एचटी ग्रुप का एचआर डायरेक्टर मजीठिया वेज बोर्ड मामले में डीएलसी के सामने ये क्या बोल गया!

दिनांक 21 अगस्त को मजीठिया वेज लागू करने के सवाल पर बिहार में दो जगहों सुनवाई हुई। फार्म सी के साथ दिए गए क्लेम पर सुनवाई राज्य सरकार के डिप्टी सेक्रेटरी अमरेन्द्र मिश्र ने की। फरवरी में दिए गए आवेदन पर सुनवाई की शुरुआत करने में 5 महीने लग गये। सुप्रीम कोर्ट की मोनेटरिन्ग होने के बाद भी गति नौ दिन चले ढाई कोस की तरह धीमी रही। दूसरा मजीठिया मामलों मे कंप्लेन केस, गलत बयानी और दमनात्मक कार्रवाई पर डीएलसी पटना के यहां सुनवाई थी। दोनों जगहों पर एचटी के एचआर डायरेक्टर राकेश गौतम खुद उपस्थित हुए और बेहूदगी व मूर्खता की सारी सीमा लांघ दी।

एचटी की ओर से हर समय यह कहा जाता रहा कि जवाब देने के लिए समय चाहिए। राकेश गौतम ने खुद जब उपस्थित हुए तो बोले- ”कैसा जवाब? किस कानून के तहत आप (डीएलसी) जवाब मांग रहे हैं? किस कानून के तहत वर्कर्स की ओर से वकील रखे गए हैं?”

राकेश गौतम की ओर से हो रही बेहूदगी के चलते डीएलसी ने कहा कि आप पूरी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल कैसे उठा सकते हैं? डीएलसी ने कहा कि आगे से आप ले-मैन की तरह नहीं बल्कि अपने वकील के साथ आएं।

एचआर डायरेक्टर देश की समस्त कानूनी प्रक्रिया को चुनौती देता रहा। वकील रखने का अधिकार मैनेजमेंट को है, कामगार या पत्रकार को नहीं, ऐसा जताता रहा। यूनियन पर सवाल उठाता रहा। कामगार के वकील और ग्रुप के ऑथराइजेशन पर सवाल उठाता रहा। वो बोलता रहा- ‘वकील किस कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हैं, इसका जवाब चाहिए।’

उसकी मंशा महज इतना जरूर दिख रही थी कि उसे कोई एक आदेश चाहिए था जिस पर वह कोर्ट का स्टे आर्डर लगा सके। कुछ दलाल कोर्ट से काले पैसे की जोड़ पर स्टे आर्डर ला देने का ठेका जो ले रखे हैं।

राकेश गौतम हिन्दुस्तान के संपादक शशि शेखर सहित पूरे लाव लश्कर के साथ 20 अगस्त को ही आ गये थे। पैसा और पैरवी का नंगा नाच रविवार की रात से चलता रहा। पिछले सप्ताह एचटी ग्रुप के सीईओ राजीव वर्मा और संपादक शशि शेखर आदि पटना आकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलकर श्रम विभाग के ईमानदार अधिकारियों को हटाने का गुहार लगाकर गए थे। सुनते हैं प्रेस में दलाली करने वाले एक खास एजेंट पत्रकार के जरिए पैसे का जमकर वितरण हुआ। वह पैसा जगह पर पहुंचा या नहीं, यह अलग बात है क्योंकि यह एजेंट मिथिला का नामी चोर है।

कल मिलाकर राकेश गौतम संस्थान की नाक पटना से कटा कर गये ही, साथ ही यह बता गए कि अयोग्य प्रबंधन किस तरह लूट मचाकर संस्थान को दिवालिया करने पर उतारू है। अब अगली सुनवाई 4 सितम्बर को श्रम विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी के यहां तथा 9 सितम्बर को डीएलसी के यहां होगी।

पटना से दिनेश सिंह की रिपोर्ट.

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मजीठिया मुद्दे पर फास्ट ट्रैक कोर्ट के लिए राज्यपाल को दिया ज्ञापन

वाराणसी । काशी पत्रकार संघ और समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के प्रतिनिधि मंडल ने मंगलवार 22 अगस्त, 2017 को अपराह्न लखनऊ स्थित राजभवन में प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक से मिलकर उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के तहत पत्रकारों व गैर पत्रकार कर्मचारियों के लम्बित वादों के निस्तारण के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन के लिए राज्य सरकार को निर्देश देने का आग्रह किया।

राज्यपाल श्री नाईक ने प्रतिनिधि मंडल को आश्वस्त किया कि वे इस संबंध में मुख्यमंत्री को जल्द ही पत्र लिखेंगे। प्रतिनिधि मंडल में संघ के अध्यक्ष सुभाषचन्द्र सिंह, महामंत्री डा॰ अत्रि भारद्वाज, समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी, संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप कुमार, उपाध्यक्ष चंदन रूपानी, मंत्री पुरुषोत्तम चतुर्वेदी, कार्यसमिति के सदस्य एके लारी, मनोज श्रीवास्तव, वाराणसी प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष संदीप गुप्ता शामिल थे।

अगले दिन संघ के अध्यक्ष सुभाषचन्द्र सिंह व महामंत्री अत्रि भारद्वाज ने उपमुख्यमंत्री डा॰ दिनेश शर्मा से विधान सभा भवन में मिलकर मजीठिया मुद्दे पर फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन और सामाजिक सुरक्षा के तहत अन्य राज्यों की तरह अवकाश प्राप्त पत्रकारों के लिए न्यूनतम 10 हजार रुपये मासिक पेंशन की व्यवस्था की मांग का ज्ञापन सौंपा। इसी क्रम में पत्रकारों के हितों के सम्बन्ध में विधान सभा अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित से भी मांग की।

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श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण से जुर्माना वसूला!

मजीठिया वेज बोर्ड मामले से जुड़े दिलीप कुमार द्विवेदी बनाम जागरण प्रकाशन लिमिटेड के मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय ने दैनिक जागरण से दो हजार रुपये जूर्माना वसूलकर वर्करों को दिलवाया और जागरण से अपना जवाब देने के लिए कहा। दिल्ली की कड़कड़डूमा श्रम न्यायालय में दैनिक जागरण के उन 15 लोगों, जिन्होंने जस्टिस मजीठिया बेज बोर्ड की मांग को लेकर जागरण प्रबंधन के खिलाफ केस लगाया था, के मामले की कल सुनवाई थी। इन सभी वर्कर को जागरण ने बिना किसी जाँच के झूठे आरोप लगाकर टर्मिनेट कर दिया था।

हुआ यह था कि पिछली तारीख के दिन जब न्यायालय में पुकार हुयी तो इन कर्मचारियों के वकील श्री विनोद पाण्डे ने अपनी बात बताई। इस पर जागरण प्रबंधन के वकील श्री आर के दुबे ने कहा था कि मेरे सीनियर वकील कागजात के साथ आ रहे हैं। वे रास्ते में हैं। माननीय जज ने कहा कि अगली तारीख पर दे देंगे, इस पर वर्कर के वकील विनोद पांडेय ने कहा कि हुजूर, ये कॉपी नहीं देना चाहते। वैसे ही हम बहुत लेट हो चुके हैं, आज हम देर से ही सही, आपके सामने इनका जवाब लेंगे, इस पर माननीय जज साहब ने पासओवर दे दिया और कहा कि 12 बजे आइये।

तय समय पर वर्कर अपने वकील के साथ हाजिर हुए, तो मैनेजमेंट की ओर से कोई नहीं आया था। जज साहब ने फिर वर्कर को साढ़े बारह बजे आने के लिए कहा। फिर सभी उक्त समय पर हाजिर हुए, तब भी मैनेजमेंट के लोग गायब रहे। इसी बात पर कानून के हिसाब से जागरण पर 2 हज़ार रुपये का जुर्माना लगा था, जिसे जागरण ने आज कोर्ट में दिया है। इस मामले की अगली तारीख 8 नवंबर 2017 लगी है।

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राजस्थान पत्रिका प्रबंधन से श्रम विभाग ने पूछा- क्यों नहीं दिया मजीठिया, कारण बताओ

राजस्थान पत्रिका के एमडी को श्रम विभाग ने नोटिस भेजकर उपस्थित होने को कहा

जयपुर। सर्वोच्च न्यायालय के मजीठिया वेज बोर्ड के मामले में 19 जून को दिए गए फैसले के बाद पत्रकारों की उम्मीदों को झटका जरूर लगा था, लेकिन इस फैसले के बाद पत्रकारों की उम्मीदों को नए पंख भी मिल गए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देशभर के श्रम कार्यालयों में मजीठिया वेज बोर्ड को हल्के में नहीं ले रहे हैं। लेबर विभाग को लेकर आम धारणा है कि यहां सालों साल मामले ​खिंचते चले जाते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद श्रम विभाग को लेकर मजबूरी में ही सही सक्रिय होना पड़ रहा है।

राजस्थान के श्रम विभाग के अतिरिक्त श्रम आयुक्त राजीव किशोर सक्सेना ने कर्मचारियों की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए राजस्थान पत्रिका के एमडी को नोटिस जारी कर कारण पूछा है। नोटिस में माननीय सुप्रीम कोर्ट के 14 मार्च 2011 और 19 जून 2017 के आदेशों का हवाला देते हुए पूछा गया है कि आपने माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना की है या नहीं। यदि नहीं की है, तो 10 अगस्त को शाम 4 बजे श्रम विभाग में उपस्थित होकर कारण बताएं।

राजस्थान पत्रिका के कर्मचारियों की ओर से दो—ढाई साल पहले से ही श्रम विभाग में शिकायतें दर्ज हैं, लेकिन इन शिकायतों पर अब तक कोई कार्यवाही होती नहीं दिख रही थी। ताजा मामले में राजस्थान पत्रिका के जयपुर मुख्यालय में कार्यरत उपसंपादक विपुल शर्मा और बीकानेर में कार्यरत वरिष्ठ उपसंपादक विनोद कुमार बालोदिया की शिकायतों को भी श्रम विभाग ने पूर्व में दर्ज शिकायतों के साथ संलग्न करते हुए राजस्थान पत्रिका प्रबंधन से जवाब मांगा है। अब राजस्थान पत्रिका प्रबंधन चाहे जो भी जवाब दे, लेकिन मजीठिया तो देना ही होगा।

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हिंदुस्तान अखबार के फ्रॉड के सुबूत दिखाने पर एचआर हेड की बोलती बंद हो गई!

