सरकारी विज्ञापन वितरण प्रणाली पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई नाराजी, 17 विभागों को नोटिस जारी

उन्मेष गुजराथी, दबंग दुनिया

मुंबई: अभिव्यक्ति के साधनों में से एक विज्ञापन को आधार बनाकर विभिन्न संस्थाएं, व्यक्ति अपने कार्यो को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं। समाचार पत्रों, चैनलों, सोशल मिडिया, रेडियो, मोबाइल के संदेशों के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति दी जा सकती है। विज्ञापन देने वाली कंपनियां किसे विज्ञापन दें, यह तो विज्ञापन देने वाली कंपनी के अधिकार क्षेत्र में रहता है, लेकिन कई बार यह देखने को मिलना है कि अच्छा सर्कुलेशन होने के बवाजूद विज्ञापन देने में दोहरी नीति अपनायी जाती है, जो लोग ऊंची पहुंच वाले हैं, वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कोई गुरेज नहीं करते।

दरअसल समाचार पत्रों में विज्ञापन देने वाले विभाग भी अपनी जेब भरने की फिराक में रहते हैं। दरअसल, इसके पीछे भी दबाव तंत्र काम करता है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में ख्यात समाचार पत्रों में विज्ञापन को लेकर जिस तरह की कमीशनखोरी जारी है, उससे यह सिद्ध होता है कि मिडिया क्षेत्र में भी दबावतंत्र हावी है और कुछ बड़े समाचार पत्रों को सभी नियमों को तोड़ते हुए भरपूर विज्ञापन दिए जाते हैं और कुछ समाचार पत्र ऐसे हैं, जिन्हें जानबूझ कर विज्ञापन से वंचित रखा जाता है।

राज्य सरकार के सूचना व जनसंपर्क महानिदेशालय तथा अन्य विभागों की ओर से वितरित किए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों में बड़ी मात्रा पर स्वेच्छाधिकार के बूते पर सरकारी नियमों को ताक पर रखते हुए कुछ चुने हुए समाचार पत्रों को ही विज्ञापन दिया जाता है। इस संबध में एडिटर्स फोरम ने बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सुनवाई  मा. न्यायमूर्ति शंतनु केमकर और न्यायमूर्ति एम.एस. कर्णिक की खंडपीठ के सामने हुई। इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजी जताई हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महानिदेशक (सूचना और जनसंपर्क), आयुक्त मुंबई महानगर पालिका, प्रबंध निदेशक और उपाध्यक्ष सिडको, मुख्याधिकारी एमआईडीसी समेत कुल 17 विभागों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।

छोटे अखबारों के साथ पक्षपात : मध्यम और छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन वितरित करते समय काफी पक्षपात किया जाता है। इस संदर्भ में एडिटर्स फोरम ने समय-समय पर सरकार और प्रशासन को इस सबंध में अवगत भी कराया गया था। लेकिन इस पर अभी तक किसी प्रकार को दखल सरकार ने नहीं ली, इस कारण  एडिटर्स फोरम ने इस के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कुछ समाचार पत्र तो अपने समाचार पत्र के प्रकाशन की संख्या बहुत ज्यादा बताकर बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित करके का षडयंत्र रचते हैं। छोड़े बड़े समाचार पत्रों का भेद बताकर लाखों रूपए कमाने का धंधा भी इस क्षेत्र में खूब फल फूल रहा है। विज्ञापन के रूप में चल रहे काले कारनामों पर अंकुश लगाना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि उनके साथ बड़े समाचार पत्र का सहयोग प्राप्त है। जब पत्रकारिता को चौथा स्तंभ कहा जाता है तो फिर छोटे, मध्यम तथा बड़े का भेद क्यों किया जाता है।

सूची में नाम नहीं होने पर भी मिलता विज्ञापन : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर ने बताया कि जब यह याचिका कोर्ट में प्रलंबित होने पर भी 18 फरवरी को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों नई मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे का भूमि पूजन और मैग्नेटिक महाराष्ट्र  यानि बदलते  महाराष्ट्र और समृद्धि परिवर्तन की कहानियों पर राज्य सरकार की ओर से करोड़ रुपए के विज्ञापन विशेष समाचार पत्रों में दिया गया था। विशेष रूप से जिस समाचार पत्र का नाम सरकार के विज्ञापन सूची में नहीं हैं, उन्हें भी फुल पेज विज्ञापन सरकार की ओर से दिया गया है। यह जानकारी एडिटर्स फोरम ने शॉर्ट एफेडेवीट सी.एच.एस.डब्ल्यू.एस.टी.122/2018 दाखिल करते हुए, इस मामले को बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने रखी गई है।

करोड़ों रुपए का विज्ञापन कैसे? : वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश तलेकर के अनुसार विज्ञापन देने के दौरान मध्यम और छोटे अखबारों पर अन्याय हो रहा है। नियमों को ताक पर रखते हुए जिन विशेष अखबारों और जिनका नाम सरकारी विज्ञापन सूची में नहीं हैं, ऐसे समाचार पत्रों को करोडों रुपए के विज्ञापन कैसे दिया जाता है? साथ ही कहा है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की फुल पेज फोटो की जरूरत न होने के बावजूद  विज्ञापनों में फोटो लगाकर करोड़ों रुपए सरकार क्यों खर्च कर रही है? राजनीतिक पार्टियां सरकारी विज्ञापन के जरिए आगामी चुनाव प्रचार कर रही है, ऐसा सवाल भी बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने उपस्थित किया है। जिस पर न्यायाधीश केमकर और न्या.कर्णिक इस मामले को गंभीर बताते हुए। 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

सरकार विभागों के अधिकारी और नेताओं के मिली भगत के चलते अपने हित में समाचार प्रकाशित करवाने के लिए अखबारों को करोडों रुपए का विज्ञापन दिया जाता है। बहुत से समाचार पत्रों का सरकारी विज्ञापन सूची में नाम भी नहीं हैं, बावजूद इसके  मिली भगत के कारण लाखों रुपए के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। इसके चलते छोटे समाचार पत्रों से साथ अन्याय हो रहा हैं। सरकार के इस रवैए से ऐसा लग रहा है कि सरकार लोकतंत्र का गला घोट रही है।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

नोटिस पाने वाले 17 विभागों के नाम : 1) मुख्य सचिव 2) सचिव सामान्य प्रशासन (मावज) 3) सचिव राजस्व व वन 4) सचिव ग्रामीण विकास 5) सचिव समाज कल्याण 6) बस्ट प्रशासन 7) सचिव शहरी विकास 8) महानिदेशक सूचना और जनसंपर्क 9) आयुक्त समाज कल्याण 10) सभी निदेशक, उप निदेशक, जिला सूचना अधिकारी, (सूचना और जनसंपर्क) 11) आयुक्त ( राजस्व ) 12) आयुक्त मुंबई मनपा 13) आयुक्त नागपुर मनपा 14) आयुक्त बिक्री कर विभाग 15) जिला सूचना अधिकारी वर्धा 16) प्रबंध निदेशक तथा उपाध्यक्ष सिडको 17) मुख्य कार्यकारी अधिकारी एमआईडीसी इन विभागों को नोटिस जारी करने के आदेश बॉम्बे हाईकोर्ट ने दी है।

सरकार और राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप की वजह से विशेष समाचार पत्रों को विज्ञापन देने का काम किया जा रहा है। साथ ही नियमों का भी उल्लंघन करके लाखों रुपए के विज्ञापन अपने हितचिंतक समाचार पत्रों के दिए जा रहा हैं, जिससे लोकतंत्र खतरे में आ गया है। एडिटर्स फोरम ने कई बार राज्य सरकार और संबंधित विभागों को इस बारे में अवगत भी किया था, लेकिन सरकार ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया, इसके चलते बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 विभागों को फौरन नोटिस भेजने के निर्देश दिए हैं।

-सतीश तलेकर, वरिष्ठ अधिवक्ता

लेखक Unmesh Gujarathi दबंग दुनिया, मुंबई संस्करण के स्थानीय संपादक हैं. उनसे संपर्क 9322755098 के जरिए किया जा सकता है.

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डीएवीपी ने कम प्रसार संख्या के आधार पर 187 अखबारों को नया विज्ञापन रेट जारी किया! (देखें लिस्ट)

नई विज्ञापन नीति के तहत डीएवीपी की तरफ से कहा गया था कि अखबार स्वेच्छा से अपनी असली प्रसार संख्या की घोषणा कर दें अन्यथा मौके पर चेकिंग के दौरान गड़बड़ी पाई गई तो अखबार के टाइटिल निरस्त कर दिए जाएंगे. इसके बाद सैकड़ों अखबारों ने अपनी झूठी प्रसार संख्या को खारिज करते हुए कम प्रसार संख्या के आंकड़े डीएवीपी को सौंप दिए.

डीएवीपी ने इनमें से 187 अखबारों के कागजातों आदि की जांच कर इनकी कम प्रसार संख्या को स्वीकार करते हुए नया विज्ञापन रेट जारी किया है. इन 187 समाचार पत्रों के रेट रिवाइज करने की एडवाइजरी डीएवीपी की वेबसाइट पर आ गई है, जो इस प्रकार है…

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पैसे देकर पुलिस वालों के खिलाफ मजेदार विज्ञापन छपवा लिया और फंस गए अखबार के संपादक जी

उज्जैन के एक सांध्य दैनिक के संपादकों के खिलाफ पुलिस अधिकारियों की छवि खराब करने समेत कई धाराओं में हुआ मुकदमा… उज्जैन में एक सांध्य दैनिक अखबार ने एक विज्ञापन प्रकाशित किया. इस विज्ञापन में उज्जैन में सट्टा व्यापार के सफल संचालन के लिए उज्जैन सटोरिया संघ ने मध्य प्रदेश पुलिस का आभार जताया है. विज्ञापन में बाकायदा एमपी पुलिस के डीजीपी ऋषि कुमार शुक्ला, एडीजी मधुकुमार और उज्जैन एसपी मनोहर एस. वर्मा की तस्वीर भी प्रकाशित की गई है. इस विज्ञापन को देखकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी परेशान हो गए. बाद में पुलिस ने अखबार के प्रधान संपादक और कार्यकारी संपादक के खिलाफ मुकदमा लिख दिया.

इस विज्ञापन में उज्जैन के नीलगंगा, महाकाल, जीवाजीगंज, भैरूगढ, नानाखेड़ा, चिमनगंज और कोतवाली थाना के प्रभारियों का भी आभार माना गया है. विज्ञापन में जिक्र था कि शहर के इन सात थाना क्षेत्रों में बे-रोकटोक सट्टा संचालित हो रहा है, इसके लिए ‘उज्जैन सटोरिया संघ’ इनका आभारी है. सटोरिया संघ की ओर से डीजीपी, एडीजी और एसपी की फोटो प्रकाशित कर उनका आभार व्यक्त किया गया है.

उज्जैन के एसपी मनोहर एस. वर्मा का कहना है कि जान बूझकर यह विज्ञापन प्रकाशित किया गया है और अधिकारियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाया गया है. शहर में उज्जैन सटोरिया संघ नाम से कोई संगठन ही नहीं है. अखबार के प्रधान संपादक घनश्याम पटेल और कार्यकारी संपादक अभय तिवारी के खिलाफ आईपीसी की कई धाराओं 469, 500, 501 व 502 के तहत केस दर्ज किया गया है. यह मुकदमा एक थाना प्रभारी की तरफ से लिखवाया गया है. उधर, अखबार के प्रधान संपादक घनश्याम पटेल ने भी स्वीकार किया कि विज्ञापन गलत प्रकाशित हुआ है और इसके लिए अखबार के संबंधित व्यक्ति के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की गई है.

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डीएवीपी विज्ञापनों के लिए फर्जीवाड़ा, दिल्ली-लखनऊ के 277 पब्लिकेशन फंसे

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सरकारी विज्ञापनों के लिए आवंटित राशि हासिल करने की खातिर कथित तौर पर ‘फर्जीवाड़े और गबन’ में शामिल होने को लेकर 277 प्रकाशनों के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज कराने और कानूनी कार्रवाई शुरु करने का फैसला किया है. विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) द्वारा मौके पर की गयी जांच में प्रकाशन एवं प्रसार संबंधी आंकड़ों में व्यापक अनियमितताएं मिलने के बाद लखनऊ और दिल्ली के करीब 277 प्रकाशन मंत्रालय के निशाने पर हैं.

एक आधिकारिक सूत्र ने बताया कि यह जांच दिल्ली और लखनऊ में की गयी तथा पता लगा कि इन प्रकाशनों द्वारा मुहैया कराए गए ब्यौरे बड़े स्तर पर गुमराह करने वाले हैं. उन्होंने कहा कि मंत्रालय का मानना है कि ये 277 प्रकाशन सरकारी राशि के गबन और धोखाधड़ी में शामिल हैं. सूत्रों ने कहा कि दिलचस्प है कि मंत्रालय के निशाने पर जो 277 प्रकाशन हैं उनमें से 70 एक ही प्रिंटिंग प्रेस से प्रकाशित होते हैं.

उन्होंने कहा कि इस बात की पूरी आशंका है कि इन प्रकाशनों ने डीएवीपी से सरकारी विज्ञापनों की राशि हासिल करने के लिए अनुचित तरीकों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया है और उन प्रकाशनों से राशि वसूलने के प्रयास किए जाएंगे. सूत्रों ने कहा कि इसके साथ ही, जांच के आधार पर इन प्रकाशनों के स्वामियों, मुद्रकों और प्रकाशकों के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज कराने के लिए डीएवीपी को भी निर्देश दिए गए हैं.

समझा जाता है कि सरकारी विज्ञापनों के प्रचार के लिए 2015-16 में इन प्रकाशनों को करीब 1.95 करोड़ रुपए दिए गए जबकि 2016-17 में करीब 1.19 करोड़ रुपए दिए गए.

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संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो?

