प्रश्न पूछ रही है कल्पेश की आत्महत्या!

भास्कर समूह संपादक कल्पेश याग्निक की आत्महत्या को नौ दिन हो गए हैं। पुलिस की जाँच गति से परिजनों को ढिलाई लग रही है। एक तरह से यह आत्महत्या पुलिस और ख़ासकर प्रबंधन से भी प्रश्न पूछ रही है कि ऐसे हालात बनने ही क्यों दिए कि जीवन समाप्त करना पड़ा। पुलिस को एक पखवाड़े पहले जो पत्र मिला, उससे काफ़ी पहले प्रबंधन को काफ़ी कुछ जानकारी थी और यह भी मालूम था कि हर वक्त पत्रकारिता को जीने वाले कल्पेश अपमानित जिंदगी तो नहीं ही जीना चाहेंगे, फिर क्यों उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया? ये ऐसे सारे प्रश्न हैं जो मीडिया जगत में तैर रहे हैं।जिस तरह बातचीत में कल्पेश रिपोर्टरों को प्रश्न पूछिए कहा करते थे, अब उनकी आत्महत्या यही सारे प्रश्न पूछ रही है।

हादसे के बाद से पुलिस जहाँ सलोनी अरोरा का इतिहास खंगालने में लगी है वहीं इस हादसे के बाद से अजीब तनाव का शिकार एनआईएनरूम स्टॉफ को संस्थान भोपाल शिफ्ट करने का मन बना चुका है। इसके साथ ही ऑफिस के उन लोगों की भूमिका की भी समीक्षा की जा रही है जो कल्पेश के नज़दीकी थे और उनके भोपाल स्थित फ्लेट पर आना जाना था।यह समीक्षा इसलिए की जा रही है कि इन लोगों ने ब्रांड की छवि धूमिल करने की कोशिश में जुटी सलोनी अरोरा के संबंध में कई जानकारी होने के बाद भी मैनेजमेंट को अवगत नहीं कराया।बहुत संभव है कि अगले एक पखवाड़े में नेशनल आइडिएशन न्यूज रूम स्टॉफ भोपाल शिफ्ट कर दिया जाए।

इस बीच सलोनी की तलाश में पुलिस दल जुटा हुआ है लेकिन दिल्लीसे भी कामयाबी नहीं मिली है। पुलिस ने नीमच में उसकी माँ और भाई तथा रतलाम में बहन से भी पूछताछ की थी। गिरफ़्तारी से बच रही मुख्य आरोपी अग्रिम जमानत की जुगत में है।इसी के साथ उसने कल्पेश को इमोशनल ब्लेकमेलिंग के उद्देश्य से आडियो सहित जो भी हथकंडे अपनाए उन्हें अपने बचाव में कोर्ट में सबूत के तौर पर भी पेश कर सकती है। उसकी तरफ़ से अग्रिम ज़मानत के लिए कोर्ट में आवेदन लग सकता है। उल्लेखनीय है कि गत शुक्रवार को पुलिस ने सलोनी पर धारा 306, 386, 503 ipc औरआई टी एक्ट में केस दर्ज कर लिया था। सूत्रों की मानें तो इसमें 2 लोग और मुलजिम बन सकते हैं। इनमे से एक के साथ सलोनी काफी समय तक रही थी।

आत्महत्या से पाँच दिन पूर्व एडीजी अजय शर्मा को कल्पेश द्वारा सौंपे गए छह पेज के लेटर को अब आत्महत्या पूर्व दिए कथन के आधार पर सलोनी अरोरा पर तो विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज कर लिया है। सवाल तो यह भी उठेगा कि इस सारे हालात की जानकारी तो कल्पेश ने प्रबंधन को भी दे दी थी, पुलिस के आलाअफसरों को भी जानकारी थी ही फिर सिर्फ सलोनी पर ही कार्रवाई क्यों? सलोनी की गिरफ़्तारी तो आज -कल में होना ही है, अदालत में जब यह मामला चलेगा तो कल्पेश की आत्महत्या से जुड़े ये सारे प्रश्न भी पूछे जाएँगे।

