भास्कर छोड़ पत्रिका गए संतोष पांडेय

पानीपत : यहां भास्कर में कार्यरत संतोष पांडेय ने अखबार छोड़ दिया है। अब वह राजस्थान पत्रिका, जयपुर के साथ अपना आगे का कार्यकाल शुरू करने जा रहे हैं। वह इससे पूर्व सतना, वाराणसी, देहरादून, लखनऊ में मीडिया के साथ जुड़े रहे हैं।

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जयपुर भास्कर कर्मियों का श्रम विभाग पर दबाव बरकरार, लेबर इंस्पेक्टर की लीपापोती की कमिश्नर से शिकायत

सुप्रीम कोर्ट के आदेश अनुसार मजीठिया की जाँच में जयपुर लेबर इंस्पेक्टर द्वारा चल रही लीपा पोती और खानापूरी के संदर्भ में जयपुर भास्कर की टीम ने जॉइंट लेबर कमिश्नर को अपनी शिकायत देकर मैनजमेंट के खिलाफ अपना दबाव बरकरार रखा है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि हर मीडिया कर्मी को उसका हिस्सा मिले। जो बुरा करे, उसके साथ बुरा हो और अच्छे के साथ बहुत अच्छा, ये भी ईश्वर का नियम है। शिकयत संलग्न है –

देखना है, श्रम मंत्रालय से इस संदर्भ में क्या पहल या कार्यवाही होती है वर्ना सुप्रीम कोर्ट में श्रम मंत्रालय को अपनी गलत रिपोर्ट पर फटकार जरूर लगेगी। देश के मीडिया हाउसों के ज्यादातर कर्मचारियों की उम्मीद सुप्रीम कोर्ट पर टीकी हुई है, क्योंकि सिस्टम इतना भ्रष्ट हो चुका है कि दूसरी जगह से न्याय पाना मुश्किल हो गया है।

आलोक के एफबी वाल से

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अखबार मालिकों की गोद में बैठे श्रम इंस्पेक्टरों की आयुक्त से शिकायत

जयपुर : दैनिक भास्कर जयपुर में मैनेजमेंट के सामने बैठ कर जाँच के नाम पर लीपापोती करने वाले लेबर इंस्पेक्टरों के खिलाफ शिकायत दर्ज करायी गई है। 

सोमवार को एडिशनल लेबर कमिश्नर सीबीएस राठौड़  के सामने लेबर इंस्पेक्टरों के खिलाफ ही शिकायत दर्ज कराई गई। लेबर इंस्पेक्टरों ने शनिवार को दैनिक भास्कर में जाकर मैनेजमेंट के सामने बैठ कर एम्प्लॉईज से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार सैलरी नहीं मिलने की रैंडम जाँच की थी। उनसे 20-जे प्रपत्र के हस्ताक्षरित पेपर मांगे गए। 

मैनेजमेंट के चमचों ने उन्हें कहा कि उन्हे मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार सैलरी नहीं चाहिए। कुछ साथियों ने दबी जुबान से इसका विरोध भी किया। बाद में मैनेजमेंट इन लेबर इंस्पेक्टरों को एक होटल में ले गया, जहां उन्हें उपकृत किया गया। यहाँ सारी जानकारी  राठौड़ को लिखित में दी गई तो उन्होंने इसकी जाँच कराने का आश्वासन दिया। कुछ साथियों ने इसकी सीडी बनाने की जानकारी cbs राठोड़  को दी तो उन्होंने सीडी भी मांग ली है।

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रवीन्द्र भवन : कलाओं का ध्वंस जारी, बर्बाद करने के लिए आधारभूत ढाँचों पर चोट

जयपुर : सरकार ने जब पुणे के फिल्म संस्थान को बर्बाद करने के लिये अपने महान योद्धा को मोर्चे पर भेज रखा है तो वह रंगमंच को बख्श देने की दरियादिली की जेहमत भला क्यों उठाने लगी? फर्क सिर्फ इतना है कि फिल्म के मोर्चे पर जहाँ ‘धर्मराज युधिष्ठिर’ को तैनात किया गया है, वहीं रंगमंच पर प्रहार करने के लिये कौरवों की सेना तैयार की गयी है जो ठेकेदार के भेस में आकर रवीन्द्र-मंच पर प्रहार करने में लगे हैं। 

सरकार दरअसल कला-संस्कृति को भगवा वस्त्र नहीं पहनाना चाहती, बल्कि उसे पूरी तरह से नंगा कर देना चाहती है ताकि वह बेआबरू होकर डूब मरे और उसके स्थान पर उनकी विचारधारा का परचम लहराया जा सके। वह कला और संस्कृति से जुड़े संस्थानों को ही बर्बाद नहीं कर रही है वरन् उनके आधारभूत ढाँचों पर भी चोट करने में लगी हुई है, ताकि बांस के अभाव में बंशी-वादन की कोई गुंजाइश न रहे। यह बात दीगर है कि हिंदुस्तान में चल रहे रंगकर्म के बड़े हिस्से को रंगमंच की कोई दरकार ही नहीं है पर सरकार अपनी ओर से इनकी जड़ों में मट्ठा डालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती।

ताजा मामला जयपुर के रवीन्द्र भवन का है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जयपुर में इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रणबीर सिंह ने  सत्र न्यायालय में स्थानीय रवींद्र में चल रहे पुनर्निमाण कार्य के विरूद्ध याचिका लगायी है और उनसे फोन पर मिली जानकारी के अनुसार कोर्ट ने अगली सुनवाई तक निर्माण कार्य को स्थगित रखने के लिये अंतरिम स्थगन आदेश जारी कर दिया है। न्यायालय के समक्ष दायर याचिका में श्री रणबीर सिंह ने आरोप लगाया है कि रवीन्द्र मंच के पुनर्निमाण का कार्य जिन हाथों को मंच के प्राधिकारियों ने सौंपा है, उनके पास थियेटर डिजाइन की कोई पृष्ठभूमि अथवा अनुभव नहीं है। यहाँ तक कि नये डिजाइन में लाइट और साउंड सिस्टम के लिये कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है। इतना ही नहीं,  ग्रीन रूम का जो प्लान नये नक्शे में तैयार किया गया है उसमें कलाकार के मंच तक सीधे पहुँचने की कोई व्यवस्था नहीं रखी गयी है।

गौरतलब है कि पुनर्निमाण का यह कार्य गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगौर की 150 वीं जयंती के मौके पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की सहायता परियोजना के तहत चलाया जा रहा है, लेकिन रिनोवेशन के नाम पर नियमों का उलंघन तथा उसके मूल स्वरूप से छेड़छाड़ की जा रही है। नये थियेटर के निर्माण में तकनीकी खामियां हैं। इस पूरे रिनोवेशन कार्य में आर्कीटेक्ट नियमों का उलंघन किया गया है। रवीन्द्र मंच के रिनोवेशन एवं नये प्रेक्षागृह के निर्माण में भारत सरकार द्वारा एक कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने जो नक्शा अप्रूब्ड किया था उसे दर किनार कर रिनोवेशन का कार्य किया जा रहा है। टेण्डर प्रणाली भी शक के घेरे में है। वर्षों पुराने इस इस कल्चरल हब के मूल स्वरूप को -जो कि यहाँ की सांस्कृतिक विरासत और धरोहर है – तहस नहस किया जा चुका है।

जयपुर के रंगकर्मियों का आरोप है कि उक्त संबंध में कुछ भी पूछने पर प्रशासन द्वारा कोई भी जानकारी नहीं दी जा रही है, जिसे लेकर शहर के समस्त कलाकारों में रोश व्याप्त है। उनके साथ नगर के साहित्यकार, नाटककार, लेखक, पत्रकार, एवं बुद्धिजीवी भी शामिल हैं। उधर इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार रवीन्द्र मंच के प्रबंधक का कहना है कि निर्माण कार्य पूरी तरह से परियोजना के नियमों के तहत हो रहा है इसलिये एकतरफा कार्रवाई जैसी कोई बात नहीं है।

रवीन्द्र मंच की पृष्ठभूमि 

रवीन्द्र मंच की परिकल्पना देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की थी। पंडित नेहरू और तत्कालीन संस्कृति मंत्री हुमायूँ कबीर ने सभी राज्यों की राजधानी में रवीन्द्र मंच का खाका तैयार किया था। इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि प्रत्येक रवीन्द्र मंच के पास अपनी एक व्यावसायिक रंगमंडली हो जो निरंतर और नियमित रूप से नाटकों का प्रदर्शन कर सके।

जयपुर के रवीन्द्र मंच की मौजूदा कहानी 

यूपीए सरकार के दौरान एक योजना बनायी गयी थी कि सभी राज्यों में आधुनिक सुविधाओं के साथ सभी रवीन्द्र मंच का पुनर्निर्माण किया जाये ताकि वे सांस्कृतिक केंद्रों या ‘कल्चरल हब’ के रूप में विकसित हो सकें। विशेषज्ञ सलाह के लिये राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के वरिष्ठ रंगकर्मियों को नियुक्त किया गया। सरकार द्वारा गठित समिति ने जयपुर का दौरा किया और उन्हें प्रमोद जैन द्वारा बनाया गया नक्शा दिखाया गया। उनके नक्शे को मंजूरी मिल गयी पर इस बीच योजना समाप्त हो चुकी थी। इसके बाद केंद्र और राज्य, दोनों जगहों पर भाजपा की सरकार आयी और योजना को नये सिरे से प्रारंभ किया गया। इस योजना के तहत रिनोवेषन का 60 फीसदी खर्च केंद्र और 40 फीसदी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। राजस्थान के संस्कृति मंत्रालय ने इस कार्य के लिये विषेशज्ञों और अधिकारियों की कोई स्थानीय समिति गठित नहीं की। राजस्थान आवास विकास इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड द्वारा एक आर्किटेक्ट को काम पर नियुक्त किया गया। 