Vishnu Rajgadia : संपादक पर ठगी के विज्ञापन का दायित्व क्यों न हो? किसी राज्य में भूख से किसी एक इंसान की मौत होने पर राज्य के मुख्य सचिव को जवाबदेह माना गया है। जबकि मुख्य सचिव का इसमें कोई प्रत्यक्ष दोष नहीं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने सीधे मुख्य सचिव पर दायित्व सौंपा है ताकि राज्य की मशीनरी दुरुस्त रहे।

इसी तरह, अख़बार में विज्ञापन छपवाकर कोई ठगी की जा रही हो, तो इसकी जाँच करके इसे रोकने का पहला दायित्व उस अख़बार के संपादक पर है। ध्यान रहे कि उसी ठगी के पैसे से विज्ञापन की राशि का भुगतान होता है। यानी ठगी से अर्जित लाभ का शेयर अख़बार को भी मिलता है। ठगी के शिकार बेरोजगार अगर अख़बार से विज्ञापन की राशि की वसूली की मांग करें, तो क्या इज्जत रह जायेगी अख़बार की?

झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार विष्णु राजगढ़िया की एफबी वॉल से. कुछ प्रमुख कमेंट्स यूं हैं :

Krishna Mohan आज का संपादक बेबस और लाचार होता है। वह किसी भी विज्ञापन पर रोक नहीं लगा सकता। यदि विज्ञापन पर रोक लगाने की कोशिश करेगा तो उसी समय उसकी छुट्टी हो जायगी। पहले संपादक ने नाम पर अखबार बिकता था। संपादक अखबार का स्टैंडर्ड बनाए रखता था ।विज्ञापन के लिए वह अपने हिसाब से जगह दिया करता था। अब वैसी बात नहीं है। अब यदि संपादक की वजह से विज्ञापन छूट जाएगा तो उस पर कार्रवाई हो जायगी। संपादक हमेशा अपनी नौकरी बचाने के ही चक्कर में लगा रहता है। यही कारण है कि जैकेट टाइप का विज्ञापन प्रचलन में आया है। ऐसी स्थिति में विज्ञापन के लिए सीधे तौर पर प्रबंधक को दोषी माना जाए किसी संपादक को नहीं।

Vishnu Rajgadia : Krishna Mohan jee, संपादक अगर किसी विज्ञापन को रोक नहीं सकता, तब भी वह उस ठगी के विज्ञापन की असलियत बताने वाली खबर तो छाप सकता है न! आखिर उसकी भी कोई सामाजिक जिम्मेवारी है।

शैलेंद्र शांत : प्रबंधक या प्रकाशक पर

Vishnu Rajgadia शैलेन्द्र शांत जी, प्रबंधक और प्रकाशक तो धंधे के लिये ही बैठे हैं। लेकिन संपादक तो नैतिकता और देश हित की बात करता है न!

शैलेंद्र शांत : अब आप तो ऐसा न कहें, सम्पादक खबरों-सम्पादकीय सामग्री के लिये जिम्मेदार होता है। अगर सम्पादक मालिक भी हो तो वह तय कर सकता है।

Vishnu Rajgadia अख़बार में छपे हर शब्द की जिम्मेवारी संपादक पर है। विज्ञापन की भी। यह तो कानूनी बात है। कोई केस कर दे समझ जाएंगे संपादक जी।

शैलेंद्र शांत : इसी से बचने के लिये डिस्कलेमर छापा जाने लगा है !

Vishnu Rajgadia जैसे होटल में खाना में जहर डालकर दे दे और बिल में लिखा हो कि पानी की जाँच आप खुद कर लें?

Anami Sharan Babal एड में क्या छप रहा है इससे मेरे ख्याल से संपादक का कोई लेना देना नहीं होना जरूरी है क्या छप रहा हैयह सरकार का अधिकार है। यहीं पर से तो पत्रकारिता चालू होती है यदि सरकार कोई भी झूठ छपवाने के लिए आजाद है तो संपादक भी अपने रिपोर्टरों को एक निर्देश दे कि हमें इस एड की असलीयत पर खबर चाहिए । यह काम कोई रिपोर्टर स्वत विवेत से या संपादक क्यों नहीं करते । संपादक अपना धर्म अदा करे सब काम सरकार और कोर्ट पर नहीं एक पत्रकार का काम यही तो है कि झूठ को बेपर्दा करे तो करे कौन रोक रहा है। पर यहां पर तो सरकार के खिलाफ लिखते पेशाब आने लगती है कि कहीं एड ना बंद हो जाए तो क्या खाक खाकर लिखएंगे

Bips Ranchi अखबार सिर्फ विज्ञापन पेज पर यह लिखना छोड़ दे कि ”छापे गये विज्ञापन की जाँच कर लें, अखबार की किसी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं” तब देखिये

Vishnu Rajgadia इस लिखने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर किसी विज्ञापन के कारण ठगी का शिकार व्यक्ति चाहे तो ठग गिरोह के खिलाफ केस करते हुए विज्ञापन की राशि में से अपनी राशि की वसूली की मांग कर सकता है।

Bips Ranchi गुरु जी मेरा कहना है की “जाँच” रीडर क्यू करे? वो तो अखबार के भरोसे उस विज्ञापन पर भरोसा कर बैठता है. अगर जिमेदार सम्पादक / अखबार नही तो सर्वेयर से सर्ये क्यू करवाते है की कौन अखबार पढ़ते या बूकिँग करवाना चाहते है. स्तर गिर रहा है गुरु जी सभी अखबार है. जैसे की वो बोला जाता है ना… दारोगा का मतलब क्या होता है ? दा रो गा : रो के दा या गा के दा. देना तो होगा. वोही हाल सभी अखबार का है. विज्ञापन चाहे कोई भी हो सिर्फ पैसा आना चाहिये.

Suraj Khanna आपने बिलकुल सही पकड़ा है मेरे ख्याल से अख़बार हम खरीद कर पढ़ते है यानि अखबार एक वस्तु है जिसे मूल्य देकर ख़रीदा गया यानी खरीददार एक उपभोक्ता है अतः उसके द्वारा ख़रीदे गए अखबार के भ्रामक विज्ञापन से कोई ठगा जाता है तो उसे अखबार के विरुद्ध उपभोक्ता फोरम में शिकायत करनी चाहिए साथ ही अख़बार के विरुद्ध मुकद्दमा दर्ज करानी चाहिए।

Vishnu Rajgadia यह भी सही है।

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डीएवीपी की विज्ञापन नीति में ये कैसा संशोधन!

विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) की विज्ञापन नीति में पहले भारत सरकार की ओर से देश की तीन बड़ी संवाद समितियों को वरीयता दी गई थी, साथ में सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं से कहा गया था कि इन तीन में से किसी एक की सेवाएं लेना अनिवार्य है। जैसे ही यह निर्देश डीएवीपी की वेबसाइट पर आए, देशभर में जैसे तमाम अखबारों ने विरोध करना शुरू कर दिया। यह विरोध बहुत हद तक इस बात के लिए भी था कि क्‍यों समाचार पत्रों के लिए सरकार की इस विज्ञापन एजेंसी ने अंक आधारित नियम निर्धारित किए हैं। इन नियमों के अनुसार प्रसार संख्‍या के लिए एबीसी या आरएनआई प्रमाण पत्र होने पर 25 अंक, समाचार एजेंसी की सेवा पर 15 अंक, भविष्‍य निधि कार्यालय में सभी कर्मचारियों का पंजीयन होने पर 20 अंक, प्रेस कॉन्‍सिल की वार्ष‍िक सदस्‍यता लेने के बाद 10 अंक, स्‍वयं की प्रेस होने पर 10 अंक और समाचार पत्रों के पृष्‍ठों की संख्‍या के आधार पर अधिकतम 20 से लेकर निम्‍नतम 12 अंक तक दिए जाएंगे।

इस नई विज्ञापन नीति के आने के बाद से जैसे ज्‍यादातर अखबारों को जो अब तक स्‍वयं नियमों की अनदेखी करते आ रहे थे, लगा कि सरकार ने उन पर सेंसरशिप लागू कर दी है। कई छोटे-मध्यम श्रेणी के अधिकतम अखबारों के साथ कुछ एजेंसियों को भी पेट में दर्द हुआ, जिन्‍हें अपने लिए इस नीति में लाभ नहीं दिख रहा था। बाकायदा विरोध-प्रदर्शन का दौर शुरू हो गया । एक क्षेत्रीय समाचार एजेंसी ने तो इसमें सभी हदें पार कर दीं । वह अपने खर्चे पर छोटे-मंझोले अखबार मालिकों को दिल्‍ली ले गई और अपनी ओर से कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन करवाया।

यहां प्रश्‍न यह है कि सरकार को इस नीति को लाने की जरूरत क्‍यों आन पड़ी ? क्‍या सरकार को यह नहीं पता था कि अखबारों से उसकी सीधेतौर पर ठन जाएगी । यह तय था कि जिस मोदी सरकार के बारे में कल तक ये अखबार गुणगान करने में पीछे नहीं थे, देश में इस नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही समाचार पत्र सीधे सरकार के विरोध में खड़े हो सकते हैं। वास्‍तव में यदि इन सभी का उत्‍तर कुछ  होगा तो वह हां में ही होगा। क्‍योंकि सरकार, सरकार होती है, उसके संसाधन अपार हैं और उसे ज्ञान देने वालों की भी कोई कमी नहीं होती, इसके बाद यह जानकर कि आने वाले दिनों में नई विज्ञापन नीति के लागू होते ही सबसे पहले सरकार का विरोध होगा, यह नीति डीएवीपी ने लागू की।

देखा जाए तो जिन लोगों को ये नहीं समझ आ रहा है कि क्‍यों सरकार ने आ बैल मुझे मार वाली कहावत को अपनी इस नीति के कारण चरितार्थ किया, तो उन्‍हें ये समझ लेना चाहिए कि सरकार इस रास्‍ते पर चलकर देश के उन तमाम कर्मचारियों का भला करना चाहती थी, जो किसी न किसी अखबार के दफ्तर में वर्षों से काम तो कर रहे हैं लेकिन उनका पीएफ नहीं कटता। जीवन के उत्‍तरार्ध में जीवन यापन के लिए कहीं कोई भविष्‍य नि‍धि सुरक्षित नहीं है। वस्‍तुत: सरकार इस नियम के माध्‍यम से देश के ऐसे कई लाख कर्मचारियों का भविष्‍य सुरक्षित करना चाह रही थी। इसी प्रकार समाचार एजेंसियों की अनिवार्यता को लेकर कहा जा सकता है। अक्‍सर देखा गया है कि वेब मीडिया के आ जाने के बाद से कई अखबार अपने समाचार पत्र में खबरों की पूर्ति इनसे सीधे कर लेते हैं। इन खबरों के निर्माण में जो श्रम, समय और धन उस संस्‍था का लगा है, उसका पारिश्रमिक चुकाए बगैर समाचारों का उपयोग जैसे इन दिनों रिवाज सा बन गया था। एक तरफ दूसरे के कंटेंट को बिना उसकी अनुमति के उपयोग करना अपराध माना जाता है तो दूसरी ओर मीडिया जगत

में ऐसा होना आम बात हो गई थी। वास्‍तव में एजेंसी के माध्‍यम से सरकार की कोशिश यही थी कि सभी अखबार नियमानुसार समाचार प्राप्‍त करें और उन खबरों के एवज में कुछ न कुछ भुगतान करें, जैसा कि दुनिया के तमाम देशों में होता है । लेकिन इसका देशभर के कई अखबारों ने विरोध किया । आश्‍चर्य की बात उसमें यह है कि यह विरोध एक समाचार एजेंसी पर आकर टिक गया था। यहां कोई भी पीटीआई या यूएनआई का विरोध नहीं कर रहा था, विरोध करने वालों के पेट में दर्द था तो वह हिन्‍दुस्‍थान समाचार को लेकर था। इस एजेंसी को लेकर यही बातें आम थी कि यह एक विशेष विचारधारा की एजेंसी है। यहां समाचार नहीं विचारधारा मिलेगी और इन्‍हीं के लोगों की सरकार है इसलिए उन्‍होंने इस एजेंसी को डीएवीपी में मान्‍यता दी है। यानि की पैसा भी देना पड़ेगा और समाचार भी नहीं मिलेंगे, लेकिन क्‍या यह पूरा सत्‍य था ? जो हिन्‍दुस्‍थान समाचार की कार्यप्रणाली से पहले से परिचित रहे हैं वे जानते हैं कि इस संवाद समिति का सत्‍य क्‍या है। एक क्षेत्रीय न्‍यूज एजेंसी से जुड़े समाचार पत्र एवं अन्‍य लोग जैसा कि कई लोगों से चर्चा के दौरान पता चला कि नाम लेकर हिन्‍दुस्‍थान समाचार का खुला विरोध कर रहे थे। कम से कम उन्‍हें पहले इसके इतिहास की जानकारी कर लेनी चाहिए थी ।

हिन्‍दुस्‍थान समाचार 1948 से देश में कार्यरत है। पीटीआई को जब देश के प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल ने विधिवत शुरू किया था, उसके पहले ही यह संवाद समिति मुंबई से अपना कार्य अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में आरंभ कर चुकी थी। यह आज भी देश में सबसे ज्‍यादा भारतीय भाषाओं में समाचार देने वाली बहुभाषी न्‍यूज एजेंसी है। इस एजेंसी के खाते में कई उपलब्‍धियां दर्ज हैं। यह हिन्‍दी और भारतीय भाषाओं में सबसे पहले दूरमुद्रक टेलीप्रिंटर निर्माण कराने वाली संवाद समिति है। चीन का आक्रमण हो या अन्‍य विदेशी घुसपैठ से लेकर देश की ग्रामीण जन से जुड़ी बातें यदि किसी एजेंसी ने सबसे ज्‍यादा और पहले देश के आमजन से जुड़ी सूचनाएं सार्वजनिक की हैं तो यही वह एजेंसी है। आज भी इस संवाद समिति का अपना संवाददाताओं का एक अखिल भारतीय और व्‍यापक नेटवर्क है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू से लेकर श्रीमती इंदिरा गांधी के समय तक हिंदुस्‍थान समाचार को केंद्र व राज्‍य सरकारों द्वारा लगातार न्‍यूज एजेंसी के रूप मान्‍यता दी जाती रही है। यहां तक कि कई कांग्रेसी एवं अन्‍य विचारधाराओं वाले नेता समय-समय पर इससे जुड़े रहे। मध्‍यप्रदेश कांग्रेस के अध्‍यक्ष अरुण यादव के पिता स्‍व. सुभाष यादव भी कभी हिंदुस्‍थान समाचार बहुभाषी सहकारी संवाद समिति  के अध्‍यक्ष रह चुके हैं। संवाददाताओं के स्‍तर पर भी देखें तो किसी पत्रकार की अपनी विचारधारा कुछ भी रही हो, यदि उसमें पत्रकारिता के गुण हैं और वह मीडिया के स्‍वधर्म को जानता है, तो बिना यह जाने कि वह किस विचारधारा से संबद्ध है, हिंदुस्‍थान समाचार ने उसे अपने यहां बतौर संवाददाता से लेकर केंद्र प्रमुख एवं अन्‍य महत्‍वपूर्ण जिम्‍मेदारियां सौंपने में संकोच या भेदभाव नहीं किया।

