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सियासत

कला को उत्पाद होने से बचाना कलाकारों से सामने बड़ी चुनौती

कोलकाता : भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद (आईसीसीआर) की नंदलाल बोस गैलरी में सिटी आर्ट फैक्ट्री की ओर से आयोजित कला प्रदर्शनी शुरू हुई जिसमें 31 कलाकारों की कृतियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन प्रख्यात चित्रकार सुब्रत गंगोपाध्याय, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के विजुअल आर्ट्स विभाग के पूर्व डीन एवं वरिष्ठ चित्रकार पार्थ प्रतिम देव तथा लेखक-चित्रकार डॉ.हृदय नारायण सिंह (अभिज्ञात) ने किया। संचालन सिटी आर्ट फैक्र्टी के क्यूरेटर शांतनु राय ने किया।

कोलकाता : भारतीय सांस्कृतिक सम्बंध परिषद (आईसीसीआर) की नंदलाल बोस गैलरी में सिटी आर्ट फैक्ट्री की ओर से आयोजित कला प्रदर्शनी शुरू हुई जिसमें 31 कलाकारों की कृतियों की प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन प्रख्यात चित्रकार सुब्रत गंगोपाध्याय, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय के विजुअल आर्ट्स विभाग के पूर्व डीन एवं वरिष्ठ चित्रकार पार्थ प्रतिम देव तथा लेखक-चित्रकार डॉ.हृदय नारायण सिंह (अभिज्ञात) ने किया। संचालन सिटी आर्ट फैक्र्टी के क्यूरेटर शांतनु राय ने किया।

अतिथि कलाकारों के साथ साथ अरिजीत भट्टाचार्य, बिधानचंद्र सरकार, उमा अजमाल, दिप्तांशु बनर्जी, रिपन कुमार सरकार, अंजन भट्टाचार्य, जया जधावर, आरती परदेशी, किरण नाइक, अमित दास, टीनू बक्शी, महाप्रभु गनुई, राका मित्र, अनुराधा हालदार, डाली दत्त, गोपीनाथ बसु, स्वपन राय, डालिया बंद्योपाध्याय, काली सरण सिन्हा, मनीषा हाजरा, देबदास मजुमदार,  शुभला बर्मा, देबरति राय,  दिपाली साहा, जयंत घोष की कृतियां प्रदर्शनी में लगी हैं, जो 31 जनवरी तक चलेगी।

वक्ताओं ने इस अवसर पर कहा कि कला को कोई निर्दिष्ट फार्मूला नहीं है कि क्या करने से कला श्रेष्ठ होगी। वॉन गाग से लेकर जामिनी राय जैसे कलाकारों ने नये पथ प्रदर्शित किये हैं। कलाकार को लगातार अभ्यास की आवश्यकता होती है। कला से जुड़े तमाम नये उपकरण आज उपलब्ध हैं जिनसे कलाकारों को आसानी हुई है किन्तु उन्हीं के कारण कलाकारों की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। कलाकारों के सामने चुनौती है कि वह दूसरों से अलग कैसे दिखे, कला बाजार में कैसे टिके। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कोई कलाकार आर्ट कालेज से निकल कर आये हैं या उसने स्वयं सीखा है महत्वपूर्ण यह है कि वह कर क्या रहा है। कला के उत्पाद बन जाने की भी चुनौतियां हैं, कलाकारों को यह तय करना होगा कि कैसे वह कला को उत्पाद होने से बचाये लेकिन बाजार में टिका रहे।

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