ट्रिक्सी यानी कुतिया नहीं, बल्कि मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी…

मेरी बेटी से बहन, दोस्त, मां और दादी तक का सफर किया ट्रिक्सी ने : ट्रिक्सी की मौत ने मुझे मौत का अहसास करा दिया : मुझसे लिपट कर बतियाती थी दैवीय तत्वों से परिपूर्ण वह बच्ची

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : मुझे जीवन में सर्वाधिक प्यार अगर किसी ने दिया है, तो वह है ट्रिक्सी। मेरी दुलारी, रूई का फाहा, बेहद स्नेिहल, समर्पित, अतिशय समझदार, सहनशील और कम से कम मेरे साथ तो बहुत बातूनी। अभी पता चला है कि ट्रिक्सी अब ब्रह्माण्ड व्यापी बन चुकी है। उसने प्राण त्याग दिये हैं।  ट्रिक्सी यानी मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी। ट्रिक्सी को लोगबाग एक कुतिया के तौर पर ही देखते हैं, लेकिन मेरे साथ उसके आध्यात्मिक रिश्ते रहे हैं। शुरू से ही।

आज खोजूंगा आसमान में झिलझिलाते सितारों के बीच उसे। मुझे यकीन है कि मुझे देखते ही ट्रिक्सी अपने दोनों हाथ हिलायेगी जरूर। पूंछ हिलायेगी। बेसाख्ताै। वह लपकेगी मेरी ओर, और मैं लपकूंगा उसकी ओर। लेकिन अचानक वह फिर झिलमिला कर खो जाएगी, किसी थाली में भरे पानी में अक्सं को किसी दर्दनाक ठोकर की तरह। क्योंकि वह मर चुकी है ना, इसलिए। और फिर मैं फूट-फूट कर रो पड़ूंगा। क्योंकि मैं अभी मरा नहीं हूं। यही तो मेरे जीवन का सर्वाधिक पीड़ादायक पहलू है, कि लाख चाह कर भी मैं तत्काल मर नहीं सकता। मेरे और ट्रिक्सीे के बीच यह एक अमिट दीवार खिंच चुकी है। अभिशाप की तरह। कम से कम तब तक, जब तक मैं खुद मर कर उसके पास नहीं जाता।

लेकिन पहले ऐसा नहीं था। तब हम दोनों दो बदन में विचरते एक प्राण की तरह हुआ करते थे।

सिर्फ पांच दिन की ही थी ट्रिक्सी, जब मेरे घर आयी थी। ट्रिक्सी यानी पामेरियन फीमेल बच्ची। साशा-बकुल की ख्वाहिश थी, इसलिए राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कालेज के प्रोफेसर एसडी सिंह उसे लेकर अपनी घर से लाये थे। तब मैं अपनी टांग तुड़वाकर भूलुण्ठित लेटा था। शायद 12 मई-2000 की घटना है यह। एसी तब था ही नहीं। इसलिए गर्मी से राहत के लिए मैं जमीन पर ही लेटा था, कि अचानक डा सिंह एक झोला में लेकर सफेद फाहे जैसी इस बॉल को लेकर आये। उन्होंने बताया कि उसका जन्म 5 मई को हुआ है। उसके आगमन से मेरा पूरा परिवार हर्ष में डूबा था, जबकि ट्रिक्सी अपनी मां को खोजने के चक्कर में भौंचक्कीे भटक रही थी। साशा-बकुल उसे हाथोंहाथ थामे थे। हम सब उसके लिए अजनबी थे, इसलिए वह बार-बार हम सब के चंगुल से छूट कर अपनी मां को खोजने में इधर-उधर छिप जाती थी। इसी बीच एक दिन वह मासूम मनी-प्लांट के झंखाड़ में छिप गयी। पूरा घर बेहाल रहा। बहुत देर खोजने के बाद वह दिखी तो मैंने उसे हल्के एक थप्प़ड़ रसीद किया। उसके बाद से ही वह समझ गयी कि उसे इसी घर में हमेशा रहना है। हम सब ने उसका नाम ट्रिक्सी रखा।

इसके बाद से ही ट्रिक्सी ने इस घर को अपना घर मान लिया और फिर वह इस घर की सबसे दुलारी बन गयी। कूं कूं से जल्दी ही उसकी आवाज भौं भौं तक पहुंच गयी। और इसी के ही साथ उसकी घर के प्रति जिम्मेूदारी भी बढ़ गयी। सबसे पहला जिम्मा तो उसने कॉलबेल का सम्भाला। घर के बाहरी गेट से किसी के खटकने से पहले ही ट्रिक्सी कूद कर दरवाजे पर निरन्तबर निनाद छेड़ देती थी। उसका यह तरंगित स्वार तब ही थम पाता था, जब घर का कोई न कोई सदस्य दरवाजे पर पहुंच न जाए।

