80 प्रतिशत पत्रकारों को सेलरी से मतलब, सरोकार से नहीं

देश को जगाने वाले खुद अंधेरे में, कौन बोले उनके लिए…  जो देश को जगा रहे हैं उनकी भी कोई सुधि लेने वाला है सभी को उनसे बस समाचार चाहिए चोखा। मतलब सही और रोचक। देश की पूरी ईमानदारी पत्रकार से ही चाहिए। जो पत्रकार लिखता पढ़ता है वह सच्चा भी होता है। 80 प्रतिशत ऐसे पत्रकार है देश में। उन्हें बस अपनी सैलरी से ही मतलब है। समाचार वहीं लिखने का प्रयास करते है जिसमें सच्चाई होती है। हर मीडिया कंपनी में ऐसे लोग है तभी आप सच्चाई को समझ और जान पा रहे है।

10 प्रतिशत खबरें सोशल मीडिया से आप को मिल जाती है। बाकि की सही और सटीक खबरें वहीं सच्चे पत्रकार अपनी रिपोर्टिंग से आप तक सामने लाते है। यह सब सही है लेकिन उनकी बात करता कौन है। उन्हें बस खबरों के लिए किया जाता है बाकि के लिए दलालों और लाइजनरों को। देश में 10 प्रतिशत ऐसे पत्रकार है जो दिनभर नेताओं और अधिकारियों की खुशामती में लगे रहते है। समय समय पर वो खुद फोटो फेसबुक, टविटर और अन्य सोशल मीडिया पर खुद अपलोड भी करते रहते है और 90 प्रतिशत ऐसे भी पत्रकार है जिनके पास खुद नेताओं और अधिकारियों के आते है।

वो बेचारे इसी में मस्त रहते है। उन्हें अधिकारी फोन करता है। नेता उन्हें फोन करता है। वो इसी गलतफहमी में पूरा जीवन मुफलिसी में बिता देते है। ऐसे पत्रकार न तो परिवार के हो पाते हैं और न ही समाज के। केवल बस खबरें ही लिखते लिखते सेवानिवृत्त हो जाते हैं। देश में ऐसे बहुसंख्यक पत्रकार है जिनके पास अपना घर नहीं है। हां एक बात हमने देखी है किसी को जब ​कही से न्याय नहीं मिलता तो उसके लिए मीडिया ही एक अंतिम जरिया बचता है। फिर भी लोगों को सच्चे पत्रकारों की कोई कद्र नहीं है।

एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी भी घर का मालिक है

जरा ईमानदारी की बात करने वालों से एक सवाल है। जो कह रहे है अखिलेश के राज में कुछ पत्रकारों ने माल कमाया है उनकी शामत आने वाली है। क्या पत्रकार माल कमा सकता है। नहीं। वो 10 प्रतिशत ऐसे लोग है जिनको कभी नहीं लिखना पढ़ना है लेकिन पत्रकार  है। सरकार ऐसे लोगों को मान्यता कार्ड भी दे देती है। जो लिखने पढ़ने वाले है उन्हें कभी नहीं कार्ड जारी होता है। सरकारी वाहन का चालक भी घर बना लेता है लेकिन क्या कोई पत्रकार घर बना पा रहा है नहीं। यह बात कुछ के गले भी न उतरे तो क्या लेकिन उनकी आत्मा को जगाने का काम करेगी।

संतोष कुमार पांडेय
वरिष्ठ रिपोर्टर
पत्रिका, आगरा
pandey.kumar313@gmail.com

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इन पांच गांवों के लिए ताजमहल अभिशाप, नहीं होती हैं शादियां (देखें वीडियो)

इनके लिए ताजमहल है अभिशाप, कहते हैं इसे कुवारों का गांव… बेपनाह मोहब्बत की निशानी ताज 400 सालों से पर्यटकों को दीवाना बना रहा है। यहां आने वाले पर्यटक इसे प्यार की सबसे बड़ी सौगात मानते हैं। पर यही ताजमहल करीब दो हजार युवक-युवतियों के लिए अकेलेपन का सबब बन गया है। ताजमहल के पूर्वी गेट के पास स्थित गांव अहमद बुखारी, नगला पैमा, गढ़ी बंगस, नगला तल्फी के युवक-युवतियां को कुदरत से शिकायत है कि उन्हें ताजमहल के पास के गांव में क्यों पैदा किया। यहां कुवारों की फौज तैयार हो चुकी है। ताज इस गांव के लिए अभिशाप बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण ताजमहल की सुरक्षा और प्रदूषण से हो रहे दुष्प्रभाव की वजह से पांच सौ मीटर की दूरी के भीतर बिना अनुमति कोई गाड़ी नहीं आ सकती है। इन गांवों में आने-जाने वालों की कड़ी तलाशी ली जाती है। ऐसे में यहां के ग्रामीणों के घर बाहर से आने वाले रिश्‍तेदारों को डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ता है। ऐसे में हालत ये है कि कोई भी इन पांच गावों में अपनी बेटी या बेटे की शादी नहीं करना चाहता है। इन पांच गांवों में रास्ते की बंदिशों के चलते दस सालों से शादियां न के बराबर हो रही हैं और जो हुई भी हैं वो गांव से बाहर। लेकिन हर किसी के लिए गांव से बाहर जाकर शादी करना मुमकिन नहीं है। अगर वहां के ग्रामीण तैयार भी होते हैं तो रिश्तेदार इसके लिए तैयार नहीं होता।

ऐसे में इन पांच गांवों में हालात ये है कि हजारों लोग कुंवारे हैं। इसके साथ गांव में करीब दो हजार युवक-युवतियां कुंवारे हैं। ऐसा नहीं है कि इसका हल निकालने के लिए ग्रामीणों ने कोशिश या पहल ना की हो। गांव के लोग स्थानीय प्रशासन से लेकर मुख्यमंत्री तक शिकायत कर चुके हैं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। रास्ते की समस्या की वजह से इन गांवों में न कोई स्कूल है और न ही कोई स्वास्थ्य केंद्र है। कई बार तो सही समय पर इलाज ना मिलने की वजह से कई हादसे भी हो चुके हैं, बावजूद इसके सरकार और प्रशासन की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया। संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

https://youtu.be/YVA9O1Hwl3A

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https://youtu.be/gDUD1HH1L0g

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https://youtu.be/Ued-52UzKbo

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https://youtu.be/of-ysKPewAw

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https://youtu.be/skBypRlycNg

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https://youtu.be/PzKXGUB9ErE

आगरा से farhan khan की रिपोर्ट.

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मजीठिया मांगने पर ‘हिंदुस्तान’ अखबार ने दो और पत्रकारों को किया प्रताड़ित

लगता है खुद को देश के कानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझ रहा है हिंदुस्तान अखबार प्रबंधन। शुक्रवार को एक साथ उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से तीन कर्मचारियों को प्रताड़ना भरा लेटर भेज दिए गए। इन कर्मचारियों की गलती सिर्फ इतनी थी की बिड़ला खानदान की नवाबजादी शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिन्दुस्तान मैनेजमेंट से उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और अपना बकाया मांग लिया था।

गोरखपुर के हिंदुस्तान संस्करण में सीनियर कॉपी एडिटर के पोस्ट पर कार्यरत सुरेंद्र बहादुर सिंह और इसी पोस्ट पर कार्यरत आशीष बिंदलकर को कंपनी ने शुक्रवार को ट्रांसफर और टर्मिनेशान की तरफ कदम बढ़ाते हुए एक पत्र भेजा है। इन दोनों साथियों ने 17 (1) के तहत लेबर विभाग में अपने बकाये की रिकवरी के लिए कलेम लगा रखा था। इस पत्र से इन दोनों साथियों को ज़रा भी अचरज नहीं है। आशीष कहते हैं मुझे लेटर अभी नहीं मिला लेकिन कंपनी ने शुक्रवार को मुझे ऑफिस में काम नहीं करने दिया और बताया कि आपको एक पत्र घर पर भेजा गया है। उधर सुरेन्द्र बहादुर सिंह का ट्रांसफर देहरादून कर दिया गया है।

यही नहीं, झारखण्ड में हिन्दुस्तान समाचार पत्र में कार्यरत उमेश कुमार मल्लिक को हिंदुस्तान प्रबंधन के निर्देश पर एचआर डिपार्टमेंट की तरफ से शुक्रवार को एक मेल  भेजा गया है। उमेश का अपराध बस ये है कि उन्होंने कानून और न्याय के निर्देश का पालन करते हुए मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर व सेलरी देने की मांग अखबार प्रबंधन से कर दी थी। कंपनी टर्मिनेशन के पीछे बहाना खराब परफारमेंस को बना रही है। उमेश दैनिक हिंदुस्तान, रांची के मीडिया मार्केटिंग यानि सेल्स डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं।

इन तीनों साथियों के उत्पीड़न से देश भर में हिंदुस्तान में कार्यरत समाचार पत्र कर्मियों में प्रबंधन के खिलाफ जमकर आक्रोश है। सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने प्रबंधन और संपादक के खिलाफ ना सिर्फ लोकल पुलिस को बल्कि मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत कर रखा है। आप तीनों साथियों से निवेदन है कि आप खुद को अकेले मत समझिये। आपको आपका अधिकार मिलेगा। ये अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट से कतई बड़े नहीं है। आप के साथ आज देश भर के समाचारपत्र कर्मचारी हैं। जल्द ही हिंदुस्तान अखबार की भी चूल हिलेगी।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिवेस्ट
मुंबई
9322411335

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अखिलेश यादव के जंगलराज की कहानी बयां करती अमर उजाला में छपी यह तस्वीर देखेंगे तो आप भी दहल जाएंगे

Mohammad Haider : A shameful situation…. Does this picture not cast a blow our nerves? And our hearts? It’s a very tragic situation. The Medical and Health facilities in the State have almost collapsed. Medical Aid is available only to the high and mighty…. Friends, you may, as educated and able person try and rid your fellow citizens, who are the lesser mortals, by ensuring the initiation of a corrective action…. Every step counts. The process may be initiated by taking a stock of the situation… The PHCs, the CHCs, the District Hospitals are ill equipped, with a fraction of actual workforce, vis-a-vis sanctioned strength… The Nursing homes run sans any approval, exploiting and harassing people…. Its high time. We need to ACT.. Its already TOO LATE.

