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सियासत

कुमार विश्वास का हाल दिलीप मंडल वाला हो गया है!

सिद्धार्थ ताबिश-

मारे मान्यवर कवि का हाल दिलीप मंडल वाला हो गया है.. क्या किया जाय ये दौर ही ऐसा है.. कोई कभी सोच भी सकता था कि मंडल मनुस्मृति का बचाव करेंगे और आंबेडकर का विरोध?

जो ये कहता है कि पैसा कुछ नहीं होता है वो ये दौर देख ले. सब कुछ पैसे से ख़रीदा जा सकता है. इस दौर में जो जितना आक्रामक क्रांतिकारी आपको दिखे, समझ लीजिए कि ये बहुत ज़ोर से “बिकने” को तैयार है. ये वैसे ही है जैसे कोई वैश्या स्त्री/पुरुष श्रृंगार किए हुए बाज़ार में खड़ा हो.

जो शुरू से धार्मिक थे, अपने धर्म के बचाव में लगे थे, मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं.. औरंगज़ेब के समय में भी लोग थे जिनका संबोधन राम राम या सीता राम ही था, भले परिस्थितियां कितनी भी विपरीत थीं.. वो सही मायने में अपने धर्म के रक्षक थे और धार्मिक थे.. मगर कुमार विश्वास जैसे लोग धूर्त हैं, धार्मिक नहीं

इस आदमी ने सारी उम्र दुबई जैसे शहरों में मुशायरों से अपनी रोटी कमाई है. भारत में इसे कौन पूछता था कभी.. दुबई के शेखों ने और वहां बसे भारतीय लोगों ने इसे कवि बनाया.. और आज ये रामायण और राम की बात कर रहा है. वो भी ऐसे घिनौने संदर्भ में जो कि “बेलो द बेल्ट” है. इसका अपना सारा जीवन “मुसलमानों” के पैसों से कमाए ऐश पर टिका हुआ है.. आज ये कथा सुना कर “शक्तिमान” बना हुआ है.

ऐसे धूर्तों को इस दौर में मुंह न लगायेगा.. कल अगर लश्कर-ए-तोयबा का राज हो जाए तो ये आपको बताएगा कि उनके राज में रहना कितना “फायदेमंद” और “दैवीय” काम है.

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