मजीठिया आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन के मामले में यूपी सरकार की मंशा साफ़ है : मंत्री 

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा है कि मजीठिया आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन के मामले में सरकार की मंशा साफ़ है।  सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का अक्षरशः अनुपालन हो। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मालिकान अगर अपने स्तर से सुनिश्चित कराते हैं तो यह उनकी महानता होगी। उन्होंने कहा कि इरादे नेक हों तो हर समस्या का हल किया जा सकता है। 

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने के सम्बन्ध में विधानभवन के तिलक हाल में आयोजित त्रिपक्षीय बैठक के दौरान राज्य के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि यह विषय बहस और चर्चा का नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सम्मान का विषय है। मुद्दे का सम्मानजनक हल निकले इसकी पहल यदि समूह मालिकों की ओर से होगी तो स्वागत करेंगे। हमारी भूमिका प्रशासक की नहीं बल्कि बातचीत से सुलझाने की होनी चाहिए। 

उन्होंने कहा कि मंशा साफ़ नहीं होती तो यह बैठक बुलाई ही नहीं गयी होती। हम किसी पर दबाव नहीं बनाना चाहते लेकिन अनुरोध है कि सरकार के किसी हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे, अखबार मालिकों को दरियादिली दिखानी पड़ेगी। श्रम मंत्री ने 19 जून के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का अध्ययन करने की बात कही। मजीठिया निगरानी समिति की तरफ से हसीब सिद्दीकी ने मांग रखी कि श्रम विभाग में मजीठिया के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाय। इसे मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने मानते हुए प्रमुख सचिव को निर्देश दिया कि किसी सीनियर अफसर को इस मामले के लिए नियुक्त किया जाए जो कि मजीठिया आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन को अवगत कराते रहें। 

बैठक के दौरान सहारा प्रबंधन ने माना कि सहारा समूह में आजकल समस्याओ की वजह से तनख्वाह देने में दिक्कत आ रही थी। लेकिन सहारा ने 4 कैटोगरी की सैलरी देने की बात कही। वहीं हिंदुस्तान की तरफ से एच आर हेड राकेश गौतम ने बताया कि उनकी कंपनी हर जगह मजीठिया लागू कर रही है। इसी बीच मजिठिया निगरानी समिति के सदस्य लोकेश त्रिपाठी ने स्पष्ट किया हिंदुस्तान कंपनी पूरी तरह फ्रॉड कर रही है। इससे संबंधित उन्होंने सबूत भी दिए। इसके बाद मंत्री ने हिंदुस्तान के प्रतिनिधि से अपना ग्रॉस रेवेन्यू और कैटगरी स्पष्ट करने को कहा तो मैनेजमेंट की बोलती बंद हो गई।

स्वामी प्रसाद मौर्य ने कहा कि आयोग के निर्णयों के क्रियान्वयन में पारदर्शिता रहे और सकारात्मक दिशा में आगे बढें। मजीठिया निगरानी समिति के सदस्य मुदित माथुर ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय श्रम मंत्री की पहल से हम उम्मीद करते हैं कि यूपी सरकार के श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य भी मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के लिए कदम बढ़ायेंगे। इस मीटिंग में मौजूद कई पत्रकारों ने श्रम मंत्री से कहा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने 19 जून 2017 के आदेश में यह साफ कहा कि सभी समाचार पत्र समूह व मीडिया समूह मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करें।  उपजा की ओर से निर्भय सक्सेना ने मंत्री जी से मांग की कि आप कंपनियों से उनकी बैलेंस शीट मांगिये। कंपनियां गड़बड़ कहां कर रही हैं, सब पता चल जाएगा।

मजदूर संघ के नेता उमाशंकर मिश्र ने कहा कि वेतन आयोग की रिपोर्ट में उल्लिखित समाचार पत्रों की श्रेणियों और उनके सालाना टर्नओवर का हिसाब श्रम विभाग के पास उपलब्ध है। अब सरकार से उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुपालन की अपेक्षा है। इस त्रिपक्षीय बैठक में श्रम मंत्री के अलावा श्रम राज्य मंत्री मन्नू लाल कुरील, अपर मुख्य सचिव श्रम राजेन्द्र तिवारी, अपर मुख्य सचिव एवं श्रमायुक्त पीके मोहंती, प्रदेश के विभिन्न मंडलों के उप श्रमायुक्त शामिल थे। वहीं यूपी सरकार की ओर गठित मजीठिया निगरानी समिति के सदस्य मुदित माथुर, हसीब सिद्दीकी, लोकेश त्रिपाठी, प्रांशु मिश्रा,  योगेश कुमार गुप्ता, जेपी त्यागी और अंकित बिशनोई मौजूद रहे। वहीं समाचार पत्र प्रबंधन की ओर से इंडियन एक्सप्रेस, टाईम्स आफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाईम्स, दैनिक जागरण, पायनियर, राष्ट्रीय सहारा तथा अन्य समूहों के प्रतिनिधि शामिल हुए. इसके साथ ही पत्रकारों के अन्य संगठनों के पदाधिकारी मौजूद थे.

मजीठिया बैठक में हिंदुस्तान की बोलती बंद हुई, हिन्दुस्तान के एचआर हेड राकेश गौतम उपहास के केंद्र बने

मजीठिया के मद्दे पर यूपी सरकार की ओर से बुलाई बैठक में हिंदुस्तान की खूब खिल्ली उड़ी। मंगलवार को मौका था यूपी सरकार की ओर से बुलाई गई मजीठिया की बैठक का। बैठक शुरू होते ही कर्मचारियों की ओर से बात रखी गई। इसके बाद नंबर आया अखबार मालिकों का। सहारा मैनजमेंट ने साफ बताया कि उनका अखबार चौथी कटेगरी में आता है। इसलिए हम उस कैटगरी का वेतन देने के लिए वचनबद्ध हैं। फिर श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिंदुस्तान के मैनेजमेंट की ओर इशारा किया कि आप अपनी बात रखें। हिंदुस्तान के नेशनल एचआर हेड आरके गौतम ने बताया कि हमारी कंपनी मजिठिया के अनुपालन में लगी है। और हमने कई यूनिट्स में लागू भी कर दिया है। यह सुनते ही मजिठिया निगरानी समिति के सदस्य लोकेश त्रिपाठी बिफर पड़ऐ। श्री लोकेश ने बताया कि हिन्दुस्तान अखबारर किसी भी यूनिट में मजीठिया नहीं दे रहा है। इसके उन्होंने सबूत भी दिए। फिर क्या था। सबूत देखते मंत्री और उनके अधिकारियों ने पूछा कि आप किस कैटगरी में मजीठिया का वेतन दे रहे हैं? स्पष्ट रूप से पूछे गये सवालों का उत्तर देने के बजाय आरके गौतम बगलें निहारने लगे। यह देख कुछ पत्रकारों ने मेज भी थपथपा दी तो पूरा माहौल मजाकिया बन गया। इसके बाद आरके गौतम बैठक खत्म होते ही ऐसे भागे कि वहाँ आमंत्रित लंच में भी हिस्सा नहीं लिया।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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पटना एचटी के एचआर हेड पर गिरी गाज, सुनवाई में नहीं आया संस्थान

हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप में मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने के सवाल पर पटना डिप्टी लेबर कमिश्नर के यहां सुनवाई के दौरान नया मोड़ आया। बार-बार झूठ और भ्रष्ट हरकतों को अपनाने वाली प्रबंधन ने नई चाल चली और 4 अगस्त को उसने वेज बोर्ड लागू करने के संदर्भ में मांगी गई सारी सूचनाओं का अभिलेख लेकर आने के लिए जिस प्रबंधन ने खुद समय लिया था, अचानक भाग खड़ा हुआ। सुनवाई का समय दो बजे दिन तय था और ढाई बजे तक प्रबंधन की तरफ से कोई नहीं पहुंचा। उसके तत्काल बाद एक फोन आया- ”मैं एचटी ग्रुप का नया एचआर हेड अभिषेक सिंह बोल रहा हूं। पुराने एचआर हेड रविशंकर सिंह का ट्रांसफर कर दिया गया है। मैं नया हूं इसलिए कुछ समय चाहिए। मैं इसकी लिखित सूचना और आवेदन भेज रहा हूं।” मगर दो घंटे बाद तक भी लिखित सूचना और आवेदन नहीं आया। अब सुनवाई 21 अगस्त को होगी।