डीएवीपी ने हिन्‍दुस्‍थान समाचार को केवल इसलिए ही अपनी सूची में नहीं डाल लिया होगा कि इसकी विशेष विचारधारा से नजदीकियां होने की चर्चाएं आम हैं। सभी को यह समझना ही चाहिए कि समाचार में कैसा विचार ? क्‍यों कि एक समाचार तो समाचार ही होता है, और देश, दुनिया के समाचार देना प्रत्‍येक संवाद समिति का रोजमर्रा का कार्य है।  वास्‍तव में विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय ने पीटीआई, यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार को इसलिए अपनी सूची में लिया क्‍योंकि यह एजेंसी प्रिंट के लिए दी जाने वाली समाचार सामग्री में सबसे ज्‍यादा क्षेत्रीय खबरों को नियमित प्रसारित करती है और वह भी कई भाषाओं में । यह भी सरकार के समय-समय पर निर्धारित किए गए नियमों का पालन करती है, मजीठिया वेतन आयोग की अनुशंसाओं के अनुसार अपने कर्मचारियों को वेतन देती है और नियमित कर्मचारियों का पीएफ काटने से लेकर अन्‍य निर्धारित मापदंडों को पूरा करती है।

ऐसे में क्‍या उन तमाम समाचार एजेंसियों को अपने गिरेबान में नहीं झांकना चाहिए जो अपने कर्मचारियों के हित में न तो किसी वेज बोर्ड की अनुशंसाओं को लागू करती हैं और न ही सभी को कर्मचारी भविष्‍य नि‍धि का लाभ देती हैं।

देखा जाए तो विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) को आज अखबारों की तरह ही यह तय कर देना चाहिए कि न्‍यूज एजेंसी के लिए हमारे यहां सूची में पंजीकृत होने के लिए क्‍या नियम होने चाहिए, जिनकी कि पूर्ति की जाना अपरिहार्य रहे। डीएवीपी ने अभी हाल ही में इस मामले को लेकर ‘ मुद्रित माध्‍यमों के लिए भारत शासन की विज्ञापन नीति-2016 में संशोधन’ किया है, उसमें उसने लिखा है कि समाचार पत्र पीआईबी एवं प्रेस कॉन्‍सिल ऑफ इंडिया से मान्‍यता प्राप्‍त किसी भी न्‍यूज एजेंसी के ग्राहक बन सकते हैं। यहां सीधा प्रश्‍न विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी) से आज क्‍यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि आपने यह जो नया निर्देश निकाला है, विरोध इसका नहीं, लेकिन क्‍या उन्‍होंने उन तमाम संवाद एजेंसियों का निरीक्षण करा लिया है जो अब इस निर्देश के नाम पर अखबारों को अपनी सदस्‍यता देंगे। क्‍या यह तमाम समाचार एजेंसियां समय-समय पर पत्रकारों के हित में बनाए गए भारत सरकार नियमों और आयोगों के निर्देशों का पालन कर रही हैं। इन्‍होंने अपने यहां क्‍या मजीठिया बेज बोर्ड के नियमों का अक्षरक्ष: पालन किया है। यदि पीटीआई और यूएनआई के साथ हिन्‍दुस्‍थान समाचार केंद्र सरकार के सभी नियमों का पालन करती है,  तो क्‍यों नहीं अन्‍य संवाद समितियों को भी उन नियमों को स्‍वीकार करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं कर रहीं तो उन्‍हें किस आधार पर विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय (डीएवीपी)  अपनी सूची में शामिल करने के लिए तैयार हो गया ? 

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हीरो मोटर के इस विज्ञापन पर टीवी पत्रकार नवीन कुमार गंभीर आपत्ति, जानिए क्या है मामला

Navin Kumar : इन दिनों टीवी पर एक विज्ञापन ख़ूब चल रहा है। हीरो मोटर कॉर्प का। यह विज्ञापन बहुत परेशान करने वाला है। यह दिखाता है कि घर का लड़का देर रात तक घर नहीं लौटा है। सब इंतज़ार कर रहे हैं। मां, पिता, छोटे-छोटे बच्चे और एक कुत्ता। नई-नई बीवी इंतज़ार करते-करते खाने के टेबल पर सो गई है। तभी बाइक की हेडलाइट दरवाज़े पर चमकती है। कैमरा दिखाता है कि कुत्ता दौड़ पड़ा। पिता मुस्कुरा उठे। बच्चे भी भागे। फिर बीवी कहां गई? सोती हुई बीवी हलचल होते ही सबसे पहले आईने के सामने भागती है। अपने बाल-मेकअप ठीक करने लगती है। और पूरी तरह संवरकर ही पति के सामने जाती है। गौर कीजिए यह आधी रात के बाद का दृश्य है। आखिर में एक लाइन का संदेश आता है गाड़ी संभलकर चलाइए क्योंकि कोई आपका इंतज़ार कर रहा है।

यह कितना फूहड़ है कि ऐसे संदेश के लिए भी विज्ञापन को कंसीव करने वाले ने और हीरो मोटर कॉर्प ने औरत को सिर्फ एक सामान समझा। किसी गुलदस्ते की तरह। जिसका महत्त्व सिर्फ उसके ताज़े और खिले होने से तय होता है। इसीलिए किसी के सुरक्षित लौट आने का इत्मीनान भी वह अपनी स्वाभाविकता में नहीं जी सकती। उसे पति के सामने मनुष्य की तरह नहीं, फूलदान की तरह पेश होना है। हो सकता है बहुतों को इसमें प्रेम और समर्पण जैसा कुछ नज़र आए। लेकिन मुझे इसमें एक वीभत्स अश्लीलता नज़र आती है।

औरत के पूरे वजूद को सिंगारदान के सामने समेट देने की ऐसी भव्य अश्लीलताओं से हमारा सिनेमा, समाज और संस्कार भरा पड़ा है। करवाचौथ पर छलनी के पीछे से पति की सूरत देखने को तड़प उठने की रवायतें औरतों के पूरे वजूद को एक झटके में खा जाती हैं। अच्छा दिखना एक मानवीय स्वभाव है। लेकिन जब यह मर्दों की सेवा में स्त्री का अनिवार्य संस्कार बन जाए तो यह मान लेने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि उस समाज के मर्द अभी मनुष्य नहीं हुए हैं। हीरो मोटर कॉर्प का विज्ञापन परंपरा के बाज़ार में मनुष्यता की उस क्रमिक मृत्यु का उत्सव गान है।

न्यूज24 में कार्यरत पत्रकार नवीन कुमार की एफबी वॉल से. इस पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

गौरव मिश्रा ये क्या भाई साहब कभी मूड्स और कामसूत्र का advt जरूर देखें इससे भी बुरा हाल है

Kamlesh Tiwari विज्ञापन का मक़सद शायद इससे बढ़कर है जितना आप इस पोस्ट में लिख पाये… अभी तक हीरो सबसे अच्छे और सामाजिक सन्देश देने वाले विज्ञापन देने वाली कंपनियों में से रही है… असली अश्लीलता दिखाने वाले और भी ब्रांड्स हैं… उनपर लिखिए सर

Rohit Singh Rajpoot फूलदान में फूल, उसकी पंखड़ियां और महक अपने आप को समर्पित कर देती है। क्योंकि उसका बगीचे से लेके बागबानी तक उसकी शोभा उसी फूलदान में आने के बाद होती है। जब वो दायरे में,करीने से महकती है। गुलदस्ता ही बेजान हो चुके फूलों को अपना गुलिस्तां बना के खुद महकता है, महकाता भी है। आपका अनुज् हूँ । क्षमा।

Tarun Vyas “मर्द अभी मनुष्य नहीं हुए हैं” बहुत सही

Naveen Kumar इस विज्ञापन में एक पिता औऱ मां भी है जो अपनी बेटी का इंतजार कर रहे होते है। उनकी बेटी स्कूटी से वापस आती है।

Neeraaj Choudhary हद तो तब हो जाती है जब टाइल्स और प्लाई के विज्ञापन में लड़कियों को दिखाया जाता है।और तो और मर्दों के मोज़े के विज्ञापन में भी लड़कियां दिखती हैं। जबकि बिना अश्लीलता के विज्ञापन सबसे ज़्यादा हिट होते हैं। फिर भी ये सब समझ से बाहर है।

Pandit Ayush Gaur One should not be so negative always. There is always a positive sign of every story.

Gaurav Kumar वाह सर…तथाकथित बेटी बचाओ..बेटी पढ़ाओ वालों के लिए कड़वी सच्चाई…उखाड़ कर रख दिया आपने तो…

Ila Joshi जो लोग इस तरह के विज्ञापनों में कुछ भी असहज नहीं देख पा रहे हैं दरअसल इन्हीं में से ज़्यादातर लोग सैनिटरी नैपकिन के विज्ञापन आने पर या तो बगलें झाँकने लगते हैं या फिर चैनल ही बदल देते हैं जबकि उसमें तो औरतों के लिए एक ज़रूरी चीज़ की उपयोगिता के बारे में बात होती है और किसी पुरुष को सामान की तरह भी नहीं दिखाया जाता।

Shashaank Shukla हा हा हा….आप वही देखते हैं जो आप देखना चाहता हैं…. बाप की बेटी के लिए चिंता नजर नहीं आई…एक कुत्ते का मालिक प्रति प्रेम नजर नहीं आया.. आपको वही नजर आया जो आप देखना चाहता थे…और वो था महिला का श्रृंगार….क्योंकि आपकी नजर वहीं टिक गई….आप वही दे…See more

Ila Joshi दरअसल दिक्कत यही है कि उस एक हिस्से को बड़ी चालाकी से पूरे विज्ञापन के बीच इस तरह रखा गया कि अगर कोई उसे चिन्हित करे तो बाकी लोग विज्ञापन के बचाव में आ जाएँ कि अरे तुमने वो क्यों नहीं देखा। या तो आप इस तरह के सेक्सिस्ट उदाहरणों को बड़ी सहुलियत से नज़रअंदाज़ कर देते हैं या आप इसे देखने के लिए conditioned हो चुके हैं या फिर आप भी उन विज्ञापन बनाने वालों जैसी ही सोच रखते हैं। अब चुनाव आप करिए कि आप ख़ुद को तीनों में से किस category में रखना चाहेंगे।

Shashaank Shukla तो ऐसे में किसी महिला का या किसी पुरुष का अपने पति या पत्नी या अपना प्रेमी प्रेमिका के प्रति प्रेम कैसे दिखाना चाहिए….फूल लड़ाकर ?….कभी ओवररिएक्शन नहीं करना चाहिए

Ila Joshi जो उदाहरण आपने दिया वो भी उतना ही फूहड़ है इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन लंबे समय से इन विज्ञापनों को देखने की वजह से हम इन फूहड़ उदाहरणों के अलावा कुछ सोच ही नहीं सकते। प्रेम जताने के लिए श्रृंगार की अहमियत भी बाज़ार की बनाई ही है। किसी का देर तक इंतज़ार करना ही प्रेम जताने के लिए बहुत नहीं है क्या?

Shashaank Shukla इला जी फिर तो आप कई महिलाएं सवाल उठा सकती हैं कि पत्नी ही देर रात जागकर इंतजार करके परेशान क्यों हो….ये भी गलत है….

Ila Joshi बिल्कुल

Navin Kumar हे Shashaank Shukla आपके मगज में नहीं घुसेगा। आपकी वैचारिक हैसियत से बाहर की बात है। नाम की स्पेलिंग में दो a लगा लेने से बुद्धि का विस्तार नहीं हो जाता। मस्त रहिये।

Amit Singh Virat जहां पर काम करना है…वहां करता कौन है… बस हल्ला मचाते रहते हैं जिम्मेदार लोग.. लगभग सभी विज्ञापनों में महिलाओं को उत्पाद की तरह परोसा जाता है… जबतक मदकत अंदाज में कोई महिला ना हो भला कौन सा विज्ञापन पूरा होता है… लेकिन इस पर किसी की नजर नहीं है..सब बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर फोकस कर रहे हैं…

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सीपीएम के मुखपत्र ‘गणशक्ति’ में मोदी सरकार की दो वर्ष की उपलब्धि का फुल पेज विज्ञापन

Shikha : सीपीएम के दैनिक मुखपत्र अखबार “गणशक्ति” के प्रथम पृष्ठ पर मोदी सरकार की दो वर्ष की “उपलब्धि” का फुल पेज विज्ञापनl क्या अब सीपीएम के “इमानदार” कार्यकर्ताओं को (यदि कोई बचे हैं तो) अपने पार्टी मुख्यालयों पर धावा बोलकर अपने गद्दार नेत्रित्व के हाथ से लाल झंडा छीनकर उनसे किनारा नहीं कर लेना चाहिए? और कितना कलंकित करेगी यह पार्टी महान लाल झंडे को?