उन्होंने चार ऐसी एजेंन्सियों से आवेदन मंगाये, जिनमें से तीन भारत सरकार के आर्किटैक्ट अधिनियम 1972 के अधीन न तो आर्किटैक्ट कांउसिल के सदस्य हैं और न ही आर्किटैक्ट हैं। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि आवेदनकर्ता को आर्किटैक्ट काउंसिल का सदस्य होना चाहिये और यदि कोई फर्म दो साझेदारों द्वारा चलायी जा रही हो तो दोनों साझेदारों को आर्किटैक्ट होना चाहिये। इस तरह नियुक्ति के मामले में प्रारंभ से ही गड़बड़ी देखी जा सकती है। साथ ही नये नक्शे को मंजूरी के लिये राष्ट्र के ीय नाट्य विद्यालय के समक्ष नहीं भेजा गया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि रिनोवेशन का कार्य किसके आदेशअथवा दिशानिर्देशों के तहत प्रारंभ किया गया।  सबसे ज्यादा सदमे की बात तो यह है कि श्री अल्काजी द्वारा डिजाइन किये गये ओपन एयर थियेटर और इसके विशाल रंगमंच को मटियामेट कर दिया गया जो एक बड़ी सांस्कृतिक धरोहर थी। निर्माण कार्य अब जिस तरीके से किया जा रहा है उसमें रवीन्द्र मंच पर नाटकों की प्रस्तुति एक टेढ़ी खीर होगी।

जयपुर के कलाकारों-रंगकर्मियों की मांग 

1. निर्माण कार्य पर अविलंब रोक लगाई जाए। 

2. ऐसा आर्किटैक्ट जिसे थियेटर डिजाइन की कोई समझ न हो उसे तुरंत हटाया जाये। 

3. उक्त मनमानी, ध्वंस और सार्वजनिक धन की बर्बादी के लिये जिम्मेदारी तय करने हेतु एक समिति गठित की जाये और जो भी नुकसान हुआ हो उसकी क्षतिपूर्ति की जाये। 

4. जो कुछ भी मरम्मत का कार्य करना हो लोक निर्माण विभाग के तहत उनके अभियंताओं द्वारा कराया जाये और प्राचीन थियेटर की सेवाओं को बहाल किया जाये ताकि यहां पर रंगकर्म संभव हो सके और रंगमंच समाज की सेवा में प्रस्तुत रहे। 

5. रवीन्द्र मंच एक स्वतंत्र निकाय होना चाहिये। इसके लिये एक समिति गठित हो जिसका अध्यक्ष वरिश्ठ कलाकार हो और इसके सदस्य अन्य कलाकार और नामी आर्किटैक्ट हों। समिति को इस बात का अधिकार हो कि वह सभी कलात्मक गतिविधियों के साथ आवष्यक मरम्मत या सुधार कार्यों की देखरेख कर सके।

जयपुर के रवीन्द्र मंच का इतिहास 

जयपुर के रवीन्द्र मंच का खाका राजस्थान के लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता श्री परमानंद गजारिया ने तैयार किया था। इसका उद्घाटन 1963 में हुआ था। प्रस्ताव यह था कि इससे जुड़ी हुई इसकी अपनी एक रंगमंडली होगी पर प्रशासनकि अड़चनों की वजह से यह संभव नहीं हो सका। पहले यह शिक्षा विभाग के अधीन था, जिसका कलाकारों ने विरोध किया और मुख्यमंत्री सुखाड़िया साहब ने आदेश दिया कि इसे राजस्थान संगीत नाटक अकादमी को सौंप दिया जाये। तब यह एक स्वतंत्र निकाय बन गया था पर 1970 में श्री देवीलाल समर जब इसके अध्यक्ष बने तो उन्होंने इसे अपने पास रखने से इंकार कर दिया। नतीजतन, मंच को राजस्थान ललित कला अकादमी को सौंन दिया गया। आगे चलकर एक सोसयटी का निर्माण किया गया और तब से रवीन्द्र मंच इस सोसायटी के अधीन है। पहले माध्यमिक शिक्षा स्कूलों के अध्यापकों को इसका अध्यक्ष बनाया जाता था। आगे चलकर राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के अधिकारी इसके प्रबंधक बनने लगे और कभी भी ऐसे लोग यहाँ पर नहीं आ सके जो थियेटर को जानते-समझते हों। इस मंच के साथ इरफान खान, ओम शिवपुरी, इला अरूण और भानू भारती जैसे कलाकार-निर्देषक विभिन्न रूपों में जुड़े रहे।

‘इप्टानामा’ से साभार

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भास्कर के सताए हुए और श्रम विभाग से निराश नरेंद्र सर्वोदयी पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

भास्कर प्रबंधन से परेशान नरेंद्र सर्वोदयी ने भड़सा4मीडिया को लिखे पत्र में बताया है कि किस तरह से भास्कर प्रबंधन ने उन्हें मजीठिया वेतनमान न देने के उद्देश्य से भारत की सीमा पर बाड़मेर कर दिया। उन्होंने अखबार प्रबंधन की तानाशाही और आपबीती इस प्रकार बयान की है – 

” सर, मैंने दैनिक भास्कर में 17 साल संपादकीय विभाग में काम किया। मजीठिया के डर से ही मेरा व तीन अन्य साथियों का तबादला सितंबर 2013 में भारत की सीमा पर बाड़मेर कर दिया गया। मजबूरन मुझे दैनिक भास्कर छोडना पड़ा। मैं कोऑर्डिनेटर के पद पर कार्यरत था । मेरा दो वर्ष का मजीठिया के अनुसार कोऑर्डिनेटर पद का एरियर, साथ ही 2008 से तीस प्रतिशत अंतरिम राहत का एरियर बनता है। इसके अलावा मुझे पीएफ विभाग से मिलने वाली मात्र 1100 रुपए की पेंशन भी मजीठिया की सेलरी मिलने पर प्रभावित होगी। 

” मैंने एरियर व अन्य लाभों के लिए कई बार दैनिक भास्कर मैनेजमेंट को लिखा। दिल्ली एवं जयपुर में लैबर डिपार्टमेंट को लिखा लेकिन दैनिक भास्कर मैनेजमेंट जवाब नहीं दे रहा है। लेबर विभाग ने मेरी शिकायत पर नोटिस भी जारी किया है लेकिन उसका भी जवाब नहीं दिया गया है। नोटिस की प्रति अटैच है। 

” तंग आकर मैंने भी सुप्रीम कोर्ट में दैनिक भास्कर के खिलाफ अवमानना का मामला दायर कर रखा है। लेबर डिपार्टमेंट का क्या इतना सा ही काम है कि वो नोटिस जारी कर दे। जब भास्कर उसके नोटिस का जवाब नहीं दे रहा है तो उसे क्या कदम उठाने चाहिए? साथ ही क्या वो सुप्रीम कोर्ट को भी इसकी रिपोर्ट भेजेगा? कृपया मार्ग दर्शन करें….नरेन्द्र सर्वोदयी, जयपुर।”

नरेंद्र सर्वोदयी से संपर्क : narendra.sarvoday@gmail.com

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जयपुर भास्कर ने संजय सैनी का जवाबी पत्र लेने से किया इनकार

जयपुर भास्कर प्रबंधन अब अपने पत्रों का जवाब स्वीकार करने से मना कर रहा है। इस कड़ी में वरिष्ठ पत्रकार संजय सैनी की ओर से 17 मई का भेजा हुआ जवाबी पत्र भास्कर प्रबंधन ने स्वीकार नहीं किया है। सैनी ने भास्कर जयपुर की एचआर हेड वंदना सिन्हा को पत्र भेज कर 21 मई तक रांची ज्वाइन करने की चेतावनी भरे पत्र का कड़ा जवाब दिया था। उन्होंने अपने डेपुटेशन को अवैध व गैरकानूनी बताते हुए आदेश को भास्कर प्रबंधन की दुर्भावनावश की गई हरकत करार दिया था। सैनी ने यह जवाबी पत्र स्पीड पोस्ट से भिजवाया था लेकिन वंदना सिन्हा ने इसे रिफ्यूज कहते हुए लेने से मना कर दिया। सैनी को जब यह पत्र मिला तो उन्होंने बाकायदा ई-मेल कर भास्कर प्रबंधन की इस हरकत की जानकारी सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भी दे दी है। 

सैनी को भास्कर प्रबंधन का 6 मई का पत्र 15 मई 2015 को मिला। सैनी ने दैनिक भास्कर राजस्थान, जयपुर की एचआर हैड वंदना सिन्हा को लिखा कि कंपनी प्रबंधन की ओर से प्रार्थी कामगार पर अनर्गल आरोप लगाते हुए एक रजिस्टर्ड पत्र 6 मई को उसके निवास स्थान पर भेजा था जो 15 मई को मिला है। प्रार्थी कामगार ने इस पत्र का जवाब 17 मई को आपको व दैनिक भास्कर के राज्य संपादक व नेशनल सेटेलाइट एडीटर ओम गौड को ई-मेल पर दे दिया था। साथ ही इस पत्र का स्पीड पोस्ट से जवाबी पत्र भेजा गया था।