पत्रकारिता को सत्ता की दलाली का मंडी बनाने वाले एक पत्रकार के साथ दिल्ली से आए एचआर हेड राकेश गौतम ने जब देख लिया कि न तो शिकायतकर्ता और न ही सुनवाई करने वाला डिप्टी लेबर कमिश्नर बिकने-डिगने को राजी है तो बिहार सरकार के मुख्य सचिव के पास डीएलसी के खिलाफ झूठी शिकायत लेकर पहुंच गए और हटाने का दबाव देने लगे। चीफ सेक्रेटरी ने श्रम विभाग के प्रधान सचिव को निर्देश दिया कि वे इसे देखें। प्रधान सचिव ने मुख्य सचिव को तत्काल इतना जरूर बताया कि हमारा डीएलसी ईमानदार, योग्य और कर्मठ अधिकारी के रूप में जाना जाता है, वह ऐसी कोई गलती कर ही नहीं सकता।

बाद में चीफ सेक्रेटरी को बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के मजीठिया वेज वोर्ड को लागू कर पत्रकारों और गैर पत्रकारों को समुचित वेतनमान देकर ठेकेदारी प्रथा से मुक्त कराने के सख्त निर्देशों का अनुपालन का मामला है तो उन्होंने भी कह दिया कि ठीक है काम करने दो।
इधर गत 20 जुलाई को भारत सरकार के श्रम सचिव ने सभी मुख्य सचिव को पत्र भेज कर लिखा है कि इस मामले मे सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए वर्किंग जर्नलिस्ट की धारा 17 मे दिए गए प्रावधानों की शक्तियों का इस्तेमाल करें। इस प्रावधान के अन्तर्गत संस्थान की संपत्ति जब्त कर रिकवरी करने का आदेश जारी करने का अधिकार दिया गया है। संस्थान की एक कोशिश है कि झूठे आरोप और फर्जी मुकदमों का सहारा लेकर जैसे भी हो देरी कराया जाय।

एक बार इस झूठ के फर्जीवाड़े मे खुद संस्थान की भद हो गई है। 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान संस्थान के वकील आलोक सिन्हा ने एक कंप्लेन फाइल किया कि याचिकाकर्ता दिनेश सिंह ने सुनवाई के दौरान अपशब्दों का इस्तेमाल किया। वकील खुद नहीं आए मगर सुनवाई में संस्थान के एचआर हेड उपस्थित थे। डीएलसी खुद झूठ से हतप्रभ थे और एचआर हेड से पूछा कि यह झूठा और बेबुनियाद आरोप आप कैसे लगा सकते हैं जब कि यहां कोई ऐसी बात हुई ही नहीं। एचटी के एचआर हेड ने स्वीकारा कि ऐसी कोई बात नहीं हुई थी। तत्काल सुनवाई स्थल से दिल्ली एचआर डायरेक्टर से बात की गई। एडवोकेट का यह झूठ उल्टा पड़ते देख दिल्ली की सहमति लेकर जल्दी-जल्दी में आरोप वापस ले लिया गया। मगर इस झूठ के आधार पर डीएलसी को मैनेज करने में असमर्थ एचआर हेड को तत्काल हटा दिया गया।

नये एचआर हेड आ चुके हैं। अब संस्थान के दलाल बंधु पत्रकार ने कमान संभाल ली है। दिल्ली से एचआर डायरेक्टर को सत्ता के गलियारे में नगरी-नगरी और द्वारे-द्वारे लिए वही घूम रहे हैं। अभी तक मैनेज करने के नाम पर भारी पैसे ले चुके हैं, ऐसा आरोप है लेकिन आउटपुट जीरो है। उसी के कहने पर संस्थान अंतिम समय में सुनवाई में उपस्थित नहीं हुआ। ऐसे भी संस्थान के पास अपनी झूठ छिपाने के लिए कुछ बचा नही है।

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पटना के एक अखबार के प्रबंधन ने डीएलसी को वाशिंग मशीन और आरओ गिफ्ट किया!

पटना के एक अखबार के एक मीडिया कर्मी ने जानकारी दी है कि यहां जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड न देना पड़े इसके लिए एक भ्रष्ट डिप्टी लेबर कमिश्नर महोदय चांदी काट रहे हैं। इस मीडियाकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर जानकारी दी कि पटना के महाधूर्त डिप्टी लेबर कमिश्नर को अखबार प्रबंधन ने अपने एक खास मातहत के जरिये वाशिंग मशीन और पानी को शुद्ध करने वाला आरओ गिफ्ट किया है। इसके अलावा अन्य उपहार भी समय समय पर दिए जा रहे हैं। इस बारे में सूत्रों का कहना है कि अखबार प्रबंधन ने डीएलसी को ये खास गिफ्ट इसलिए भेंट दिया है ताकि मजीठिया मामले में ये अखबार प्रबंधन की मदद करें।

सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि बिहार के लेबर कमिश्नर गोपाल मीणा काफी ईमानदार हैं मगर भ्रष्ट डीएलसी के सामने उनकी भी नहीं चल रही है। ये गिफ्ट अखबार के एकाउंट हेड के जरिये भेजा गया है। फिलहाल अब अखबार के मीडियाकर्मी इस मामले की विजलेंस के जरिये जांच कराने जा रहे हैं जिसमें जांच का मुख्य बिंदु है कि अकाउंट हेड, पटना यूनिट हेड, चीफ एचआर और डीएलसी के मोबाइल का सीडीआर निकाला जाय ताकि पता चले कि इनमें आपस में क्या बातें होती थीं। अखबार द्वारा गिफ्ट को किन-किन रास्तों से होते हुये अधिकारी के घर पहुँचाया गया, उसका भी वीडियो फुटेज उपलब्ध करा दिया जाएगा।

एक मीडियाकर्मी द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना पर आधारित.

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में यूपी के मीडियाकर्मी यहां करें शिकायत

यूपी सरकार की मजीठिया निगरानी समिति की बैठक 8 अगस्त को होने जा रही है। मजीठिया मांगने पर यदि आपके खिलाफ अन्याय हो हुआ है या हो रहा है तो आप अपनी संक्षिप्त रिपोर्ट (नाम, पता, मोबाइल नंबर, अखबार का नाम औऱ 5 लाइन में घटनाक्रम) इन मेल आईडीज पर भेज दें…

ankitbishnoi1@rocketmail.com

lokeshlko@gmail.com

muditmathur@hotmail.com

ये सभी समिति के सदस्य हैं जो आपकी बात को यूपी सरकार के श्रम मंत्री व प्रमुख सचिव श्रम के सामने रखेंगे।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
9322411335

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मजीठिया के लिए कानूनी सहायता कैंप : दर्जनों मीडियाकर्मियों ने क्लेम के लिए बढ़ाया कदम

वाराणसी। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराने की लड़ाई की अगुवाई कर रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को पराड़कर स्मृति मवन में “कानूनी सहायता शिविर लगाया गया। शिविर में काफी संख्या में पत्रकारों, समाचार पत्र कर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को कैसे हासिल किया जाय, इसकी कानूनी जानकारी ली। समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी ने कैम्प में आये पत्रकारों समाचार पत्र कर्मचारियो कों मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियो के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए उसे कानूनी रूप से कैसे लिया जा सकता है उससे अवगत कराया। 

पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार शाम ४ से ६ बजे तक पराडकर स्मृति भवन में चले इस कैम्प में दर्जनो समाचार पत्र कर्मचारियों ने समाचार पत्र कर्मचारी यूनीयन के मंत्री अजय मुखर्जी को मुकदमें के लिए अपने जरूरी कागजात सौंपा साथ ही आवश्यक औपचारिकताए पूरी की। इनमे कई ऐसे लोग भी रहें जो सम्बन्धित कागजात के साथ नहीं आये थे उन्होंने जल्द ही औपचारिकताए पूरी करने के लिए कहा। मालूम हो कि समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ ने  मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियो को लागू कराने के लिए इन दिनों बिगुल बजा रखा है। इस सम्बन्ध में शनिवार को पत्रकारों के प्रतिनिधि मण्डल ने जिलाधिकारी से मुलाकात की थी। उन्हें अपनी मांगों से सम्बन्धित ज्ञापन सौंपा था।

मजीठिया मामले में शासन तक पहुंची काशी से उठी फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग

काशी में  मजीठिया की लडाई की अगुवाई कर रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ की कोशिशें अब रंग लाने लगी है। पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए काशी से उठी फास्ट ट्रैक कोर्ट की मांग संबंधी ज्ञापन पर कार्रवाई की ओर कदम बढे हैं। समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन और काशी पत्रकार संघ का संयुक्त आवेदन पत्र पोर्टल पर दर्ज हो गया है, जिसका पंजीकरण क्रमांक 12197170191907 है| इसकी नवीनतम स्थिति जनसुनवाई पोर्टल / ऐप के माध्यम से देखा जा सकता है| संबंधित पत्र अपर मुख्य सचिव / प्रमुख सचिव / सचिव सूचना, को अग्रेतर कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दिया गया है| शनिवार को ही बनारस के डीएम के जरिए सीएम को ज्ञापन भेजा गया। डीएम से डीएलसी स्तर के मामलों की नियमित सुनवाई कराने की मांग रखी गई। इसपर डीएम योगेश्वर राम मिश्र ने वार्ता के दौरान मौजूद डीएलसी के प्रतिनिधि से साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों से संबंधित मुकदमों की सूची तैयार कर उनमें हो रही कार्यवाही का पूरा विवरण उपलब्ध करायें। उन्होंने कहा कि इसकी हर हफ्ते वे समीक्षा करेंगें। इस क्रम में डीएम ने कहा कि आठ अगस्त को वे खुद डीएलसी कार्यालय में एक घंटे बैठकर मुकदमों के प्रगति की समीक्षा करेंगे। डीएम ने यह भी निर्देश दिया कि मुकदमों में तीन दिन से ज्यादा की डेट न दी जाए। तीन से चार डेट में मुकदमों का निस्तारण हर हाल में सुनिश्चित किया जाए।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
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बनारस में मजीठिया मामले में मीडियाकर्मियों के मुकदमों की फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह होगी सुनवाई