कामरेड शिखा के उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Shishir Gupta : मैंने और कई और लोगों ने भी माकपा के ‘गणशक्ति’ अखबार के मुख्य पृष्ठ पर मोदी सरकार का फुल पेज का विज्ञापन निकालने वाली पोस्ट डाली थी. इस पर बहुत से लोग तर्क दे रहे हैं कि अखबार सरकारी विज्ञापन के लिए कानूनन मना नहीं कर सकते. तो किसने कहा था आप विज्ञापन निकालने के लिए सरकारी विभाग में आवेदन डालिए? (अखबारों को शुरू में आवेदन करना पड़ता है, और कुछ न्यूनतम मानकों पर खरा उतरने पर ही अखबारों को सरकारी विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध किया जाता है.) माकपा तो नव-उदारवादी पार्टियों और उनकी नीतियों का विरोध करती है (हालाँकि नीतियाँ उसकी भी कमोबेश वैसी ही होती हैं), फिर इस तरह का आवेदन करने के पहले क्या इस पार्टी को नहीं पता था कि कांग्रेस, भाजपा जैसी पार्टियाँ नव-उदारवादी हैं और अंततः उन्हीं के विज्ञापन देने पड़ेंगे? दूसरे ये तो ख़ुद को मजदूरों-किसानों की पार्टी कहते हैं तो पूंजीपतियों की सरकार के पैसे के दम पर अखबार निकालने का क्या मतलब हुआ? बात का सार ये है कि माकपा अब बहुत हद तक ख़ुद खुले तौर पर नंगा होकर सामने आ रही है. तो समझिये बात को. लाल रंग से इतने सम्मोहित ना हो जाइए कि जहाँ लाल दिखा हाँफते-डांफते पहुँच गए सलामी देने. अंतत: निराशा और अवसाद के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगने वाला उससे. बेहतर होता कि आप मार्क्सवाद का अध्ययन करते, और लेनिन के शब्दों में उसे “ठोस परिस्थितियों का ठोस मूल्यांकन” कर कार्यान्वित करने की बात करते.

Ashish Thakur The rules of central govt. advertisements have been written down in the “DIRECTORATE OF ADVERTISING AND VISUAL PUBLICITY” smile emoticonhttp://www.davp.nic.in/Newspaper_Advertisement_Policy.html). The sub clause f of clause 18 says: “A newspaper may be suspended from empanelment by DG, DAVP with immediate effect if It refuses to accept and carry an advertisement issued by DAVP on behalf of the Ministries/Departments of Government of India, public sector undertakings and autonomous bodies on more than two occasions.”

Ish Mishra CPM — Corporate Promoted Marxists

Dinesh Aastik बन्गाल me इसी वजह se इनकी aisi durdasha hui hai. इन्ही paartiyo की वजह se log साम्यवाद ko अव्यवहारिक maanne का भ्रम karne lage.

Gulshan Kumar Ajmani is prakar ke vigyapan ke liye CPM ko lajja aani chaihiye. agar sabhi tarah k sarkari vigyapan hi deikhane hai to Gan shakti ka Party jornal hone ka kya matalab hai.

Amarnath Madhur लाल झंडा जल्द ही बजरंग बली के लाल लंगोट की जगह बाँधा जाएगा.

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ए2जेड चैनल होगा रीलांच, यूपी और उत्तराखंड में चाहिए पत्रकार, करें अप्लाई

रीलान्च होगा A2Z न्यूज चैनल। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में अनुभवी और कर्मठ रिपोर्टरों, कैमरामैन और जिला संवाददाता की ज़रूरत है।

चैनल के साथ जुड़ने के लिये नीचे दी गई मेल आईडी पर अपना बॉयोडाटा भेजें…

munendrsharma@a2znewschannel.com

और

aniru1988@gmail.com

अगर जरूरत लगे तो इन नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं :

09554963756

और

09628033222

(विज्ञापन)

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शर्मनाक : उत्तर प्रदेश सरकार ने मुंबई के मराठी दैनिक में प्रकाशित कराया यह घटिया विज्ञापन

मुंबई के एक मराठी दैनिक लोकमत में ७ फरवरी को प्रकाशित उत्तर प्रदेश सरकार का एक सरकारी विज्ञापन मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों को काफी चुभ रहा है। इस मराठी दैनिक में दिये विज्ञापन में उत्तर प्रदेश सरकार ने लोगों से यूपी आने का आग्रह किया है और आग्रह के लिये जो विज्ञापन तैयार कराया गया है उसमें एक फेरीवाले को दिखाया गया है जो गुलाब जामुन बेच रहा है। इस विज्ञापन में स्लोगन दिया गया है ‘गुलाब जामुन खाईयेगा, चासनी भी मत छोड़ियेगा, यूपी जरूर आईयेगा’।

पर्यटन निदेशालय द्वारा जारी यह विज्ञापन कई सवाल खड़े कर रहा है। एक सवाल तो यह कि क्या उत्तर प्रदेश में सिर्फ फेरीवाले ही हैं। इस विज्ञापन में ताजमहल, गंगानदी, विश्वनाथ मंदिर, मथुरा, वृंदावन, आगरा का किला, गंगा आरती, संगम, बनारसी साड़ी को भी तो दिखाया जा सकता था जिसकी पूरी दुनिया दिवानी है और देशी विदेशी पर्यटक आज भी भगवान राम और कृष्ण की इस धरती पर आकर अभिभूत हो जाते हैं।

यहां उस्ताद विस्मिल्ला खान को क्या सरकार नहीं जानती। क्या कोई भी फेरीवालों से गुलाब जामुन खाने और चासनी चाटने यूपी जायेगा? इस विज्ञापन में उत्तर प्रदेश की जगह यूपी शब्द इस्तेमाल करके और यूपी के फेरीवालों को दिखाकर उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार आखिर पर्यटकों को आर्कषित करने के लिये मनसे प्रमुख राज ठाकरे की भाषा का इस्तेमाल तो नहीं कर रही है?

दूसरी चीज जिस तरह का गुलाब जामुन इस विज्ञापन में दिखाया गया है वह मुंबई के हर स्टेशन या स्टेशनों के बाहर आराम से मिलते हैं। ऐसे में कोई भी गुलाब जामुन खाने उत्तर प्रदेश (यूपी) क्यों जायेगा? यह विज्ञापन मुंबई के सिर्फ मराठी अखबारों में ही दिये गये। यह भी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है। देखना है कि उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार इस विवादित विज्ञापन पर अपना पक्ष भी रखती है या जंगलराज में चुपचाप अपने कुनबे का मंगलराज मनाती चलाती रहती है।

मुंबई से पत्रकार शशिकांत सिंह की रिपोर्ट.

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टीवी पर सबसे ज्यादा विज्ञापन देने वाले उद्योगपति बने बाबा रामदेव

नई दिल्ली। योगगुरु बाबा रामदेव योग के मामले में तो आगे हैं ही, अब चैनल्स को सबसे ज्यादा विज्ञापन देने वाले विज्ञापनदाता भी बन गए हैं। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी) की रिपोर्ट के अनुसार की पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड सबसे बडी एफएमसीजी एडवर्टाइजिंग कंपनी बन गई है। काउंसिल की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक पतंजलि ब्रांड ने 23 से 29 जनवरी के बीच कैडबरी (16 हजार कमर्शियल्स) को पीछे छोड़ते हुए 17000 से भी अधिक बार टीवी कमर्शियल्स प्रसारित। पतंजलि ब्रांड के अंतर्गत आने वाले प्रॉडक्ट्स के टीवी कमर्शियल्स की संख्या कैडबरी, पार्ले और पॉन्ड्स जैसे दिग्गज ब्रैंड्स के विज्ञापनों से भी ज्यादा रही।

बीएआरसी टीवी विज्ञापनों के आंकड़ों का प्रकाशन करती है और इसके लिए बीएआरसी करीब 450 चैनल्स पर निगरानी करती है। ये विज्ञापन देश के विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चैनलों पर प्रसारित किए गए। विशेषज्ञों का कहना है कि पतंजलि की यह बढ़त आगे भी बनी रह सकती है। इन आंकड़ों के जारी होने से महज एक हफ्ते पहले ही पतंजलि इस मामले में छठे नंबर पर थी, जबकि नवंबर से पहले टॉप 10 में भी पतंजलि की नाम नहीं था।

पतंजलि करीब 7 प्रॉडक्ट्स की दमदार मार्केटिंग कर रही है, जिसमें घी, बिस्किट, नूडल्स, शहद, टूथपेस्ट, शैंपू और क्रीम शामिल हैं। गौरतलब है कि योगगुरु रामदेव ने दावा किया था कि अगले 5 साल के भीतर उनकी कंपनी देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी बन जाएगी। बाबा रामदेव के प्रवक्ता एस के तिजारावाला ने बताया कि हमने अपने सात प्रॉडक्ट्स के विज्ञापनों के जरिए टीवी पर पहली रैंक हासिल कर ली है। हम 7 और प्रॉडक्ट्स लेकर आ रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक पतंजलि ने इन विज्ञापनों पर कम से कम 300 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। इस अनुमान का खंडन पतंजलि ने भी नहीं किया है। तिजारावाला कहते हैं कि ये विज्ञापन न्यूज चैनल्स को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं, लिहाजा उन्हें कम कीमत में ही तैयार कर लिया गया और उनके प्रसारण की फ्रिक्वेंसी भी इतनी अधिक है

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मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार… पढ़िए एक युवा ने क्यों कर लिया सुसाइड

Vinod Sirohi : जरूर शेयर करें —मोबाइल टावर्स लगाने का लालच और विज्ञापन के भूखे लालची अखबार — आप पर कोई बंदिश नहीं है आप इस मैसेज को बिना पढ़े डिलीट कर सकते हैं। अगर आप पढ़ना चाहें तो पूरा पढ़ें और पढ़ने के बाद 5 लोगों को जरूर भेजें।

मेरा नाम राहुल है। मैं हरियाणा के सोनीपत जिले के गोहाना का रहने वाला हूँ। आप भी मेरी तरह इंसान हैं लेकिन आप में और मुझमें फर्क ये है कि आप जिन्दा हैं और मैंने 19 अगस्त, 2015 को रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

चौकिये मत, नीचे पढ़िये।

मेरा परिवार गरीबी से जूझ रहा था। एक दिन मैंने एक हिन्दी के अख़बार में (अपने आप को हिन्दी जगत का प्रमुख अखबार बताने वाला ) मोबाईल टावर लगाने सम्बन्धी विज्ञापन पढ़ा। इसमें 45 लाख एडवांस, 50 हजार रूपये महीना किराया तथा 20 हजार रूपये प्रतिमाह की सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी देने की बात कही थी। मैनें दिये गये नम्बर पर फोन किया तो उन्होंने हमारे प्लाट का पता ले लिया जहाँ मैं टावर लगवाना चाहता था। अगले दिन उन्होंने मुझे फोन करके मुबारकबाद दी और कहा कि मेरा प्लाट टावर लगने के लिए पास हो गया है। उन्होंने मुझे रजिस्ट्रेशन फ़ीस के तौर पर 1550 रूपये स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाता 20266209852 ब्रांच लाजपत नगर नई दिल्ली में डालने के लिए कहा। मैंने 1550 रूपये डाल दिये तो उन्होंने मुझे रिलायंस कम्पनी का ऑफर लेटर तथा एक लेटर सूचना और प्रोद्द्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार का मेरी ईमेल पर भेजा जिसमें 27510 रूपये सरकारी टैक्स जमा करवाने की बात कही गई थी।

मैंने 27510 रूपये भी जमा करवा दिये तो उन्होंने मुझसे 13500 रूपये डिमांड ड्राफ्ट चार्जेज के तौर पर जमा करवाने के लिए कहा। मैंने ये रूपये भी जमा करवा दिए तो उन्होंने मेरे फोन उठाने बंद कर दिये। जो पैसे मैंने इस खाते में जमा करवाये वह पैसे मेरी बहन की शादी के लिए रखे थे। मैं अपने परिवार को 45 लाख रूपये का सरप्राइज देना चाहता था, लेकिन जब मुझे ठगी का एहसास हुआ तो मैं अपने परिवार को मुहँ दिखाने के लायक नहीं बचा और मैंने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली।

मेरी असमय मौत के बाद मेरी रूह धरती पर ही भटक रही है और लोगों को ठगी के इस जंजाल के प्रति जागरूक कर रही है। मेरे दावे की सत्यता के लिये आप ऊपर दिये गये बैंक खाते की 11 अगस्त से 18 अगस्त की स्टेटमेंट देख सकते हैं। ऐसे लगभग 300 फ्रॉड ग्रुप अख़बारों में फर्जी विज्ञापन देकर भोले-भाले लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। इनके झांसे में ना आयें। आप 5 लोगों को 2 मिनट में ये सन्देश जरूर भेजें और पार्क, बैठक, घर और दफ्तर के लोगों को मौखिक तौर पर इस ठगी के खेल के बारे में जरूर बतायें। मेरी रूह को शान्ति मिलेगी और आपको आत्मसंतुष्टि।

यूपी पुलिस में इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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यूट्यूब की तरह फेसबुक भी वीडियो अपलोड करने वालों को देगा कमाई करने का मौका

जैसे यूट्यूब पर लोग वीडियो अपलोड करके पैसे कमाते हुए, उसी तरह फेसबुक पर भी ओरिजनल वीडियो अपलोड करने वाले कमाई कर सकते हैं. फेसबुक एक नया फीचर जोड़ने जा रहा है. इसके तहत अगर आप अपनी टाइमलाइन या फेसबुक पेज पर कोई वीडियो अपलोड करते हैं तो फेसबुक उस पर एड चलाएगा और इससे होने वाली आमदनी को आपके साथ शेयर भी करेगा. वीडियो ओरिजनल होना चाहिए और उस पर किसी का कॉपीराइट नहीं होना चाहिए.

फेसबुक का नया फीचर ‘सजेस्टेड वीडियो’ फिलहाल आईफोन पर टेस्ट किया जा रहा है. इसका फायदा कंटेट क्रिएटर और मीडिया हाउस को भी होगा. इसका रेवन्यू मॉडल वैसा ही है जैसा कि यूट्यूब का है. फेसबुक के अनुसार 10 सेकेंड्स या उससे ज्यादा समय तक एड देखने पर ही विज्ञापन देने वाले से चार्ज किया जाएगा. यानी कि किसी वीडियो एड पर रेवन्यू तभी जनरेट होगा जब कोई सर्फर उस एड को कम से कम 10 सेकेंड्स तक देखेगा.