उन्होंने लिखा कि बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है, कंपनी की जिम्मेदार अधिकारी होते हुए भी आपने इस पत्र को लेने से मना कर दिया। इससे साफ तौर पर जाहिर होता है कि आप प्रार्थी के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई षड्यंत्र कर रही हैं। प्रार्थी को आशंका है कि कंपनी प्रबंधन जवाबी पत्र नहीं मिलने की आड़ लेकर प्रार्थी के खिलाफ दुर्भावनावश कोई कार्रवाई करना चाहता है। इसका उदाहरण मेरा जवाबी पत्र लेने से मना किया जाना है।  यह जवाबी पत्र मुझे 26 मई को वापस मिला है।

कंपनी प्रबंधन को उन्होंने यह भी बताया कि सर्वोच्च न्यायालय अपने कई फैसलों में यह कह चुका है कि न्यायालय में विवादित मामलों में यदि कोई जिम्मेदार अधिकारी, कंपनी या जिसके नाम पत्र लिखा गया है, वह पत्र को लेने से मना करता है तो वह पत्र स्वीकार ही माना जाएगा।  ऐसे में कंपनी प्रबंधन कोई कार्रवाई करता है तो वह कार्रवाई अवैध मानी जाएगी। 

सैनी ने वंदना सिन्हा को 17 मई 2015 को लिखा कि उसकी ओर से 1 जनवरी 2015 को मजीठिया वेज बोर्ड लागू करने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना का केस करने के बाद कंपनी प्रबंधन की ओर से लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है। उस पर केस वापस लेने के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उसके केस वापस लेने से मना करने के बाद दुर्भावनावश और अवैधानिक तरीके से उसका डेपुटेशन रांची किया गया है। इसका उदाहरण नेशनल सेटेलाइट एडीटर ओम गौड़ का 3 मार्च का कथन है कि-‘तुमने कंपनी के खिलाफ केस करके गलती की है। तुमने कंपनी की पॉलिसी के खिलाफ जाकर काम किया है। इस कारण तुम्हारा डेपुटेशन किया गया है।’ इसके बाद 3 मार्च को ही स्टेट एडीटर लक्ष्मीप्रसाद पंत का कथन कि ‘तुमने केस वापस नहीं लिया तो तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जेल भेज देंगे। तुमने कंपनी के खिलाफ केस किया है तो इसके नतीजे भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा।’  

उन्होंने अपने जवाबी पत्र में लिखित रूप से यह भी बताया है कि इससे पूर्व एच.आर. मैनेजर जोगेन्दर सिंह और सिटी प्रभारी सतीश कुमार सिंह ने 25 फरवरी को दिन में 12 बजे एक कमरे में उसे बुला कर कुछ कागजों पर उसके जबरन हस्ताक्षर करवा लिए। केस वापस लेने के लिए शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कराने की कोशिश की। इन तमाम सबूतों की वीडियो रिकार्डिंग और तथ्यों के आधार पर प्रार्थी कामगार ने अपने डेपुटेशन आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है। हालांकि इस पर आदेश अभी नहीं हुए हैं पर यह मामला अब  सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। ऐसे में कंपनी प्रबंधन की ओर से बार-बार डेपुटेशन पर जाने के आदेश देना, नहीं जाने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की धमकी देना अवमानना के स्तर को और भी बढ़ाता है।  ऐसे में प्रार्थी कंपनी प्रबंधन पर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई कर सकता है।

उन्होंने भास्कर प्रबंधन को बताया कि अपनी बीमारी के दौरान सरकारी डॉक्टर से 27 मार्च 15 तक का मेडिकल अवकाश दे चुका था। उसके बाद भी कंपनी प्रंबधन ने अपने पैनल के डाक्टर के साथ मिल कर मेडिकल चैकअप के बहाने प्रार्थी कामगार की बीमारी में भी उसके जीवन से खिलवाड़ करने और जीवन को नुकसान पहुंचाने का षड्यंत्र किया।  इससे प्रार्थी डर गया कि कंपनी प्रबंधन मैनेज करके प्रार्थी और उसके परिवार को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई भी एक्सीडेंट करा सकता है। इससे प्रार्थी मानसिक अवसाद में आ गया। प्रार्थी ने अपने मनोचिकित्सक डा. तुषार जगावत की मेडिकल उपचार की पर्ची 28 मार्च 15 को ही मेल कर दी थी। ऐसी स्थिति में प्रार्थी को अपने और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए मुख्यमंत्री राजस्थान सरकार, राज्य मानवाधिकार से गुहार करनी पड़ी। प्रार्थी कामगार के नियुक्ति पत्र (19 अगस्त 2004) के अनुसार प्रार्थी की नियुक्ति जयपुर में हुई थी। प्रार्थी के नियुक्ति आदेश में जयपुर से बाहर तबादला करने/डेपुटेशन पर भेजने संबंधी भेजने का कोई ब्यौरा नहीं है। ऐसे में प्रार्थी कामगार को तीन महीने के लंबे समय से जयपुर से बाहर नहीं भेजा जा सकता।

दैनिक भास्कर प्रबंधन ने आज तक स्थाई आदेश जारी नहीं किए जो औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश )अधिनियम 1946 के तहत जरूरी है। ऐसे में कंपनी प्रबंधन पर राज्य सरकार के आदर्श स्थायी आदेश लागू होते हैं। इन आदेशों के तहत कंपनी प्रबंधन किसी भी कर्मचारी को दूसरे राज्य में डेपुटेशन पर भेजने के लिए कर्मचारी की सहमति लेना आवश्यक है। जो प्रार्थी कामगार से नहीं ली गई। ऐसे में प्रार्थी के डेपुटेशन आदेश अवैध और गैरकानूनी है। इसे निरस्त किया जाए।

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मजीठिया वेतनमान : राजस्थान के श्रममंत्री ने दिए इंस्पेक्टर की नियुक्ति के आदेश

जयपुर में गुरुवार को मजीठिया वेज बोर्ड इम्प्लीमेंटेशन संघर्ष समिति की ओर से राजस्थान के श्रममंत्री सुरेंद्रपाल सिंह टीटी को ज्ञापन दिया गया। उनको सुप्रीम कोर्ट के 28 अप्रैल को दिए गए आर्डर की कॉपी भी दी गई। साथ ही उनसे मांग की गई की कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार इंस्पेक्टर की नियुक्ति की जाए, जो सभी अखबारों की जाँच करे कि उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अपने वर्कर / पत्रकारकर्मियों को बढ़ा हुआ वेतन दिया अथवा नहीं। 

राजस्थान के श्रममंत्री सुरेंद्रपाल सिंह टीटी को ज्ञापन देते दैनिक भास्कर के वरिष्ठं पत्रकार संजय सैनी, पत्रिका के राकेश शर्मा अमित मिश्रा, व उनके साथी 

श्रममंत्री ने तुरंत श्रम सचिव रजतकुमार को निर्देश दिए कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना की जाये और जल्दी से जल्दी इंस्पेक्टर की नियुक्ति की जाये। साथ ही अखबार मालिकों की ओर से पत्रकारों को दी जा रही प्रताड़ना को बंद कराएं। ज्ञापन देने वालो में दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका के 100 पत्रकार-गैर पत्रकार थे। इनमें भास्कर की तरफ से संजय सैनी व उनके साथी पत्रिका की तरफ से अमित मिश्रा, राकेश वर्मा, विनोद पाठक, राकेश शर्मा और उनके साथी थे। 

श्रममंत्री ने पत्रकारों की बातों को ध्यान से सुना और उन्हें आश्वस्त किया कि सरकार अखबार मालिकों के दबाव में नहीं आएगी और सुप्रीम कोर्ट में सही रिपोर्ट भिजवाएगी। इस बीच दैनिक भास्कर जयपुर में कोर्ट के आदेश के बचाव की तैयारी शुरू हो गई है। भास्कर ने अपने सभी वर्कर्स को सालाना इन्क्रीमेंट देने का लॉलीपॉप दे दिया है, जिससे कोई भी कर्मचारी खिलाफ बयान या शपथपत्र नहीं दे. जयपुर में अगस्त में कर्मचारियों से जबरन साइन कराए  गए 20-जे के फॉर्मों को स्कैन करना भी शुरू कर दिया गया है। 

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ओछी हरकतों पर उतरा जयपुर भास्कर प्रबंधन

श्रम विभाग में सुनवाई के दौरान शुक्रवार को जयपुर भास्कर प्रबंधन के कर्मचारी ओछी हरकतों पर उत्तर आए। भास्कर के पत्रकारों ने सीटू के सचिव जयपुर भास्कर के सीओओ संजय शर्मा ओर एच आर मैनेजर वंदना सिन्हा के खिलाफ प्रताड़ना और दुर्भावना से कार्रवाई करने पर केस कर रखा है। इस केस में श्रम विभाग ने सीओओ संजय शर्मा ओर एच आर मैनेजर वंदना सिन्हा को नोटिस जारी कर रखे है जिसकी शुक्रवार को तारीख थी। 

सीओओ और एच आर मैनेजर जेल जाने से बचने और अपनी गलतियों को छिपाने के लिए अब डराने और धमकाने की कोशिश में लग गया है। भास्कर के लीगल ऑफिसर सुमित व्यास के साथ शुक्रवार को दादागरी करने के लिए उसने अपने खास चमचे को भेजा। सीओओ के सामने अपने नम्बर बढ़ाने के लिए उसने आते ही इस चमचे ने बदतमीजी शुरू कर दी। उसने धमकाया की या तो वे इस केस को वापस ले ले या फिर सीओओ को जेल जाने से बचाने के लिए उन्हें जवाब लेने के लिए लम्बी तारीख लेने दे।

