रवीन्द्र भवन : कलाओं का ध्वंस जारी, बर्बाद करने के लिए आधारभूत ढाँचों पर चोट

जयपुर : सरकार ने जब पुणे के फिल्म संस्थान को बर्बाद करने के लिये अपने महान योद्धा को मोर्चे पर भेज रखा है तो वह रंगमंच को बख्श देने की दरियादिली की जेहमत भला क्यों उठाने लगी? फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म के मोर्चे पर जहाँ ‘धर्मराज युधिष्ठिर’ को तैनात किया गया है, वहीं रंगमंच पर प्रहार करने के लिये कौरवों की सेना तैयार की गयी है जो ठेकेदार के भेस में आकर रवीन्द्र-मंच पर प्रहार करने में लगे हैं। 

सरकार दरअसल कला-संस्कृति को भगवा वस्त्र नहीं पहनाना चाहती, बल्कि उसे पूरी तरह से नंगा कर देना चाहती है ताकि वह बेआबरू होकर डूब मरे और उसके स्थान पर उनकी विचारधारा का परचम लहराया जा सके। वह कला और संस्कृति से जुड़े संस्थानों को ही बर्बाद नहीं कर रही है वरन् उनके आधारभूत ढाँचों पर भी चोट करने में लगी हुई है, ताकि बांस के अभाव में बंशी-वादन की कोई गुंजाइश न रहे। यह बात दीगर है कि हिंदुस्तान में चल रहे रंगकर्म के बड़े हिस्से को रंगमंच की कोई दरकार ही नहीं है पर सरकार अपनी ओर से इनकी जड़ों में मट्ठा डालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती।

ताजा मामला जयपुर के रवीन्द्र भवन का है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जयपुर में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणबीर सिंह ने  सत्र न्यायालय में स्थानीय रवींद्र में चल रहे पुनर्निमाण कार्य के विरूद्ध याचिका लगायी है और उनसे फोन पर मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने अगली सुनवाई तक निर्माण कार्य को स्थगित रखने के लिये अंतरिम स्थगन आदेश जारी कर दिया है। न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में श्री रणबीर सिंह ने आरोप लगाया है कि रवीन्द्र मंच के पुनर्निमाण का कार्य जिन हाथों को मंच के प्राधिकारियों ने सौंपा है, उनके पास थियेटर डिजाइन की कोई पृष्ठभूमि अथवा अनुभव नहीं है। यहाँ तक कि नये डिजाइन में लाइट और साउंड सिस्टम के लिये कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है। इतना ही नहीं,  ग्रीन रूम का जो प्लान नये नक्शे में तैयार किया गया है उसमें कलाकार के मंच तक सीधे पहुँचने की कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है।

गौरतलब है कि पुनर्निमाण का यह कार्य गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगौर की 150 वीं जयंती के मौके पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सहायता परियोजना के तहत चलाया जा रहा है, लेकिन रिनोवेशन के नाम पर नियमों का उलंघन तथा उसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। नये थियेटर के निर्माण में तकनीकी खामियां हैं। इस पूरे रिनोवेशन कार्य में आर्कीटेक्ट नियमों का उलंघन किया गया है। रवीन्द्र मंच के रिनोवेशन एवं नये प्रेक्षागृह के निर्माण में भारत सरकार द्वारा एक कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने जो नक्शा अप्रूब्ड किया था उसे दर किनार कर रिनोवेशन का कार्य किया जा रहा है। टेण्डर प्रणाली भी शक के घेरे में है। वर्षों पुराने इस इस कल्चरल हब के मूल स्वरूप को -जो कि यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर है – तहस नहस किया जा चुका है।

जयपुर के रंगकर्मियों का आरोप है कि उक्त संबंध में कुछ भी पूछने पर प्रशासन द्वारा कोई भी जानकारी नहीं दी जा रही है, जिसे लेकर शहर के समस्त कलाकारों में रोश व्याप्त है। उनके साथ नगर के साहित्यकार, नाटककार, लेखक, पत्रकार, एवं बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। उधर इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार रवीन्द्र मंच के प्रबंधक का कहना है कि निर्माण कार्य पूरी तरह से परियोजना के नियमों के तहत हो रहा है इसलिये एकतरफा कार्रवाई जैसी कोई बात नहीं है।

रवीन्द्र मंच की पृष्ठभूमि 

रवीन्द्र मंच की परिकल्पना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की थी। पंडित नेहरू और तत्कालीन संस्कृति मंत्री हुमायूँ कबीर ने सभी राज्यों की राजधानी में रवीन्द्र मंच का खाका तैयार किया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि प्रत्येक रवीन्द्र मंच के पास अपनी एक व्यावसायिक रंगमंडली हो जो निरंतर और नियमित रूप से नाटकों का प्रदर्शन कर सके।