इस फीचर के लाइव होने के बाद आपको अपनी न्‍यूज फीड पर सजेस्‍टेड वीडियो फीड दिखाई देगी. आप जिस वीडियो को क्लिक करेंगे फेसबुक उससे संबंधित दूसरे वीडियोज़ भी आपको सजेस्‍ट करेगा. यही नहीं फेसबुक अपनी न्यूज फीड एल्‍गोरिदम में बदलाव कर रहा है. इससे सर्फर अपनी फीड में वीडियो देख सकेगा और उसे अपने अनुसार फीड में सहेज भी सकेगा. फेसबुक अपने वीडियो एड से हासिल रेवन्यू का 55 फीसदी इसके कंटेट क्रिएटर के साथ शेयर करेगा.

सबसे पहले यूट्यूब ने वीडियो पर एड देने शुरू किए थे. वीडियो अपलोड करने के मामले में यूट्यूब इस वक्‍त दुनिया की नंबर वन सोशल मीडिया साइट है. फेसबुक के इस कदम से अब उसे कड़ी टक्‍कर मिल सकती है. अभी फेसबुक को सबसे ज्‍यादा रेवन्यू मोबाइल से मिल रहा है और इसमें और तेजी आने की संभावना है. इस साल फेसबुक को पूरी दुनिया से होने वाली आमदनी में से 73 फीसदी यानी 70 हजार करोड़ रुपये (10.90 बिलियन डॉलर) सिर्फ मोबाइल एड के जरिए हासिल होंगे. मोबाइल पर फेसबुक एप्लीकेशन किसी दूसरे एप्प की तुलना में काफी सफल है. भारत में फेसबुक का इस्‍तेमाल करने वालों की संख्या 12 करोड़ से ज्यादा है.

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जुआ खेलकर रक़म जीतने का लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता!

यशवंत सिंह जी

संपादक, भड़ास4मीडिया

भड़ास को हम सब पत्रकार बहुत गंभीरता से लेते हैं… पर एक ऐसा विज्ञापन देखा कि आपको पत्र लिखने को मजबूर हुआ.. लिखने को तो दस पेज भी लिख सकता हूँ.. मगर आप बुद्धिजीवी हैं… इसलिए पूरा यकीन है कि कम लिखे को ज़्यादा ही समझेंगे… इस मेल के साथ में एक तस्वीर अटैच की है, उसे देखिए… इसमें जो ऑफर है, वो किसी भी नज़रिये से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता… जुआ खेलने का ऑफर देकर रक़म जीतने की उम्मीद या लालच देता ये विज्ञापन भड़ास को शोभा नहीं देता… आशा करता हूं कि आप इस पर ध्यान देंगे.

धन्यवाद.

आसिफ खान

Asif Khan

kasif.niaz@gmail.com

आसिफ भाई,

आपने बिलकुल सही प्वाइंट की ओर ध्यान दिलाया है.  हम भड़ास के लोग खुद भी दूसरे न्यूज पोर्टल्स के गंदे विज्ञापनों के खिलाफ छापते रहे हैं. ये जो विज्ञापन भड़ास पर चलते हैं, वह गूगल की तरफ से चलाए जाते हैं. गूगल बहुत ही सोच समझ कर विज्ञापन देता है. जब भी आप क्लिक करते हो तो गूगल नए किस्म का विज्ञापन दिखाता है. ज्यादातर विज्ञापन यूजर की पसंद या सर्च या रुझान के हिसाब से होते हैं. मान लीजिए आप अगर सर्वर तलाश रहे हों और इस बारे में गूगल या जीमेल पर सर्च कर रहे हों, मेल कर रहे हों, तो गूगल के पास फीडबैक पहुंच जाता है कि आप सर्वर की तलाश में है. आपको तब यह सर्वर के विज्ञापन ही दिखाएगा.

इसी तरह जो लोग सेक्स आदि ज्यादा सर्च करते हैं उन्हें गूगल सेक्स रिलेटेड विज्ञापन दिखाता है. मेरे कहने का आशय ये है कि आप को जो विज्ञापन दिखाया गया गूगल द्वारा, जरूरी नहीं कि वह दूसरों को भी दिखाया जा रहा हो. फिर भी, ये जुवे का विज्ञापन बिलकुल गलत है. इसके खिलाफ हम लोग गूगल को पत्र लिखकर अपनी आपत्ति जताएंगे और ऐसे विज्ञापन न दिखाने को लेकर अनुरोध करेंगे. आपके लेटर को हम भड़ास पर प्रकाशित कर रहे हैं ताकि भड़ास अपनी खुद की आलोचना को भी सुन और छाप सके, साथ ही इसके जरिए हम खुद को सुधार सकें.

आभार

यशवंत सिंह

एडिटर

भड़ास4मीडिया

 

 

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क्रिकेट का अंध जुनून और राष्ट्र भक्ति के कृत्रिम भाव

क्रिकेट को हथियार बनाकर जिस तरह से देशी भावनाओं से विदेशी पूंजीपति कम्पनियां और व्यवसायिक मीडिया खेल रहा है वह गम्भीर चिंता पैदा करने वाला है। एक गहरी साजिश के चलते क्रिकेट के प्रति अंध जनून पैदा कर भारतीय युवा को मानसिक दिवालीएपन की ओर धकेलने की कोशिश हो रही है। ग्लैमर,मीडिया और शौहरत के इस आडम्बर में कम्पनियां अपने तेल, शैम्पू, कपड़े, इत्र सब बेच रही हैं और वहीं बेरोजगारी, मुफलिसी और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा युवा अपनी तमाम समस्याओं को भुलाकर उनको अपना रोल मॉडल माने बैठा है। विडम्बना तो यह है कि आमजन की पीड़ा से बिल्कुल भी सरोकार न रखते हुए यह कृत्रिम हीरो बिकाऊ घोड़ों की तरह नीलाम होकर कम्पनियों के जूते, चप्पल बेचने में व्यस्त हैं।

क्रिकेट एक खेल की तरह खेला जाए तो खेला जाए पर आपत्ति इस बात की,कि जब खेल को खेल की तरह पेश न करके इस तरह पेश किया जाता है कि मानों कोई खेल न होकर जंग हो। भारत पाकिस्तान के मैच को इतना हाई टैंशन दिखाया जाता है कि मानो जीतने पर कश्मीर समस्या का हल हो जाना हो। जीत यां हार को कुछ अतिवादी धर्म प्रेमी राष्ट्रवादी विचारधारा के कृत्रिम भाव पैदा कर साम्प्रदायिकता की रोटियां सेंकने की फिराक में रहते हैं। व्यवसाय के इस चरम तमाशे में आम खेल प्रेमी इस्तेमाल हो रहा है और पूंजीपति सिस्टम दूर खड़ा होकर सारा तमाशा देख रहा है। अंग्रेजों ने गुलामी के समय में इस खेल को इसलिए बढ़ावा दिया कि आम आदमी इसी में व्यस्त रहे और अपनी जंजीरों को तोडऩे की कोशिश न करे। अंग्रेज गए परन्तु उनके हथियारों को आज भी बाखूबी इस्तेमाल किया जाता है,सिर्फ इसलिए कि लोग अपनी असल समस्याओं को भूलकर टीवी व रेडियो पर ही चिपके रहें।

सर्बजीत सिंह
करनाल
मो. 09896290262

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‘आप’ ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका

 

Sanjaya Kumar Singh : आम आदमी पार्टी ने ढूंढ़ा बिकाऊ मीडिया पर खर्च का पूरा लाभ पाने का तरीका। फर्जी सर्वेक्षणों का बाप है यह तरीका। इसे कहते हैं आईडिया। यह विज्ञापन इस तरह आ रहा है जैसे रेडियो चैनल खुद सर्वेक्षण कर रहा हो। इसमें किसी व्यक्ति से पूछा जाता है पिछली बार आपने किसे वोट दिया था। वह चाहे जो कहे दूसरा सवाल होता है इस बार किसे देंगे– आम आदमी पार्टी को। और क्यों में, आम आदमी के पक्ष में कारण बताया जाता है।

इस तरह पार्टी अपने पक्ष में वोट डालने के कारण तो लोगों को बता ही रही है जो ध्यान नहीं देगा वह समझेगा कि पिछली बार कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी को वोट देने वाले सभी लोग इस बार आम आदमी पार्टी को वोट देंगे और उनके पास इसके ठोस कारण हैं। बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किए जाने वाले इन विज्ञापनों में टेलीविजन चैनलों को जैसे अचानक ब्रेक लेना पड़ता है वैसे ही ब्रेक ले लिया जाता है। काम की बात खत्म होते ही। और फिर आखिर में कहा जाता है कि यह विज्ञापन था। तब तक इसका जो असर होना होता है, हो चुका होता है।

और भाजपा की ओर से अपने स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी की आवाज में चलाए जा रहे विज्ञापन, “भाइयों और बहनों ये विजय यात्रा क्यों चल पड़ी है। एक के बाद एक भारतीय जनता पार्टी जनता के दिलों में इतना प्यार और विश्वास कैसे बना पाई है। भाइयों और बहनों जो देश का मूड है वही दिल्ली का मूड है। जो देश चाहता है वही दिल्ली चाहता है” का करारा और दिलचस्प जवाब है। यह ऐसा आईडिया है, जिससे कोई भी धोखा खा जाए। प्रस्तुति बहुत ही शानदार और स्वाभाविक है। रेडियो का प्रचार और विज्ञापनों के लिए जबरदस्त उपयोग।

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कालाधन और भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर 100 दिन में काला धन वापस लाने की बातें करके देश के मध्यम वर्ग को ललचा देने के बाद भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में अब गरीबों और झुग्गी झोपड़ी वालों को चारा डाल रही है। दिल्ली चुनाव में “जहां झुग्गी, वहीं मकान” का नारा इसी रणनीति के तहत है। और गरीबों को लक्ष्य करने के लिए ही भाजपा के जो विज्ञापन इन दिनों प्रमुखता से प्रसारित हो रहे हैं उनमें पहला है, हमारा वोट भाजपा को। मोदी जी आए हैं तो बैंक में हमारा खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा मिला गैस सिलेंडर का फायदा मिला अब झुग्गी वालों को मकान मिलने की बात भी हो रही है। इसी क्रम में एक और विज्ञापन है, ना-ना मेमसाब, उनको वोट। हम नहीं देंगे। पानी देंगे, बिजली देंगे, कहकर सब के वोट ले लिए पर ये तो उन्हें मिले ना जिनके पास मीटर थे। हम झुग्गी वालों को क्या मिला। और तीसरा विज्ञापन है, पिछली सरकार तो गठबंधन से बनी थी साब जी। सब साथ हो लिए। क्योंकि सबको विश्वास था कि दिल्ली का भला होगा। लेकिन ड्राइवर तजुर्बेकार ना हो तो गाड़ी तो ठुकेगी ना। सब जानते हैं कि गाड़ी ठुकी नहीं, ब्रेक लगाया गया था। ऐसे में, गरीबों को साधने के फेर में मध्यम वर्ग को चुका हुआ मानने वाली भाजपा अपने खर्च पर आम आदमी पार्टी की उपलब्धियां भी प्रचारित कर रही है।

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जैसे-जैसे दिल्ली में मतदान की तारीख करीब आ रही है भारतीय जनता पार्टी अपने सभी हथियारों का उपयोग कर लेने पर आमादा है। जिस तरह काले धन के पैसे 100 दिन में लाने का झूठा और अव्यावहारिक वादा करके पार्टी केंद्र में सत्ता में आई है वैसा ही झूठा और अव्यवहारिक वादा वह दिल्ली के गरीबों से कर रही है। खादी के बिना बाजू वाले कुर्तों से डिजाइनर और स्पेशल सूट पर पहुंच चुके नरेन्द्र मोदी गरीबों को फिर सपने दिखा रहे हैं। इसबार जहां झुग्गी वहां मकान का वादा काले धन को वापस लाने से भी बड़ा धोखा है। क्या यह संभव है। पर देश का प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ दल खुलेआम झूठ बोल रहा है। काले धन का तो लोग इंतजार कर रहे हैं पर किसी दिन दिल्ली में झुग्गियां उजाड़ी गईं और लोग चढ़ बैठे सात रेसकोर्स रोड पर तो क्या होगा, किसी ने सोचा है। गरीबों के लिए घर का सपना वैसे ही बहुत बड़ा होता है। ऐसा सपना नहीं दिखाया जाना चाहिए कि गरीब मरने मारने को उतारू हो जाए। भाजपा अगर रिकार्ड सीटों के साथ सत्ता में आई है तो कहीं ऐसा ना हो कि रिकार्डतोड़ तरीके से सत्ता से हटाई जाए। तैयारी पार्टी खुद कर रही लगती है।

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मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद जो काम किए हैं उसका प्रचार दिल्ली में चुनाव के मद्देनजर रेडियो पर आ रहा है। इसमें एक आदमी कहता है कि मोदी जी आए हैं तो बैंक में खाता खुला, डेबिट कार्ड मिला, बीमा हुआ, रसोई गैस का फायदा मिला – अब मैं आपको बताऊं कि वो ये नहीं कहता कि चेक बुक मिला और खाते का नंबर भी मिला। वाकई बहुत काम हुआ है। और रसोई गैस की सबसिडी खाते में ट्रांसफर करने की योजना पिछली सरकार की थी – मेरे ख्याल से। विज्ञापन में यह नहीं कहा गया है कि खाते जिस काले धन के पैसे की उम्मीद में लोगों ने खोले हैं वो चुनाव बाद आ जाएंगे। और जनता पर यह कम अहसान नहीं है। मैं अगले विज्ञापन का इंतजार बेसब्री से कर रहा हूं।

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महंगी कमाई मुफ्त में ‘खर्च’ हो गई… दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में किरण बेदी के जीवन की एक प्रमुख कमाई (इंदिरा गांधी की कार टो करने का श्रेय) खर्च हो गई। और मजेदार यह है कि इस खर्च को ना किरण बेदी के चुनावी खर्च में जोड़ा जा सकता है और ना भारतीय जनता पार्टी के। दुख की बात यह है इस महत्त्वपूर्ण कमाई के खर्च होने का कोई लाभ किसी को नहीं मिलेगा। यहां तक कि मीडिया को भी इस ‘रहस्योद्घाटन’ का कोई श्रेय नहीं दिया जा सकता है।