उसने श्रम विभाग के ऑफिस में माहौल ख़राब करने की कोशिश की पर भास्कर के पत्रकार उसकी नीयत जान गए थे। उन्होंने शान्ति बनाये रखी। भास्कर प्रबंधन के इन दोनों सेवको को तारीख लेने की इतनी जल्दी थी कि वे शनिवार 30  मई को अवकाश के दिन की ही तारीख ले गए।

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मीडिया की मंडी में हमारे लिए अब जयपुर के वे दिन सपने जैसे

ये मार्च या अप्रैल 1990 था,जब मैं जयपुर दूरदर्शन समाचार विभाग से नियमित जुड़ा था।एक कैजुअल सब एडिटर कम ट्रांसलेटर के रूप में……हर महीने दस दिन की बुकिंग मिलती थी….उससे एक मुश्त कमरे का किराया और भोजन सहित छोटा-मोटा खर्च निकल जाता था,ये बहुत बड़ा सहारा था।साथ ही यह उम्मीद भी, कि कभी मौका लगा तो दूरदर्शन में स्थायी हो जाएंगें।तब किसी ने मार्गदर्शन नहीं दिया था,कि समाचार विभाग में सरकार कभी एडिटर या सब एडिटर की पोस्ट नहीं निकालेगी।खैर ये तो लंबे समय तक धक्के खा कर खुद ही समझना पड़ा।समाचार संपादक एम आर सिंघवी ने मुझमें विश्वास जताया और न्यूज रूम में हर तरह के असाइनमेंट करने का मौका दिया।

इससे नए तरह का काम भी सीखा और आत्मविश्वास भी बढ़ा। साथ ही जीवन की गति वापस आर्थिक पटरी पर आ गई।न्यूज रूम में उन दिनों अजय चतुर्वेदी और हरीश करमचंदानी भी थे,बाद में अजंता देव,प्रेम भारती,रतन सिंह,प्रज्ञा पालीवाल गौड,ओ पी मीणा,भरतलाल मीणा और धर्मेश भारती के साथ भी काम किया…पर सबसे ज्यादा सीखा अजयजी और प्रज्ञाजी से।न्यूज रूम से जुड़े होने के कारण तकनीक और समाचारों में होने वाले परिवर्तनों को और उनको लेकर चलने वाली पॉलटिक्स को भी समझा।

जब मैं जयपुर दूरदर्शन से नियमित जुड़ा था… तब वह दूरदर्शन का स्वर्णयुग था….मोनोपॉली ब्रॉडकास्टर होने के बावजूद कार्यक्रमों में विविधता और गुणवत्ता के कारण दूरदर्शन का वह काल आज भी दर्शक याद करते हैं।जयपुर में उस समय अनुभवी प्रोड्यूसरों और उत्साही सहयोगियों की मिश्रित टीम थी।

वरिष्ठ फिल्म समीक्षक नेत्रसिंह रावत ने यहां कई अच्छी डॉक्यूमेंट्रियां बनाईं।रामेंद्र सरीन ने चर्चित सीरियल दायरे बनाया।इसके अलावा भी गुलशन सचदेव,अशोक गुप्ता,रूप स्पार्क जैसे प्रतिभाशाली प्रोड्यूसर भी यहां रहे।तो बाद में नंद भारद्वाज,राजेन्द्र बोहरा,कृष्ण कल्पित,आनंद स्याल,राधेश्याम तिवारी और चंद्रकांत वर्ठे जैसे साहित्यप्रेमी प्रोड्यूसर भी।युवाओं की टीम भी कोई कमजोर नहीं रही…..एबीपी के विजय विद्रोही और न्यूज नेशन के संजय कुलश्रेष्ठ ने भी अपना कैरियर यहीं से शुरु किया था….कुल मिलाकर वो जयपुर दूरदर्शन का शैशवकाल था पर यहां युवा टीम थी ….उत्साह और रचनात्मकता का माहौल था…जो अब सिर्फ स्वप्न लगता है।

जयपुर दूरदर्शन से जुड़ने के बाद भी फ्रीलांसिंग जारी थी…….’माया’ में नियमित लेखन भी। फरवरी 1992 में माया का नियमित संवाददाता बन गया……पत्रकार ओम सैनी ब्यूरो चीफ थे, श्रीपाल शक्तावत साथ में संवाददाता थे और प्रताप सिंह बतौर फोटोग्राफर टीम का हिस्सा थे। माया के ब्यूरो में पूरा पारिवारिक माहौल था। माया ज्वाइन करते समय ही मैंने ओमजी को स्पष्ट कर दिया था कि दूरदर्शन की बुकिंग नहीं छोड़ूगा। वैसे भी मैगजीन का ब्यूरो अखबार जैसा नहीं रहता। कोई दबाव नहीं ….बस हर पखवाड़े एक स्टोरी करनी होती थी, जिसे हम आपस में मिल कर तय करके बांट लेते थे….ओमजी की रूचि राजनैतिक ज्यादा थी, इसलिए पॉलिटिकल स्टोरी उनके हिस्से और इंसिडेंटल या इन्वेस्टिगेटिव स्टोरियां मेरे और श्रीपालजी के हिस्से।

फार्मल इंट्रेक्शन के लिए सुबह- शाम निर्धारित समय पर ऑफिस में इकट्ठे होते….अखबार पढ़ते…चर्चाएं करते…चाय पीते और आवारागर्दी (आप खबरें ढ़ूढ़ना कहना चाहें तो कहें) करने निकल जाते…कोई तनाव नहीं, कोई दबाव नहीं। माया तब सबसे ज्यादा बिकने वाली पॉलिटिकल मैगजीन थी….उसमें छपी हर स्टोरी पर राजनैतिक गलियारों में तीव्र प्रतिक्रिया होती थी….तो निश्चय ही हमारी टीम उन प्रतिक्रियाओं का आनंद भी उठाती थी….और उत्साहित भी होती थी। राजस्थान सरकार के नियमों के अनुसार मैगजीन के लिए एक जने का ही एक्रिडेशन किया जाता था….सो ओमजी का एक्रिडेशन हो गया…….बाद में ओमजी ने गली निकाल कर फोटोग्राफर के रूप में प्रतापसिंह का भी एक्रिडेशन करवा दिया..लेकिन हमारा एक्रिडेशन नहीं हो रहा था। इस पर एक दिन ओमजी ने प्रस्ताव रखा कि चूंकि मैगजीन के नाम पर एक जने का ही एक्रिडेशन हो सकता है, इसलिए हम मनोरमा और मनोहर कहानियां (दोनों माया के प्रकाशकों की ही लोकप्रिय पत्रिकाएं थीं) के संवाददाता के रूप में अपना एक्रिडेशन करवा लें….परंतु मैंने और श्रीपालजी ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया कि काम माया के लिए करें और एक्रिडेशन दूसरी पत्रिकाओं से करवाएं। क्योंकि एक्रिडेशन के बाद राज्य में बस की यात्रा फ्री हो जाती थी और पीडब्ल्यूडी के डाक बंगले में सस्ती दर पर ठहरने का प्रबंध हो जाता था। लेकिन इससे हमें क्या लाभ….इसमें तो मूलतः मैनेजमेंट का लाभ है….उसके पैसे बचेंगे..तो हम क्यों कष्ट पाएं और अपनी साख के साथ बईमानी करें।

धीरज कुलश्रेष्ठ के एफबी वॉल से

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भास्कर जयपुर के सीओओ संजय शर्मा को सताने लगा जेल जाने का डर

दैनिक भास्कर जयपुर के सीओओ संजय शर्मा को अब ये डर सताने लगा है कि अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट उन्हें भी कही जेल न भेज दे। 

सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मार्च में हुई सुनवाई में नोटिस जारी कर पूछा है कि अब तक मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों की पालना क्यों नहीं हुई। सीओओ संजय शर्मा को तो इस नोटिस के बारे में पता ही नहीं था। भड़ास में खबर आने के बाद उनके कान खड़े हुए क्योंकि जिस दैनिक भास्कर जयपुर के  सीओओ है उस कंपनी ने ही उन्हें इस बारे में नहीं बताया। 

सुना है की दैनिक भास्कर के मालिक जयपुर, राजस्थान,गुजरात (पूरा पश्चिम क्षेत्र ) की जिम्मेदारी उन्हें बताते हुए कंपनी अवमानना का ठीकरा उन्हीं पर फोड़ने वाले  है। जिस तरह राजस्थान पत्रिका के मालिको ने अपना बचाव करते हुए अपने निदेशक एचपी तिवारी को  अवमानना के लिए जिम्मेदार बताया है। वैसी ही आशंका जयपुर में भी है। इसी कारण कंपनी ने उन्हें नोटिस के बारे में नहीं बताया और अब उनकी तरफ से गुपचुप में जवाब दाखिल कर देगी।  ऐसे में वो जवाब भी नहीं दे पा रहे है। उन्होंने अपने बचाव के लिए खुद ही नोटिस  की तलाश शुरू कर दी है। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से नहीं बच पायेंगे भास्कर जयपुर के सीओओ संजय शर्मा

दैनिक भास्कर जयपुर के सीओओ संजय शर्मा भी सुप्रीम कोर्ट की अवमानना से नहीं बच पायेंगे। 

भास्कर के चेयरमैन रमेशचंद्र अग्रवाल और एमडी सुधीर अग्रवाल के साथ उन्हें भी पार्टी बनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें नोटिस जारी कर रखे हैं, जिसका जवाब उन्हें 28 अप्रैल तक  देना है। शर्मा इस मामले में अभी डीबी कॉर्प के वकीलों पर ही निर्भर हैं। शर्मा के साथ दैनिक भास्कर जयपुर की एचआर हेड वंदना सिन्हा को श्रम विभाग जयपुर ने 23 पत्रकारों को प्रताड़ित करने पर 1 मई को तलब कर रखा है।