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश की सांस्कृतिक राजधानी काशी से एक बड़ी खबर आ रही है। यहां जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर को लेकर पत्रकारों व गैर पत्रकारों की लड़ाईं लड़ रहे समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ की पहल पर अब डीएलसी स्तर तक के सभी तरह के मुकदमों की सुनवाई निर्धारित समय के भीतर पूरी होगी। इस आशय का आदेश जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्र ने शनिवार को समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन व काशी पत्रकार संघ के संयुक्त प्रतिनिधिमण्डल की बातों को सुनने के बाद दी।

प्रतिनिधि मण्डल में शामिल पत्रकारों ने डीएलसी स्तर पर मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक विलम्ब पर नाराजगी जतायी। डीएम ने वार्ता के दौरान मौजूद डीएलसी के प्रतिनिधि से साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों से सम्वन्धित मुकदमों की सूची तैयार कर उनमें हो रही कार्यवाही का पूरा विवरण उन्हें उपलब्ध करायें। उन्होंने कहा कि इसकी हर हफ्ते वे समीक्षा करेंगे। इस क्रम में डीएम ने कहा कि आठ अगस्त को वे खुद डीएलसी कार्यालय में एक घंटे बैठकर मुकदमों के प्रगति की समीक्षा करेंगेI

डीएम ने यह भी निर्देश दिया कि मुकदमों में तीन दिन से ज्यादा की डेट न दी जाए। तीन से चार डेट में मुकदमों का निस्तारण हर हाल में सुनिश्चित किया जाय। प्रतिनिधिमण्डल ने श्रम न्यायालयों में सम्बन्धित मुकदमों की जल्द सुनवाई के लिए “फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की प्रदेश सरकार से मांग से सम्बन्धित ज्ञापन डीएम के माध्यम से सीएम योगी आदित्यनाथ को भेजा’। इस सम्बन्ध मे पत्रकारों का प्रतिनिधिमण्डल मुख्यमंत्री से मिलने के लिए लखनऊ जाने वाला है।

प्रतिनिधिमण्डल में समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के मंत्री अजय मुखर्जी, काशी पत्रकार संघ अध्यक्ष सुमाष सिंह, महामंत्री अत्रि भारद्वाज, पूर्व अध्यक्ष विकास पाठक, पूर्व महामंत्री राजेन्द्र रंगप्पा के अलावा एके लारी,  रमेश राय, मनोज श्रीवास्तव, लक्ष्मी कांत द्विवेदी, जगाधारी, सुधीर गरोडकर, संजय सेठ आदि शामिल थे।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट

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अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करना ही होगा : कामगार आयुक्त

मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश महाराष्ट्र में लागू कराने के लिये बनायी गयी त्रिपक्षीय समिति की बैठक में महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त यशवंत केरुरे ने अखबार मालिकों के प्रतिनिधियों को स्पष्ट तौर पर कह दिया कि 19 जून 2017 को माननीय सुप्रीमकोर्ट के आये फैसले के बाद अखबार मालिकों को बचने का कोई रास्ता नहीं बचा है। अखबार मालिकों को हर हाल में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करनी ही पड़ेगी। श्री केरुरे ने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट ने जो आदेश जारी किया है उसको लागू कराना हमारी जिम्मेदारी है और अखबार मालिकों को इसको लागू करना ही पड़ेगा। इस बैठक की अध्यक्षता करते हुये कामगार आयुक्त ने कहा कि अवमानना क्रमांक ४११/२०१४ की सुनवाई के बाद माननीय सुप्रीमकोर्ट ने 19 जून 2017 को आदेश जारी किया है जिसमें चार मुख्य मुद्दे सामने आये हैं। इसमें वर्किंग जर्नलिस्ट की उपधारा २०(जे), ठेका कर्मचारी, वेरियेबल पे, हैवी कैश लॉश की संकल्पना मुख्य थी।

कामगार आयुक्त ने कहा कि अखबार मालिक २० (जे) की आड़ में बचते रहे हैं जबकि १९ जून २०१७ के आदेश में सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी श्रमिक पत्रकार और पत्रकारेत्तर कर्मचारी आयोग की तरह वेतन पाने के पात्र हैं। सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस आयोग का अधिक लाभ यदि एकाद कर्मचारी को मिल रहा हो तो भी अधिक से अधिक कर्मचारी इसके लाभ के पात्र हैं। ठेका कर्मचारी के मुद्दे पर उन्होने कहा कि सुप्रीमकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उक्त अधिनियम की धारा २(सी), २ (एफ) और २(डीडी ) में दिये गये वर्किंग जर्नलिस्ट एंड नान जर्नलिस्ट न्यूज पेपर इम्पलाईज की व्याख्या के अनुसार तथा मजीठिया वेतन आयोग की शिफारिश के अनुसार स्थायी और ठेका कामगार में फर्क नहीं है।  सुप्रीमकोर्ट का मानना है कि सभी ठेका कर्मचारी  को मजीठिया वेतन आयोग की शिफारिश के अनुसार वेतन देने की सीमा में शामिल नहीं किया गया है।  वेरियेबल पेय के मुद्दे पर उन्होने कहा कि माननीय सुप्रीमकोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्ट किया है कि केन्द्र शासन ने केन्द्र शासन के कर्मचारियोें के लिये ६ वें वेतन आयोेग की तर्ज पर मजीठिया वेतन आयोग ने देश के श्रमिक पत्रकार और पत्रकारेत्तर कर्मचारियों के लिये वेरियेबल पे की संकल्पना की है। भारी वित्तीय घाटे के मुद्दे पर श्री केरुरे ने माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा लिये गये निर्णय को त्रिपक्षीय समिति को बताया।

इस दौरान नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एनयूजे) महाराष्ट्र की महासचिव शीतल करंदेकर ने अध्यक्ष यशवंत केरुरे का ध्यान दिलाया कि अखबार मालिक फर्जी एफीडेविट दे रहे हैं। साथ ही लोकमत और सकाल अखबारों में अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड मांगने वालों की छंटनी कर रहे हैं। इस पर यशवंत केरुरे ने तीखी नाराजगी जतायी और कहा कि अखबार मालिक ऐसा नहीं कर सकते। मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन हर मीडियाकर्मी का अधिकार है और ये अधिकार उन्हें सुप्रीमकोर्ट ने दिया है। उन्होंने कहा कि कई अखबार मालिकों की ऐसी शिकायतें आ रही हैं कि वे मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन मांगने वाले कर्मचारियों को शोषण कर रहे हैं। इसे बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। इस बैठक में कामगार आयुक्त ने कहा कि किसी भी मीडियाकर्मी को मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन मागने पर अगर तबादला या परेशान किया गया तो वे इस मामले को निजी तौर पर भी गंभीरता से लेंगे।

शीतल करंदेकर ने इस दौरान एक अन्य मुद भी उठाया जिसमें अखबार मालिकों द्वारा जानबूझ कर मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू ना करना शामिल है। कामगार आयुक्त ने इस दौरान मालिकों के प्रतिनिधियों की बातों को भी समझा और आदेश दिया कि वे प्रेस रीलिज जारी करने जारहे हैं ताकि हर अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू करें। इस बैठक में बृहन्मुंबई जर्नलिस्ट यूनियन (बीयूजे) के एम जे पांडे, इंदर जैन आदि के अलावा वरिष्ठ लेबर अधिकारी श्री बुआ और सहायक कामगार आयुक्त शिरिन लोखंडे आदि भी मौजूद थीं। कामगार आयुक्त ने इस दौरान यह भी कहा कि अखबार मालिक अपनी अलग अलग यूनिट दिखा रहे हैं और बचने का रास्ता खोज रहे हैं तथा २ डी एक्ट का उलंघन कर रहे हैं। यह नहीं चलेगा। सुप्रीमकोर्ट ने इसपर भी व्याख्या कर दी है।   बीयूजे के एम जे पांडे ने कहा कि आज अखबार मालिक क्लासिफिकेशन के नाम पर बचते आरहे हैं और उनकी आयकर विभाग से  बैलेंससीट मंगाने की जरुरत है इस पर उन्होने कहा कि हम इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इंदर जैन ने भी मीडियाकर्मियों का पक्ष रखा।

शशिकांत सिंह
पत्रकार, आरटीआई एक्सपर्ट और मजीठिया सेल समन्वयक (एनयूजे महाराष्ट्र)
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हिमाचल प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्‍टस यूनियन गठित, मजीठिया को लेकर निर्णायक जंग की तैयारी

मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू करवाने और प्रबंधन के उत्‍पीड़न के खिलाफ पिछले दिन वर्षों से लड़ाई लड़ रहे वरिष्‍ठ पत्रकार रविंद्र अग्रवाल के प्रयासों से हिमाचल प्रदेश में पहली बार पत्रकार एवं गैर-पत्रकार अखबार कर्मियों की यूनियन का गठन कर लिया गया है। हिमाचल के कई पत्रकार और गैरपत्रकार साथी इस यूनियन के सदस्‍य बन चुके हैं और अभी भी सदस्‍यता अभियान जारी है। एक जून को इस हिमाचल प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्‍टस यूनियन(एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू) के नाम से गठित इस कर्मचारी यूनियन में पत्रकार और गैरपत्रकार दोनों ही श्रेणियों के अखबार कर्मियों को शामिल किया जाएगा। नियमित और संविदा/अनुबंध कर्मी भी यूनियन के सदस्‍य बन सकते हैं, वशर्ते इनका पेशा सिर्फ अखबार के कार्य से ही जुड़ा होना चाहिए।