The medical profession, which is one of the noblest professions, is becoming commercialised… The doctors, unfortunately seem to have completely forgotten the hippocratic oath. The Nursing homes, without even the most basic of amenities continue to pay havoc with human lives, and Stray news of the kind posted by me do keep coming often, failing to move us or to awaken our sleeping conscience. Please help us take this matter to a logical conclusion. We read/view in print and electronic media about many cases of patients who have suffered major health setback or even died due to receiving allopathic treatment from unqualified quacks. This is the tip of the iceberg as most cases of malpractice go unreported. It has been reported that number of quacks are increasing in India, both in urban and rural areas.

It is estimated that about 10 lakh quacks are practicing allopathic medicine, out of which 4 lakh belong to practitioners of Indian Medicine (Ayurvedic, Sidha, Tibb and Unani). The health of the gullible people including poor, critically ill, women and children are at stake. Therefore, there is a greater need to act against quacks wherever any of us come across them. Quacks can be divided amongst three basic categories as under : 1. Quacks with no qualification whatsoever. 2. Practitioners of Indian Medicine (Ayurvedic, Sidha, Tibb, Unani), Homeopathy, Naturopathy, commonly called Ayush, who are not qualified to practice Modern Medicine (Allopathy) but are practicing Modern Medicine. 3. Practitioners of so called integrated Medicine, Alternative System of Medicine, electro-homeopathy, indo-allopathy etc. terms which do not exist in any Act. There is acute lack of awareness amongst State Governments, the legislature(s), judiciary and even doctors themselves regarding threat to nation’s health from quackery and about non-entitlement of practitioners of Indian Medicine who are practicing Modern Medicine. I am planning an action on this. Will keep u posted.

रोज मरने की तमन्ना करके भी जी रहा है यही आम आदमी है… मित्रों, हम सब लोग पूर्णतः संवेदनशून्य हों चुके हैं, और बस ऐसी ख़बरों को एक नज़र देख कर क्षणिक दुःख और क्षोभ प्रकट कर के ईश्वर का धन्यवाद दे कर आगे बढ़ जाते हैं की ये त्रासदी हमारे साथ नहीं हुई। लेकिन मित्रों,

जलते घरों को देखने वालों, फूस का छप्पर आप का है,
आगे पीछे तेज़ हवा है, आगे मुक़द्दर आप का है।

उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था,मेरा नंबर अब आया,
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं, अगला नंबर आप का है।

जागो मित्रों, और सब मिल कर इस विभीषिका, इस त्रासदी के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करो, वरना बहुत पछताना पड़ेगा और जाने वाले वापस नहीं आएँगे।

लखनऊ में कारपोरेट लॉ की पढ़ाई कर रहे मोहम्मद हैदर द्वारा फेसबुक पर पोस्ट की गई उपरोक्त तस्वीर को ढेर सारे लोगों ने शेयर किया है. कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Shalabh Mani Tripathi : हृदयविदारक, सच में ग़रीब और बेबस लोगों के लिए कुछ भी नहीं है इस हिप्पोक्रेट समाज में, कलेजा फट जाता है ये सब देखकर. हे भगवान कहाँ हैं आप।

Harpal Singh Bhatia : कभी-कभी इंसान होने पर शर्मिंदगी महसूस होती है। मानवता को शर्मसार करने वाली ह्रदयविदारक तस्वीर।

Pankaj Pandey : क्या कहें …क्या सुनें…जब मानवता ने ही दम तोड़ दिया है।कहा जाता है शरीर मर सकता है..आत्मा नही ।।पर यहाँ इस बात को डंके की चोट पर कहा जा सकता है की लोगों की मरी आत्मा की ही वजह से इस तरह के हृदय विदारक कृत्य होते हैं….बहुत ही दुखद

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ट्रिक्सी यानी कुतिया नहीं, बल्कि मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी…

मेरी बेटी से बहन, दोस्त, मां और दादी तक का सफर किया ट्रिक्सी ने : ट्रिक्सी की मौत ने मुझे मौत का अहसास करा दिया : मुझसे लिपट कर बतियाती थी दैवीय तत्वों से परिपूर्ण वह बच्ची

-कुमार सौवीर-

लखनऊ : मुझे जीवन में सर्वाधिक प्यार अगर किसी ने दिया है, तो वह है ट्रिक्सी। मेरी दुलारी, रूई का फाहा, बेहद स्नेिहल, समर्पित, अतिशय समझदार, सहनशील और कम से कम मेरे साथ तो बहुत बातूनी। अभी पता चला है कि ट्रिक्सी अब ब्रह्माण्ड व्यापी बन चुकी है। उसने प्राण त्याग दिये हैं।  ट्रिक्सी यानी मेरी बेटी, बहन, दोस्तन, मां और दादी। ट्रिक्सी को लोगबाग एक कुतिया के तौर पर ही देखते हैं, लेकिन मेरे साथ उसके आध्यात्मिक रिश्ते रहे हैं। शुरू से ही।

आज खोजूंगा आसमान में झिलझिलाते सितारों के बीच उसे। मुझे यकीन है कि मुझे देखते ही ट्रिक्सी अपने दोनों हाथ हिलायेगी जरूर। पूंछ हिलायेगी। बेसाख्ताै। वह लपकेगी मेरी ओर, और मैं लपकूंगा उसकी ओर। लेकिन अचानक वह फिर झिलमिला कर खो जाएगी, किसी थाली में भरे पानी में अक्सं को किसी दर्दनाक ठोकर की तरह। क्योंकि वह मर चुकी है ना, इसलिए। और फिर मैं फूट-फूट कर रो पड़ूंगा। क्योंकि मैं अभी मरा नहीं हूं। यही तो मेरे जीवन का सर्वाधिक पीड़ादायक पहलू है, कि लाख चाह कर भी मैं तत्काल मर नहीं सकता। मेरे और ट्रिक्सीे के बीच यह एक अमिट दीवार खिंच चुकी है। अभिशाप की तरह। कम से कम तब तक, जब तक मैं खुद मर कर उसके पास नहीं जाता।

लेकिन पहले ऐसा नहीं था। तब हम दोनों दो बदन में विचरते एक प्राण की तरह हुआ करते थे।

सिर्फ पांच दिन की ही थी ट्रिक्सी, जब मेरे घर आयी थी। ट्रिक्सी यानी पामेरियन फीमेल बच्ची। साशा-बकुल की ख्वाहिश थी, इसलिए राजकीय होम्योपैथिक मेडिकल कालेज के प्रोफेसर एसडी सिंह उसे लेकर अपनी घर से लाये थे। तब मैं अपनी टांग तुड़वाकर भूलुण्ठित लेटा था। शायद 12 मई-2000 की घटना है यह। एसी तब था ही नहीं। इसलिए गर्मी से राहत के लिए मैं जमीन पर ही लेटा था, कि अचानक डा सिंह एक झोला में लेकर सफेद फाहे जैसी इस बॉल को लेकर आये। उन्होंने बताया कि उसका जन्म 5 मई को हुआ है। उसके आगमन से मेरा पूरा परिवार हर्ष में डूबा था, जबकि ट्रिक्सी अपनी मां को खोजने के चक्कर में भौंचक्कीे भटक रही थी। साशा-बकुल उसे हाथोंहाथ थामे थे। हम सब उसके लिए अजनबी थे, इसलिए वह बार-बार हम सब के चंगुल से छूट कर अपनी मां को खोजने में इधर-उधर छिप जाती थी। इसी बीच एक दिन वह मासूम मनी-प्लांट के झंखाड़ में छिप गयी। पूरा घर बेहाल रहा। बहुत देर खोजने के बाद वह दिखी तो मैंने उसे हल्के एक थप्प़ड़ रसीद किया। उसके बाद से ही वह समझ गयी कि उसे इसी घर में हमेशा रहना है। हम सब ने उसका नाम ट्रिक्सी रखा।

इसके बाद से ही ट्रिक्सी ने इस घर को अपना घर मान लिया और फिर वह इस घर की सबसे दुलारी बन गयी। कूं कूं से जल्दी ही उसकी आवाज भौं भौं तक पहुंच गयी। और इसी के ही साथ उसकी घर के प्रति जिम्मेूदारी भी बढ़ गयी। सबसे पहला जिम्मा तो उसने कॉलबेल का सम्भाला। घर के बाहरी गेट से किसी के खटकने से पहले ही ट्रिक्सी कूद कर दरवाजे पर निरन्तबर निनाद छेड़ देती थी। उसका यह तरंगित स्वार तब ही थम पाता था, जब घर का कोई न कोई सदस्य दरवाजे पर पहुंच न जाए।