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पत्रकारों का उत्पीड़न करने पर भास्कर जयपुर के सीओओ और एचआर हेड एक मई को तलब

जयपुर : पत्रकारों का उत्पीड़न करने पर दैनिक भास्कर के सीओओ संजय शर्मा और एच आर हेड वंदना सिन्हा को श्रम विभाग जयपुर ने कारण बताओ नोटिस जारी कर 1 मई को अपने यहां तलब किया है।

श्रम विभाग ने यह कार्रवाई सीटू के राज्य सचिव भंवर सिंह की याचिका पर की है। याचिका में बताया गया है कि  दैनिक भास्कर जयपुर में काम कर रहे 23 पत्रकारों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिेशों के अनुसार वेतन मांगने और इसके लिये सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने पर संस्थान से बाहर कर दिया। 21  पत्रकारों को निलम्बित कर दिया। दो पत्रकारों सुधीर कुमार शर्मा व संजय कुमार सैनी को उनकी बिना सहमति के डेपुटेशन पर गैरकानूनी तरीके से रांची भेजने का आदेश जारी कर दिया।

 याचिका में बताया गया है कि यह कार्रवाई औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 क़ी धारा 25 टी व अधिनियम की पांचवीं अनुसूचि के अनुछेद 1 व 7 के अनुसार अनुचित श्रम रीति में आता है। अतः दैनिक भास्कर जयपुर  के सीओओ संजय शर्मा  व एच आर हेड वंदना सिन्हा के खिलाफ अभियोजन की अनुमति प्रदान की जाए।  इस अधिनियम में दोषी पाए जाने पर दैनिक भास्कर जयपुर के दोनों अधिकारियों को 6-6 महीने की जेल हो सकती है।

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जयपुर में मीडिया सम्मेलन का समापन : सोशल मीडिया पर खबर लिखवाना भी सिखाएं पत्रकारिता संस्थान

जयपुर : न्यू मीडिया हमारे जैसे पत्रकारों के लिए चुनौती है, पत्रकारिता संस्थानों को ट्यूटर और फेसबुक पर खबर लिखवाना भी सिखाना चाहिए। चाहे ओसामा बिन लादेन के मरने की खबर हो, चाहे जापान में आई भारी सुनामी की खबर हो, ये सभी खबरें सबसे पहले सोशल मीडिया पर ही ब्रेक हुई थी। सोशल मीडिया से आज चुनाव तक जीते जा रहे हैं।’’ ये कहना था वरिष्ठ टीवी पत्रकार विजय विद्रोही का। वे आज राजस्थान विवि में आयोजित तीन दिवसीय ‘ अखिल भारतीय मीडिया शिक्षक सम्मेलन’ के समापन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।

जयपुर विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन के समापन सम्बोधन की एक झलक

विद्रोही ने कहा कि आज देश में पिछले आठ महीने से मुख्य सूचना आयुक्त नहीं है और प्रधानमंत्री सहित पूरी सरकार ये दावा करती है कि हम सूचना के अधिकार के पक्षधर हैं। आज खबर के लिए सिर्फ टीवी चैनल या अखबार ही स्त्रोत नहीं है। मोबाइल, टैबलेट पर खबर पढ़ना और शेयर करना नई पीढ़ी का शगल बन गया है। 

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए हरिदेव जोशी पत्रकारिता विवि के कुलपति सनी सबेस्टियन ने कहा कि पिछले दशक में मीडिया में काफी परिवर्तन आया है। साथ ही मीडिया शिक्षा की ओर भी रूझान बढ़ा है। अनेक विश्वविद्यालयों में इस पाठ्यक्रम को प्राथमिकता से देखा जा रहा है। उन्होंने ‘सूचना का अधिकार’ की शुरूआत और उससे जुड़े पत्रकारों को याद किया और कहा कि इस कानून का बनाने का गौरव राजस्थान को प्राप्त है। बकौल सबेस्टियन अगली बार ऐसी कांफ्रेस में मीडिया शिक्षा पर ज्यादा चर्चा होनी चाहिए, बजाय मीडिया के। 

इस मौके पर केंद्रीय सूचना आयुक्त प्रो. एम. श्रीधर आचार्युलू ने कहा कि हर संस्थान में मीडिया कानूनों पर अलग से एक पेपर होना चाहिए, साथ ही मीडिया कानूनों पर सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करना चाहिए। उन्होंने विभिन्न छोटे-छोटे आंदोलनों का उदाहरण देते हुए समझाया कि किस प्रकार मीडिया, कॉर्पोरेट घरानों से संचालित होने के बावजूद भी समाज को नई दिशा दे सकता है। उन्होंने कहा कि समाजिक सरोकारों के लिए सिर्फ मीडिया ही नहीं आम आदमी को भी सवाल उठाने का हक है। 

कार्यक्रम में एमिटी विवि, मुंबई के डीन प्रो. उज्जवल चैधरी ने कहा कि आज मीडिया डिग्रीयों के अलग-अलग हैं, जो देश भर के मीडिया शिक्षण पर सवाल उठाते हैं। उन्होंने कहा कि आज मीडिया शिक्षा और मीडिया उद्योग को करीब लाने की जरूरत है। मीडिया का शिक्षण बदल रही मीडिया प्रौद्योगिकी की संगति के साथ मेल करे और उनमें एक-दूसरे के क्षेत्रों में काम करने के अवसर उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। 

इस अवसर पर मणिपाल यूनिवर्सिटी के कुलपति संदीप संचेती ने कहा कि मीडिया शिक्षा की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए शिक्षण पद्धति और पाठ्यक्रम में अपेक्षित बदलाव की जरूरत है। 

यूनिसेफ के सलाहकार के बी कोठारी ने स्वयंसेवी संगठन और मीडिया की समाज में भूमिका पर बल देते हुए मीडिया शिक्षा में भी तालमेल होने की आवश्यकता जताई। 

समारोह के समापन पर देशभर से आए मीडिया शिक्षकों की मौजूदगी में जयपुर मीडिया संकल्प जारी किया गया। जिसमें मीडिया की तेज गति के कारण प्रभावित होने पर चर्चा करते हुए उसमें मूल्य चेतना की आवश्यकता जताई। साथ ही मीडिया शिक्षा में सैद्धांतिक और व्यवहारिक पक्षों पर बराबर ध्यान देने की जरूरत जताई। इसके अलावा मीडिया की सकारात्मक भूमिका और आज के दौर में मीडिया में आ रहे परिवर्तन पर सुझाव आमंत्रित किए गए हैं।

राजस्थान समाचार फेसबुक वॉल से

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मीडिया गुरुओं के सम्मेलन में दूसरे दिन पत्रकारिता की भाषा और भूमिका पर पढ़े गए शोधपत्र

जयपुर : मीडिया शिक्षकों के महाकुंभ के दूसरे दिन मणिपाल विवि में देश भर से आए मीडिया शिक्षक और रिसर्च स्कोलरों ने शोध पत्रों का वाचन किया। अधिकांश शोध पत्र पारंपरिक और सोशल मीडिया के सामाजिक प्रभाव, पत्रकारिता की भाषा, विज्ञापन, सिनेमा, न्यू मीडिया, वेब पत्रकारिता और संचार माध्यमों से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित रहे। तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता देश भर से आये मीडिया शिक्षकों ने की। प्रतिभागियों ने 180 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए और बदलते दौर में मीडिया की भूमिका को रेखांकित किया।

 

‘समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मीडिया की भूमिका-चुनौतियां और संभवनाएं’ विषय पर आयोजित तीन दिन के अखिल भारतीय मीडिया सम्मेलन के दूसरे दिन 12 तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रतिभागियों ने मीडिया से जुड़े अहम पहलुओं पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये और श्रोताओं के सवालों के जवाब दिये। मीडिया शिक्षकों के इस अखिल भारतीय सम्मेलन का आयोजन राजस्थान विश्वविद्यालय के जन संचार केन्द्र के रजत जयंती समारोह के क्रम में किया जा रहा है। सम्मेलन का आयोजन मणिपाल विश्वविद्यालय, जयपुर, स्वयंसेवी संगठन लोक संवाद तथा सोसायटी ऑफ मीडिया इनीशिएटिव फॉर वेल्यूज, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है।

सम्मेलन के अध्यक्ष प्रो. संजीव भानावत और संयोजक कल्याणसिंह कोठारी ने बताया कि सम्मेलन के दौरान शुक्रवार को विभिन्न तकनीकी सत्रों में 200 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गये। संयोजक कल्याणसिंह कोठारी ने  मणिपाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संदीप संचेती को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया। साथ ही इस अवसर पर मणिपाल विश्वविद्यालय जयपुर के डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज्म एंड मॉस कम्यूनिकेशन की और से निकाले जा रहे न्यूज लेटर एमयूजे टाईम्स का विमोचन भी एमयूजे के प्रेसिडेंट प्रो. संदीप संचेती, प्रो. कमल दिक्षित, प्रो. संजीव भानावत, प्रो. मृणाल चटर्जी, प्रो. उज्जवल चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार कल्याणसिंह कोठारी ने किया। इस मौके पर एमिटी विश्वविद्यालय, मुंबई के डीन प्रो. उज्ज्वल चौधरी ने समस्त प्रतिभागियों की तरफ से आयोजकों को बधाई दी और अगले अखिल भारतीय सम्मेलन की मेजबानी करने का प्रस्ताव भी रखा। इस अवसर पर सम्मेलन के अध्यक्ष प्रो. संजीव भानावत ने चुनीन्दा शोध पत्रों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने का आश्वासन दिया।