इस यूनियन का प्रदेश अध्‍यक्ष सर्वसम्‍मति से रविंद्र अग्रवाल को बनाया गया है। महासचिव की जिम्‍मेवारी कपिल देव को दी गई है। अन्‍य पदाधिकारियों में मुरारी शर्मा को वरिष्‍ठ उपाध्‍यक्ष, उदयवीर पठानिया व वासूदेव नंदन को उपाध्‍यक्ष, टीना ठाकुर व नवनीत बत्‍ता को सचिव और रामकेवल सिंह को कोषाध्‍यक्ष चुना गया है। इस यूनियन की संबद्धता इंडियन फैडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्‍ट़स(आईएफडब्‍ल्‍यूजे), नई दिल्‍ली से ली गई है। एचपीडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष रविंद्र अग्रवाल व सचिव कपिल देवी ने एक संयुक्‍त बयान में बताया कि इस यू‍नियन के गठन का मकसद हिमाचल प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकार और गैरपत्रकार अखबार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान व एरियर दिलवाने के साथ ही इनकी समस्‍याओं को सरकारी व कानूनी स्‍तर पर सुलझाना रहेगा। इन्‍होंने कहा कि मजीठिया वेजबोर्ड को लागू करवाने के लिए प्रदेश सरकार और श्रम विभाग अब तक ढुलमुल नीति अपनाए हुए हैं।

यूनियन जल्‍द ही इस संबंध में मुख्‍यमंत्री वीरभद्र सिंह, श्रम मंत्री मुकेश अग्निहत्री और श्रम विभाग के आयुक्‍त हिमांशु शेखर चौधरी को ज्ञापन भेज कर अखबार कर्मियों की चिंताओं से अवगत करवाएगी। साथ ही मजीठिया वेजबोर्ड की मांग करने वाले पत्रकारों के तबादलों और जबरन इस्‍तीफे लिए जाने की अखबार प्रबंधनों की कार्रवाई की भी यूनियन कड़े शब्‍दों में नींदा करती है। एचपीडब्‍ल्‍यूजे के अध्‍यक्ष रविंद्र अग्रवाल ने कहा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और रूख से एक बात तो स्‍पष्‍ट हो चुकी है कि अखबार प्रबंधन अपने कर्मचयारियों को मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार वेतनमान और एरियर देने से नहीं बच सकते। भेले ही अब वे दबमनकारी नीतियों के चलते अखबार कर्मियों की आवाज को दबाए हुए हैं, मगर जल्‍द ही हिमाचल प्रदेश के समस्‍त कर्मी एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू के बैनर तले एकत्रित होकर निर्णायक लड़ाई शुरू कर देंगे। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि यह लड़ाई किसी समाचार स्‍थापना में प्रबंधन विरोधी गतिविधियों से जुड़ी कतई नहीं होगी, बल्कि कानूनी तौर पर अखबार कर्मियों के संवैधानिक हकों हो प्राप्‍त करने के तौर पर होगी। इस संबंध में जल्‍द ही यूनियन की वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई जाएगी।

उन्‍होंने कहा कि अखबार कर्मियों के हितों के लिए यूनियन कानूनी जंग लड़ने को तैयार है। इससे पहले प्रदेश सरकार और श्रम विभाग को वर्किंग जर्नलिस्‍टस एक्‍ट,1955 के प्रावधानों सहित मजीठिया वेजबोर्ड अवार्ड को लागू करवाने के लिए अनुरोध किया जाएगा, अगर अब भी प्रदेश सरकार और श्रम विभाग अखबार प्रबंधन के दबाव में आकर कार्रवाई से परहेज करते हैं तो इनके खिलाफ माननीय सर्वोच्‍च न्‍यायल के आदेश लागू न करवाने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। रविंद्र अग्रवाल ने कहा कि प्रदेश के श्रमजीवी पत्रकार एवं गैर पत्रकार अखबार कर्मी मोबाइल नंबर 9418394382(wattsapp) या मेल आईडी hpwjunion@gmail.com पर अपनी समस्‍या या सुझाव भेज सकते हैं। रविंद्र अग्रवाल ने एचपीडब्‍ल्‍यूजेयू को संबद्धता देने के लिए आईएफडब्‍ल्‍यूजे के महासचिव एवं परमानंद पांडेय का आभार भी व्यक्‍त किया है।

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मजीठिया वेज बोर्ड मामले में प्रभात खबर के पत्रकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर किया

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में एक बड़ी खबर आ रही है। प्रभात खबर के आरा के ब्यूरो चीफ मिथलेश कुमार के मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा सुनाए गए फैसले में कुछ कमियों को दूर करने के लिए उनके एडवोकेट दिनेश तिवारी ने माननीय सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर दिया है। इस खबर की पुष्टि मंगलवार 18 जुलाई को देर रात खुद मिथलेश कुमार ने फोन पर हुई बातचीत में किया है।

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट द्वारा 19 जून 2017 को देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों के पक्ष में फैसला सुनाया गया था मगर इसमें कुछ कमियां रह गयी थी। दैनिक प्रभात खबर के बिहार के आरा के ब्यूरोचीफ मिथलेश कुमार के मामले में उनके एडवोकेट दिनेश तिवारी ने 18 जुलाई को सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर दिया है। मीडिया कर्मियों के कई वकीलों ने सुप्रीमकोर्ट के फैसले में कुछ संशोधन की मांग को लेकर रिव्यू पिटीशन दायर करने का ऐलान किया था। मिथलेश कुमार ने पुष्टि की है कि एडवोकेट दिनेश तिवारी ने उनके मामले में रिव्यू पीटीशन दायर कर दिया है।

माननीय सुप्रीमकोर्ट ने 19 जून 2017 को सुनाए अपने फैसले में साफ निर्देश दिया था कि अखबार मॉलिकों को हर हाल में जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ देना ही पड़ेगा। साथ ही यह लाभ उन कर्मचारियों को भी देने का निर्देश दिया गया था जो ठेका पर काम करते हैं। मिथलेश कुमार का ट्रांसफर प्रभात खबर प्रबंधन ने कर दिया था जिस पर वे अपने एडवोकेट के जरिये सुप्रीमकोर्ट तक पहुंच गए थे। प्रभात खबर ने मिथलेश कुमार का ट्रांसफर झारखंड के चाईबासा में कर दिया था और वे सुप्रीमकोर्ट से अपने पक्ष में स्टे भी ले आये मगर फिर भी प्रभात खबर ने उन्हें पुरानी जगह पर ज्वाइन नही कराया। फिलहाल मिथलेश कुमार के मामले में रिव्यू पिटीशन दायर होने से मीडिया कर्मी अब सुप्रीमकोर्ट के अगले कदम पर नजर गड़ाए हैं।

शशिकांत सिंह

पत्रकार और आर टी आई एक्सपर्ट

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क्या नोएडा के डीएलसी रहे बीके राय दैनिक जागरण के आदेशपाल की तरह काम करते थे?

माननीय सुप्रीम कोर्ट से मजीठिया को लेकर जो फैसला आया, उसको मालिकानों ने अपने काम कर रहे वर्कर के बीच गलत तरह से पेश किया। उदाहरण के तौर पर दैनिक जागरण को लेते हैं। सभी जानते हैं कि दैनिक जागरण का रसूख केंद्रीय सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक में है। इनके प्यादे अक्सर इस बात की धौंस मजीठिया का केस करने वाले वर्करों को देते रहते हैं कि रविशंकर प्रसाद, जेटली जी और पी एम मोदी जागरण की बात सुनते हैं। देश में ऐसा कौन है जो जागरण की बात नहीं मानेगा? इन नेताओं की आय दिन तस्वीरें जागरण के मालिकानों के साथ अख़बारों में छपती रहती हैं। देखें तो, प्यादों की बात सही भी है, क्योंकि यह सब जागरण के वर्करों ने देखा भी है। तभी तो जागरण के मालिकान और मैनेजमेंट बेख़ौफ़ होकर किसी भी दफ्तर में गलत तर्क या गलत शपथ पत्र देते नहीं हिचकते हैं।

पर सच यह भी है कि ऐसा करके मालिकान या इनके प्यादे सिर्फ वर्कर को परेशान करते हैं और इस काम में उनके सहयोगी बनते हैं सरकारी अफसर। नोएडा जागरण की बात करें, तो यहाँ के वर्कर की मजीठिया मामले को लेकर हुए टर्मिनेशन और उसको लेकर हुई कुछ सुनवाइयों के दृश्य यहाँ उल्लेखनीय हैं। एक बार नोएडा के डी एल सी कार्यालय में तारीख के मुताबिक सवा दो सौ टर्मिनेट वर्कर की भीड़ आयी थी। कुछ लोग अंदर यानी डी एल सी के कमरे में थे बाकि सब बाहर खड़े थे। इन सुनवाइयों के दौरान अजीब दृश्य तब उत्पन्न होता था, जब डी एल सी महोदय यानी श्री बी के राय वर्कर को देखने के बाद मुस्कुराते हुए कहते, आज तारीख है क्या? वर्कर जब कहते कि जी सर, आज तारीख है। आपने 3 बजे बुलाया था। तब वे कहते, अच्छा ठीक है। फिर श्री राय अपने मोबाइल से फोन करते जागरण के कुछ अधिकारियों को। एक ने नहीं सुनी तो दूसरे को, दूसरे ने नहीं सुनी तो तीसरे को, तीसरे ने नहीं सुनी तो…..। कुल मिलाकर वर्करों को यह पता चल जाता था कि श्री राय के मोबाइल में जागरण नोएडा के सभी प्यादे के मोबाइल नंबर फीड हैं। यहाँ तक कि बिचौलिये का भी।