लेकिन उसका रौद्र रूप तब प्रकट होता था, जब कोई चोर-सियार टाइप शख्स या जीव हमारे घर के आसपास फटकता था। खास कर दूधवाला। यह जानते हुए भी कि अगर यह दूधवाला न आये तो ट्रिक्सी को सबसे ज्यादा दिक्कत होगी, लेकिन ट्रिक्सी दूधवाले को सूंघते ही पागल हो जाती थी। भौंक-भौंक कर उस पर फेचकुर फेंकने के दौरे पड़ते थे। उसे सम्भा्ल पाना मुश्किल होता था। शायद उसे साफ पता चल चुका था कि दूधवाला दूध में पानी मिलाता है। लेकिन शरीफ व साफ दिलशख्स को ट्रिक्सी सिर्फ पासवर्ड चेक करने की अंदाज में उसे सूंघ कर ही छोड़ देती थी। गजब थी ट्रिक्सी, कि पोस्टमैन जैसे किसी भी शख्स पर उसने कभी भी अपनी नाराजगी व्यक्त नहीं की। बच्चों के प्रति उसमें दैवीय स्नेख रहता था। मेरी पोती या कोई भी मित्र के बच्चे जब भी आये, उनके सामने वह हमेशा शांत और संयत ही रहती थी। तब भी, जब वे बच्चे उसके मूंछ उखाड़ते या उसे छेड़ते थे। ट्रिक्सी हमेशा खामोश रहती। बहुत ज्यादा हो जाता तो वह ऐसे शरारती बच्चों से दूर हट जाती। लेकिन जवाब में काटना या पंजा मारने के बारे में तो उसने कभी भी नहीं सोचा।

घर से अगर कोई सदस्य बाहर जा रहा है तो ट्रिक्सी उदास हो जाती थी, लेकिन उसके घर वापसी के वक्त वह इतना खुश हो जाती थी, मानो उसे कोई बड़ी लॉटरी मिल गयी। रात को मेरे घर वापस के वक्त‍ वह शाम से ही प्रतीक्षा शुरू कर देती थी। मैं आया ही नहीं, कि वह मेरे आसपास गोल-गोल चक्कर लगाती थी। कूं कूं कूं कूं। कुर्सी पर बैठने के बाद वह उचक कर मेरी गोद में दोनों पैर घुसेड़ कर मुझसे बतियाती थी। बहुत देर तक। वह मुझे बताती थी कि उसका दिन कैसा बीता, कौन-कौन घर आया, किसने घंटी बजायी, किसको काटने-नोंचने की कोशिश की, बकुल-साशा-इंदिरा ने किस-किस बात पर उसे डांटा, कितनी बार उसे दुलराया, कौन-कौन चिडि़या मेरे मुंडेर पर बैठी जिसे भौंक कर भगाया, कौन बंदर को उसने काटने की कोशिश की, वगैरह-वगैरह। एक-एक बात वह मुझसे करती थी, लेकिन चूंकि मैं उसकी बात समझ नहीं पाता था, इसलिए केवल हां हां, अच्छा, ओके, पक्का जैसे दिलासा देता रहता था।

हालांकि बाद में साशा की डिमाण्ड पर एक जर्मन स्पिट भी आयी। नाम रखा गया बोल्डी। ट्रिक्सी ने उस पर शासन करना शुरू कर दिया और बोल्डी ने आधीनता स्वीकार कर लिया। अब दोनों मिल कर हंगामा करते थे। उछलकूद। घर हरा भरा हो गया। अब दोनों मिल कर चूहों का शिकार करती थीं। किसी शातिर शिकारी की मानिन्द। लेकिन इन दोनों ने अब किसी तीसरे को भगाने की हर चंद कोशिश की। मैं बनारस में एक मासूम-अनाथ बिल्ली ले आया था। नाम रखा था संगीत। वह भी बहुत प्यारी बच्ची थी। लेकिन एक दिन ट्रिक्सी और बोल्डी ने मिल कर उसका अंतिम संस्कार करा दिया। कोई पांच साल पहले बोल्डी को खून के दस्तर हुए और उसी में उसकी मृत्यु हो गयी। अब ट्रिक्सीई अकेली हो गयी। लेकिन उसने अपना प्रेम बाकी के सदस्यों पर लुटाना शुरू कर दिया। समझदारी का आलम यह रहा कि उसे पता था कि कौन शख्स को घर के भीतर क्याल सम्मान दिया जाना चाहिए। भड़ास4मीडिया के यशवंत जब भी घर आये, ट्रिक्सी ने हमेशा स्वा‍गत किया।

ट्रिक्सी ने घर के हर संकट में मुझे मजबूत बनाये रखा। वह भी तब जब कि घरेलू संकट के चलते उसे एक साल बड़े भाई-भाभी के यहां रहना पड़ा। बाद में जब मैंने गोमती नदी के किनारे जंगल में रहने का फैसला किया, तब ट्रिक्सी को छोड़ना मेरी मजबूरी थी। लेकिन शायद ही कोई ऐसा दिन हुआ रहा हो, जब मुझे ट्रिक्सी की याद नहीं आयी। ट्रिक्सी की याद आते ही मेरी आंखें नम हो जाती थीं।

और आज तो बज्रपात ही हो गया।

जिसे मैं अपनी बेटी से ज्यादा प्यार करता था, वह इस दुनिया को छोड़ कर चली गयी। हमेशा-हमेशा के लिए।

अरे बेटा, यह तो तनिक सोचतीं तुम, कि मरघट तुम्हारी नहीं, मेरी प्रतीक्षा में है।

तुम मुझसे पहले कैसे मर गयीं ट्रिक्सी?

लेखक कुमार सौवीर उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ और बेबाक पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09415302520 या kumarsauvir@gmail.com पर कर सकते हैं.

कुमार सौवीर के लिखे इन पोस्ट्स को भी पढ़ सकते हैं>

आईजी साहब, आपको बधाई… आपने आगरा के पत्रकारों को लंगड़ाकर चलना सिखा दिया…

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यूपी में जंगलराज : लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार राजीव चतुर्वेदी को पुलिस ने थाने में प्राण निकलने तक प्रताड़ित किया

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चंदौली का हेमंत हत्याकाण्ड : पत्रकारिता बनाम गजब छीछालेदर

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मीडिया को देखते ही अमिताभ ठाकुर के घर से दुम दबाकर भाग निकले विजिलेंस वाले!

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देखिये, कितनी बेशर्मी के साथ यह प्रेसनोट हिंदुस्तान अखबार में छापा गया है

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आईएफडब्‍ल्‍यूजे के नेताओं ने किया रायपुर में नंगा नाच, हेमन्‍त और कलहंस की करतूत से पत्रकार समुदाय शर्मसार

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यूपी में जंगलराज : सूचना दिलाने के बजाय आयुक्त बिष्ट ने वादी को बेइज्जत कर नज़रबंद कराया

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लखनऊ के ये तीन गैर-जिम्मेदार अखबार

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पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

माननीय संपादक जी
भड़ास4मीडिया

सर

मेरा नाम श्याम दांगी  है और मैं मुंबई में पत्रकारिता से जुड़ा हूँ। सर नौकरी के दौरान मैं कुछ कठिनाईयों का सामना कर रहा हूँ जिसके लिए आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है। मैं पिछले पांच महीने से मुंबई से प्रकशित होने वाले  दैनिक अखबार दक्षिण मुंबई में बतौर सब एडिटर कार्यरत था। लेकिन मुझे इस दौरान कभी सैलरी नहीं मिली।

फिर मुझे किसी काम से गाँव जाना पड़ा। लौटने के बाद जब मैंने अपनी सैलेरी की मांग की तो मुझे बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया गया। अब मेरे लिए क्या रास्ता बचता है इस विषय में मुझे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ताकि इस अखबार से जुड़े कई और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

श्याम दांगी
7506530401
shyamdangi22@gmail.com

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देखो महाप्रभुओं! देख लो, इस बुजुर्ग पत्रकार की दुर्दशा

इलाहाबाद। देखिये, इस तस्वीर को जरा गौर से देखिये। दहाड़ें मारकर रोते, माथा पीटते सामने दिख रहे हैं बुजुर्ग पत्रकार रामदेव मिश्र। उसके थोड़ी ही दूर सहमे और हतप्रभ दशा में खड़े थे उनके दो पोते और एक नातिन। रामदेव ने अपना इकलौता बेटा और बहू तो इन तीन मासूम बच्चों ने अपने माता पिता को हमेशा-हमेशा के लिए एक सड़क हादसे में खो दिया। बुजुर्ग पत्रकार रामदेव मिश्र और मासूम उम्र के रामदेव के दो पोते और एक पोती। इस परिवार के आगे अंधेरा ही अंधेरा।

आगे बढ़ने से पहले रामदेव और संजय मिश्र के बारे में जान लें। रामदेव मिश्र और इनका इकलौता बेटा संजय मिश्र उन आंचलिक अभागे पत्रकारों में हैं, जिनसे अखबार हाउस समाचार संकलन, अखबार वितरण से लेकर विज्ञापन तक के कार्य बारहों महीने लेते हैं पर इनको कायदे से पत्रकार की श्रेणी तक में शुमार नहीं करते। खुद करोड़ों अरबों का सालाना टर्न ओवर करने वाले अखबार हाउस में अखबार की रीढ़ कहे जाने वाले ये आंचलिक पत्रकार बगैर किसी साधन-सुविधा के रोजाना दस पंद्रह किमी रेंज में सभी बीट पर अकेले जूझते हैं, कोई खबर छूटने पर हंड्रेड फीसदी जवाबदेही भी।

बहरहाल, दो जनवरी 2016 की शाम करीब चार बजे सपत्नीक बाइक से घर आते कौशांबी जिले की सैनी रोड पर तेज रफ्तार ट्रक ने पत्रकार संजय और उनकी पत्नी रीता उर्फ राधा को कुचल दिया। घटनास्थल पर ही पत्रकार दंपती की मौत हो गई। घटना की जानकारी मिलते ही लालगोपालगंज के हिन्दुस्तान पत्रकार रिजवान उल्ला और अमृत प्रभात के पत्रकार राकेश शुक्ला मौके पर पहुंचकर रात में ही पोस्टमार्टम कराया।

दुखद यह कि इकलौते पुत्र और बहू की एकसाथ मौत ने बुजुर्ग पत्रकार रामदेव के बुढ़ापे की लाठी तो छीनी ही, माता पिता को असमय खोने वाले तीन मासूम बच्चों की जिंदगी में भी अंधेरा पैदा कर दिया। समूचे प्रकरण में शर्मनाक रही उन अखबारों की भूमिका जिसके लिए रामदेव मिश्र ने बेटे को साथ लेकर अपनी जिंदगी का अस्सी फीसदी हिस्सा खपा दिया।