प्रो.भानावत ने बताया कि शनिवार को समापन समारोह के मुख्य वक्ता केन्द्रीय सूचना आयुक्त प्रो. एम. श्रीधर आचार्युलू होंगे। मणिपाल विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति प्रो. संदीप संचेती, एमिटी विश्वविद्यालय, मुंबई के डीन प्रो. उज्ज्वल चौधरी और यूनिसेफ के पूर्व सलाहकार प्रो. के.बी. कोठारी समापन समारोह के विशिष्ट अतिथि होंगे, जबकि हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जन संचार विश्वविद्यालय के कुलपति सनी सेबेस्टियन समारोह की अध्यक्षता करेंगे। एबीपी न्यूज के कार्यकारी सम्पादक विजय विद्रोही मुख्य अतिथि के तौर पर समारोह में शामिल होंगे।

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जयपुर में मीडिया महाकुंभ शुरू, पहले दिन गूंजी तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग

जयपुर : राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर में गुरुवार को मीडिया शिक्षकों का तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हो गया। इसमें बीस राज्यों के ढाई सौ से अधिक मीडिया गुरू समाज में सकारात्मक बदलाव और इसमें मीडिया की भूमिका पर विचार विमर्श करने के लिए जमा हुए हैं। सम्मेलन का उदघाटन माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति प्रो. बी के कुठियाला ने किया। सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने कहा कि पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं, वरन प्रमुख स्तंभ है। प्रो. कुठियाला ने तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग की। ब्रॉडकास्टर्स एडिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव एन.के. सिंह ने मीडिया के कामकाज में सरकारी दखल को गैर जरूरी करार दिया।

मंचासीन प्रो. सच्चिदानंद जोशी, एनबीटी चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा, वीसी प्रो. बीके कुठियाला, वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह, उमेश उपाध्याय, संजीव भानावत आदि 

 

दीप प्रज्ज्वलित कर तीन दिवसीय राष्ट्रीय मीडिया सम्मेलन का शुभारंभ करते मुख्य अतिथिगण 

‘समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मीडिया की भूमिका’ विषय पर आयोजित किए जा रहे, इस सम्मेलन में 18 से अधिक राज्यों के 250 से अधिक प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। मीडिया शिक्षकों के इस सम्मेलन का आयोजन राजस्थान विश्वविद्यालय के जनसंचार केन्द्र, मणिपाल विश्वविद्यालय, जयपुर, मीडिया एडवोकेसी, स्वयं सेवी संगठन लोक संवाद संस्थान और सोसायटी ऑफ मीडिया इनिशिएटिव फॉर वैल्यू, इंदौर के संयुक्त तत्वावधान में किया जा रहा है। 4 अप्रैल तक चलने वाले इस सम्मेलन में 20 राज्यों के करीब 250 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। सम्मेलन का आयोजन राजस्थान विवि के जनसंचार केंद्र के रजत जयंती वर्ष से जुड़े समारोह के क्रम में किया जा रहा है।

सम्मेलन के मुख्य अतिथि और नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बलदेव भाई शर्मा ने सत्य, धर्म और न्याय को समाज की बुनियाद बताया और कहा कि पत्रकारिता इस आधारभूत संरचना को कायम रखने का एक प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं वरन प्रमुख स्तंभ माना जाना चाहिए। उन्होंने पत्रकारिता में भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कारों को स्थान देने का आग्रह किया और सकारात्मक पहलुओं को शामिल करने पर जोर दिया। उन्होंने मीडिया की सामाजिक प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए ऊंचे जीवन मूल्यों को अपनाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मीडिया राष्ट्र के जीवन निर्माण का माध्यम है और बदलते दौर में में भी मीडिया को अपने दायित्व का प्रभावी तरीके से निभाना चाहिए। उन्होंने मीडिया शिक्षकों से अपील की कि वे नई पीढ़ी को मानवीय मूल्यों और संस्कारों की शिक्षा दें और अपने जीवन तथा आचरण में भी इन्हें उतारें।

हाल के दौर में मीडिया की दुनिया में आई गिरावट पर गहरी चिंता जताते हुए प्रो. कुठियाला ने कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव के साथ संवाद के स्वराज की जरूरत है। इंटरनेट के कारण आज समूचा विश्व एक व्यापक समाज में बदल गया है। तकनीक के इस नए दौर में हमें मीडिया शिक्षण में भी आवश्यक बदलाव करने होंगे। उन्होंने मीडिया के व्यावसायिक स्वरूप का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें तब तक कोई बुराई नहीं है, जब तक कि मीडिया अपने सामाजिक सराकारों को न छोड़े। उन्होंने तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग की और एक प्रभावी मीडिया काउंसिल बनाने की भी जरूरत परजोर दिया। 

सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि और नेटवर्क 18 के प्रेसीडेंट (न्यूज) उमेश उपाध्याय ने इस बात पर खुशी जताई कि आज मीडिया से भी सवाल पूछे जा रहे हैं, जो कि स्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक है। उन्होंने मीडिया शिक्षण और मीडिया के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई और मीडिया एजुकेशन को मीडिया के साथ जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि मीडिया के नए साधनों पर इस तरह की सामग्री शामिल की जानी चाहिए, जो लोगों की सामूहिक अवचेतना को बढ़ाए। 

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने मीडिया की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि मीडिया शिक्षण का दौर बेहद कठिन है और इसीलिए जय जरूरी है कि हम मीडिया से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करें। उन्होंने कहा कि अन्य शिक्षकों की तुलना में मीडिया शिक्षकों के सामने अधिक चुनौतियां हैं, क्योंकि उनके साथ समाज की अपेक्षाएं भी जुड़ी हैं। प्रो. जोशी ने मीडिया शिक्षकों से आग्रह किया कि वे एक मंच पर आएं और मीडिया शिक्षण को और बेहतर तथा प्रभावी बनाने का आग्रह भी किया और कहा कि मीडिया शिक्षकों के ऐसे अहम सम्मेलनों का आयोजन निमित्त तौर पर किया जाना चाहिए।

ब्रॉडकास्टर्स एडिटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव और वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह ने सामाजिक सरोकारों से मीडिया की बढ़ती दूरी पर गहरी चिंता व्यक्त की, लेकिन उन्होंने मीडिया के कामकाज में सरकारी दखल को गैर जरूरी ठहराया और कहा कि सत्ता का चरित्र प्रतिबंध में ही परिलक्षित होता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में मीडिया में वही सब कुछ नजर आ रहा है, जो समाज से घट रहा है। उन्होंने संपादक संस्था की गरिमा और प्रतिष्ठा को फिर से बहाल करने की अपील की और कहा कि कॉर्पोरेट दौर में मीडिया के सामने यह एक अहम चुनौती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संपादक की गरिमा बहाल होने के बाद समाज में भी व्यापक बदलाव नजर आ सकता है और इस तरह मीडिया समाज सुधार के लक्ष्य को हासिल कर सकता है। उन्होंने मीडिया शिक्षकों से अपील की कि वे विद्यार्थियों में बेहतर जीवन मूल्यों की समझ विकसित करें।

सम्मेलन के अध्यक्ष प्रो. डॉ. संजीव भानावत ने बताया कि इस आयोजन में उत्तर पूर्व और दक्षिण भारत के संस्थानों से जुड़े मीडिया शिक्षक भी शामिल हो रहे हैं और इससे यह उम्मीद बढ़ी है कि बदलाव की लहर बहुत दूर तक जाएगी। उन्होंने कहा कि जन संचार केन्द्र के विद्यार्थियों को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने इस सम्मेलन को वैचारिक महाकुंभ की संज्ञा दी और उम्मीद जताई कि तीन दिन के इस मंथन से अहम परिणाम सामने आएंगे।

सोसायटी ऑफ मीडिया इनिशिएटिव ऑफ वैल्यू, इंदौर के राष्ट्रीय संयोजक प्रो. कमल दीक्षित ने मीडिया की दुनिया में आए बदलावों की चर्चा की और पत्रकारिता में मूल्यों तथा आदर्शों में गिरावट पर चिंता जताई। उन्होंने वर्तमान दौर में मीडिया की भूमिका पर नए सिरे से विचार करने का सुझाव दिया और एक बेहतर समाज के निर्माण की दिशा में साझा प्रयास करने की अपील की। सम्मेलन की संयोजक कल्याणसिंह कोठारी ने बताया कि सम्मेलन के दौरान 12 विभिन्न तकनीकी सत्रों में 200 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए जाएंगे।

सम्मेलन के दौरान एक स्मारिका का लोकार्पण भी किया गया। इस स्मारिका में शोध पत्रों का सारांश प्रकाशित किया गया है। इस दौरान सम्मेलन के न्यूजलैटर ‘एआईएमईसी टाइम्स’ का लोकार्पण भी किया गया। न्यूज लैटर का प्रकाशन सम्मेलन में प्रतिदिन किया जाएगा और इसमें सम्मेलन की प्रमुख गतिविधियों को प्रकाशित किया जाएगा।

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जयपुर में चौदह राज्यों के ढाई सौ से अधिक मीडिया शिक्षकों का सम्मेलन 2 से 4 अप्रैल तक

जयपुर (राजस्थान) : राजस्थान विश्व विद्यालय के मानविकी सभागार में दो अप्रैल से देश भर के जाने-माने मीडिया शिक्षक जुटेंगे। वे ‘समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में मीडिया की भूमिका’ विषय पर आयोजित किए जा रहे तीन दिवसीय अखिल भारतीय मीडिया शिक्षक सम्मेलन में शिरकत करेंगे। 