अजीब तो तब लगता, जब किसी एक प्यादे का नंबर लग जाता, तो श्री बी के राय दुआ सलाम करने के बाद यह पूछते कि आपके वर्कर आये हुए हैं, आप क्या कहते हैं? फिर उधर से जो जवाब मिलता था, उनके चेहरे के भाव से पता चल जाता था जैसे श्री राय यूपी के एक डीएलसी नहीं, जागरण के आदेशपाल हों। फिर ये गिड़गिड़ाते कि आ जाइये न, आ जाते तो अच्छा होता। उनके इस आग्रह और विनय पर कभी एक घंटे तो कभी दो घंटे बाद जागरण का कोई प्यादा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा या फिर कोई बिचौलिया, जो जागरण और डी एल सी के बीच तमाम दूसरे केसों में भी शामिल होता है, आता और वह आएं, बाएं, साएं बोलकर आगे की तारीख लेता और चला जाता। इन वार्ताओं के दौरान डी एल सी साहब का रवैया एक समर्थ सरकारी अफसर जैसा न होकर ऐसा होता था, जैसे वह खरीदार और बेचने वाले के बीच का इंसान हो।

माना जा सकता है कि कमोवेश यही स्थिति हर राज्य के डी एल सी की होगी। अख़बार के मैनेजर और प्यादे इन्हें जूते की नोंक पर रखते होंगे और ये अफसर अपनी औकात भूलकर या तो कमाने या फिर डर के मारे या नौकरी बचाने के लिए ऐसा करने को मजबूर होते होंगे कि कहीं मालिकान आलाकमान से शिकायत न कर दें और डी एल सी साहब का तबादला, मऊ, बलिया, जौनपुर, अमरोहा या बाराबंकी न हो जाये, जहाँ न तो नोएडा जैसा काम है और न नोएडा जैसी कमाई।

सूत्र यह भी बताते हैं कि नोएडा में या तो मंत्री जी के खास लोगों की पोस्टिंग होती है या फिर उनकी, जो…. । बावजूद इसके आज की बात करें, तो हालिया आये माननीय सुप्रीम कोर्ट के आर्डर ने मालिकानों का चैन छीन लिया है। अब उसके दिल से डर नहीं जा रहा है। कोई जाने या न जाने, पर मालिकान जानता है कि अवमानना का जिन्न कभी भी उसकी गिरेबान पकड़ सकता है और वर्करों द्वारा इसकी तैयारी भी चल रही है। आये आदेश के मुताबिक इस बार मालिक वर्करों का पैसा देने में अगर चूके, तो अख़बार मालिकानों को जेल जाने से कोई नहीं बचा सकेगा।

दूसरी ओर डी एल सी, जो मालिकानों द्वारा वर्करों के केस में डराये, धमकाये, या सताए गए या जाते रहे हों, माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर उनके लिए ढाल बनकर आया है। वे अब उसका सहारा ले सकते हैं और मालिकानों से कह सकते हैं कि अगर मैंने गलत किया तो मेरी नौकरी चली जायेगी। …और यह सच भी है, क्योंकि अब किसी गलती पर वर्कर उन्हें नहीं छोड़ेंगे और आगे की अदालत में जायेंगे। जाहिर है, फिर उनकी भी शामत आएगी, जो गड़बड़ करेंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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सेवानिवृत्त मीडियाकर्मी भी अपना हक लेने के लिए मीडिया मालिकों के खिलाफ मैदान में कूदे

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अवमानना के केस में माननीय सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है, उसके बाद अख़बार कार्यालयों से अपनी सेवा से निवृत हो चुके वर्कर भी अब इस लड़ाई में कूद पड़े हैं। जाहिर है, मालिकान ने अभी तक जो पैसा दिया है, वह मजीठिया के अनुसार नहीं दिया है। पिछले दिनों पटना के कुछ रिटायर वर्करों ने अखबार मालिकानों पर अपना दावा लिखित रूप से ठोंका। सूत्र बताते हैं कि इनकी संख्या बारह के करीब है। इस कड़ी में आगे कुछ और लोगों के जुड़ने की उम्मीद है और आशा की जानी चाहिए कि यह आग धीरे धीरे पूरे देश में लगेगी।

मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। तत्कालीन जारी गैजेट में इसका उल्लेख भी है कि वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग एक बात और जो माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अख़बार मालिकानों से दोबारा कही है, वह यह है कि अख़बार मालिकानों को अपने यहाँ हर हाल में 7 फरवरी 2014 से वर्करों को देने वाली सैलरी को मजीठिया के हिसाब से लागू करना ही है।

जिस अख़बार ने इसे लागू नहीं किया और जुलाई में मिली वेतन पर्ची के साथ उसका कोई वर्कर यदि कोर्ट में चला गया तो वह माननीय सुप्रीम कोर्ट की अवमानना में जेल जायेगा। बस वर्कर को यह साबित करना होगा कि अख़बार समूह किस ग्रेड में है और वह किस ग्रेड का वेतन अपने वर्कर को दे रहा है। ग्रेड साबित करने के लिए अख़बार का वार्षिक टर्नओवर देना होगा। अगर अख़बार या समूह का टर्नओवर 1000 करोड़ है, तो वह ए ग्रेड में  आएगा। 500 से 1000 के बीच का है, तो बी ग्रेड में आएगा। मेरा मानना है, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि ए ग्रेड में आएंगे।

जो भी अख़बार कर्मचारी रिटायर हुए हैं, वे इस उपरोक्त साल और मजीठिया के हिसाब से एक अंदाजा लगा सकते हैं कि उन्हें और कितनी राशि मिलेगी। मेरा तो सीधा मानना है कि ज़िन्दगी भर में कोई अख़बार कर्मी अगर रिटायर होने के बाद 5 से 7 या 10 लाख रूपए जोड़ता है, तो इस समयावधि में आने वाले वर्कर और अच्छी रकम पाने के हकदार होते हैं। बस उन्हें कोर्ट में लड़ना होगा, क्योंकि कोर्ट का यह आदेश है कि जो केस में जायेगा, वही मजीठिया पायेगा। भले ही मालिकान या उनके प्यादे वर्कर को गलत तरह से समझाते हैं, पर वे जानते हैं कि उनकी जान दिनों दिन सांसत में फंसती ही जा रही है। रिटायर वर्कर का क्या जाना है, वे सब कुछ ले चुके हैं। उन्हें केस लगाकर जो भी मिलेगा, बोनस ही होगा वह भी ज़िन्दगी भर की कमाई से 2 या 3 गुना ज्यादा।

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वर्कर को सैलरी हालिया माह में नहीं मिली, तो उसके मालिकानों को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। माननीय सुप्रीम कोर्ट की बात अगर याद हो तो उन्होंने अख़बार मालिकानों को स्पष्ट तौर पर यह कह दिया है कि उन्हें वह एक मौका दे रहे हैं और मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से उन्हें अपने यहाँ हर हाल में वेतन लागू कर देना है। इसके लिए कोर्ट ने तारीख भी फिर से स्पष्ट कर दी है यानि 7 फरवरी 2014 से यह मान्य होगी। वर्कर के वकील अब इस लाइन पर आगे बढ़ रहे हैं और तैयारियों में जुटे हैं कि आगे मालिकानों को कैसे गिरफ्त में लिया जाए!

अब यह भी तय है कि जिन वर्करों को कंपनी ने 7 फरवरी 2014 के बाद चाहे जिस बहाने से निकाला है, वे सीधे तौर पर अवमानना के केस में अपनी सैलरी स्लिप दिखाकर कोर्ट जा सकते हैं कि यह रही मेरी सैलरी स्लिप और मुझे इसका लाभ अब भी नहीं मिला है। यहाँ एक बात और उल्लेखनीय है कि जिन लोगों ने अवमानना का केस माननीय सुप्रीम कोर्ट में किया था, उनमें बहुत से ऐसे थे, जिन्होंने 20जे के कंसेंट पर साइन नहीं किया था। इस आधार पर भी कोर्ट मालिकानों को अवमानना का दोषी करार दे सकता है। जरूरत है सही तरह से कोर्ट में अपनी बात रखने की और कोर्ट को समझाने की। यदि ऐसा हुआ, तो भी मालिकान जेल जा सकते हैं। कुल मिलाकर मजीठिया का जिन्न अख़बार मालिकानों को फ़िलहाल तो जकड़े ही रहेगा। वर्कर और उनके वकील गुरिल्ला युद्ध की तरह हमेशा तैयारी करते रहेंगे। इससे मुक्ति तभी मिलेगी, जब मालिकान अपने यहाँ सही तौर पर मजीठिया के अनुसार वेतन लागू कर देंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद श्रम अधिकारियों का रवैया बदला है

सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया को लेकर जो फैसला दिया है, उसके बाद हर जिले के डीएलसी आफिस यानी सहायक श्रम आयुक्त कार्यालय के हर कर्मचारियों का रवैया बदला है। इन कर्मचारियों का रुख इसलिए बदला है कि 19 जून 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के आये फैसले में यह स्पष्ट लिखा है कि मजीठिया वेतन आयोग के मामले में सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के क्या दायित्व होंगे। यही वजह है कि मजीठिया का मामला 19 जून के बाद जहां भी शुरू हुआ है, मालिकान की तरफदारी करने वाले सभी सरकारी अधिकारी का रवैया बदला है।

