैतिक मूल्यों और ईश्वर के प्रति समर्पण के लिये काम करते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं तो समझ नही आता कि दूसरे धर्म समुदायों के प्रति इतनी नफ़रत समाज मे फिर आती कहाँ से है. फिर तो वो सारे समाज जहाँ धार्मिक संगठन सबसे ज़्यादा सक्रिय हैं, उच्च नैतिक सामाजिक मूल्यों से सरोबार होने चाहिएँ. मगर दुनिया के सबसे सुखी देशों और समाजो में वो लोग हैं जो प्रकृति के नज़दीक हैं, और बेहतर मानवीय सामाजिक मूल्यों को बिना किसी धर्म की आड़ के अपना रखा है.

बहरहाल 21 साल का विशाल झा और 18 साल की श्वेता सिंह, बुल्ली बाई एप्प के अभियुक्त के रूप में गिरफ्तार हुए हैं. ये अपवाद होता तब भी चिंता की बात नही थी, मगर ये युवा अपराधी एक प्रवृत्ति की तरह नज़र आते हैं जिसके पीछे वो साम्प्रदायिक घृणा है जो पिछले कुछ सालों में कई गुना बढ़ी है.

और हाँ प्लीज़ इनकी गिरफ़्तारी से अपना हाथ न झाड़ लीजिये, हम सब सह अभियुक्त हैं. हम अपने घर मे रजाई में घुसकर च्च्च्च करने की जगह अपने गिरेबान में झाँक लें कि राजनीतिक पार्टियाँ तो चलो अपनी सत्ता के लिये आग लगाती हैं, अगली, फिर उससे अगली सरकार बनाने की जुगत में लगी रहती हैं, मगर हमने भी इस नफ़रत को पोसने और फैलाने में कम योगदान नही दिया है.

हम आर्थिक रूप से सुरक्षित लोग, हमारे घरों पर धार्मिक ध्वजा लहरा रही है, हम सम्भवतः इन युवाओं की गिरफ़्तारी को collateral damage की तरह देखें कि बड़े एजेंडे के लिये इतनी बलियाँ तो चढ़ती ही हैं, जब पूर्ण राज आएगा तो ये युवा जेल में नही जाएँगे बल्कि गोडसे, रैगर की तरह सामाजिक मॉडल की तरह नवाज़े जाएँगे मगर हम ख़ुद अपने बच्चों को विदेश में सैटल करने का सपना देखते हैं जहाँ उनके साथ किसी प्रकार का धार्मिक, नस्लीय भेदभाव न हो.

देश के क़ाबिल युवाओं के पास न रोज़गार का वादा है, न बेहतर जीवन व्यवस्था का, ख़ुद को बेहतर बनाने की जगह दूसरों को नीचा देखने और दिखाने से उनके अहम की तुष्टि की जा रही है, उन्हें समझाया जा रहा है कि उनकी समस्याओं की जड़ वर्तमान व्यवस्था में नही बल्कि दूसरे धार्मिक समुदायों में निहित है, उन्हें अपने नफ़रती एजेंडे का ईँधन बनाया जा रहा है.

दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के लिए हमारी सरकारों के पास भविष्य की कोई ठोस योजना नही है, वर्तमान ये है तो भविष्य में अच्छे दिनों की कोई उम्मीद तो नहीं ही जगती.



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Comments on “हमें तीनों वक्त मुसलमान चाहिए!

  • Jeelani khan Alig says:

    Rakesh bhai yehi sabse badi tragedy hai k hum social diseases n heinous crimes ko bhi religious angle se dekhne lage hain… sabse bada mujrim so-called well-to-do section hi hai jise apni n family ki to bht perwa hai but dusre ki bilkul nhi especially agar wo muslim family ho to…. mob lynching pe silence kya indirectly support… namaz se rokne pr bhi khula support… ab bahu betiyon ki izzat ki nilami pe bhi silent support… Rahat Indori sb ka ye sher bilkul sach sabit hoga yaad rakhein aise log…. lagegi aag to aayeinge ghar kayi zad mein: Yehan pe sirf hamara makan thode hai…. Jai Hind

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  • गजेंद्र पाठक says:

    ये कोई आज की बात नहीं है। सदियों से जो नफरत के बीज बोए जाते रहे हैं उनका परिणाम आना तो स्वभाविक ही था। अब सवाल यह उठता है कि जनता अपनी भड़ास किस पर निकाले इसका तो सीधा साधा टारगेट तो सरकार ही हो सकती है अब चाहे इसे ‘शाहीन बाग’ के द्वारा निकाला जाए या फिर ‘किसान आंदोलन’ के द्वारा निकाला जाए।
    या हम ये मान लें कि पहले सब ठीक था और अभी ही सब गलत हो रहा है ।
    इसका निर्णय कौन करेगा ?
    क्या इसका निर्णय सड़कों पर आम जनता की भावनाओं को भड़का कर होगा ?
    यह निश्चय ही हमारे मानसिक दिवालियापन का प्रतीक है और इसका इलाज 1 दिन में संभव नहीं है। हम अपनी गलतियों से कोई सीख नहीं ले रहे हैं और संसद’ कार्यपालिका’ व न्यायपालिका में हम अपना भरोसा खो चुके हैं। इसके लिए हमें दूरगामी निर्णय लेने होंगे और समाज के हर वर्ग को निजी स्वार्थ से हटकर इसमें आगे आना होगा।

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