लेकिन उसका रौद्र रूप तब प्रकट होता था, जब कोई चोर-सियार टाइप शख्स या जीव हमारे घर के आसपास फटकता था। खास कर दूधवाला। यह जानते हुए भी कि अगर यह दूधवाला न आये तो ट्रिक्सी को सबसे ज्यादा दिक्कत होगी, लेकिन ट्रिक्सी दूधवाले को सूंघते ही पागल हो जाती थी। भौंक-भौंक कर उस पर फेचकुर फेंकने के दौरे पड़ते थे। उसे सम्भा्ल पाना मुश्किल होता था। शायद उसे साफ पता चल चुका था कि दूधवाला दूध में पानी मिलाता है। लेकिन शरीफ व साफ दिलशख्स को ट्रिक्सी सिर्फ पासवर्ड चेक करने की अंदाज में उसे सूंघ कर ही छोड़ देती थी। गजब थी ट्रिक्सी, कि पोस्टमैन जैसे किसी भी शख्स पर उसने कभी भी अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं की। बच्चों के प्रति उसमें दैवीय स्नेख रहता था। मेरी पोती या कोई भी मित्र के बच्चे जब भी आये, उनके सामने वह हमेशा शांत और संयत ही रहती थी। तब भी, जब वे बच्चे उसके मूंछ उखाड़ते या उसे छेड़ते थे। ट्रिक्सी हमेशा खामोश रहती। बहुत ज्यादा हो जाता तो वह ऐसे शरारती बच्चों से दूर हट जाती। लेकिन जवाब में काटना या पंजा मारने के बारे में तो उसने कभी भी नहीं सोचा।

घर से अगर कोई सदस्य बाहर जा रहा है तो ट्रिक्सी उदास हो जाती थी, लेकिन उसके घर वापसी के वक्त वह इतना खुश हो जाती थी, मानो उसे कोई बड़ी लॉटरी मिल गयी। रात को मेरे घर वापस के वक्त‍ वह शाम से ही प्रतीक्षा शुरू कर देती थी। मैं आया ही नहीं, कि वह मेरे आसपास गोल-गोल चक्कर लगाती थी। कूं कूं कूं कूं। कुर्सी पर बैठने के बाद वह उचक कर मेरी गोद में दोनों पैर घुसेड़ कर मुझसे बतियाती थी। बहुत देर तक। वह मुझे बताती थी कि उसका दिन कैसा बीता, कौन-कौन घर आया, किसने घंटी बजायी, किसको काटने-नोंचने की कोशिश की, बकुल-साशा-इंदिरा ने किस-किस बात पर उसे डांटा, कितनी बार उसे दुलराया, कौन-कौन चिडि़या मेरे मुंडेर पर बैठी जिसे भौंक कर भगाया, कौन बंदर को उसने काटने की कोशिश की, वगैरह-वगैरह। एक-एक बात वह मुझसे करती थी, लेकिन चूंकि मैं उसकी बात समझ नहीं पाता था, इसलिए केवल हां हां, अच्छा, ओके, पक्का जैसे दिलासा देता रहता था।

हालांकि बाद में साशा की डिमाण्ड पर एक जर्मन स्पिट भी आयी। नाम रखा गया बोल्डी। ट्रिक्सी ने उस पर शासन करना शुरू कर दिया और बोल्डी ने आधीनता स्वीकार कर लिया। अब दोनों मिल कर हंगामा करते थे। उछलकूद। घर हरा भरा हो गया। अब दोनों मिल कर चूहों का शिकार करती थीं। किसी शातिर शिकारी की मानिन्द। लेकिन इन दोनों ने अब किसी तीसरे को भगाने की हर चंद कोशिश की। मैं बनारस में एक मासूम-अनाथ बिल्ली ले आया था। नाम रखा था संगीत। वह भी बहुत प्यारी बच्ची थी। लेकिन एक दिन ट्रिक्सी और बोल्डी ने मिल कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया। कोई पांच साल पहले बोल्डी को खून के दस्तर हुए और उसी में उसकी मृत्यु हो गयी। अब ट्रिक्सीई अकेली हो गयी। लेकिन उसने अपना प्रेम बाकी के सदस्यों पर लुटाना शुरू कर दिया। समझदारी का आलम यह रहा कि उसे पता था कि कौन शख्स को घर के भीतर क्याल सम्मान दिया जाना चाहिए। भड़ास4मीडिया के यशवंत जब भी घर आये, ट्रिक्सी ने हमेशा स्वा‍गत किया।

ट्रिक्सी ने घर के हर संकट में मुझे मजबूत बनाये रखा। वह भी तब जब कि घरेलू संकट के चलते उसे एक साल बड़े भाई-भाभी के यहां रहना पड़ा। बाद में जब मैंने गोमती नदी के किनारे जंगल में रहने का फैसला किया, तब ट्रिक्सी को छोड़ना मेरी मजबूरी थी। लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन हुआ रहा हो, जब मुझे ट्रिक्सी की याद नहीं आयी। ट्रिक्सी की याद आते ही मेरी आंखें नम हो जाती थीं।

और आज तो बज्रपात ही हो गया।

जिसे मैं अपनी बेटी से ज्यादा प्यार करता था, वह इस दुनिया को छोड़ कर चली गयी। हमेशा-हमेशा के लिए।

अरे बेटा, यह तो तनिक सोचतीं तुम, कि मरघट तुम्हारी नहीं, मेरी प्रतीक्षा में है।

तुम मुझसे पहले कैसे मर गयीं ट्रिक्सी?

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 या kumarsauvir@gmail.com पर कर सकते हैं.

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