पहले इनकी बातों से, इनके काम करने के तरीकों से, इनके हाव भाव से स्पष्ट होता था जैसे ये अख़बार मालिकानों की नौकरी करते हों। वर्कर की मदद के लिए बनाये गए ये अफसर सही में मालिकानों के लिए काम करने में जुटे होते थे, लेकिन मजीठिया मामले के आये आदेश के बाद इनका मिजाज और काम करने का अंदाज़ बदला है। हालांकि माना यह भी जाता है कि ये किसी न किसी तरह अब भी मालिकान के लिए काम करेंगे। इसलिए अब वर्करों को भी इनसे सतर्क रहना होगा। इन पर नज़र भी रखनी होगी, इनकी कार्य करने के तरीके को समझना होगा और वर्कर को आगे बढ़ने के लिए तैयार रहना होगा, मसलन हाई कोर्ट और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इनकी शिकायत करने के लिए।

माननीय सुप्रीम कोर्ट से आये आदेश का डर सरकारी अफसर के मन में हुआ है। यही वजह है कि इन दिनों जहाँ भी मजीठिया का केस चल रहा है, अफसर इस काम को करने में देर नहीं लगा रहे हैं। पिछले दिनों राजस्थान पत्रिका का मामला वर्करों के लिए खुश करने वाला था। वहां जीतेन्द्र जाट के मामले में लेबर कोर्ट ने पत्रिका प्रबंधन से नौकरी पर रखने के लिए कहा। अभी कानपुर में दैनिक जागरण के वर्कर का मामला भी ऐसा ही सुना गया। कोर्ट ने जागरण की एक नहीं सुनी और लगातार सुनवाई करने की बात की। दो दिन सुनवाई हुई, जिसके बाद जागरण ने कोर्ट के आगे गिड़गिड़ाया कि सर एक तारीख आप अपनी मर्ज़ी से दे दें, तब कोर्ट ने एक सप्ताह की मोहलत दी। जागरण ने पिछले दिनों पंजाब के जालन्धर में भी सरकारी बाबू के आगे हाथ जोड़े और वर्कर के वकील से मिलकर और उन्हें लोभ देकर मामले को निपटाने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी।

कुल मिलाकर वर्कर के पक्ष में हवा चली है और इसका श्रेय जाता है माननीय सुप्रीम कोर्ट को, जिनके फैसले ने मालिकानों की हर चाल को जकड़ रखा है। मालिकान तन से हारे अभी भले ही नहीं दिख रहे हैं, पर वे जल्दी ही तन और मन दोनों से हारे नज़र आएंगे। वर्करों का धन उन्हें देना ही पड़ेगा। संभव है, अख़बार मालिकानों के खिलाफ मजीठिया के केस जहां भी चल रहे होंगे, कमोवेश सभी सरकारी अफसर की नीयत अब बदली सी होगी और ये मालिकान के प्यादे सरकारी दफ्तर से पालतू की तरह भगाए जा रहे होंगे। बाबजूद हमें उस कहावत को नहीं भूलना चाहिए कि कुत्ते की दुम को सालोंसाल चोंगे में यानी पाइप में डाल कर छोड़ दो, वह तब भी सीधी नहीं होगी। सरकारी अफसर थोड़े बदल भी जाएँ, मालिकान के ये प्यादे कभी भरोसे के लायक नहीं हो सकते।

मजीठिया क्रन्तिकारी और पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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अपने अखबार मालिकों के धंधों का काला चिट्ठा निकालिये, मजीठिया लेने में काम आएंगे

एक-दो अख़बारों को छोड़ दें तो सभी अख़बार या अख़बार समूहों में वेतन को लेकर कोई न कोई लोचा जरूर है। सवाल वही है कि अगर किसी आयोग ने हमारी तनख्वाह 2000 रूपये तय की है और मालिकान हमें 1995 रुपये दे रहे हैं, तो 5 रुपये की गड़बड़ी तो मालिकान ने की ही है। फिर इस लिहाज से आयोग के आदेश का सही तरह से पालन कहां हुआ? सरकार द्वारा मंजूर इस देनदारी को अख़बार मालिकानों ने सही तरह से नहीं निभाया है।

मजीठिया का लाभ 2008 की जनवरी से मिलना तय हुआ है। गैजेट ऑफ़ इंडिया में भी इसका उल्लेख है कि मालिकानों को वर्कर के बेसिक वेतन का 30 प्रतिशत 2008 से 10 नवम्बर 2011 तक देना है। फिर 11 नवम्बर 2011 से लेकर आज तक मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन मिलना है। इनसे अलग यह बात माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मालिकानों से दोबारा कही है कि अख़बार मालिकान अपने कर्मचारियों को 7 फरवरी 2014 से जो सेलरी देंगे, वह मजीठिया के हिसाब से देंगे। इसे अभी तक किसी अख़बार ने लागू नहीं किया है और मिली सेलरी स्लिप को लेकर अगर कोई वर्कर कोर्ट में चला गया, तो मालिक अवमानना के केस में फंसेगा और वर्कर को पैसे देगा।

देखें तो टर्नओवर और एक्ट के हिसाब से दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, राष्ट्रीय सहारा, पंजाब केसरी, प्रभात खबर, अमर उजाला, नवभारत, हरिभूमि, अजीत समाचार, दबंग दुनिया, लोकमत आदि अख़बार ‘ए’ ग्रेड में आएंगे। इनमें बहुत से मालिकान ने अपने कुछ अन्य कामों को छिपाया हुआ है। आपको इनके अन्य कामों को उजागर करने में लग जाना है। इन उपरोक्त अख़बारों में से कुछ मालिकानों ने अपना टर्नओवर सरकार के सामने गलत पेश किया है। कुछ के कागजात निकाले गए हैं। आप सब भी अपनी कम्पनी और मालिकानों से जुड़े अन्य धंधे का काला चिट्ठा निकालिये। वे आगे सबूत के तौर पर काम आएंगे। फिर सरकार को हम बताएंगे कि फलां कम्पनी ने सेबी या अन्य जगह झूठे कागजात पेश किये हैं। फिर इनका हश्र क्या होगा, दुनिया देखेगी।

19 जून को जो आर्डर सुप्रीम कोर्ट से आया है, मजीठिया को लेकर, वह स्पष्ट है। इस आदेश के परिप्रेक्ष्य में अब न तो सरकारी कर्मचारी कोई हीलाहवाली करेंगे और न ही कोई और। मालिकान को झूठ बोलने और बरगलाने का अवसर अब न तो डीएलसी देगा और न लेबर कोर्ट। अब न अख़बार की धौंस चलेगी और न मनमानी। अब सब मान चुके हैं कि माननीय सुप्रीम कोर्ट से बड़ा यहाँ कोई नहीं है। इसलिए अब वर्कर अपने पैसे मालिकानों से आसानी से ले सकेंगे। कुछ वक्त भले ही लग जाये, 6 या 8 महीना।

वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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अगर आप प्रिंट मीडिया से रिटायर हुए हैं या नौकरी से निकाले गए हैं तो पा सकते हैं लाखों रुपये, जानें कैसे

जो मीडियाकर्मी दुनिया में नही हैं उनके परिजन भी पा सकते हैं मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ… जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए वे मीडियाकर्मी भी सामने आ सकते हैं जो वर्ष 2008 से 18 जुलाई 2017 के बीच सेवानिवृत हुए हैं। यही नहीं, अगर कंपनी ने आपको इस अवधि के दौरान नौकरी से निकाल दिया है तो ऐसे लोग भी लाखों रुपये पा सकते हैं।

आपको बता दें कि जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट का स्पष्ट आदेश आ चुका है। इस आदेश को संज्ञान में लेकर अखबार मालिकों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ उन प्रिंट मीडिया कर्मियों को देना ही पड़ेगा जो वर्ष 2008 से अब तक यानि जुलाई 2018 के बीच रिटायर हो चुके हैं। यही नहीं, अगर किसी मीडियाकर्मी का इस अवधि में निधन हो गया है और वे निधन से पूर्व इस अवधि में ड्यूटी पर थे तब भी उनके घर वाले मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार मृतक के आश्रित के रूप में या किसी अन्य को इस बाबत सुनवाई में उपस्थित रहने का अधिकार पत्र देकर लाखों रुपये का अपना बकाया ले सकते हैं।

ये बकाया चालीस लाख रुपये तक हो सकता है। सभी मीडियाकर्मियों से निवेदन है कि अगर आपका कोई परिचित मीडियाकर्मी इस समयावधि (2008 से 2017) के बीच रिटायर हुआ है, टर्मिनेट किया गया है या उसने त्यागपत्र दिया है तो ऐसे मीडियाकर्मी को ढूंढे तथा उनकी मदद करने के लिए आगे आएं। यही नहीं, अगर कोई प्रिंट मीडिया कर्मी चाहे वह किसी भी विभाग में काम करता हो, अगर उसकी मृत्यु हो चुकी है और वह 2008 से 2017 के बीच ड्यूटी पर था या इस दौरान रिटायर हुआ था तो उसके परिजनों को खोजकर उनसे मजीठिया वेज बोर्ड के तहत 17(1) का लेबर विभाग में क्लेम लगवाएं। अगर कहीं किसी को कोई दिक्कत आए तो आप मजीठिया क्रांतिकारी शशिकांत सिंह से 9322411335 पर संपर्क कर सकते हैं।

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कोर्ट ने दैनिक जागरण को लगाई फटकार, रोज होगी मजीठिया की सुनवाई

कानपुर से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों के लिए एक अच्छी खबर आ रही है. आज कानपुर लेबर कोर्ट ने दैनिक जागरण समूह की कंपनी जागरण प्रकाशन लिमिटेड को कड़ी फटकार लगाई. आज मजीठिया वेज बोर्ड मामले की सुनवाई थी. सुनवाई के दौरान जब जागरण प्रकाशन का नंबर आया तो जागरण प्रकाशन की तरफ से कोई मौजूद नहीं था. वकील ने कोर्ट से अगली तारीख देने की अप्लीकेशन लगा दी.