करीब सातवें दशक से रामदेव मिश्र साइकिल से इलाके की खबरों का संकलन कर शाम को पैकेट से छपने के लिए उसे भेजते फिर अखबार छपने के बाद भोर से ही करीब पंद्रह किमी सुदूर गांव की रेंज में अखबार बांटने का कार्य करते। तब के प्रमुख समाचार पत्र देशदूत, भारत फिर उसके बाद दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान और अमर उजाला से लेकर कॉम्पैक्ट, आईनेक्स्ट तक के लिए कार्य कर रहे हैं। अखबारों ने काफी तरक्की की। संस्करण दर संस्करण बढ़ते गए। मालिकान कमा कमा कर मोटे होते गए। कारपोरेट कल्चर ने अखबारों के दफ्तर, फर्नीचर के कलेवर तक बदल डाले पर नहीं बदल सके तो साठ फीसदी उन आंचलिक पत्रकारों की दुर्दशा, जो अखबार के लिए नींव की ईंट बन उन अखबारी अट्टालिकाओं की शान बढ़ाने का कार्य दिन रात मिलकर किया करते हैं।

खैर, बात आंचलिक पत्रकार संजय मिश्र और रामदेव मिश्र की। बुढ़ापे में इकलौता बेटा और बहू को खोने वाले अखबारी परिवार के इस पुराने साथी के घोर दुख की घड़ी में हिन्दुस्तान के संपादकीय प्रभारी आशीष त्रिपाठी, चीफ रिपोर्टर बृजेंद्र प्रताप सिंह, अंचल डेस्क प्रभारी देवेंद्र देव शुक्ल, गुरूदीप तिवारी, पीयूष श्रीवास्तव अंत्येष्टि से लेकर रामदेव के घर आकर परिजनों को ढांढस बंधाया, मदद का भी आश्वासन दिया। अमर उजाला और दैनिक जागरण की इलाहाबाद यूनिट तो एकदम चिरकुट निकली। इन दोनों अखबार के लोग तो रामदेव के दरवाजे पहुंच ढांढस बंधाने तक की औपचारिकता से मुंह छिपाया। और वे नेताजी लोग जो खबरों में अपना नाम फोटो छपवाने के लिए मंचों से गला फाड़ते हैं-‘कलम के सिपाही अगर सो गए तो…। वे भी अपनी गोटी सेट करने में पता नहीं कहां जुटे रहे।

आंचलिक पत्रकारों में कौशांबी मुख्यालय, सिराथू के पत्रकारों ने जुटकर रात में ही पोस्टमार्टम से लेकर सैनी कोतवाली में एफआईआर कराने तक मदद की। इस असहाय पत्रकार की आर्थिक मदद के लिए स्थानीय पत्रकार चंदा तक जुटा रहे हैं पर इलाकाई नेता लापता हैं। इलाके के विधायक अंसार अहमद, बसपा के पूर्व विधायक गुरूप्रसाद मौर्य तो अंत्येष्टि में गंगातट पर पहुंचे। अंसार अहमद ने उसी दिन स्मृति- द्वार बनवाने का ऐलान किया। कई दलों के थोक के थोक बनाए गए मीडिया ‘मैनेजर’ एक बार फिर नकारा साबित हुए।

लोकसभा चुनाव के पहले तक गला फाड़ फाड़कर चिल्लाने वाले क्षेत्रीय भाजपा सांसद केशव प्रसाद …‘नेता नहीं, बेटा चुनिए’ आखिर कहां है। हर हाल में चुनावी बैतरिणी पार कर लेने को आतुर दो बार विधायकी चुनाव लड़ने वाले नेता शिवप्रसाद मिश्र, पूर्व विधायक प्रभाशंकर पांडेय, पूर्व केंद्रीयमंत्री रामपूजन पटेल, पूर्व सांसद धर्मराज पटेल, सीमा क्षेत्र से लगे प्रतापगढ़ के राज्यसभा सदस्य प्रमोद तिवारी, पूर्व सांसद रत्ना सिंह, प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री राजा भैया समेत अन्य कई सो-काल्ड ‘जनता के सेवक’ अभी तक सांत्वना देने तक के लिए उनके घर नहीं पहुंचे।

और तो और, जगह जगह उग आए पत्रकारीय संगठनों के ‘क्रांतिकारी साथी’ भी चुप्पी साधे बैठे हैं। चर्चा के दौरान बुजुर्ग पत्रकार रामदेव मिश्र के आंखों में आंसू आ जाते हैं। दर्द बयां करते हैं-अखबार ने भी लिया, समाज ने भी चढ़ जा बेटा सूली पर कहकर लिया पर संकट की घड़ी में मिला क्या? नेता अफसर और समाज… सांत्वना के दो शब्द कहने तक में कंजूसी करेगा, कभी सोचा न था। …एक पत्रकार के जीवन का शायद यही अंतिम सच भी है।

हे देश के महाप्रभुओं! रामदेव मिश्र के चेहरे में कहीं अपना चेहरा नजर आ रहा हो या इन बच्चों में कहीं अपना कुछ दिख रहा हो तो इस परिवार को भरोसा दिलाइए कि हम सब उनके साथ हैं।

मूल खबर:  हिंदुस्तान के पत्रकार संजय मिश्र और उनकी पत्नी की सड़क हादसे में मौत

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. संपर्क: shivas_pandey@rediffmail.com


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पिता की तेरहवीं में छुट्टी लेकर गए फोटो जर्नलिस्ट की चार दिन की तनख्वाह काट ली

राजस्थान पत्रिका समूह में उत्पीड़न और प्रताड़ना की ढेर सारी कहानियां सामने आती रही हैं. एक ताजे घटनाक्रम के मुताबिक पत्रिका ग्वालियर के फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पाण्डेय अपने पिता की तरेहवीं में हिस्सा लेने के लिए अवकाश पर गए थे. जब वे लौटकर आए तो पता चला उनका अवकाश मंजूर नहीं किया गया है और उनके वेतन से चार दिन की सेलरी काट ली गई है. इससे आहत पांडेय ने प्रबंधन को पत्र लिखकर न्याय करने की गुहार की है.

सूत्रों के मुताबिक पिता जी की तेरहवीं पर अवकाश पर जाने की नियमानुसार सूचना पत्र के जरिए फोटो जर्नलिस्ट शशि भूषण पांडेय ने अपने इंचार्ज नीरज सिरोहिया को और वरिष्ठों को दी थी. इसके बाद वे अवकाश पर चले गए क्योंकि जाना जरूरी था. अवकाश से लौटने के बाद उन्हें 4 दिन की कम सेलरी दी गयी. उन्हें बताया गया कि बिना मंजूरी के अवकाश पर जाने की वजह से सेलरी काटी गयी है. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि किसी के पिता की तेरहवीं हो और वह लिखित में छुट्टी की अप्लीकेशन देकर जाए और वह छुट्टी एसेप्ट न हो. इसी को कहते हैं ताकत के नशे में होने पर आंखों पर घमंड और पाप की पट्टी चढ़ जाती है और सब कुछ उलटा दिखने लगता है.

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‘इंडिया न्यूज राजस्थान’ चैनल बंद, न्यू इयर पर सैकड़ों कर्मियों के लिए बैड न्यूज

विनोद शर्मा और उनके बेटे कार्तिक शर्मा को अपने मीडियाकर्मियों को दुख देने और प्रताड़ित करने में आनंद आता है. शायद कारण वही हो कि मीडिया वालों ने मीडिया ट्रायल के जरिए मनु शर्मा को जेसिका लाल मर्डर केस में सजा दिलवाने में सफलता पाई इसलिए बदला लेने के लिए बाप बेटे ने न्यूज चैनल से लेकर अखबार मैग्जीन सब खोल डाला और हर साल इस मीडिया हाउस से सैकड़ों लोगों को निकालते रखते रहते हैं. ताजी सूचना है कि इंडिया न्यूज राजस्थान चैनल को प्रबंधन ने बंद कर दिया है.

जब सारी दुनिया हैप्पी न्यू इयर बोल रही है, उस वक्त इंडिया न्यूज के मालिकों ने अपने सैकड़ों कर्मियों के लिए न्यू इयर को अनहैप्पी बना डाला. इन सैकड़ों कर्मियों को न तो तीन महीने का एडवांस वेतन दिया गया और न ही उन्हें पहले से सूचित किया गया ताकि वे वैकल्पिक व्यवस्था कर सकें. आज साल के आखिरी दिन सभी को अचानक सूचित कर दिया गया कि चैनल बंद हो चुका है, आप लोग अपना अपना रास्ता देखें.

भड़ास के पास आए दर्जनों फोन काल्स में सबने रुआंसी आवाज में पीड़ा बताई…. कहीं ऐसा होता है क्या, अचानक चैनल बंद कर दो… पहले बता दिया होता तो कोई व्यवस्था कर लेते हम लोग… न तो एडवांस वेतन दिया और न पहले सूचित किया… ऐसे में नए साल के पहले ही जनवरी महीने में घर चलाना मुश्किल हो जाएगा… ‘नो वन किल्ड जेसिका’ फिल्म की तरह मीडिया वालों के दुख दर्द पर एक फिल्म बननी चाहिए, ‘नो वन फायर्ड जर्नलिस्ट्स’… इस लोकतांत्रिक देश में मीडिया वालों के हक और इज्जत के लिए कोई सिस्टम नहीं है, कोई सुनने वाला नहीं है, कोई आगे आना वाला नहीं है…

मीडिया के मालिक खुद जब नेताओं के गोद में जा बैठे हों तो नेता भला मीडिया मालिकों से क्यों पंगा लेगा, उसे भी अपनी राजनीति की दुकानदरी चलानी है… पतन की इस चरम परिघटना में सबसे ज्यादा नुकसान सरोकारी पत्रकारिता और आम पत्रकारों का हुआ है… यही कारण है कि नेता लोग और अफसर लोग प्रिंट मीडिया वालों के लिए न तो मजीठिया वेज बोर्ड लागू कर करा पा रहे और न इलेक्ट्रानिक वालों के फायर हायर को लेकर सामान्य श्रम कानून के तहत कोई कार्रवाई कर आदेश निर्देश दे पा रहे….