मुख्यमंत्री ने इस मामले में निष्पक्ष जाँच का वादा मीडिया से किया है। चुनाव सिर पर है, सरकार पर तमाम क़िस्म के प्रेशर बढ़ते जाएँगे ऐसे में अब याग्निक परिवार को डीआयजी मिश्रा के नेतृत्व में चल रही जाँच पर ही भरोसा है। घटना के नौ दिन बाद भी पुलिस मुख्य आरोपी को नहीं तलाश पाई है। परिजनों को जाने क्यों यह आशंका होने लगी है कि ऐसा न हो कि पुलिस की जाँच सलोनी और उसके सहयोगी मित्रों को गिरफ़्त में लेने के बाद ठंडी पड़ जाए। नज़दीक आते चुनाव के साथ ही पुलिस की व्यस्तता भी बढ़ती जाएगी।चूँकि अब याग्निक परिवार को अन्यकिसी स्तर पर इस कांड की पुख़्ता जाँच में सहयोग नहीं मिलेगा, इसलिए भी वे पुलिस की अब तक की जाँच की गति से संतुष्टि नहीं है।

फिल्म वितरक पर नजर, हाईप्रोफ़ाइल रैकेट तो नहीं
कल्पेश आत्महत्या मामले में पर्दे के पीछे अन्य जो लोग हो सकते हैं उनमें एक फिल्म वितरक का नाम भी सामने आ रहा है। इस घटनाक्रम के बाद पुलिस को यह जानकारी भी मिली है कि बेहद क़रीबी इस शख्स को सलोनी ने 2483 फोन कॉल किए हैं जिसमें मोबाइल पर 2256 और उसके धेनु मार्केट स्थित ऑफिस पर लैंडलाइन पर 227 कॉल दर्ज हैं। कल्पेश को जिस तरह लगातार मानसिक प्रताड़ना के साथ ही रुपयों की डिमांड की जा रही थी उसकी परतें खोलने मे लगी पुलिस इस एंगल पर भी काम कर रही है कि जिस तरह सलोनी करोड़ से अधिक रुपयों की माँग कर रही थी उसमें रुपयों की भागीदारी में कुछ अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं। चूँकि सलोनी मुंबई में रहते हुए भास्कर के लिए फिल्मी खबरें लिखा करती थी और उसे फिल्म रिपोर्टर के रूप में प्रमोट करने में उक्त वितरक का सहयोग रहा है इस वजह से पुलिस यह एंगल भी तलाश रही है कि कहीं यह हाईप्रोफ़ाइल सैक्स रैकेट तो नहीं। जिस तरह कल्पेश को ब्लेकमेल किया जा रहा था उसी तरह अन्य लोग तो इनकी तिकड़म का शिकार नहीं हुए।

मोबाइल जानबूझकर छोड़ा
मुंबई गए पुलिस दल ने जो सलोनी के फ्लैट से मोबाइल फोन बरामद किया है वो बहुत सामान्य किस्म का है। बताते हैं इस मोबाइल को जानबूझकर यहाँ चार्जिंग में लगाकर छोड़ा गया ताकि उस पर फोन लगाने पर घण्टी बजती रहे और उसकी टॉवर लोकेशन भी यहाँ की आती रहे। इस बीच सलोनी वहां से रफूचक्कर हो गयी। एएसपी शेलेंद्र सिंह चौहान का कहना है कि उसकी तलाश के हर सम्भव प्रयास किये जा रहे है।

ड्राइवर से भी लेंगे जानकारी
कल्पेश के ड्राइवर से भी पुलिस गहनता से पूछताछ कर सकती है। संस्थान में प्रोडक्ट मैनेजर पदस्थ रहते कल्पेश के अति विश्वस्त होने से शक्ति संपन्न हो गए ड्राइवर कल्पेश-सलोनी के संबंध में भी कई ऐसे राज जानता है जिनमें से परिवार को भी कुछ बाद में पता चले। घटना वाले दिन से बाद तक इसके व्यवहार पर भी नजर रही है। स्टॉफ के इक्का-दुक्का लोगों का ही उनके भोपाल में होशंगाबाद रोड स्थित पारस हर्मिटेज बिल्डिंग में आना जाना था। इन्हीं अति विश्वस्त लोगों से एनएनआर के कई सदस्य इसलिए भी नाराज़ रहते थे कि वार्षिक वेतनवृद्धि में सर्वाधिक फ़ायदा इन इक्का-दुक्का लोगों का ही होता था।

