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अपने अखबार मालिकों के धंधों का काला चिट्ठा निकालिये, मजीठिया लेने में काम आएंगे

एक-दो अख़बारों को छोड़ दें तो सभी अख़बार या अख़बार समूहों में वेतन को लेकर कोई न कोई लोचा जरूर है। सवाल वही है कि अगर किसी आयोग ने हमारी तनख्वाह 2000 रूपये तय की है और मालिकान हमें 1995 रुपये दे रहे हैं, तो 5 रुपये की गड़बड़ी तो मालिकान ने की ही है। फिर इस लिहाज से आयोग के आदेश का सही तरह से पालन कहां हुआ? सरकार द्वारा मंजूर इस देनदारी को अख़बार मालिकानों ने सही तरह से नहीं निभाया है।

एक-दो अख़बारों को छोड़ दें तो सभी अख़बार या अख़बार समूहों में वेतन को लेकर कोई न कोई लोचा जरूर है। सवाल वही है कि अगर किसी आयोग ने हमारी तनख्वाह 2000 रूपये तय की है और मालिकान हमें 1995 रुपये दे रहे हैं, तो 5 रुपये की गड़बड़ी तो मालिकान ने की ही है। फिर इस लिहाज से आयोग के आदेश का सही तरह से पालन कहां हुआ? सरकार द्वारा मंजूर इस देनदारी को अख़बार मालिकानों ने सही तरह से नहीं निभाया है।

मजीठिया का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। गैजेट ऑफ़ इंडिया में भी इसका उल्लेख है कि मालिकानों को वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग यह बात माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मालिकानों से दोबारा कही है कि अख़बार मालिकान अपने कर्मचारियों को 7 फरवरी 2014 से जो सेलरी देंगे, वह मजीठिया के हिसाब से देंगे। इसे अभी तक किसी अख़बार ने लागू नहीं किया है और मिली सेलरी स्लिप को लेकर अगर कोई वर्कर कोर्ट में चला गया, तो मालिक अवमानना के केस में फंसेगा और वर्कर को पैसे देगा।

देखें तो टर्नओवर और एक्ट के हिसाब से दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला, नवभारत, हरिभूमि, अजीत समाचार, दबंग दुनिया, लोकमत आदि अख़बार ‘ए’ ग्रेड में आएंगे। इनमें बहुत से मालिकान ने अपने कुछ अन्य कामों को छिपाया हुआ है। आपको इनके अन्य कामों को उजागर करने में लग जाना है। इन उपरोक्त अख़बारों में से कुछ मालिकानों ने अपना टर्नओवर सरकार के सामने गलत पेश किया है। कुछ के कागजात निकाले गए हैं। आप सब भी अपनी कम्पनी और मालिकानों से जुड़े अन्य धंधे का काला चिट्ठा निकालिये। वे आगे सबूत के तौर पर काम आएंगे। फिर सरकार को हम बताएंगे कि फलां कम्पनी ने सेबी या अन्य जगह झूठे कागजात पेश किये हैं। फिर इनका हश्र क्या होगा, दुनिया देखेगी।

19 जून को जो आर्डर सुप्रीम कोर्ट से आया है, मजीठिया को लेकर, वह स्पष्ट है। इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में अब न तो सरकारी कर्मचारी कोई हीलाहवाली करेंगे और न ही कोई और। मालिकान को झूठ बोलने और बरगलाने का अवसर अब न तो डीएलसी देगा और न लेबर कोर्ट। अब न अख़बार की धौंस चलेगी और न मनमानी। अब सब मान चुके हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट से बड़ा यहाँ कोई नहीं है। इसलिए अब वर्कर अपने पैसे मालिकानों से आसानी से ले सकेंगे। कुछ वक्त भले ही लग जाये, 6 या 8 महीना।

वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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