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सर्वदा कविता के सुखद आनंद में जीने वाले पंकज सिंह को उनकी ही एक कविता में विनम्र श्रद्धांजलि!

Vinod Bhardwaj : पंकज सिंह से मेरा पुराना परिचय था. 1968 से उन्हें जानता था. आरम्भ लघु पत्रिका की वजह से. 1980 में जब मैं पहली बार पेरिस गया था, तो उन दिनों वे वहीँ थे. काफी उनके साथ घूमा. रज़ा से मिलने उनके साथ ही गया था. लखनऊ में रमेश दीक्षित के घर पर एक बार खुसरो का ‘छाप तिलक’ उनसे सुनकर मन्त्र मुग्ध हो गया था. बहुत सुन्दर गाया था उन्होंने. अजीब बात है कि फेसबुक पर हम मित्र नहीं थे पर वे मेरी कई चीज़ें शेयर कर लेते थे अपनी वाल पर, अधिकार की तरह. पिछली कई मुलाकातों में उन्होंने मुझसे सेप्पुकु पढ़ने की बात की. तय हुआ हम जल्दी ही मिलेंगे. पर आज यह बुरी खबर मिली. मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

Dayanand Pandey : मित्र पंकज सिंह नहीं रहे, इस ख़बर पर बिलकुल यकीन नहीं हो रहा। कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो धक से लग जाती हैं कि अरे! यह ऐसी ही ख़बर है। बहुत सारी यादें हैं। फ़िल्मकार प्रकाश झा और उन के साथ गुज़री कुछ न भुला पाने वाली साझी यादें हैं। दिल्ली में जब रहता था, तब की मुलाक़ातें हैं। लखनऊ की मुलाक़ातें हैं। मदिरा में भीगी हुई रातें हैं। फ़ेसबुक की बातें हैं । भाषा और शब्दों के प्रति अतिशय सतर्क रहने और सचेत करने वाले पंकज सिंह कामा और पूर्ण विराम तक की संवेदना को समझते थे, बहुत शालीनता से समझाते भी थे। लेकिन अभी कुछ भी कह पाने का दिल नहीं हो रहा। मुझ से कुल दस साल ही बड़े थे। यह भी कोई जाने की उम्र थी भला? ‘मैं आऊंगा चोटों के निशान पहने’ कभी लिखने वाले भी जानते हैं कि जाने के बाद कोई नहीं लौटता। सर्वदा कविता के सुखद आनंद में जीने वाले पंकज सिंह को उन की ही कविता में विनम्र श्रद्धांजलि !

गेरू से बनाओगी तुम फिर
इस साल भी
घर की किसी दीवार पर ढेर-ढेर फूल
और लिखोगी मेरा नाम
चिन्ता करोगी
कि कहाँ तक जाएंगी शुभकामनाएँ
हज़ारों वर्गमीलों के जंगल में
कहाँ-कहाँ भटक रहा होऊंगा मैं
एक ख़ानाबदोश शब्द-सा गूँजता हुआ
शब्द-सा गूँजता हुआ
सारी पृथ्वी जिसका घर है
चिन्ता करोगी
कब तक तुम्हारे पास लौट पाऊंगा मैं
भाटे के जल-सा तुम्हारे बरामदे पर
मैं महसूस करता हूँ
तुलसी चबूतरे पर जलाए तुम्हारे दिये
अपनी आँखों में
जिनमें डालते हैं अनेक-अनेक शहर
अनेक-अनेक बार धूल
थामे-थामे सूरज का हाथ
थामे हुए धूप का हाथ
पशम की तरह मुलायम उजालों से भरा हुआ
मैं आऊंगा चोटों के निशान पहने कभी

Pankaj Chaturvedi : पंकज सिंह दुर्लभ इंसान और कवि तो थे ही, कविता के अनूठे पक्षधर भी थे. उन्होंने एक बार कहा था कि कवि को ‘डिफ़ेंसलेस’ जीवन क्यों जीना चाहिए? आज उनकी विदाई से मैं स्तब्ध रह गया. जैसे हम और अरक्षित हो गये. विनम्र श्रद्धांजलि!

Surendra Grover :  बेहद दुखद और झकझोर कर रख देने वाली बुरी खबर है कि वरिष्ठ कवि और पत्रकार Pankaj Singh हमें छोड़ कर चले गए.. मुझसे कुछ समय पहले ही फोन पर मिलने आने के लिए कहा भी था पर अफ़सोस कि मैं उनके इस आदेश का पालन नहीं कर पाया.. कल्बे कबीर के साथ कार्यक्रम बनाने की कोशिश की जो असफल रही फिर Uday Prakash जी के साथ उन्हें टैग करते हुए पोस्ट भी की थी एक हफ्ते पहले ही पर नाकामयाब रहा.. अपने छोटे सा बर्ताव करते थे जब भी मिले.. फिर एक बार अनाथ हो गया हूँ.. सादर श्रद्धांजलि..

जन विजय : कवि पंकज सिंह का देहान्त। मैं उन्हें पिछले 35 साल से जानता था। मैं बेहद दुखी हूँ। उदय, तुम्हारे साथ ही 1980 में मैंने जे०एन०यू० में पहले-पहल पंकज सिंह को देखा था डाऊन कैम्पस में लाइब्रेरी के पास। पंकज सिंह केदारनाथ सिंह के साथ घूम रहे थे और उन्हीं दिनों प्रख्यात चित्रकार रज़ा के साथ साल भर पेरिस में गुज़ार कर लौटे थे। तुम्हीं ने मेरा परिचय पंकज से कराया था। बाद में पंकज से मेरी गहरी दोस्ती हो गई थी। मैंने ही 1982 में पंकज को सविता से मिलवाया था। सविता तब इन्द्रप्रस्थ कालेज में एन०ए० में पढ़ रही थी। बाद में पंकज सविता के साथ मास्को भी आए थे और मेरे घर पर ही रुके थे। आज मेरी नज़रों के सामने वे दृश्य घूम रहे हैं, वे स्मृतियाँ बार-बार आ रही हैं।

Dhiraj Kumar Bhardwaj : अभी-अभी यशवंत सिंह से फोन पर खबर मिली कि वरिष्ठ पत्रकार पंकज सिंह जी का निधन हो गया. हालांकि फेसबुकियों के लिये उनका नाम कम परिचित है, लेकिन पत्रकारिता में उनका नाम काफी पुराना है. पुराने कांग्रेसी नेता तारिक अनवर ने जब अपने कॅरीयर की शुरुआत में सन 1972 में युवक धारा के नाम से एक पत्रिका निकाली थी तो उसके संपादक पंकज भैया ही हुआ करते थे. फिर बाद में नभाटा, हिन्दुस्तान, बीबीसी लंदन आदि कई संस्थानों में देश-विदेश में काम किया. कई कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई भी उन्हीं की बदोलत शुरु हुई. कॉरपोरेट पत्रकारिता का आखिरी असाइनमेंट कल्पतरू एक्सप्रेस के साथ रहा. मुझसे पहली मुलाकात 2010 में मेरी संस्था राष्ट्रीय पत्रकार कल्याण ट्रस्ट के वार्षिक सम्मेलन में हुई थी. फेसबुक और गूगल प्लस अकाउंट भी उन्होंने मेरे बहुत अनुरोध करने पर बनाया, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर ज्यादा सक्रिय नहीं रहे. पिछले दिनों मुलाकात हुई तो बता रहे थे कि कल्पतरू वालों ने उनकी कई महीने की तनख्वाह मार ली. वे नोएडा-दिल्ली की सीमा पर बने ईस्ट एंड अपार्टमेंट में रहते थे. हाल-फिलहाल में मुलाकातों का सिलसिला थोड़ा कम हो गया था. पिछली मुलाकात में उन्होंने कहा भी था कि अब जिंदगी का बहुत भरोसा नहीं रहा… आज अचानक ऐसा लग रहा है मानों अपने परिवार का कोई सदस्य बिछुड़ गया हो. पुराने एलबमों में तलाशा तो हमारी पहली मुलाकात की कुछ तस्वीरें मिल गयीं.

पत्रकार विनोद भारद्वात, दयानंद पांडेय, सुरेंद्र ग्रोवर, पंकज चतुर्वेदी, जनविजय, धीरज भारद्वाज के फेसबुक वॉल से.


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दिल के दौरे से वरिष्ठ पत्रकार और कवि पंकज सिंह का निधन

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क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है!