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खबर है कि किरण बेदी के पास दो पते पर दो वोटर आई कार्ड हैं। भक्तगण इसपर भी बुद्धिमानी दिखा रहे हैं। अभी दो दिन पहले ही उपराष्ट्रपति से भी ज्यादा ज्ञानी लोगों ने अपने ज्ञान का नंगा प्रदर्शन किया है। अब फिर कूद पड़े। अपनी अज्ञानता दिखाने। भक्तों के मामले में यह कहावत बिल्कुल सही लगती है, Its better to keep your mouth shut and let people think that you are a fool than to open it and clear all doubts. समस्या बहुत गंभीर है। लोग तुरंत फैसला सुनाने लगते हैं, खेमे में बंट जाते हैं। कार्यवाही मेरे या किसी के कहने या चाहने से नहीं हो सकती या वो नहीं होगी जो कोई चाहेगा। कार्यवाही नियमानुसार ही होगी। अगर किसी ने मतदाता सूची में नाम डालने के लिए आवेदन किया हो तो उसे पता होना चाहिए कि आप का नाम मतदाता सूची में ऐसे ही नहीं आ जाता है। इसके लिए आप बाकायदा आवेदन करते हैं और घोषणा करते हैं कि आप मतदाता सूची में नाम आने की शर्तें पूरी करते हैं। इसी में यह घोषणा भी होती है कि मेरा नाम किसी और मतदान क्षेत्र की मतदाता सूची में नहीं है या है उसे काटकर इस मतदान क्षेत्र में मेरा नाम दर्ज किया जाए। दो जगह नाम रहने का मतलब है आपने आवेदन में नहीं बताया। अगर बताया था तो आवेदन पत्र से साबित हो जाएगा, आप कर दीजिए। बात खत्म। या आप चाहते हैं कि बताने के बावजूद आपका नाम कटा क्यों नहीं तो इसकी मांग कीजिए, दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। पर आपने नाम काटने का आवेदन किया ही नहीं हो, या यह घोषणा ही नहीं की हो कि आपका नाम कहीं और है, तो आप दोषी हैं, कार्रवाई आपके खिलाफ होगी। लेकिन इसमें अदालती पेंच हैं। कई बार आप आवेदन खुद नहीं करते हैं, दस्तखत गंभीरता से नहीं मिलाए जाते हैं। इस बिना पर आप अदालत से शायद बच जाएं पर मामला तय तो अदालत में ही होगा। भक्त बेकार ज्ञान बघारने लगते हैं और मजे की बात यह कि अमूमन यह नहीं कहा जाता कि नियम क्या है या फैसला तो अदालत में लोगा। लोग टूट पड़ते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.


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अजीत अंजुम की बिटिया जिया ने मोदी की बजाय केजरी पर मुहर मारा (देखें वीडियो)

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

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जानिए, उन वजहों को जिसके कारण दिल्ली में किरण बेदी फैक्टर अरविंद केजरीवाल को बहुमत दिला रहा है

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दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर : भाजपा की बुजुर्ग महिला का जवाब खुद केजरीवाल ने यूं दिया

Sanjaya Kumar Singh : दिल्ली विधानसभा चुनाव एफएम रेडियो पर अच्छा चल रहा है। भारतीय जनता पार्टी ने रेडियो पर एक विज्ञापन चलाया जो इस प्रकार है, “गलती मेरी ही थी। आम आदमी, आम आदमी कहकर धोखा दे दिया। बड़े-बड़े वादे। पानी मुफ्त कर देंगे। आंसू दे गया। घर के काम छोड़कर उसके लिए मीटिंग करवाई, मोहल्लों में। पर बदले में क्या मिला। सब छोड़कर भाग गया। इनके अपने आदमी तक चले गए। गैर जिम्मेदारी का बदला लेंगे। अब इस नाकाम आदमी को वोट न देंगे। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

इसका जवाब अरविन्द केजरीवाल की आवाज में आ रहा है। रेडियो विज्ञापन में वे कहते हैं, “मैंने एफएम रेडियो पर एक बुजुर्ग महिला की आवाज सुनी। बहुत दुखी नजर आ रही थीं क्योंकि उन्होंने मुझे वोट दिया और मैंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा, मैंने उनके वोट का सम्मान नहीं किया। आज मैं उन्हीं से मुखातिब हूं। मैं उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि माताजी, मैं कहीं भाग के नहीं गया कुछ ही दिनों में पूर्ण बहुमत लेके आपकी सेवा में फिर आ रहा हूं। आप अपना विश्वास बनाए रखिए। ना तो आपका वोट व्यर्थ गया ना आपका परिश्रम। कमी रह गई थी तो कुछ सीटों की आप विश्वास और आशीर्वाद बनाए रखिए हम पूर्ण बहुमत लेकर आपकी सेवा करने पूरे पांच साल के लिए फिर से वापस आ रहे हैं। आप नाराजगी छोड़िए, थोड़ा मुस्कुरा दीजिए।”

इसके अलावा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने जो वोटबटोरू मुद्दे उठाए हैं (जीन्स पहनने, महिलाओं की नौकरी, लव जेहाद, गोड्से की मूर्ति) उनका मजाक उड़ाने वाला एक विज्ञापन आम आदमी पार्टी की ओर से आता है। हालांकि इसमें भाजपा का नाम नहीं लिया गया है। भाजपा के ज्यादातर विज्ञापन आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल को लक्ष्य करते हैं। मुद्दे उसके पास हैं नहीं या उन्हें अभी सामने नहीं ला रही है पर अभी जो तीर दागे जा रहे हैं उसका एक और नमूना देखिए…

“कुछ ना था वो। चार दिन की चांदनी दिखाकर भाग गया। तुम खुद सोचो, जो अपने लालच के लिए एक बार जनता का विश्वास तोड़ सकता है वो दोबारा क्या ऐसा नहीं कर सकता? मगर भाई … … अरे तू रहने दे। सरकारी बंगला ठुकराने के बाद बंगला ले लिया… गाड़ी ठुकराने के बाद वो भी ले ली। जो अपने वादों पर ना टिका वो अपने विश्वास पर क्या खाक टिकेगा? ऐसी बचकानी हरकत करने वाले को तू चाहता है कि मैं वोट दूं। बात करता है। पूर्ण बहुमत से बदलें दिल्ली के हालात। चलो चलें मोदी के साथ।”

देखना है जनता नाराजगी छोड़कर मुस्कुराती है या मुस्कुराते हुए मोदी के साथ चली जाती है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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डीआई पीआर में 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने वाला कौन है?

: राजस्थान के डीआई पीआर में अखबारों की मान्यता का फर्जीवाड़ा : 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय दर्जा, लाखों का चूना : जोधपुर। राजस्थान के सूचना एवं जन सम्पर्क निदेशालय के आला अधिकारी अखबारों की मान्यता की कार्यवाही मे बड़े स्तर पर घपला कर सरकार को चूना लगा रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है जोधपुर में फर्जी प्रिंट लाईन से छप रहे 4 पेज के अखबार दैनिक प्रतिनिधि का। दैनिक प्रतिनिधि का मालिक खुद को राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का रिश्तेदार बताता है। उक्त समाचार पत्र का एक ही संस्करण जोधपुर में छप  रहा है। इस चार पेज के अखबार के पीछे  प्रिन्ट लाईन में नियम तोड़ कर प्रिन्टिंग प्रेस के पते की सूचना तक दर्ज नहीं की जा रही हैं जबकि प्रेस एक्ट में मुद्रणालय के पूरे पते की सूचना आवश्यक रूप से दी जाती है। जिस भण्डारी ऑफसेट से यह अखबार छपना बताया जा रहा है इस नाम की कोई प्रिंन्टिंग प्रेस अस्तित्व में नही है।

उक्त समाचार पत्र को डीआई पीआर के अधिकारियों ने कभी जिला स्तर तो कभी संभाग व राज्य तो वापस जिला स्तर का समाचार पत्र मानते हुए वर्गीकृत किया। जब जब भी मेहरबानी की उस समय वर्गीकरण की प्रक्रिया बदल दी गई। अंत में गई कांग्रेस सरकार ने फिर संभाग जोधपुर के लिए राज्यस्तरीय अखबार बना लिया। जबकि संभाग स्तर पर अलग से राज्यस्तरीय मान्यता देने का प्रावधान राजस्थान विज्ञापन नियम 2001 में कहीं भी नहीं है।

राज्य सरकार के विज्ञापन नियम में जयपुर सहित राज्य के दो स्थानों से प्रकाशित होने वाले 10 पेज के अखबार को ही राज्यस्तरीय मान्यता विभिन्न पात्रताएं पूरी करने पर देने का प्रावधान है। यह अखबार तो सिर्फ 4 पेज का और वह भी सिर्फ जोधपुर से प्रकाशित होने वाला है। अब तक डीआई पीआर से राज्यस्तर के नाम पर लाखों का चूना लगा चुका है। जोधपुर विकास प्राधिकरण भी इस अखबार को राज्यस्तरीय मानते हुए वाणिज्यिक दरों पर भुगतान की कार्यवाही कर जेडीए को 25 लाख से अधिक का चूना लगाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप में चला रहा है।

डीआई पीआर में आखिर 4 पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने वाला कौन है? इसकी जांच करवाई जाये तो कईं ऐसे मामले सामने आ सकते हैं। बेचारे कई अखबार जो 10 पेज के निकलते हैं कईं जगहों से प्रकाशित होते हैं उन पर डीआई पीआर मेहरबानी नहीं कर रहा है। इस चार पेज के अखबार को राज्यस्तरीय बनाने में किसने क्या व कितने लिये, यह दावा तो नहीं कर सकते लेकिन इस दाल को बनाने मे काले रंग का इस्तेमाल जरूर हुआ है वरना नौकरी बेच कर ऐसे काम कौन करता?

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टीवी विज्ञापन का गिरता स्तर : क्या संपादकों के पास आंख दिमाग नहीं है?

आप टीवी खोल कर देखिए. टीवी का पत्रकार (एंकर) लोकत्रंत का रक्षक बन कर सामने खड़ा होगा. जो नैतिकता और इमानदारी का पुतला होगा. वह हर किसी से सवाल करेगा. उसे शर्मिंदा करेगा. कहेगा देश जानना चाहता है. आप जवाब दो. जवाब दो. अगर आपको उससे कोई सवाल पूछना हो या शिकायत करनी हो तो टी वी ब्रोडकास्टर एशोसिएशन को पत्र लिखें. जिस का पता नीचे पट्टी पर कभी कभी दिखलाया जाता है. अब उससे सवाल कौन पूछे?

हम सब जानते हैं कि देश के कानून के अनुसार शराब सिगरेट के विज्ञापन टीवी नहीं दिखाए जा सकते. अब टीवी पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक रेस्टोरेंट में अजय देवगन एक लड़की को छेड़ने वाले गुंडे से मारपीट करता है. बाद में सबके लिए एसीपी का ऑडर करता है. फिर एक सवाल आता है. एसीपी याने उसका अजय देवगन जवाब देता है “सब के लिए एसीपी म्युजिक सीडी“. मूर्ख से मूर्ख आदमी को समझ आता है कि यह ऐरिस्टोक्रेट प्रीमियम विस्की का विज्ञापन है.

टीवी पर नैतिकता, कानून के पालन की बात करने वाले एंकर, उसके संपादक और टीवी के मालिक को यह म्यूजिक सीडी का ही विज्ञापन लगता होगा. ऐसा हम मान लेते हैं. इसी प्रकार एक विज्ञापन  बॉडी वार्मर (गर्म कपडों) का आता है जिसमें एक सगाई का दृश्य है. नायक नायिका की उंगली में अंगूठी पहनाने की कोशिश करता है जिसमें उसका हाथ बार बार फिसलता जाता है. एक सवाल पीछे से आता है, लगता है इसके पास नहीं है. शराब का गिलास हाथ में लिए मेज पर बैठा आदमी विश्वास से उस देख कर कहता है, लगता है इसके पास नहीं हैं. इसके बाद, एक लड़की शरारत भरे अंदाज में कहती हैं, लगता है जीजू के पास नहीं है. इस पर नायक खीज कर पूछता है, क्या नहीं है मेरे पास? तब एक छोटी लड़की बॉडी वार्मर कपड़ों का सेट लेकर आती है जो कहती है ……..के वार्मर.

यह विज्ञापन बॉडी वार्मर कपड़ों का ही है. किन्तु जिस तरह से कहा और दिखलाया गया है वह पुरानी मुकरी शैली है… क्या सखी चोर न सखी सैयां. किन्तु इस विज्ञापन में जो इंगित है वह यहाँ लिखा भी नहीं जा सकता. सभी उसे समझते हैं लेकिन टीवी पर आने वाले एंकर उनके विद्वान संपादक जो भाषा के विद्वान हैं, जो मन की बात जान लेते हैं, उन्हें कुछ समझ नहीं आता.

देश के कानून के अनुसार टीवी पर दवाइयों के विज्ञापन नहीं दिखलाये जा सकते. पहले चवनप्राश, आयोडेक्स जैसे दर्द निवारकों के विज्ञापन आते थे जिनके लिए डाक्टर की पर्ची की जरुरत नहीं होती थी. अब न्योरोबिन फोर्टें गोलियों का सीधे सीधे विज्ञापन आता है.क्या टीवी के संपादक और संचालक को यह नहीं पता कि इस दवा का इस प्रकार विज्ञापन प्रसारित करना अनुचित है. यह चिकित्सा विज्ञान की आचार संहिता और कानून का उलंघन है. किन्तु टीवी वाला तो देश और लोकतंत्र का रक्षक है. उससे सवाल कौन करे?

गर्भ निरोधकों के विज्ञापन पहले संतति निरोध के लिए आते थे. अब वे आनंद के लिए एक वस्तु के रूप में आ रहे हैं जिसे एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया जा रहा हैं इसलिए उसका बार बार विज्ञापन आ रहा है. चेनल में आते नोटों के सामने टीवी के संपादक और मालिक को उन नोटों के अलावा कुछ नहीं दिखता है. इस मामले में टीवी के एंकर या संपादक कुछ कर पाएंगे. ऐसी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. टीवी एंकर अभिनेता हैं और संपादक टीवी के संचालक का नौकर. मालिक जो चाहेगा संपादक वही दिखलाएगा या नौकरी छोड़ कर अलग खड़ा हो जाएगा. इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है.