राजस्थान विश्व विद्यालय, जनसंचार केंद्र के अध्यक्ष प्रो.संजीव भानावत ने बताया कि सम्मेलन में अब तक ढाई सौ से अधिक अतिथियों के आने की अनुमति मिल चुकी है। राजस्थान विश्व विद्यालय, जयपुर, मणिपाल विश्वविद्यालय, जयपुर मीडिया एडवोकेसी स्वयंसेवी संगठन, लोक संवाद संस्थान और सोसायटी ऑफ मीडिया इनिशियेटिव फॉर वैल्यूज, इंदौर के तत्वावधान में आयोजित सम्मेलन के पहले दिन दो अप्रैल को सुबह दस बजे विवि के मानविकी पीठ सभागार में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.बीके कुठियाल प्रथम सत्र का उदघाटन करेंगे। 

प्रो.भानावत ने बताया कि सम्मेलन में देश के चौदह से अधिक राज्यों के प्रतिनिधि भाग लेने के लिए पंजीकरण करा रहे हैं। पूरे मीडिया जगत में इस तरह के पहले विशाल सम्मेलन में राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति हनुमान सिंह भाटी, नेशनल बुक ट्रस्ट के चेयरमैन बल्देव भाई शर्मा, टीवी 18 नेटवर्क के पत्रकार रमेश उपाध्याय, मणिपाल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.संदीप संचेती, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सच्चिदानंद जोशी, ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महासचिव एन.के. सिंह आदि मुख्य रूप से भाग लेंगे। 

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भास्कर जयपुर के संपादक की प्रताड़ना से तंग आकर इस्तीफा

जयपुर : दैनिक भास्कर जयपुर में 18 साल से कार्यरत मुख्य उपसंपादक रामबाबू सिंघल ने संपादक एल पी पंत की प्रताड़ना से तंग आकर अपना इस्तीफा एम डी सुधीर अग्रवाल को भेज दिया है। उन्होंने एम डी को भेजे अपने पत्र में कहा है कि एक पत्रकार के तौर पर कमर्ठता से सेवा दी है। पिछले कई दिनो से संपादक एल पी पंत उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं।

उन्होंने आगे लिखा है- ऐसे में या तो इस समस्या का समाधान करें या इस पत्र को ही उनका इस्तीफा समझ लें। सुधीर अग्रवाल ने अभी तक इस केस में कोई सुनवाई नहीं की है। इसके बाद सिंघल ने ऑफिस जाना बंद कर दिया है। इससे पहले सिंघल संपादक एल पी पंत को बता चुके थे कि उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के लिए कोई केस नहीं किया है। इसके बाद भी पंत ने उन्हें प्रताड़ित करना बंद नहीं किया था। 

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प्रताप सिंह राठौड़ लेकसिटी प्रेस क्लब के अध्यक्ष निर्वाचित

उदयपुर। उदयपुर पत्रकार हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से गठित हुए लेकसिटी प्रेस क्लब के 11वें अध्यक्ष के रूप में प्रतापसिंह राठोड निर्वाचित हुए। प्रेस क्लब के इतिहास में लंबे अरसे बाद हुई मतदान प्रक्रिया में प्रताप सिंह राठोड ने 61 मतों से जीत हासिल कर अपने प्रतिद्वंदियों को करारा जवाब दिया। दरअसल चुनाव प्रक्रिया के दौरान इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुडे प्रतापसिंह के सामने ओम पुर्बिया और प्रमोद गौड जनाधार नहीं होने के बावजुद अपनी जिद पूरी करने के लिये चुनावी मेदान में उतरे लेकिन क्लब से जुडे पत्रकारों ने क्लब में हुए विकास कार्यो को प्रमुखता देते हुए प्रतापसिंह राठोड को भारी मतों से विजयी बनाया।

129 मतदाताओं में से 120 मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया। प्रताप सिंह राठोड को 86, ओम पुर्बिया को 25 और प्रमोद गौड को 8 मत प्राप्त हुए वहीं एक मत खारिज हुआ। लेकसिटी प्रेस क्लब के इतिहास में पहली बार रोचक चुनाव देखने को मिला जिसमें महत्वपुर्ण भुमिका प्रतापसिंह राठोड के रणनीतिकार और चुनाव में चाणक्य के नाम से बुलाये जाने वाले कपिल श्रीमाली, मनु राव और अख्तार खान की रही। मनुराव के कार्यकाल में हुए विकास कार्यो को सोशियल मिडिया के माध्यम से पत्रकार मतदाताओं तक पहुंचाने में कपिल श्रीमाली ने खासी मेहनत की और क्लब के हित में प्रतापसिंह राठोड के समर्थन में मतदाताओं की संख्या को बढाया। विजयी होने के बाद क्ल्ब अध्यक्ष प्रतापसिंह राठोड ने सभी मतदाताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया साथ ही क्लब के विकास और पत्रकारों के हितों के लिये सदैव तत्पर रहने का भी वायदा किया।

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नेशनल दुनिया जयपुर के पूर्व चीफ रिपोर्टर राकेश कुमार शर्मा ने मालिक शलभ भदौरिया को लिखा लंबा-चौड़ा पत्र

नेशनल दुनिया, जयपुर के पूर्व चीफ रिपोर्टर राकेश कुमार शर्मा ने अखबार के मालिक और प्रधान संपादक शैलेन्द्र भदौरिया को लंबा चौड़ा पत्र लिखकर अखबार के अंदरखाने चल रहे करप्शन और गड़बड़ियों का खुलासा किया है. साथ ही उन्होंने संस्थान से इस्तीफा देने की घोषणा करते हुए बकाया दिलाने की मांग की है. उन्होंने पत्र में सब्जेक्ट के रूप में लिखा है- ”नेशनल दुनिया जयपुर संस्करण के संपादक के संरक्षण में डरा-धमकाकर हो रही उगाही और भ्रष्ट कार्यशैली के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट, साथ ही एक महीने के नोटिस पूरा होने के बाद संस्थान को छोडऩे एवं मेरे देय वेतन-भत्ते दिलवाने के बाबत।”