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

विज्ञापन निकलने के बाद ही आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर नियुक्त किए जाते हैं, विज्ञापन में पात्रता की शर्तों के अनुसार आवेदन देने वाला किसी भी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी नहीं होना चाहिए।  आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति की प्रक्रिया भी स्थाई उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति के समान ही है। आकस्मिक उद्घोषकों / कम्पीयर की भी काम करने की अवधि 7 घंटे 20 के ही समान है।

वर्तमान में एक आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को 3 से 4 असाइनमेंट को पूर्ण करने में पूरा महीना काम करना पड़ता है। वेज़ेज़ एक्ट के हिसाब से व्यावहारिक एवं वास्तविक विधि द्वारा असाइनमेंट से कार्य दिवस की गणना का नया विधान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली की सहमति से निर्धारित किया गया है, लेकिन इसका लाभ आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को नहीं दिया जा रहा है।

आकाशवाणी महानिदेशालय भारत सरकार नई दिल्ली ने आदेश संख्या – 102(14)/78-SVII , दिनांक 8 सितंबर 1978 के तहत कैज़ुअल कलाकारों/ कर्मचारियों के नियमितिकरण के लिए एक नियमितिकरण योजना/ स्कीम दिनांक 08/09/ 1978 को बनाई गई थी जिसमें आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट, आकस्मिक जनरल असिस्टेंट/ कॉपिस्ट, आकस्मिक संगीतकार के साथ आकस्मिक उद्घोषकों को भी नियमित किया गया है।

6 मार्च 1982 के पहले आकाशवाणी के सभी पद अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थे, वर्तमान में उद्घोषक/ कम्पीयर के सभी पद स्थाई पद हैं। इसी स्वीकृत एवं नियमित पदों की जगह आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर वर्षों से सेवाकार्य कर रहे हैं। O.A./563/1986 के मामले में ऑनरेवल CAT, प्रधान शाखा नई दिल्ली द्वारा पारित आदेश पर दूरदर्शन के सभी आकस्मिक कलाकारों का नियमितिकरण किया गया है और किया जा रहा है। O.A./563/1986 के मामले में 14 फरवरी 1992 को बनाई गई नियमितिकरण योजना को ही सादर दुहराने की बात ऑनरेवल CAT ने ही आकाशवाणी के आकस्मिक कलाकार सुरेश शर्मा एवं अन्य के मामले में O.A. 822/1991 में उल्लिखित की।

आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली ने दोहरे मापदंड के संग सिर्फ आवेदकों के संवर्गों के नियमितिकरण के लिए ही नियमितिकरण योजना बनाई और वर्ष में 72 असाइनमेंट्स पूरा करने वाले आकस्मिक कलाकारों, आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट एवं आकस्मिक जनरल असिस्टेंट को नियमित कर नियमितिकरण का लाभ दिया जा चुका है, इतना ही नहीं O.A. 601/2006 कंचन कपूर एवं अन्य के मामले में ऑनरेवल CAT द्वारा 6 जुलाई 1998 एवं पुनः 20 मार्च 2007 को पारित आदेश में वर्ष में 72 से भी कम दिन कार्य करने वाले आकस्मिक कलाकारों की सेवाओं का नियमितिकरण किया जा चुका है।

आकाशवाणी त्रिवेंद्रम के कैज़ुअल कम्पीयर पी. रामेन्द्र कुमार की सेवाओं का नियमितिकरण O.A. 743/ 2000 में पारित आदेश के अनुपालन में प्रोडक्शन असिस्टेंट/ ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के पद पर किया जा चुका है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा उमा देवी के मामले में 10 अप्रैल 2006 में पारित आदेश में दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश के बावजूद तथा समान रूप से समान सेवा शर्तों पर सेवारत हम आकस्मिक उद्घोषकों/ कम्पीयर का नियमितिकरण आज तक नहीं किया गया है।

आकस्मिक उद्घोषकों के अधिकार को हाशिये पर डाल दिया गया है। अवैध अंडरटेकिंग के सहारे आकाशवाणी पहले ही देश के अधिकांश आकस्मिक उद्घोषक और कम्पीयर से एफिडेविट पर हस्ताक्षर ले चुकी हैं और अब स्क्रीनिंग में उन्हें फेल करके हमेशा के लिए आकाशवाणी से बाहर करना शुरू भी कर दिया है, ये सब महज़ इसलिए कि अपना जायज़ अधिकार मांगने लायक भी कोई न रहे कोई न बचे।

पंद्रहवी लोक सभा में संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी प्रसार भारती और आकाशवाणी को ये निर्देश दिया था कि आकस्मिक उद्घोषकों और कम्पीयर के साथ भेद भाव और शोषण को तत्काल ख़तम किया जाए। देश की दो सर्वोच्च संस्था एक माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी हमारी संसद, हैरानी होती है जब इनका आदेश और निर्देश प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय नहीं मानती है और वही काम करती है, जो इनके मन में आता है और जब कभी प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय को ये याद दिलाया जाता है, कि आप माननीय सर्वोच्च न्यायालय और संसद के निर्देश को न मान कर उनकी अवमानना कर रहे हैं, तब ये अपना बदला आवाज़ उठाने वाले की ड्यूटी बंद करके निकालते हैं।

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है जो इनके आदेश और निर्देश का अनुपालन नहीं करती ? अगर ऐसा है तो ये ग़लत है, इसके लिए प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय से मैंने सवाल किया था और परिणाम ये रहा कि मेरी बुकिंग (ड्यूटी) बंद कर दी गई है। सच बोलने पर सुना था इनाम मिलता है लेकिन मुझे तो सज़ा मिली है और पूछने पर आज तक मेरा क़ुसूर नहीं बताया गया है,अगर प्रसार भारती सही है और उसके दावे सच्चे हैं तो Honourable Supreme Court of India,  Central Administrative Tribunal  और संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय के ख़िलाफ़ क्यों है? आशा करता हूँ सच का साथ आप देंगे वरना संभव है आज सच बोलने की मुझे सज़ा मिली है कल आपका कोई अपना भी मेरी तरह फ़रियाद कर रहा होगा, आप ऐसा होने देंगे?

Ashok Anurag 
casual hindi announcer
AIR Delhi

जाने माने आकाशवाणी उदघोषक अशोक अनुराग का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं>

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

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नियमितीकरण के लिए आकाशवाणी के उद्घोषकों का जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन

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आह आकाशवाणी, वाह आकाशवाणी…

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बे-मन की बात : आकाशवाणी के कैजुअल एनाउंसरों पर लटक रही छंटनी की तलवार

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केंद्र सरकार ने केबल एक्ट 1995 में चुपचाप संशोधन कर चैनलों को नोटिस जारी कर दिया, हम सब कब जगेंगे!

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अमर उजाला की डिजिटल टीम के पास मुद्दों का टोटा, देखिए क्या क्या छाप रहे हैं

Ayush Shukla : लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ. धन्य हो तुम्हारा हिंदी अखबार. धन्य हो इस अखबार की डिजिटल टीम के रिपोर्टर. धन्य हो डिजिटल के संपादक जी और धन्य हो इस ग्रुप के ओवरआल मालिक जी. आप लोग भी इसे देखिए और सोचिए कि अमर उजाला की टीम के पास क्या मुद्दों का टोटा पड़ गया है जो पैंट में पेशाब कर देने जैसी चीजों को खबर बनाने पर तुले हुए हैं.

 न्यू मीडिया के युवा पत्रकार आयुष शुक्ला के फेसबुक वॉल से.

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धंधेबाज और चरित्रहीन जी न्यूज (एमपी-सीजी) वालों ने एक इमानदार रिपोर्टर को यूं बेइज्जत कर निकाला

घटना छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर सरगुजा की है. यहां मनीष सोनी नामक पत्रकार कई वर्षों से जी न्यूज एमपी-सीजी से जुड़े हुए हैं. आज उन्होंने अचानक देखा कि चैनल स्क्रीन पर उनका नाम लिखकर यह चलाया जा रहा है कि मनीष सोनी को चैनल से निकाल दिया गया है, उनसे कोई किसी प्रकार का संबंध अपने जोखिम पर रखे. ऐसी ही कुछ लाइनें बदल बदल कर लगातार चल रही थी. मनीष सोनी को यकीन न हुआ कि आखिर उनके साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है. उन्होंने न तो दलाली की है, न बेइमानी की है, न चोरी की है, न अपराधी हैं, तो चैनल वाले ये सलूक क्यों कर रहे हैं.

इस पूरे प्रकरण को लेकर जब मनीष सोनी ने दाएं बाएं से पता किया तो मालूम चला कि चैनल के धंधेबाज वरिष्ठ पदाधिकारी अपनी धंधेबाजी बढ़ाने और अपनी काली करतूतों को विस्तार देने हेतु उन्हें बलि का बकरा बनाकर हटा दिया है और किसी दूसरे धंधेबाज को चैनल की बागडोर सौंप दी जाएगी. इस हटाने के लिए पूरी एक कहानी गढ़ी गई और उसके आधार पर उन्हें बर्खास्त करके इसकी सूचना सीधे चैनल पर प्रसारित करवा दी गई. मनीष सोनी ने अपने चैनल के वरिष्ठों को एक पत्र लिखकर ऐसी हरकत करने के पीछे का कारण पूछा है… पढ़िए एक इमानदार पत्रकार का दर्द.

मनीष का पत्र अगले पेज पर है जहां जाने के लिए नीचे क्लिक करें>

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राज्यसभा टीवी के इंटरव्यू में एक महिला प्रतिभागी पर अपना नाम वापस लेने का दबाव डाला गया!

