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दिल्ली

स्वर्णकांता, केजरीवाल के केस से अलग तो हो गईं, लेकिन पूर्व सीएम के लिए नई मुश्किल खड़ी हो गई!

अभिरंजन कुमार-

अरविंद केजरीवाल की अर्जी पर दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा शराब केस की सुनवाई से अलग तो हो गई, लेकिन अब केजरीवाल पर अवमानना का मामला भी चलेगा।

मेरा मानना है कि जजों को अपनी नाक इतनी ऊंची नहीं रखनी चाहिए। यदि केजरीवाल की आपत्तियां सही नहीं थीं, तो जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को सुनवाई से हटना नहीं चाहिए था।

यदि सुनवाई से हट गई हैं, तो अवमानना का मामला चलाने का कोई मतलब नहीं है। जजों का, अदालतों का सम्मान बढ़ता है देश के लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों के प्रति अपनी महती जिम्मेदारी को समझते हुए त्वरित न्याय करने से।

हम एक लोकतंत्र में हैं। अदालतें समय पर न्याय करने में विफल सिद्ध हो रही हैं। करोड़ों मामले सालों, दशकों तक लंबित रहते हैं। ऊपर से अनेक जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी होते हैं। देश की करोड़ों आम गरीब जनता इस अन्यायपूर्ण न्याय व्यवस्था से कराह रही है।

इसलिए जजों और अदालतों पर भी सवाल उठाए जाएंगे, और उन्हें उन सवालों को सुनना पड़ेगा, उत्तरदाई होना पड़ेगा। अगर वे इसके लिए खुद को उत्तरदाई नहीं समझते तो लोकतंत्र बेमानी है।

जहां तक केजरीवाल मामले का सवाल है, मैं न तो उनका समर्थक हूं, न बचाव कर रहा हूं। लेकिन जिस तरह से उनके अनेक नेताओं को कथित भ्रष्टाचार के विभिन्न आरोपों में जेल भेजा गया, और अनेक बचे हुए नेताओं को केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी में विलय करा लिया गया, वह इस बात का संकेत देता है कि सब कुछ सही नहीं है। अवश्य ही बहुत कुछ उसमें राजनीति से प्रेरित है।

यदि राजनीति से प्रेरित नहीं है, तो अदालत क्यों नहीं छह महीने में फैसला दे सकती है कि केजरीवाल पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं या नहीं?

अब मुझे कृपया यह न कहें कि केजरीवाल सहयोग नहीं कर रहे और खुद ही मामले को लटकाने में लगे हैं। भारत की शक्तिशाली जांच एजेंसियों और अदालतों के सामने केजरीवाल की क्या हैसियत कि वे सहयोग न करें अथवा मामले को लटका-भटका सकें?

यदि एजेंसियां और अदालतें अपना काम सही से करेंगी तो केजरीवाल तो क्या, देश में किसी की हैसियत नहीं है कि वह उनसे सहयोग न करे अथवा उनकी प्रक्रियाओं को बाधित कर सके।

इसलिए, यह प्रश्न तो है और रहेगा कि यदि भ्रष्टाचार हुआ है तो केंद्रीय एजेंसियों को कोर्ट और देश की जनता के सामने उसके पुख्ता सबूत रखने के लिए कितना वक्त चाहिए?

सबूत या तो हैं, या नहीं हैं। सबूत हैं तो सज़ा दो। नहीं हैं तो बरी करो। सालों साल इतनी नौटंकी क्यों? इस तरह से तो नहीं होता न्याय!

मुझे लगता है कि यदि अरविन्द केजरीवाल पवित्र नहीं हैं, तो उनके मामले में केंद्रीय सत्ता और केंद्रीय एजेंसियां भी पवित्र दिखाई नहीं दे रही हैं।

इसलिए माननीय अदालत से सम्मानपूर्वक मेरी अपील होगी कि त्वरित न्याय करें और अपनी तरफ से मामले को बेवजह कॉम्प्लिकेटेड नहीं बनाएं। धन्यवाद।


दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा का दिल्ली आबकारी नीति मामले की सुनवाई से आखिरकार अलग होना लेकिन इस केस से जुड़े अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज समेत आम आदमी पार्टी के तमाम नेताओं पर अदालत की अवमानना का केस चलाना दरअसल न्यायपालिका की साख बचाने की कोशिश में निजी खुन्नस निकालने का मामला बन गया है। अपनी झेंप मिटाते हुए बीच का रास्ता निकालने की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की इस कोशिश से लगातार सवालों में घिरती जा रही न्यायपालिका की छवि को नुकसान ही होगा क्योंकि उन्होंने आबकारी केस की सुनवाई किसी दूसरे जज की कोर्ट में किये जाने का आदेश देते हुए जो फैसला लिखाया है उसमें न्याय करने की तार्किकता और संयम नहीं बल्कि क्रोध, कड़वाहट, अहंकार और सबक सिखाने की ज़िद साफ झलकती है।
क्या अरविंद केजरीवाल ने सचमुच ऐसा कुछ कहा या किया जिसे अदालत की अवमानना माना जाए, जैसा कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अपने फैसले में कहा है?
देखा जाए तो केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर वही तमाम बातें दोहराईं जो वह खुली अदालत में पहले ही कह चुके थे। बस इस बार उन्हें एक पत्र और वीडियो के ज़रिये सार्वजनिक कर दिया।
क्या अरविंद केजरीवाल के सह-अभियुक्त मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और कुछ अन्य लोग भी अपने पत्रों में वही बातें नहीं दोहरा रहे थे जो वे पहले अदालत में कह चुके थे? फिर अब उन्हें अवमानना का दोषी क्यों माना जाए?
जब अरविंद केजरीवाल ने उनके दिल्ली आबकारी नीति वाले केस की सुनवाई से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को अलग होने की अपील की थी और उस सिलसिले में खुद अदालत में पेश होकर अपनी पैरवी की थी, जज को तभी अपनी और न्यायपालिका की फजीहत रोकने के लिए इस मामले से अलग हो जाना चाहिए था। तब ऐसा न करके जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपनी और न्यायपालिका की फजीहत ही करवाई । अब भी उन्होंने एक तरह से बहाना बनाकर ही खुद को मामले से अलग कर लिया है जिसे उन्होंने अपने लिखित फैसले में टेक्निकली recuse करना नहीं कहा है। लेकिन जिन लोगों ने recusal की मांग की थी, उन सबको अदालत की अवमानना का दोषी ठहराना बेहद दिलचस्प और जटिल मामला हो जाता है।
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अपने फैसले में ज़िक्र किया है कि आम आदमी पार्टी के नेताओं ने उनको निशाना बनाने के लिए उनके किसी पुराने वीडियो के साथ छेड़छाड़ की। यह एक सामान्य आरोप नहीं, एक जज की टिप्पणी है, बहुत गंभीर मामला है। इसकी जांच होनी चाहिए। अदालत चाहती तो इस मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे सकती थी। लेकिन इसे अवमानना का मामला बताकर कहीं न कहीं जस्टिस शर्मा अब भी इसे एक निजी अहं की लड़ाई ही बना रही हैं। -अमिताभ श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार

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