इस पत्र के शुरुआत में कुछ पैराग्राफ में वे लिखते हैं: ”अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की ऐतिहासिक तिथि के मौके पर 9 अगस्त, 2013 को जयपुर में नेशनल दुनिया संस्करण की शुरुआत की गई। तब विद्याश्रम स्कूल के सभागार में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री मुरली मनोहर जोशी, आपके (श्री शैलेन्द्र भदौरिया) और आपके ससुर विधायक श्री सलिल विश्नोई (कानपुर से भाजपा से चार बार विधायक) समेत अन्य वक्ताओं ने 9 अगस्त की ऐतिहासिक तिथि को याद करते हुए राजस्थान की धरा से भ्रष्टाचार को उखाडऩे तथा जनता की आवाज बनकर उनके साथ हमेशा खड़े रहने का वादा किया। इससे लोगों में आस बंधी थी कि यह समाचार पत्र जनता की आवाज बनेगा और जन मुद्दों को सरकार के सामने लाएगा। लेकिन जब तक दिल्ली की टीम जयपुर में रही, तब तक अखबार इस लाइन पर चला और जनता व मीडिया जगत में अपनी पहचान भी बनाई, पर जैसे ही आपकी निगाहें व निगरानी हटी, वैसे ही इस अखबार की साख के साथ ही प्रसार सं या भी औंधे मुंह गिरती गई और आज अखबार क्या स्थिति में है, यह हर कोई जानता है।  ढूंढते रह जाओ की स्थिति तक पहुंच चुके इस अखबार की ऐसी दुर्गति क्यों हुई और क्यों बाजार में इसकी साख गिरकर सड़क तक आ गई, इसके बारे में 2 दिसंबर, 2014 को आपको मेरे द्वारा इस्तीफे के नोटिस संबंधित ई-मेल और रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजकर भी अवगत करा दिया था। हालांकि इस पत्र के बाद आपके द्वारा कोई रिस्पांस नहीं दिखा, जिससे लगता है कि आप भी अखबार में जो चल रहा है, उसे नियति मना चुके हैं। फिर भी पत्रकार मन नहीं मानता और न ही मैं जिस घर और कौम में पैदा हुआ है, उसे संस्कार यह कहते हैं कि सच्चाई बताने से डरो, बल्कि सच्चाई को अंजाम तक पहुंचाने की हि मत रखता हूं। सो आपको आज विस्तार से बता रहा है, फिर चाहे आप कुछ भी करें, आपका अखबार है, लेकिन किसी के साथ भ्रष्टाचार और गलत खबर छपी तो इस संस्थान से बाहर रहकर भी बर्दाश्त नहीं करुंगा और सोश्यल मीडिया व कानून के डंडे से इसका सामना करुंगा। प्रधान संपादक महोदय, अखबार में भ्रष्ट व फर्जी पत्रकारों की भर्ती और इन पर कोई नियंत्रण नहीं होने के कारण जनता की सेवा के ध्येय के लिए खोला यह अखबार अब उगाही करने का संस्थान बन गया है। जिस अखबार का संपादक ही शाम को चार-पांच बजे कार्यालय में पहुंचता है और उसका पूरा वक्त ऑफिस में कम बाहर ज्यादा बीतता हो तो वो अखबार क्या चलेगा। खुद जीएम मनीष अवस्थी भी संपादक की टाइमिंग को देख चुके हैं। वे कहते भी थे कि क्या पत्रिका में भी यही टाइमिंग रहती थी कि क्या शाम को आना और कुछ देर बैठकर गायब रहना। लेकिन जब उनको यह बताते थे कि दोपहर बारह बजे पत्रिका में पहुंच जाते थे और रात दो बजे तक जब तक अखबार नहीं छूटता था, तब तक खिसक नहीं सकते थे। लेकिन यहां कोई देखना वाला तो था नहीं। जब संपादक के ये हाल होंगे तो उनके द्वारा भर्ती किए गए चहेते फर्जी पत्रकारों की टीम भी वैसी ही निकम्मी होगी। वैसे भी इन फर्जी पत्रकारों में तीन तो ऐसे हैं, जो सिर्फ संपादक के शौक को पूरा करने के लिए उसके घर और उसके घरेलू कार्यों को पूरा करने के लिए नौकर की तरह लगे रहते हैं। अखबार और खबरों से इनका कोई वास्ता नहीं है। चौथा एक मीडिया चैनल के इशारे पर चलता है तो पांचवां सरकारी प्रेसनोट चलाकर और तबादले उद्योग में लगा रहता है। उसे अखबार व खबरों से कोई मतलब नहीं है। ऐसे भ्रष्ट माहौल के चलते ही नेशनल दुनिया को पिछले साल विधानसभा चुनाव में सीधे सरकार व भाजपा से करोड़ों रुपए का विज्ञापन दिलवाने वाले पत्रकार समेत आधा दर्जन वे रिपोर्टर अखबार छोड़ चुके हैं, जिनके दम पर ही अखबार कुछ महीने तो चला और बाजार में खड़ा भी हो सका। एक के बाद एक ऐसे पत्रकारों के छोडऩे से अखबार भी सड़क पर आ गया। दो पत्रकार तो संपादक की शौकिन मिजाजी के चलते छोड़ भागे क्योंकि वे अलवर के किसी साधु-संत के पास जाते थे। रास्ते में अपने होश खौ बैठते थे। अलवर में नेशनल दुनिया के पूर्व समूह संपादक डॉ. संजीव मिश्र भी आते थे और आज भी वे जयपुर और अलवर में जादू-टोने की जगहों पर मंडराते देखे जा सकते। वैसे भी संपादक की खबरों में हैसियत एक क्राइम रिपोर्टर से ज्यादा तक नहीं रही है। जब पत्रिका में रहते हुए इसकी पहचान प्रशासन, सरकार और राजनीतिक दलों में बिल्कुल नहीं थी। आज भी सरकार और राजनीतिक दलों से कोई काम पड़ता है तो पत्रिका के पत्रकारों का सहयोग मांगता है। पत्रिका में भी इनकी चाण्डाल चौकडी के कई सदस्य जमे हुए हैं। प्रधान संपादक महोदय, आपके भाई की शादी के कार्ड भी वहां के पत्रकारों के साथ जाकर बांटे हैं जो इसकी पहचान का परिचायक है। इनके फर्जी पत्रकार दूसरे साथियों को यह कहकर भ्रष्टाचार के लिए उकसाते हैं कि हमारे साथ रहो तो मेवा ही मेवा मिलेगा। शिकायतों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि संपादक की सीट पर हमारे बापजी बैठे हैं और मालिक को अखबार से कोई लेना-देना नहीं है। जब पत्रिका में अनुभवी संपादक इसकी कारगुजारियों को पकड़ नहीं सके तो यहां के मालिक की तो मजाल ही क्या। इनकी देखादेखी अब दूसरे साथी भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने लगे हैं। आपको भले ही यह बात गलत लगे, लेकिन आपके जयपुर में मीडिया जगत के अपने जानकार पत्रकारों के बारे में संपादक और उसकी फर्जी व लुटेरी टीम के बारे में पडताल कर सकते हैं। पूरे शहर में संपादक के संरक्षण में नेशनल दुनिया अखबार का डंका बजा रखा है, खबरों में नहीं, वसूली में। अब तो पुरस्कार भी डरा-धमकाकर लेने लगे हैं, चाहे पुरस्कार सूची में नाम हो या नहीं, लेकिन दबाव बनाकर पुरस्कार लेने पहुंच जाते हैं। तब तक कार्यक्रम में बैठते रहते हैं, जब तक उनका नाम पुकार नहीं जाए। हाल ही एक फर्जी के नाम से मीडिया जगत में मशहूर पत्रकार ने यह पुरस्कार हथिया है। आयोजकों के मना करने पर भी कार्यक्रम में पहुंच गए।”

कई पन्नों के इस पत्र में राकेश शर्मा ने कई कई कहानियां लिखी हैं, वह भी सविस्तार. इसमें कई लोगों के नाम लेकर उन पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और उनकी पूरी पोल पट्टी खोल दी गई है. पत्र के आखिर में राकेश लिखते हैं: ”महोदय, इस पत्र के साथ ही यह भी बताना चाहता हूं कि मेरे एक महीने के नोटिस संबंधी समय पूरा हो गया है। आशा है आप मेरे इस्तीफे को स्वीकार करके मेरे संस्थान में बकाया वेतन, पीएफ राशि समेत अन्य वेतन परिलाभ का भुगतान तय समय कर देंगे। आपके संस्थान द्वारा दिए गए अखबार का आई कार्ड और मोबाइल की सिम (9166496490) एचआर सैक्शन में जमा करवा दी है। धन्यवाद”

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पत्रकार एलएल शर्मा ने एक ही अखबार में 25 साल की पारी पूरी की

राजस्‍थान के सबसे पुराने समाचार पत्र दैनिक नवज्‍योति के चीफ रिपोर्टर एलएल शर्मा ने अपनी 25 साल की सेवाएं पूरी कर ली। एक ही समाचार पत्र में फील्‍ड में इतनी लंबी पारी खेलने वाले शर्मा जयपुर के पहले पत्रकार है। इस उपलब्धि पर गुलाबीनगर जयपुर के पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों ने उनको बधाई दी है। शर्मा पिंकसिटी प्रेस क्‍लब जयपुर के चार बार अध्‍यक्ष रह चुके हैं।

राजस्‍थान पत्रकार परिषद के अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं। अब वे पिंकसिटी प्रेस क्‍लब और राजस्‍थान श्रमजीवी पञकार संघ के मुख्‍य निर्वाचन अधिकारी की जिम्‍मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। पञकारिता के क्षेत्र में शर्मा के संघर्ष की लंबी कहानी है। उन्‍होंने ढाई दशक पहले 28 दिसम्‍बर 1989 को दैनिक नवज्‍योति में कदम रखा और इससे जुडे। चार दिन बाद एक जनवरी 1990 से छोटे से गांव गोनेर और सांगानेर कस्‍बे के एक स्‍ट्रिंगर के रूप में विधिवत समाचार भेजने लगे। कुछेक सालों तक स्‍ट्रिंगर के रूप में काम करने के बाद सीधे दफ़्तर से जुडे। स्‍ट्रिंगर से चीफ रिपोर्टर तक के इस 25 साल के सफर में उन्‍होंने कई उतार चढाव देखे। पहले सिटी रिपोर्टर, ‍फिर क्राइम रिपोर्टर और बाद में चीफ रिपोर्टर बने। उनका जन्‍म जयपुर के पास एक छोटे से गांव चतरपुरा में हुआ। ग्रामीण परिवेश में पल और पढे। दसवीं तक की पढाई भी पड़ोस के गांव गोनेर में की। ढाई दशक तक एक ही समाचार पञ में लगातार रिपोर्टिंग करना का मौका बहुत ही कम लोगों को मिलता है, उनमें एक  सौभाग्‍यशाली शर्मा भी है।

एक साक्षात्‍कार में शर्मा ने बताया कि इन 25 सालों में वरिष्‍ठ साथियों से तो बहुत कुछ सीखा, मगर कनिष्‍ठ साथियों का भी इसमें कम योगदान नहीं है। उनसे भी मैंने कुछ न कुछ सीखने की भरपूर कोशिश की है और अभी भी सीख रहा हूं। इस अवधि में कड़वे मीठे अनुभव भी रहे हैं। पत्रकारिता के दौरान कई राजनेताओं से दोस्‍ती भी हुई और दूरियां भी बढी। लेकिन मैने राजनेताओं के संबंधों को अपनी पत्रकारिता पर कभी हावी नहीं होने दिया। कुछ लोगों ने कोशिश जरुर की थी लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। मैंने भी इस बात का भी पूरा खयाल रखा कि किसी भी राजनेता के हाथों टूल नहीं बनूं। ऊन्‍होंने नवोदित पञकारों को सलाह दी है कि उनकी लेखनी निष्‍पक्ष और समाज के हित में है तो उनको लाखों लोगों का साथ जरूर मिलेगा।

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नेशनल दुनिया जयपुर में सेलरी संकट, काम बंद करने की तैयारी

नेशनल दुनिया अखबार के सभी संस्करणों में वेतन का संकट खड़ा हो गया है. दिल्ली, उत्तर प्रदेश और जयपुर में पत्रकारों और अन्य मीडिया कर्मियों को दो महीने से वेतन नहीं मिला है. दिल्ली और उत्तर प्रदेश के संस्करणों में पहले से ही सेलरी कई-कई महीने देरी से मिल रही है. अब जयपुर संस्करण में भी यह समस्या शुरू हो गई है. जयपुर में नवंबर महीने की तनख्वाह अभी तक नहीं मिली है, इधर दिसंबर भी बीतने जा रहा है.

वेतन को लेकर संपादक मनोज माथुर का रवैया टाल-मटोल वाला है. जयपुर संस्करण में सिर्फ पहले महीने सेलरी टाइम पर आई. उसके बाद हर माह सेलरी लेट मिली. बाद में तो दो दो महीने देर से सेलरी दी गई. सेलरी इकट्ठे देने की जगह किश्तों में दी जाने लगी. सेलरी संकट से कर्मियों में गुस्सा है और आने वाले दिन में कर्मचारी काम बंद करने जैसा कदम उठा सकते हैं.

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