जयपुर के रवीन्द्र मंच की मौजूदा कहानी 

यूपीए सरकार के दौरान एक योजना बनायी गयी थी कि सभी राज्यों में आधुनिक सुविधाओं के साथ सभी रवीन्द्र मंच का पुनर्निर्माण किया जाये ताकि वे सांस्कृतिक केंद्रों या ‘कल्चरल हब’ के रूप में विकसित हो सकें। विशेषज्ञ सलाह के लिये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वरिष्ठ रंगकर्मियों को नियुक्त किया गया। सरकार द्वारा गठित समिति ने जयपुर का दौरा किया और उन्हें प्रमोद जैन द्वारा बनाया गया नक्शा दिखाया गया। उनके नक्शे को मंजूरी मिल गयी पर इस बीच योजना समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद केंद्र और राज्य, दोनों जगहों पर भाजपा की सरकार आयी और योजना को नये सिरे से प्रारंभ किया गया। इस योजना के तहत रिनोवेषन का 60 फीसदी खर्च केंद्र और 40 फीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। राजस्थान के संस्कृति मंत्रालय ने इस कार्य के लिये विषेशज्ञों और अधिकारियों की कोई स्थानीय समिति गठित नहीं की। राजस्थान आवास विकास इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा एक आर्किटेक्ट को काम पर नियुक्त किया गया। 

उन्होंने चार ऐसी एजेंन्सियों से आवेदन मंगाये, जिनमें से तीन भारत सरकार के आर्किटैक्ट अधिनियम 1972 के अधीन न तो आर्किटैक्ट कांउसिल के सदस्य हैं और न ही आर्किटैक्ट हैं। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आवेदनकर्ता को आर्किटैक्ट काउंसिल का सदस्य होना चाहिये और यदि कोई फर्म दो साझेदारों द्वारा चलायी जा रही हो तो दोनों साझेदारों को आर्किटैक्ट होना चाहिये। इस तरह नियुक्ति के मामले में प्रारंभ से ही गड़बड़ी देखी जा सकती है। साथ ही नये नक्शे को मंजूरी के लिये राष्ट्र के ीय नाट्य विद्यालय के समक्ष नहीं भेजा गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि रिनोवेशन का कार्य किसके आदेशअथवा दिशानिर्देशों के तहत प्रारंभ किया गया।  सबसे ज्यादा सदमे की बात तो यह है कि श्री अल्काजी द्वारा डिजाइन किये गये ओपन एयर थियेटर और इसके विशाल रंगमंच को मटियामेट कर दिया गया जो एक बड़ी सांस्कृतिक धरोहर थी। निर्माण कार्य अब जिस तरीके से किया जा रहा है उसमें रवीन्द्र मंच पर नाटकों की प्रस्तुति एक टेढ़ी खीर होगी।

जयपुर के कलाकारों-रंगकर्मियों की मांग 

1. निर्माण कार्य पर अविलंब रोक लगाई जाए। 

2. ऐसा आर्किटैक्ट जिसे थियेटर डिजाइन की कोई समझ न हो उसे तुरंत हटाया जाये। 

3. उक्त मनमानी, ध्वंस और सार्वजनिक धन की बर्बादी के लिये जिम्मेदारी तय करने हेतु एक समिति गठित की जाये और जो भी नुकसान हुआ हो उसकी क्षतिपूर्ति की जाये। 

4. जो कुछ भी मरम्मत का कार्य करना हो लोक निर्माण विभाग के तहत उनके अभियंताओं द्वारा कराया जाये और प्राचीन थियेटर की सेवाओं को बहाल किया जाये ताकि यहां पर रंगकर्म संभव हो सके और रंगमंच समाज की सेवा में प्रस्तुत रहे। 

5. रवीन्द्र मंच एक स्वतंत्र निकाय होना चाहिये। इसके लिये एक समिति गठित हो जिसका अध्यक्ष वरिश्ठ कलाकार हो और इसके सदस्य अन्य कलाकार और नामी आर्किटैक्ट हों। समिति को इस बात का अधिकार हो कि वह सभी कलात्मक गतिविधियों के साथ आवष्यक मरम्मत या सुधार कार्यों की देखरेख कर सके।

जयपुर के रवीन्द्र मंच का इतिहास 

जयपुर के रवीन्द्र मंच का खाका राजस्थान के लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता श्री परमानंद गजारिया ने तैयार किया था। इसका उद्घाटन 1963 में हुआ था। प्रस्ताव यह था कि इससे जुड़ी हुई इसकी अपनी एक रंगमंडली होगी पर प्रशासनकि अड़चनों की वजह से यह संभव नहीं हो सका। पहले यह शिक्षा विभाग के अधीन था, जिसका कलाकारों ने विरोध किया और मुख्यमंत्री सुखाड़िया साहब ने आदेश दिया कि इसे राजस्थान संगीत नाटक अकादमी को सौंप दिया जाये। तब यह एक स्वतंत्र निकाय बन गया था पर 1970 में श्री देवीलाल समर जब इसके अध्यक्ष बने तो उन्होंने इसे अपने पास रखने से इंकार कर दिया। नतीजतन, मंच को राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंन दिया गया। आगे चलकर एक सोसयटी का निर्माण किया गया और तब से रवीन्द्र मंच इस सोसायटी के अधीन है। पहले माध्यमिक शिक्षा स्कूलों के अध्यापकों को इसका अध्यक्ष बनाया जाता था। आगे चलकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधिकारी इसके प्रबंधक बनने लगे और कभी भी ऐसे लोग यहाँ पर नहीं आ सके जो थियेटर को जानते-समझते हों। इस मंच के साथ इरफान खान, ओम शिवपुरी, इला अरूण और भानू भारती जैसे कलाकार-निर्देषक विभिन्न रूपों में जुड़े रहे।

‘इप्टानामा’ से साभार

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