इसी साल सितंबर महीने में राज्यसभी टीवी में हुए Consultant Anchor के वॉक इन इंटरव्यू के लिए मैं पहुंचा राज्यसभी टीवी के दफ्तर। कई दूसरे प्रतिभागी भी वहां पहुंचे। सभी मीडिया जगत के ही साथी थे। एक-एक कर हमारे सीवी को छांटा गया। फिर जो सभी पैमानों पर उनके विज्ञापन पर खरे उतरे, उन्हें रुकने को कहा गया। बाकी सबको धन्यवाद कह दिया गया। मेरी भी सीवी सिलेक्ट हो गई। मैं काफी समय से मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी करता आया हूं और अभी भी करता हूं।

खैर, बारी-बारी हम सबको इंटरव्यू के लिए भेजा गया। 6 मठाधीशों का पैनल बंद कमरे में प्रतिभागियों की योग्यता का फैसला कर रहा था। सभी को इंटरव्यू के दौरान पता चला कि केवल अंग्रेज़ी एंकरों को ही इस पद के लिए योग्य समझा जा रहा है। बड़ी बात है कि इस बात का ज़िक्र विज्ञापन में कहीं भी नहीं किया गया था। मज़ेदार बात है कि अंग्रेज़ी चैनल से कोई एंकर पहुंचा ही नहीं था। शायद वो सभी अपने-अपने संस्थानों में बेहद खुश हैं और इन सरकारी पचड़ों से दूर ही रहना चाहते हैं।

मेरी बारी आई तो यही बात कहकर मुझे भी टरका दिया गया। लेकिन हद तो तब हो गई जब एक महिला प्रतिभागी को एक मठाधीश जो कि एक सरदार हैं, उसने कहा कि आप अपना नाम इस इंटरव्यू से वापस ले लें। बिना सवाल पूछे ही उनसे कह दिया गया कि उन्हें ज़ीरो नंबर दिए गए हैं और उनकी उम्र को देखते हुए ये अच्छा नहीं लगेगा कि उनके मार्क्स को सार्वजनिक किया जाए। तय था कि किसे इस पद के लिेए रखा जाएगा, इसका चयन पहले ही कर लिया गया था और इंटरव्यू का नाटक केवल आंखों में धूल झोंकने के लिए किया गया था।

अब सवाल उठता है कि हम कब तक ऐसे मठाधीशों को सरकारी दफ्तरों को उनके बाप का जागीर बने रहने दें। क्या हम और आप में इन सरकारी दफ्तरों में नौकरी करने की योग्यता नहीं है और ये कौन तय करेगा कि किसमें कितनी योग्यता है। कब तक सिफारिश के दम पर इन पदों पर नियुक्ति की जाती रहेगी। क्या समय नहीं आ गया कि हम एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज़ उठाएं, अदालत का दरवाज़ा खटखटाएं। चलिए हम सब मिलकर एक मुहिम चलाएं मीडिया साथियों, ताकि इन बाबुओं को दिखा सकें की आम आदमी की ताकत कुर्सी की ताकत से ज्यादा होती है। चलिए एक बेहतर भारत बनाए जहां मुझे कोई पद मिले या ना मिले, जो उसके योग्य हो उसे ज़रूर मिले।

धन्यवाद।

साभार,
सन्नी सिंह
sunnysinghmika@gmail.com

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‘समाचार प्लस’ चैनल ने मुझ स्ट्रिंगर का छह महीने का पैसा मार लिया!

समाचार प्लस चैनल की रीयल्टी. पत्रकारों का शोषण करने वाला चैनल. न्यूनतम वेतन से भी कम देने वाला चैनल. छ माह की तनख्वाह खा जाने वाला चैनल. असभ्य और बदमिजाज एडिटर वाला चैनल. अपनी बात से बार बार पलटने वाले सम्पादक. स्ट्रिगरों का हक मारने वाले. खबर के लिए चौबीस घण्टे फोन करने वाले. वेतन के लिए फोन नहीं उठाने वाले. रोज शाम राजस्थान की जनता को ज्ञान बॉटने वाले सम्पादक महोदय. एक स्ट्रिगर के सवालों का जवाब नहीं दे पाते. राजस्थान के दर्जनों पत्रकारों के मेहनत के पैसे खा जाने वाले. पत्रकारो को आईडी कार्ड नहीं देने वाले. ऐसा चैनल जिसमे एकाउण्ट और एचआर डिपार्टमेन्ट नहीं हो. गेजुएट, पोस्ट गेजुएट और बीजेएमसी पास युवाओं को मजदूर से कम वेतन देने वाले, वह भी चार माह की देरी से. ये सब करता है समाचार प्लस चैनल.

एसाइनमेंट डेस्क से अनुरोध है कि नीचे लिखे गए मैसेज को साहनी सर तक पहुंचा दें…

साहनी सर

नमस्ते

मैं विमलेश कुमार शर्मा पूर्व स्ट्रिंगर समाचार प्लस राजस्थान, दौसा। मुझे मिस्टर अजय झा जी ने फोन पर निर्देश देकर चैनल के लिए काम करने से मना कर दिया और चैनल आईडी नव नियुक्त स्ट्रिंगर एचएन पाण्डे को देने के लिए कहा गया। मैंने अजय सर के निर्देश की पालना की। मुझे मेरे लगभग 80 दिनों के बकाया भुगतान के लिए इन्तजार करने के लिए कहा गया। अगस्त माह के शुरुआत में राजस्थान के सभी साथियों का भुगतान कर दिया गया पर मेरा भुगतान नहीं किया गया।

मैंने अजय सर से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि आपके खाते मे अमाउण्ट डाल दिया गया है। मैंने उन्हें बताया कि मुझे पेमेन्ट नहीं मिला है और मैने बैंक की पूरी डिटेल उन्हें मेल कर सारी स्थिति से साफ साफ अवगत करा दिया। अब बीते तीन चार सप्ताह से अजय सर मेरा फोन अटेण्ड नहीं कर रहे हैं। मैंने दर्जनों बार डेस्क पर फोन कर अजय जी सर से बात करनी चाही पर बात नहीं हो पा रही है। मैने हाशिम जी सर, अमरेश जी सर, दीपक जी सर, जयपुर में चन्द्रशेखर जी और आप से भी एक बार फोन करके पूरी स्थिति से अवगत करा चुका हूं। आपसे अनुरोध है कि मुझ  स्ट्रिंगर के बकाया भुगतान को दिलवाने की मेहरबानी करें।

आपका
विमलेश कुमार शर्मा
9414036436
vimleshdausa@gmail.com

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नवभारत बस्तर के कर्मचारियों को दो महीने में एक दफे वेतन मिलता है!

नवभारत यूं तो एक प्रतिष्ठित अखबार समूह है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों की दुर्दशा यह है कि यहां उन्हें दो महीनों में एक दफे वेतन मिलता है। आपको बता दें कि बस्तर संभाग मुख्यालय जगदलपुर दफ्तर से संचालित है। दूसरी ओर वेतन में भी भारी विसंगति ​की जानकारी मिली है। कुछ लोगों का कहना है कि अन्य अखबार समूहों के बनिस्बत यहां काफी कम वेतन मिलता है। और तो और, पिछले महीने का वेतन इस महीने की 25 तारीख को दी जाती है। ऐसे में अपने परिवार का पोषण करने वाले विशुद्ध पत्रकार किस तरह से अपने दायित्वों को निभाते होंगे, इसे लेकर सहजता से अंदाजा लगाया जा सकता है।

अखबार के मालिक ने मैनेजमेंट में फेरबदल किया और भ्रष्ट लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद नये मैनेजमेंट से कुछ आस तो जरूर जगी है, लेकिन कब तक वे कर्मचारियों के हित में फैसला लेंगे, इस पर संशय बना हुआ है। कुछ महीनों पहले अगस्त माह से वेतन में वृद्धि का आश्वासन दिया गया था, लेकिन अब तक इसका कोई पता नहीं है। कर्मचारियों की स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है। न तो अब तक जगदलपुर के कर्मचारियों को ही नियमित किया जा सका है और न ही वेतनवृद्धि को लेकर ही कोई सुगबुगाहट समझ आ रही है। कर्मचारियों को बाउचर पर वेतन दिया जाता है, ऐसे में यहां गड़बड़ी की आशंका बनी हुई है। कहीं कर्मचारियों के वेतन का हक तो नहीं मारा जा रहा, ऐसे ही और भी कई सवाल हैं, जो कर्मचारियों के दिमाग में दौड़ते चले जा रहे हैं। कभी उनका नियमितीकरण हो पायेगा क्या, कभी उनका वेतन बढ़ेगा क्या, इस बात को लेकर वे परेशान हैं और लगातार अवसाद की जद में आते जा रहे हैं।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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‘आज’ अखबार का मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त बोला- ”मैं चाहूं तो किसी रिक्शे वाले को भी संपादक बना सकता हूं”

वाराणसी। ‘आज’ अखबार से आर. राजीवन निकाल दिए गए। वरिष्ठ पत्रकार। सुनिए इनकी दास्तान। ये कहते हैं- फर्जी मुकदमा या हत्या शायद यही मेरे पत्रकारिता कर्म की संचित पूंजी हो, जो शायद आने वाले दिनों में मुझे उपहार स्वरूप मिले तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. यकीन मानिए पूरे होशो-हवास में सच कह रहा हूं। हिन्दी का सबसे पुराना अखबार जो 5 साल बाद अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है, उसी ‘आज’ अखबार में मैने 25 साल तक सेवा की, लिखता-पढ़ता रहा। निष्ठा-ईमानदारी के साथ अपने काम को अंजाम देता रहा। लेकिन एक दिन अचानक मुझे बिना किसी कारण-बिना किसी नोटिस के बाहर का रास्ता दिखा दिया।

‘आज’ अखबार से निकाले गए वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन ने जब अपनी दास्तान सुनाई तो मीडिया के अंदर की हालत पर रोना आया…        फोटो : भाष्कर गुहा नियोगी

बकाया वेतन, भविष्य निधि, पेंशन, ग्रेच्युटी तो दूर, देने के नाम पर मालिक शार्दूल विक्रम गुप्त ने कुछ दिया तो देख लेने की धमकी। ये जो ‘आज’ अखबार के मालिक और सम्पादक शार्दूल जी हैं, इनका कहना है तुम चीज क्या हो? मैं ही सब हूं। मैं चाहूं तो किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। हां एक दिन कुछ इसी तरह से उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुला कर समझाया और ठीक इसके दूसरे दिन मैं सड़क पर था, अपने पत्रकारीता जीवन के यादों के साथ।