ब्रोडकास्टर एसोसिएशन, कोई और काउंसिल या कोई परिषद इस मामले में कुछ कर पायेगी, ऐसी उम्मीद भी आपको नहीं रखनी चाहिए. सरकार की किसी एजेंसी अपनी ओर से कुछ करेगी, अगर उसे कुछ करना होता तो वह अब तक कर चुकी होती. यह मुक्त बाजार की व्यवस्था है. यहाँ सब बाजार ही तय करेगा. अब बाजार सरकार भी बना रहा है तो अच्छा यह रहेगा कि सरकार इस क्षेत्र को भी नियम कानून से मुक्त कर दे जिस से एक दर्शक का इस तरह से दिल तो नहीं दुखेगा.

लेखक अशोक उपाध्याय के ब्लाग से साभार.

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Dainik Hindustan Advt Scam : next hearing date 13 January

New Delhi : 200 crore Dainik Hindustan Government Advertisement  scandal, the Supreme Court has listed the Special Leave Petition (Criminal) No.1603/2013 (Shobhana Bhartia Vs State of Bihar & another) for  hearing on January thirteen, 2015 next. Meanwhile, the  Superintendent of Police,Munger(Bihar), Mr.Varun Kumar Sinha has submitted the Counter-Affidavit on behalf of the Bihar Government to Mr.Rudreshwar Singh, the counsel  for the Bihar Government in the Supreme Court in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013 .Now, the Counsel for the Bihar Government, Mr. Rudreshwar Singh  has to  file the Counter-Affidavit  in the Supreme Court and has to argue on behalf of the Bihar Government in this case.

Meanwhile, reliable sources  in New Delhi said that the Police Superintendent, Munger (Bihar), Mr.Varun Kumar Sinha, in the Counter-Affidavit to the Supreme Court, had clearly exposed the financial scandal of  M/S. H.T. Media Ventures Limited (New Delhi).

The Police Superintendent, Munger(Bihar) in his Counter-Affidavit said, “During police investigation and supervision, the Munger (Bihar) police have found ”facts”  crystal -clear that the Munger edition of Dainik Hindustan is being printed and published, violating the rules and provisions of the Press & Registration of Books Act, 1867 and getting the government advertisements illegally. On the basis of facts, coming in course of investigations,supervisions and available documents, the police  find sufficient evidences against all the named accused persons  in the Munger Kotwali Police Case No.445/2011 including the Chairperson of M/S. H.T.Media Ventures Limited(NewDelhi) Shobhana Bhartia. I pray  to the Hon’ble Supreme Court  to reject the petition of the petitioner,Shobhana Bhartia in this instant case.”

It is worth mentioning that the senior lawyer of Bihar, ShriKrishna Prasad on January 13,2014 last, appearing on behalf of the O.P No.02, Mantoo Sharma (Munger, Bihar),  had completed his argument in the court of Hon’ble Mr.Justice H.L.Dattu and Hon’ble Mr.Justice S.A.Bobde.

The lawyer,ShriKrishna Prasad told  the court of Hon’ble Mr.Justice H.L.Dattu and Hon’ble Mr.Justice S.A Bobde,” My Lord, this is one of the rarest cases of forgery,cheating and loot of the government revenue on behalf of the powerful media house of India,M/S  H.T.Media Ventures Limited( New Delhi).On the order of the Munger Chief Judicial Magistrate, an F.I.R has been lodged with the Munger Kotwali P.S.,bearing case No.445/2011.After investigations and supervisions, the Dy.S.P and the SP Munger (Bihar) have submitted  their ”Supervision- Reports No.01 & 02 in which  they have found  all charges against the named accused persons ‘prima-facie true’ And the investigations in this instant case is in full progress.The Hon’ble High Court of Patna has also rejected the prayer of the Chairperson of M/S H.T.Media Ventures Limited,Shobhana Bhartia  in the Criminal Miscellaneous Case No.2951 and 16763 of 2012.So, I pray to the Hon’ble Court to reject the prayer of the petitioner,Shobhana Bhartia, and direct the Munger police to expedite the police investigations in this instant case.”

What is the F.I.R ?- On the basis of a Munger court complainant No.993(C)/2011 of the complainant,Mantoo Sharma, s/o Late Ganesh  Sharma, resident -Puraniganj, P.S.- Kasim Bazar,District-Munger, an F.I.R has been  lodged against (1) the Principal accused Shobhana Bhartia (Chairperson, Hindustan Publication Group, Hindustan Media Ventures Limited,Head Office,18-20,Kasturba Gandhi Marg, New Delhi, (2) Shashi Shekhar,the Chief Editor, Dainik Hindustan (New Delhi), (3) Aakku Srivastawa,Acting Editor, Patna edition of Dainik Hindustan, (4) Binod Bandhu, Regional Editor, Bhagalpur  edition of Dainik Hindustan and (5)  Amit Chopra,Printer & Publisher of M/S Hindustan Media Ventures Limited,New Delhi. All of them have been accused of violating  sections  8(B),14 & 15  of the Press & Registration of Books Act, 1867,  and Sections 420/471 & 476 of Indian   Penal Code, printing and publishing  Bhagalpur and  Munger editions of Dainik Hindustan ,using wrong  Registration No. and obtaining  the government advertisements of the Union and the State governments in crores in the Advertisement Head  by presenting the forged  documents of registration.
Statements under section  164 of Cr.P.C in the Munger Judicial Court: In the process of  investigation, the Investigating Police Officer,Munger Kotwali,Bihar,    has got the statements of the complainant,Mantoo Sharma, and other witnesses,(1) ShriKrishna Prasad,(2) Kashi Prasad,(3) Bipin Kumar Mandal under section 164 of  Cr.P.C  in the Munger judicial court on April, 14,1012.All the witnesses   in their statements   before the court  have fully supported  the allegations against  the accused  persons  in the F.I.R ,bearing No. Munger Kotwali P.S Case No.445/2011.(EOM)

By ShriKrishna Prasad
senior advocate
Munger
Bihar
Mob: 09470400813

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मनोरंजन टीवी के फर्जीवाड़ा ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ का एक शिकार मैं भी हूं

विषय : Fraud of Manoranjan TV

निदेशक
मनोरंजन टीवी
आदरणीय सर

आपके चैनल Manoranjan TV पर आने वाले ‘चेहरा पहचानो इनाम जीतो’ विज्ञापन के जरिए लोगों को पागल बनाने का काम किया जाता है. इसका एक शिकार मैं भी हुआ हूं. मेरे पास आज दिनांक 09 दिसंबर को फोन आया कि आपको 12 लाख 50 हजार रुपए इनाम में मिलने वाला है. इसे पाने के लिए मेरे से अभी तक इनाम देने वालों ने 86 हजार रुपए तक वसूल लिए हैं.

जब मैंने पैसे वापस करने के लिए कहा तो भी इन्होंने कहा कि इसके लिए 14 हजार रुपए और एकाउंट में डाल दो. आपसे निवेदन है कि आप इस संदर्भ में मदद करने की कृपया करें ताकि मुझ गरीब को न्याय मिल सके. मैं आपको वह मोबाइल नंबर दे रहा हूं जिसके जरिए मुझे लगातार फोन किया गया और पैसे मांगे गए. वह नंबर 08969362566 है.

सतीश चन्द शर्मा
कोटपूतली जयपुर राजस्थान
M. 09314090617
satishsharma.pa@gmail.com

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अपराधी मीडिया मालिक छुट्टा घूम रहे, विज्ञापन एजेंट को तीन साल की जेल हो गई

किसी अखबार या चैनल मालिक को आपने पेड न्यूज या छंटनी या शोषण या चोरी के मामले में जेल जाते आपने नहीं सुना होगा लेकिन एक विज्ञापन एजेंट को तीन साल की जेल की सजा इसलिए हो गई क्योंकि उसने अखबार में विज्ञापन छपवाकर उसका पेमेंट जमा नहीं कराया. विज्ञापन छपवा कर पैसे न जमा कराना अपराध है. उचित ही सजा मिली. लेकिन ऐसी सजाएं बड़े लोगों को अपराध में क्यों नहीं होती.

सारे के सारे चोर ब्लैकमेलर मीडिया मालिक धड़ल्ले से पेड न्यूज और छंटनी जैसे कुकर्म करते हैं लेकिन इनके खिलाफ कहीं कोई सुनवाई नहीं होती. लेकिन ये अखबार मालिक जब चाहें तब किसी भी विज्ञापन एजेंट या पत्रकार को जेल भिजवा दें, कोई भी आरोप लगाकर. इन ताकतवर मीडिया मालिकों से पुलिस वालों की सेटिंग किसी से छुपी नहीं है. लीजिए पढ़िए विज्ञापन एजेंट के तीन साल जेल वाली खबर….

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दैनिक भास्कर : राजस्थान में अखबार ने मृत्यु के शोक संदेश पर दे दी बधाई!

राजस्थान का सबसे बड़ा अखबार होने का दावा करने वाला दैनिक भास्कर अब भगवान भरोसे ही चल रहा है। अखबार के हर संस्करण में खबरों में तो खामियों की भरमार है ही, मगर अब तो विज्ञापनों में भी ये लोग कुछ भी छाप दे रहे हैं। ताजा मामला भास्कर के चितौड़गढ़ संस्करण का है जिसमें 11 दिसंबर को चितौड़गढ़ भास्कर में पेज नंबर 2 पर एक शोक संदेश का विज्ञापन छपा था।

इस विज्ञापन में श्री एम.एल.मेहता जी के आकस्मिक निधन पर उनके परिवारजनों ने श्रद्धांजलि संबंधी मैटर छपवाया था और वह छपा भी, मगर ज्यों ही विज्ञापन की हैडिंग पर जायें तो सिर चकरा जाये। जिस व्यक्ति का आकस्मिक निधन हुआ है और परिवारजनों ने उन्हे श्रद्धांजलि दी है, उसे भास्कर वालों ने हार्दिक बधाई दे दी। इस विज्ञापन से तो मानों यूं लग रहा है जैसे श्री मेहता के जाने से उनके परिवारजनों को खुशी हुई हो और इसी खुशी के मारे उन्होंने अखबार में हार्दिक बधाई का विज्ञापन बुक करवाया हो…. हद हो गई ये तो यार….

राजस्थान से आर.पी. की रिपोर्ट.

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साधना न्यूज पर रात 11 बजते ही शुरू हो जाता है सेक्स रोग, सेक्स और दवा के नाम पर भद्दा मार्केटिंग खेल।

रांची : साधना न्यूज की हालत इन दिनों बड़ी अजीब हो गई है। बिहार- झारखंड को बेस्ड करके यह चैनल जिस तरीके से शुरू हुआ था, उसने अपने खबरों के माध्यम से हलचल मचा दी थी। तभी इसके टीआरपी भी बढ़े थे। अच्छे समाचार और समाचारों के प्रति ईमानदारी से लगे इसके पत्रकार ने अपने बलबूते कई खबरों को ब्रेक कराया। चैनल हिट होने लगा तो पत्रकारों का ग्रुप मालिक और चैनल को फायदा दिलाने की बजाए खुद मुद्रा मोचन और डील में लग गए। इसका अहसास होते ही चैनल संचालक ने पत्रकारों को भी झटका देना, जो शुरू किया, वह भी जारी है।

चैनल को अपने तौर- तरीकों से चलाना, किसी को हटाना तो किसी को लाना, यह सारा कुछ चल रहा है। हाल यह हो गया है कि चैनल पर अब दर्शकों को बेशर्मी भरे विज्ञापन भी देखने को मिल रहे हैं। रात ग्यारह बजे शुरू होते ही यह चालू हो जाता है। सेक्स रोग, सेक्स और दवा के नाम पर भद्दा मार्केटिंग का खेल। समाचार पर ध्यान हटने से पत्रकार किसी को हटाना तो चैनल को चैनल शुरू करनेवाले उद्यमी को इससे मतलब कहां। इसके पत्रकार अब समझ नहीं पा रहे हैं कि वे किसी न्यूज चैनल के पत्रकार हैं।

एक तरह से मालिक के अजीबोगरीब निर्णय से भले चैनल का रेवेन्यू जेनरेट हो रहा हो, पर साधना न्यूज उसमें कहीं खो चुका है और विभिन्न जिला मुख्यालयों के इसके पत्रकार अब बेरोजगर हो गए हैं। चैनल के स्टेट दफ्तर का हाल यह है कि वहां कब कौन प्रभारी बना दिया जाएगा, वाली स्थिति आ गयी है। हरियाणा के चुनाव हुए, तो बिहार-झारखंड का यह चैनल, पैसे के लिए साधना हरियाणा बना दिया गया। वहां बहाली की गयी, काम लिया माल बनाया और अब पैकअप। कर्मचारियों की छुट्टी करके पूरा फोकस झारखंड चुनाव पर। एकबार फिर झारखंड के अपने रिपोर्टरों को सक्रिय होने को कह दिया गया है। उनके माध्यम से प्रत्याशियों से वसूलने की तैयारी है। झारखंड का रांची ब्यूरो दफ्तर को नए वायदों के साथ दुरूस्त कर दिया गया है। (साभार- मीडिया फॉर झारखंड डाट काम)

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माखनलाल में मेरी पांच साल की पढ़ाई और आज की विज्ञापनी पत्रकारिता

सम्पादकीय पर विज्ञापन इस कदर हावी है कि लगता ही नहीं कहीं पत्रकारिता हो रही है। ये दौर ऐसा है कि हर कुछ को चाटुकारिता की चाशनी में बार-बार डुबाया जाता है और इसे ही सच्चा बताकर पेश किया जाता है। पत्रकार बनने का सपना लिए हमने 5 साल माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल में गुजारे। काफी गुर भी सीखे। पत्रकारिता की बारीकियों को हमारे गुरुओं ने हमें दम भर सिखाया। इंटर्नशिप ट्रेनिंग के लिए हमें दिल्ली आजतक भी भेजा। लेकिन पढ़ा था कि विज्ञापन और सम्पादकीय दो अलग चीजें होती हैं। लेकिन जब सच्चाई का सामना हुआ तो दिल के टुकड़े हजार भी हुए। हर समय विज्ञापन हावी रहा सम्पादकीय पर।

कोई भी खबर लिखी जाती है तो हमेशा विज्ञापन वाली खबर और बिना विज्ञापन वाली खबर का ध्यान देना पड़ता है। ऐसा न करने की सूरत में अच्छी खासी डांट पिलाई जाती है। हर खबर में अगर आपने विज्ञापनदाता का ध्यान नहीं रखा तो बस आप की शामत आई समझो। कई बार बवाल तो नाम छापने और ना छापने को लेकर हो जाया करता है। ऐसा लगता ही नहीं की पत्रकारिता कर रहे हैं, लगता है की बस पूंजीपतियो के सम्मान में निकल रहे एक अखबार में टाइपराईटर बन दिन भर लिखे जा रहे हैं। ऐसे में जिस पत्रकारिता का सपना देखा था वो आज विज्ञापन की बेड़ियों में जकड़ दिया गया है। टीस तो दिल में रोज़ उठती है..। लेकिन करें क्या सिर्फ लिखना ही सीखा है, और कोई काम आता ही नहीं।

प्रवीण श्रीवास्तव
Praveen Srivastava
मो- 08081808108
praveenpink31@gmail.com

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‘प्रभात खबर’ ने लालू यादव को राबड़ी देवी और राबड़ी देवी को लालू यादव बना दिया!