इस पर मीडियाकर्मियों और उनके वकील ने आपत्ति जताई. मीडियाकर्मियों के वकील ने कहा कि जागरण के लोग लगातार कोर्ट को गुमराह कर समय नष्ट कर रहे हैं. ये लोग लगातार हीलाहवाली कर रहे हैं ताकि कोर्ट का समय बर्बाद हो और क्लेम करने वाले थक हार कर घर बैठ जाएं. मजिस्टेट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद जागरण प्रकाशन के वकील को फटकार लगाई.

मजिस्ट्रेट ने जागरण के रवैये पर आपत्ति जताते हुए कहा कि अगर इन लोगों को समय चाहिये तो हम बस एक दिन का समय देते हैं. कल यानी 12 जुलाई को आइए. अब मजीठिया की प्रतिदिन तारीख लगेगी और प्रतिदिन सुनवायी होगी. इतना सुनते ही मीडिया कर्मियों के चेहरे खुशी से खिल गये और जागरण का वकील मुंह लटकाए खड़ा रहा.

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मजीठिया : पत्रिका को पत्रकार जितेंद्र जाट का तमाचा, लेबर कोर्ट में जीते टर्मिनेशन का केस

कल 10 जुलाई यानि सावन के पहले सोमवार को एक शुभ समाचार आया। पत्रिका अखबार के मालिक गुलाब कोठारी और उनके ख़ास सिपहसालारों की हार की शुरुआत हो गई है। पत्रिका के मालिकों के खिलाफ जब कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना के केस लगाये तो पत्रिका प्रबन्धन ने संबंधित कर्मचारियों को टर्मिनेट-ट्रान्सफर करना शुरू कर दिया। टर्मिनेशन-ट्रान्सफर के खिलाफ कर्मचारी लेबर कोर्ट गए।

उन टर्मिनेट कर्मचारियों में से मेरे एक पत्रकार साथी जितेंद्र जाट भी थे जिन्होंने ग्वालियर लेबर कोर्ट में टर्मिनेशन को चुनौती दी जिसका फैसला कल आ गया। इसमें जितेंद्र जाट की जीत और पत्रिका के मालिकों की करारी हार हुई। लेबर कोर्ट ने पत्रकार जितेंद्र जाट को बहाल करने के आदेश पत्रिका अखबार के प्रबंधन को दिए हैं। यह पत्रिका के हार की शुरुआत है।

पत्रकार विजय शर्मा की एफबी वॉल से.

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भास्कर समूह की कंपनी डीबी कार्प के खिलाफ कट गई आरसी, मजीठिया क्रांतिकारियों का बकाया देने के लिए संपत्ति होगी नीलाम

BHASKAR

मजीठिया मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महाराष्ट्र में कटी पहली आरसी… दैनिक भास्कर और दिव्य भास्कर समेत कई अखबारों को संचालित करने वाली भास्कर समूह की कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड के माहिम और बीकेसी कार्यालय को नीलाम कर कर्मचारियों को बकाया पैसा देने का आदेश…

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 19 जून को सुनाए गए फैसले के बाद देश भर के श्रम / कामगार विभाग सक्रिय हो गए हैं। महाराष्ट्र से इस संबंध में बड़ी खबर आ रही है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में पहला रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) महाराष्ट्र में जारी कर दिया गया। अपने आप को देश का नंबर वन अखबार बताने वाले दैनिक भास्कर की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड के खिलाफ महाराष्ट्र में पहला रिकवरी सर्टिफिकेट (आरसी) यहां के लेबर विभाग ने जारी किया है।

इस रिकवरी सर्टिफिकेट में मुंबई के जिलाधिकारी को निर्देश दिया गया है कि डीबी कॉर्प लिमिटेड की संपत्ति को नीलाम कर वह बकायेदारों का बकाया दिलाएं। यह रिकवरी सर्टिफिकेट दैनिक भास्कर के मुंबई ब्यूरो में कार्यरत प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट (एंटरटेनमेंट) धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, इसी अखबार की रिसेप्शनिस्ट लतिका आत्माराम चव्हाण और आलिया इम्तियाज शेख के मामले में जारी किया गया है। इसे मुंबई शहर की सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने 1 जुलाई, 2017 को जारी किया है।

आपको बता दें कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह सहित लतिका चव्हाण और आलिया शेख ने दैनिक भास्कर की प्रबंधन कंपनी डीबी कॉर्प लिमिटेड से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार अपने बकाए की मांग करते हुए स्थानीय श्रम विभाग में वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17 (1) के तहत क्लेम किया था। महाराष्ट्र के कामगार आयुक्त कार्यालय की सहायक कामगार आयुक्त नीलांबरी भोसले ने इस मामले में लंबी सुनवाई की और दोनों पक्षों को गंभीरता से सुनने के बाद पाया कि धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण तथा आलिया शेख द्वारा मांगा गया बकाया सही है।

इसके बाद सुश्री भोसले ने पहले आर्डर (नोटिस) जारी किया कि डीबी कॉर्प इन कर्मचारियों का बकाया पैसा फौरन अदा करे। मगर 20-25 दिन गुजर जाने के बाद भी जब उक्त प्रबंधन के कानों पर जूं नहीं रेंगी तो उन्होंने जुलाई महीने की पहली तारीख को डीबी कॉर्प के विरुद्ध बकाए की वसूली के लिए रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर दिया है।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की बकाया राशि 18 लाख 70 हजार 68 रुपए, लतिका आत्माराम चव्हाण की 14 लाख 25 हजार 988 रुपए और आलिया शेख की 7 लाख 60 हजार 922 रुपए है। आरसी के मुताबिक इसमें 30% (अंतरिम राहत) की राशि को जोड़ना शेष है, किंतु संपूर्ण धनराशि पर 18% की दर से मांगी गई ब्याज की रकम का जिक्र नहीं है! वैसे इन तीनों रिकवरी सर्टिफिकेट से एक नया रिकॉर्ड तो बन ही गया है।

आरसी में धर्मेन्द्र प्रताप सिंह, लतिका चव्हाण तथा आलिया शेख का बकाया पैसा दिलाने के लिये डीबी कॉर्प की उन अचल संपत्तियों का विवरण भी दिया गया है जिसे जरूरत पड़ने पर नीलाम कर तीनों मांगकर्ताओं को पैसा दिया जाना है। इसमें मुंबई स्थित माहिम कार्यालय के अतिरिक्त डीबी कॉर्प का बीकेसी (बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स) स्थित नमन चैंबर्स वाला कार्यालय भी शामिल है।

धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के अलावा लतिका चव्हाण और आलिया शेख ने यह क्लेम सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता और मजीठिया वेज बोर्ड मामले में देश भर के मीडियाकर्मियों के पक्ष में लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा के दिशा-निर्देश पर किया था। सो, माननीय सुप्रीम कोर्ट का आर्डर आने के बाद कटी इस पहली आरसी से उन अखबार मालिकों का अहंकार जरूर टूटेगा, जो अब तक यही सोच रहे थे कि मीडियाकर्मी मुकदमा हार गये हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें हर हाल में लागू करनी ही पड़ेंगी।

मुंबई से पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335 या shashikantsingh2@gmail.com

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सुप्रीम कोर्ट ने मजीठिया को लेकर मीडियाकर्मियों की लड़ाई को लेबर कोर्टों के हवाले किया

सुप्रीम कोर्ट ने दिया साफ संदेश- ”मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लेबर कोर्ट में लड़िए”. मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं करने पर दायर अवमानना याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज जो फैसला सुनाया है उसका स्पष्ट मतलब यही है कि आगे से इस मामले में कोई भी सुप्रीम कोर्ट न आए और जिसे अपना हक चाहिए वह लेबर कोर्ट जाए. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रंजन गोगोई व जस्टिस नवीन सिन्हा की खंडपीठ से मीडियाकर्मियों ने जो उम्मीद लगाई थी, वह दोपहर तीन बजे के बाद मुंह के बल धड़ाम से गिरी. दोनों जजों ने फैसला सुनाते हुए साफ कहा कि वेजबोर्ड से जुड़े मामले संबंधित लेबर कोर्टों में सुने जाएंगे. वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर समेत वेतन भत्ते संबंधित मामले लेबर कोर्ट या अन्य कोर्ट में ही तय किए जाएं. संबंधित कोर्ट इन पर जल्दी से जल्दी फैसला लें.

वेज बोर्ड में सबसे विवादित बिंदू 20-जे के संबंध में कोर्ट ने कहा कि 20-जे को लेकर एक्ट में कोई विशेष प्रावधान नहीं है, इसलिए इसका फैसला भी संबंधित कोर्ट ही तय करेगी. कोर्ट ने कहा कि अवार्ड को गलत समझने के चलते मीडिया संस्थानों पर अवमानना के मामले नहीं बनते. अवमानना याचिकाओं में दायर ट्रांसफर, टर्मिनेशन व अन्य प्रताडऩाओं के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कोई निर्देश नहीं दिए. कोर्ट ने वेजबोर्ड से संबंधित एरियर वेतन भत्ते कर्मचारियों की प्रताडऩा आदि से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी लेबर कोर्ट पर डाली है. अब लेबर कोर्ट ही पत्रकारों व गैर पत्रकारों के मामले में फैसला देगा. 36 पेजों में दिए फैसले में कोर्ट ने मीडिया संस्थानों के खिलाफ अवमानना को नहीं माना. ढाई साल से वेजबोर्ड के लिए देश के हजारों पत्रकार व गैर पत्रकार सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे. पर नतीजा आज पूरी तरह मीडिया मालिकों के पक्ष में रहा.

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