कितनी सहानुभूति और कितने मगरमच्छ के आँसू
कार्यालय भवन की तीसरी मंज़िल से 12-13 जुलाई की रात कल्पेश याग्निक द्वारा की गई आत्महत्या के बाद से स्थानीय स्टॉफ सहित अन्य संस्करणों के स्टॉफ को भी मौत संबंधी खबर प्रकाशन के बाद से मैनेजमेंट का रुख़ समझ आ चुका है।यही कारण है कि घटना वाले वक्त जो सहानुभूति का उफान था वह मगरमच्छ के आँसू जैसी स्थिति में बदल गया है। कल्पेश ने डेढ़ दशक से अधिक समय में जितने रिपोर्टर तैयार किए उससे कहीं अधिक उनकी कार्यशैली से इसलिए नाराज़ होते गए कि पत्रकारिता के प्रति उनके जुनून और समर्पण में वे पसंद-नापसंद की राजनीति तलाशते रहे।यही कारण है कि अब जब कल्पेश ने अपने ही हाथों अपना अंत कर लिया तो उस दौरान मनमसोस कर सब कुछ सह जाने वालों के साथ ही उन रिपोर्टरों को भी अनर्गल छिद्रान्वेषण का अवसर मिल गया जो तब रात के अंतिम प्रहर में ग्रुप एडिटर की कृपा बनी रहने के लिए झाँझ-मंजीरे के साथ समूह स्वर में मंगला आरती गाने को उतावले रहते थे।

समूह को चिंता अपने ब्रांड की
जिस तरह इंदौर सहित देश का मीडिया जगत कल्पेश के उठाए आत्महत्या के कदम से हत्प्रभ है उससे कहीं अधिक पत्र समूह इस घटना से अपने ब्रांड की हो रही किरकिरी को लेकर चिंतित है।कारपोरेट में चर्चा यह भी है कि कल्पेश ने कहीं सोच समझकर तो आत्महत्या के लिए कार्यालय परिसर को नहीं चुना? पाँच दिन पहले एडीजी को छह पेज का पत्र देने से यह मन:स्थिति तो समझ में आती है कि वे कितने भीषण तनाव से गुज़र रहे थे।इस सारे हालात की जानकारी प्रबंधन को देने के बाद भी उस स्तर पर तुरंत राहत और डेमेज कंट्रोल के प्रयास क्यों नहीं हुए, अब यह भी चर्चा का विषय बना हुआ है। ऐसे में जो कदम 12-13 जुलाई की रात उठाया वह घातक निर्णय वे इन पाँच दिनों में से कभी भी, कहीं भी ले सकते थे।सलोनी के शॉक से पहले ही डरे सहमे कल्पेश के सामने उस रात अचानक ऐसे क्या हालात निर्मित हो गए कि उन्होंने जीवन लीला समाप्त करने के उद्देश्य से कार्यालय भवन को ही हर दृष्टि से उपयुक्त माना ? यदि ऐसा मन बनाया भी था तो वे कार्यालय से बाहर, घर या अन्जान किसी स्थान को भी चुन सकते थे।

क्या इतना विश्वास था कि बचेंगे ही नहीं

घटना वाली रात बॉंबे अस्पताल के बाहर कल्पेश जी के प्राण बच जाने की कामना करने वाले संपादकीय के साथियों के बीच यह चर्चा भी चल रही थी कि तीसरी मंज़िल से नीचे वे जिस स्थान पर गिरने के बाद करीब पंद्रह मिनट बेसुध पड़े रहे उस स्थान का वे पहले अवलोकन करने नीचे आए थे और टहलते हुए ऊँचाई का अंदाज लगाया था। जिस तरह वे गिरे और शरीर के विभिन्न हिस्सों में गंभीर चोंट लगी उस वजह से उनकी जान बचने के चांस बहुत कम थे। डॉक्टरों के तमाम प्रयास के बाद उन्हें बचाया भी नहीं जा सका। मल्टीपल इंजुरी के बाद भी डॉक्टरों के प्रयास से उनकी जान बच जाती या लंबे समय के लिए बेड रेस्ट की स्थिति बन जाती, उस हालात में प्रबंधन क्या निर्णय लेता? वे जिस ऑफिस सहयोगियों के माध्यम से अख़बार के कंटेंट को निखारने के लिए दिन रात लगे रहते थे। उस ऑफिस का स्टॉफ उस हादसे से उबर नहीं पाया है। उनकी ख़ाली कुर्सी हर वक्त भयावह रात की याद दिलाती है। इस मनहूसियत से मुक्ति और तरह तरह की चर्चाओं पर विराम के लिए ही पाँच साल बाद इस स्टॉफ को पुन: भोपाल स्थानांतरित किया जा रहा है।स्टॉफ को एचआरए का लाभ देने का विश्वास दिलाया गया है। ऑफिस शिफ्ट करने के बाद अगला कदम कल्पेश के अति विश्वस्त सहकर्मियों को इधर-उधर करना हो सकता है।

लेखक कीर्ति राणा कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं.

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