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पैसे कमाने की होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।

इसी क्रम में आज (इतवार) को मैंने एक स्टॉल वाले से कहा कि एक-एक इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स दे दो। उसने अखबार पकड़ाए और कहा 10 रुपए। मैंने कहा किसके कितने। उसने कहा हिन्दुस्तान टाइम्स तो साब पांच रुपए का है। ये भी (इंडियन एक्सप्रेस) पांच रुपए का है। मैंने कहा, कहां लिखा है दिखाओ। वह ढूंढ़ने लगा और 5 अक्तूबर दिखाकर कहा ये देखो साब। मैंने कहा ये तो आज की तारीख लिखी है। अब वह बेचारा और परेशान उसके साथ मैं भी। असल में आज इतवार को दोनों अखबारों में पहला पन्ना विज्ञापन का था और विज्ञापन के साथ बने मास्ट हेड में तारीख आदि तो हैं पर अखबार की कीमत नहीं लिखी है, न जाने क्यों। जब हॉकर को नहीं मिला तो मैंने उसकी सहायता के लिए अंदर के (जो असल में पहला था) पन्ने पर कीमत ढूंढ़ना शुरू किया और ढूंढ़ निकाला।

हॉकर सही था, मैंने 10 रुपए दिए और अखबार लेकर आगे बढ़ा तो अफसोस कर रहा था कि मैंने बेकार बेचारे कम पढ़े-लिखे अखबार विक्रेता को परेशान किया। पर साथ ही यह ख्याल भी आया कि अखबार वाले हम पाठकों का तो ख्याल नहीं ही रखते हैं, अपने विक्रेताओं की भी चिन्ता उन्हें नहीं है। एक समय था जब पहले पन्ने पर एक ही विज्ञापन होता था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई और अब अखबार वाले अपना पूरा पहला पन्ना बेच दे रहे हैं और पाठकों को पहले पन्ने की खबरें अंदर पढ़ा रहे हैं। पाठकों की परवाह तो अखबार वालों को नहीं है। उन्हें चिन्ता विज्ञापन देने वालों की है और उनकी सेवा वे अच्छी तरह कर भी रहे हैं पर बेचारे गरीब, कम पढ़े-लिखे विक्रेताओं का ख्याल तो रखो। पैसे कमाने की इस होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है, यह जानकर आज थोड़ा अफसोस हुआ।

दूसरी ओर, अखबार में विज्ञापन देने और छापने वालों को बता दूं – मैंने नहीं देखा कि विज्ञापन किसी चीज का था। शाम को बच्चों ने बताया कि आमिर खान का प्रोग्राम आज शुरू हो गया तब समझ में आया कि हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पेज के विज्ञापन में खबरें क्यों छपीं थीं और उनपर विज्ञापन क्यों लिखा था। अब याद नहीं आ रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर क्या विज्ञापन था (हालांकि था हिन्दुस्तान टाइम्स से अलग)। देखते हैं अखबार वाले इस तरह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए कब तक धंधा कर पाते हैं। हमारी तो जो मजबूरी है सो हइये है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. mohan lal

    October 11, 2014 at 12:37 pm

    Sanjay ji

    Namsty

    express, Agar ADVT 1 par nahi chapega to Magidiya kaha se de ga

    mohan Lal (Jansatta)

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