प्रभात खबर का एक और कारनामा… इसने रातोंरात अपने अखबार में लालू यादव को राबड़ी देवी और राबड़ी देवी को लालू यादव घोषित कर दिया…. ऐसा विज्ञापन में किया गया है. न्यूट्रल पब्लिशिंग हाउस नामक कंपनी प्रभात खबर अखबार का प्रकाशन करती है.  कभी ‘अखबार नहीं आंदोलन’ और आज के दिनों में ‘बिहार जागे…देश आगे’ स्लोगन देकर यह अखबार बेचा जाता है. इस हिन्दी दैनिक ‘प्रभात खबर’ के बिहार संस्करण में विज्ञापन के नाम पर एक और कारनामा सामने आया है.  ‘प्रभात खबर’ के गया एडीशन में एक विज्ञापन छपा जो काफी चौकाने वाला है.

गया जिला के राजद उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार द्वारा छठ पर्व के मौके पर दिए गए एक शुभकामना संदेश में राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद की तस्वीर के नीचे उनका नाम राबड़ी देवी लिखा गया है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की तस्वीर के नीचे उनका नाम लालू यादव लिखा गया है. ऐसा नहीं कि इस विज्ञापन का आकार इतना छोटा है कि संपादकीय या विज्ञापन विभाग की नजर इस पर नहीं पड़ी हो. पर ‘पैसे के लिए कुछ भी करेंगे’ की कहावत को चरितार्थ कर रहा ‘प्रभात खबर’ में वह सब मुमकिन दिख रहा है जो आम लोगों को नामुमकिन दिखता है. 

गौरतलब है कि इस अखबार के पटना संस्करण में पिछले दिनों बिहार के कभी मोस्ट वांटेड रहे और कुछ दिन पूर्व ही जेल से जमानत पर रिहा हुए फतुहा के कल्याणपुर गांव निवासी कुख्यात अपराधी टुनटुन यादव का छठ पर्व के मौके पर एक बड़ा सा शुभकामना संदेश छपा था जिससे इस अखबार की पूरे बिहार में काफी किरकिरी हुई. इसके बावजूद न तो इस अखबार का प्रबंधन चेता न ही ही इसका विज्ञापन विभाग.

पटना के पत्रकार विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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‘प्रभात खबर’ ने छापा कुख्यात अपराधी का ‘शुभकामना संदेश’

पटना से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘प्रभात खबर’ ने अखबार और विज्ञापन की सारी सीमाओं और मर्यादा को तोड़ते हुए बुधवार को प्रकाशित अंक में एक ऐसे विज्ञापन को प्रकाशित किया है जो हैरत में डाल देने वाला है। 28 अक्टूबर को प्रकाशित इस अखबार के 5वें पृष्ठ पर फतुहा के टुनटुन यादव की तस्वीर के साथ छठ पर्व के अवसर पर एक बड़ा सा शुभकामना संदेश छपा है जिसमें टुनटुन यादव को फतुहा विधान सभा क्षेत्र का समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता बताया गया है।

वास्तविकता यह है कि मूल रूप से फतुहां के ही कल्याणपुर गांव निवासी व कभी पुलिस के रिकार्ड में मोस्ट वांटेड रहा टुनटुन यादव कुख्यात अपराधी है और हत्या, रंगदारी सहित दर्जनों संगीन मामलों में वह आरोपित रहा है। टुनटुन यादव को पिछले वर्ष छठ के ही मौके पर एसएसपी मनु महाराज के निर्देश पर गिरफ्तार किया गया था तब उसके पास से काफी मात्रा में प्रतिबंधित मादक पदार्थ बरामद किए गए थे। टुनटुन यादव कुछ दिन पूर्व ही जेल से रिहा हुआ है।

विनायक विजेता की रिपोर्ट.

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इत्ता सारा सफ़ेद धन आवे कहाँ से जो हर अख़बार टीवी ख़रीद लेवे?

Om Thanvi : इसके बावजूद समर्थन के लिए दोस्तों और दुश्मनों के सामने याचक बने बैठे हैं? … और मितरो, इतना (सफेद) धन आवे कहाँ से है?

Sheetal P Singh : कहानी तो यहाँ है! इत्ता सारा सफ़ेद धन आवे कहाँ से जो हर अख़बार टीवी ख़रीद लेवे?

Manoj Dash : Manufacturing consent and opinion with in home black money. How can I trust the intent? This is the reason why black money issue is bound to stay in cold storage till next election.

Vandan Kumar : इसीलिए तो स्विस बैंक से वापस लाने लायक कुछ बचा ही नहीं… ‘पाई – पाई’ में से कुछ पाईयाँ ही मिलेंगी!

Zafar Ali : जब तक अम्बानी की मेहर है? कालाधन विदेश से आएगा नहीं चुनाव सामाग्री पे खर्च होगा बस

Kamal Joshi : क्या दादा आप भी….रिलायंस के गैस के दाम ऐसे ही बढ़ गए क्या ? कुछ एक अखबारों में विज्ञापन तो मित्र लोग दे ही सकते है…

फेसबुक से.

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पैसे कमाने की होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है

Sanjaya Kumar Singh : पत्नी बीमार हैं और दो महीने में तीसरी बार अस्पताल में हैं। तीमारदारी करते हुए अस्पताल में समय काटने के लिए नकद देकर अखबार खरीदता और पढ़ता हूं। इसी क्रम में पिछले दिनों ‘द हिन्दू’ खरीदा तो पता चला कि आजकल आठ रुपए का आ रहा है। आपमें से बहुतों को पता नहीं होगा कि रोज घर आने वाला अखबार कितने का होता है। महीने भर का बिल देने वालों के लिए यह कोई खास बात नहीं है।

इसी क्रम में आज (इतवार) को मैंने एक स्टॉल वाले से कहा कि एक-एक इंडियन एक्सप्रेस और हिन्दुस्तान टाइम्स दे दो। उसने अखबार पकड़ाए और कहा 10 रुपए। मैंने कहा किसके कितने। उसने कहा हिन्दुस्तान टाइम्स तो साब पांच रुपए का है। ये भी (इंडियन एक्सप्रेस) पांच रुपए का है। मैंने कहा, कहां लिखा है दिखाओ। वह ढूंढ़ने लगा और 5 अक्तूबर दिखाकर कहा ये देखो साब। मैंने कहा ये तो आज की तारीख लिखी है। अब वह बेचारा और परेशान उसके साथ मैं भी। असल में आज इतवार को दोनों अखबारों में पहला पन्ना विज्ञापन का था और विज्ञापन के साथ बने मास्ट हेड में तारीख आदि तो हैं पर अखबार की कीमत नहीं लिखी है, न जाने क्यों। जब हॉकर को नहीं मिला तो मैंने उसकी सहायता के लिए अंदर के (जो असल में पहला था) पन्ने पर कीमत ढूंढ़ना शुरू किया और ढूंढ़ निकाला।

हॉकर सही था, मैंने 10 रुपए दिए और अखबार लेकर आगे बढ़ा तो अफसोस कर रहा था कि मैंने बेकार बेचारे कम पढ़े-लिखे अखबार विक्रेता को परेशान किया। पर साथ ही यह ख्याल भी आया कि अखबार वाले हम पाठकों का तो ख्याल नहीं ही रखते हैं, अपने विक्रेताओं की भी चिन्ता उन्हें नहीं है। एक समय था जब पहले पन्ने पर एक ही विज्ञापन होता था। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ती गई और अब अखबार वाले अपना पूरा पहला पन्ना बेच दे रहे हैं और पाठकों को पहले पन्ने की खबरें अंदर पढ़ा रहे हैं। पाठकों की परवाह तो अखबार वालों को नहीं है। उन्हें चिन्ता विज्ञापन देने वालों की है और उनकी सेवा वे अच्छी तरह कर भी रहे हैं पर बेचारे गरीब, कम पढ़े-लिखे विक्रेताओं का ख्याल तो रखो। पैसे कमाने की इस होड़ में विज्ञापनों का धंधा करने वालों के साथ इंडियन एक्सप्रेस भी जुड़ गया है, यह जानकर आज थोड़ा अफसोस हुआ।

दूसरी ओर, अखबार में विज्ञापन देने और छापने वालों को बता दूं – मैंने नहीं देखा कि विज्ञापन किसी चीज का था। शाम को बच्चों ने बताया कि आमिर खान का प्रोग्राम आज शुरू हो गया तब समझ में आया कि हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पेज के विज्ञापन में खबरें क्यों छपीं थीं और उनपर विज्ञापन क्यों लिखा था। अब याद नहीं आ रहा है कि इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर क्या विज्ञापन था (हालांकि था हिन्दुस्तान टाइम्स से अलग)। देखते हैं अखबार वाले इस तरह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए कब तक धंधा कर पाते हैं। हमारी तो जो मजबूरी है सो हइये है।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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गोरा रंग, कमर-घुटनों का दर्द, सेक्स पावर, नशा छुड़ाने और अभिमंत्रित ताबीज जैसे भ्रामक विज्ञापनों का प्रसारण न करें चैनल : मंत्रालय

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी चैनलों को भ्रामक और झूठे विज्ञापनों का प्रसारण नहीं करने की सलाह दी है. गोरा रंग बनाने की गारंटी, कमर -घुटनों का दर्द छूमंतर करने, सेक्स पावर बढ़ाने, नशा छुड़ाने और अभिमंत्रित ताबीज से मन की मुरादें पूरी करने वाले विज्ञापन देकर आम जनता को भ्रमित करने वाले विज्ञापन सच्चाई से कोसों दूर हैं. इन विज्ञापनों की सच्चाई के लिए उपभोक्ता शिकायत परिषद और विज्ञापन स्टैंर्डड परिषद ने अध्ययन किया तो ये विज्ञापन सच्चाई से बहुत दूर नजर आए और इन्हें कानून का उल्लंघन माना गया.

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सभी चैनलों को झूठे प्रचार करने वाले विज्ञापनों की एक सूची थमाई है और सलाह दी है कि इनका प्रसारण न करें, नहीं तो सरकार केबल टीवी अधिनियम-1994 और औषधि एवं जादू कुप्रभाव (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 के तहत कार्रवाई करेगी. किसी न किसी टीवी चैनल पर युवाओं, महिलाओं व बुजुर्गों को आकर्षित करने वाले विज्ञापन दिखाई देते हैं.

इन विज्ञापनों को प्रभावी तरीके से बनाया जाता है ताकि लोग उनके झांसे में आएं और उनके सामान खरीद लें, लेकिन खरीदने के बाद पता चलता है कि कंपनी के दावे झूठे हैं. झांसे में आए लोगों ने भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) को बड़ी संख्या में शिकायत की. परिषद ने इन शिकायतों को उपभोक्ता शिकायत परिषद को भेजा जिसने इनकी जांच की और इनके दावों को झूठा पाया. परिषद ने ऐसे विज्ञापनों को तुरंत रोकने की सिफारिश की.

इन विज्ञापनों में बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम शामिल हैं. मुसली पावर एक्स्ट्रा नाम की ताकत और सेक्स पावर बढ़ाने की दवा के लिए कंपनी ने बड़े-बड़े वायदे किए, लेकिन जब उसके गुणों की जांच की गई तो वे गलत निकले. परिषद ने पाया कि न तो वह ताकत बढ़ा रही है और न सेक्स पावर. इस उत्पाद को 1954 के औषधि एवं जादू कुप्रभाव अधिनियम का उल्लंघन भी माना गया. ऐसे ही एक उत्पाद वाया गोल्ड एनर्जी पावडर, पावर मैग्नेटिक ब्रासेल्ट व शक्तिवर्धक वैक्यूम थैरेपी के दावे को भी गलत माना गया. नामी कंपनी डिटोल के विषाणुओं के कारण होने वाली 100 बीमारियों से लड़ने के दावे को भी झूठा बताया गया.

लंबाई बढ़ाने की फुलग्रोथ दवा, नशामुक्ति के लिए फुल स्टाप एडिक्शन पावडर, शूगर की बीमारी का इलाज करनेवाली मधुनाक्शणी व लाइलाज रोगों से मुक्ति के लिए वैदिक अमृत के दावों को भी गलत पाया गया. युवा लड़के एवं लड़कियों में गोरा होने व स्किन ग्लो करने की क्रीमों के विज्ञापनों को भी पूरी तरह से गलत पाया गया.

फेयरलुक क्रीम, फेयरप्रो, चोले वाले हनुमानजी, राशि रत्न टोपाज व महाधन लक्ष्मी आदि विज्ञापनों को भी नियमों के खिलाफ माना गया है. इन सभी कंपनियों को विज्ञापन रोकने और टीवी चैनलों को ऐसे विज्ञापनों को प्रसारित न करने का आग्रह किया गया है.

आपको भी कुछ कहना-बताना है तो bhadas4media@gmail.com पर मेल करें.

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