सोच रहा था विद्या भास्कर, लक्ष्मी शंकर व्यास, चन्द्र कुमार जैसे सम्पादक जिनके सान्ध्यि में मैने पत्रकारिता का कहकरा सीखा, उसी संस्थान के वर्तमान बढ़बोले और हठी संपादक की नजर में एक रिक्शेवाला भी संपादक हो सकता है, यानि योग्यता और नजरिया कोई मायने नहीं रखता। …झूठा अहम भी क्या कुछ नहीं कहता और करता, शार्दूल विक्रम गुप्त इसके उदाहरण हैं। कुछ दिन लगे इस सदमें से उबरने में। जब उबरा तो स्मृति में हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के साथ गुजरे 25 सालों की न जाने कितनी यादें दस्तक देने लगी। और यादों के झरोखे से साथ में काम करने वालों के बुझे और उदास चेहरे याद आने लगे। जो काम तो पूरे ईमानदारी से करते रहे, पर इसके ऐवज में जो मिला, शौक तो छोड़िए उससे जरूरतें कभी पूरी न हो सकी।

इनमें से एक चेहरा था राजेन्द्रनाथ का। उन्होंने भी इस संस्थान में अपने जीवन का लम्बा समय दिया। पर जब राजेन्द्र लकवा के शिकार हुए तो संस्थान ने उनसे मुंह फेर लिया। मदद के नाम पर हम कुछ पत्रकार साथियों ने व्यक्तिगत तौर पर मदद किया। हां, काम के ऐवज में राजेन्द्र को संस्थान सें उनका हक तो मिला पर कई टुकड़ों में। राजेन्द्र जी ही क्यों, कई चेहरे है, जो हिन्दी के सबसे पुराने अखबार के शोषण के शिकार हुए हैं, और कई हो रहे हैं। एलबीके दास, गोपेश पाण्डेय, प्रमिला तिवारी… और भी लम्बी फेहरिस्त है… इन्हें अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अखबारी दुनिया का ये सबसे दुखद पहलू है, कि खबर लिखने, उसे सजाने-सवांरने वालो की जिदंगी की खबर बेखबर बन कर रह जाती है। मीडिया इंडस्ट्री में इस तरह की हजारों सिसकियां मौजूद हैं, जो मालिक-प्रबंधन के निर्ममता की उपज है। कुछ मिल जायेगा, शायद यही वजह है, कि होंठ सबके सिले हैं, वरना अन्दर ही अन्दर आक्रोश का एक तूफान तो सबको मथ रहा है।

अपने प्रंसग पर लौटता हूं, इन दिनों अपने हक को पाने की लड़ाई लड़ रहा हूं। अपने मेहनताने को पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की पहल कर  चुका हूं। भविष्य निधि कार्यालय से एक नोटिस भी अखबार को जारी हो चुका है, साथ ही साथ बहुत-कुछ समझ-बूझ कर इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि लड़ने के सिवाय कोई और चारा नहीं है। सो तय किया हूं कि मैं लड़ूगा अपने हक के लिए, कहूंगा अपनी बात, मैं किसी रिक्शेवाले को भी संपादक बना सकता हूं। संपादक होने के भ्रम में जो खुद के खुदा होने का गुमान पाले बैठे हैं, उनके भ्रम को तोड़ना जरूरी है। इतना तो जानता हूं कि कुछ न कुछ तो होकर रहेगा… मालिक, प्रबंधन की तरफ से फर्जी मुकदमा, जानलेवा हमला या फिर कुछ….. और, चाहे जो कुछ भी हो, खामोश रहने से बेहतर है, अपनी बात कहते हुए दुनियां से जाना… कम से कम वो चेहरे तो बेनकाब होंगे जो आदर्श का खाल ओढ़कर और शब्दों का जाल बुनकर अपनी काली करतूतों को छुपाए फिर रहे है। वो सब कहूंगा तफसील और सिलसिले से…. जो छुपाया जा रहा है, सामने लाकर रहूंगा। फिलहाल इतना ही कहूंगा……

ऐ सनम तेरे बारे में
कुछ सोचकर
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है….

हिन्दी के सबसे पुराने अखबार ‘आज’ में 25 साल तक काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकार आर. राजीवन के अंतर की आवाज का ताना-बाना, जो शायद किसी अखबार का हिस्सा न बन पाए… आर.राजीवन से संपर्क 07800644067 के जरिए किया जा सकता है. आर. राजीवन ने जो कुछ कहा-बताया, उसे शब्दों में उकेरा बनारस के युवा और प्रतिभाशाली पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी ने. भास्कर गुहा नियोगी से संपर्क 09415354828 के जरिए कर सकते हैं.

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अपनी लगातार खराब होती टीआरपी से परेशान इंडिया टीवी ने स्ट्रिंगरों को तंग करना शुरू किया

इंडिया टीवी की टीआरपी पिछले लगभग एक वर्ष से गिरती ही जा रही है. तमाम कोशिशों के बावजूद भी चैनल है की चढ़ाई चढ़ ही नहीं पा रहा है. ख़बरों के मामले में भी चैनल के पास लगातार सूखा ही पड़ता जा रहा है, जिसकी वजह से चैनल ने अपनी झुंझलाहट निकालते हुए स्ट्रिंगरों का पैसा मारना शुरू कर दिया है. लगातार स्ट्रिंगरों के बिल काटे जा रहे हैं. मेहनताने के नाम पर उन्हें सिर्फ अठन्नी चवन्नी थमाई जा रही है. अब इस चैनल के बुरे दिन आये हैं या कुछ और मामला है, मगर इंडिया टीवी में सब ठीक नहीं चल रहा है, यह तय है.

दिल्ली और उत्तर प्रदेश के अधिकांस स्ट्रिंगरों ने अब इंडिया टीवी से किनारा कर लिया है. इन लोगों को खबर के नाम पर तो जम कर तंग किया जाता है, मगर जब पैसे देने का समय आता है तो ठेंगा दिखा दिया जाता है. स्ट्रिंगर को खबर के बदले में भले ही 1000 रुपये देने की बात की गई है मगर जब बिल बनाये जाते हैं तब इनकी ख़बरों की सूची काट-छांट कर इतनी छोटी कर दी जाती है कि इन्हें इतना पैसा भी नहीं मिल पा रहा है कि इंटरनेट का बिल पूरा हो जाय. ऐसे में लगभग सभी स्ट्रिंगर इंडिया टीवी से ऊब गए हैं. किसी समय चैनल को अच्छी श्रेणी का चैनल माना जाता था, मगर आज चैनल के दिन शायद खराब हो गए हैं.

चैनल के अंदर के लोग कहते हैं कि देश भर के स्ट्रिंगरों ने चैनल को ख़बरें भेजना बंद कर दिया है. हर राज्य से इक्का दुक्का स्ट्रिंगर ही ख़बरें भेज रहे हैं. चैनल भी अधिकांश ख़बरें ब्यूरो के जरिये ही ले रहा है. ऐसे में चैनल का एक खेमा नाराज है, क्योंकि दूर दराज की खबर अगर स्ट्रिंगर नहीं करेगा तो खबर कैसे आएगी. ब्यूरो हर खबर के लिए दौड़ नहीं लगा सकता. मगर एक खेमा ये मानता है कि एएनआई न्यूज एजेंसी के जरिये चैनल ख़बरों की भरपाई करेगा. मगर इससे ये तो साफ़ हो गया है कि चैनल की टीआरपी आगे भी गिरने बाली है. हो सकता है आने वाले कुछ महीनों में इंडिया टीवी पांचवें या छठे स्थान पर उतर जाय.

इंडिया टीवी के एक स्ट्रिंगर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को संपादक ने काम से रोका, दोनो में मारपीट होते होते बची, माहौल तनावपूर्ण

भोपाल : मजीठिया वेतनमान की मांग को लेकर दैनिक जागरण के सीईओ संजय गुप्ता के खिलाफ नई दुनिया, भोपाल के कर्मचारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर होने के बाद जागरण अखबार प्रबंधन बौखला गया है। छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को काम से रोकने पर गत दिनो यहां नई दुनिया के संपादक से मारपीट होते होते रह गई। इसके बाद दफ्तर का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है।   

बताया गया है कि जागरण प्रबंधन नई दुनिया भोपाल के कर्मचारियों को प्रताड़ित करने लगा है, जिसको लेकर वहां माहौल तनावपूर्ण हो गया है। इसकी एक बानगी विगत दिनो उस समय देखने को मिली, जब नई दुनिया के सीनियर जर्नलिस्ट और क्राइम रिपोर्टर समर सिंह यदुवंशी छुट्टी से लौटकर कार्यालय ड्यूटी पर पहुंचे। 

यदुवंशी को ऑफिस में देखते ही संपादक सुनील शुक्ला ने सिटी चीफ को आदेश दे दिया कि समर से कोई काम न लिया जाए। इसके बाद शुक्ला ने समर को अपने चैंबर में बुलाकर उनसे छुट्टी से लौटने के बहाने आपत्तिजनक बातें कहीं। इस पर समर ने भी मुंहतोड़ जवाब देते हुए खरीखोटी सुना दी। दोनों के बीच लगभग बीस मिनट तक आपस में वाद-विवाद हुआ।

बताया जाता है कि मामला इतना बढ़ गया कि बीच बचाव के लिए स्टेट ब्यूरो और अन्य डेस्क के मीडियाकर्मियों को संपादक के चैंबर में घुसना पड़ा। संपादक हमला ही करने वाले थे कि उन्हें लोगों ने पकड़ कर रोक लिया। इस घटनाक्रम के बाद से यहां के संपादकीय स्टॉफ में काफी रोष है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति ने अपने पूरे पत्रकारीय जीवन में केवल मेडिकल बीट की रिपोर्टिंग की है, उसको जागरण मैनेजमेंट ने यहां का संपादक बना दिया है। जब तक प्रबंधन चुप था तो हम भी चुप रहे। अब यदि हमे परेशान किया जाएगा तो संपादक समेत अन्य अधिकारियों को भी लेबर कोर्ट में घसीटा जाएगा। 

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The tale of a dalit journalist

Nagaraju Koppula overcame impossible hurdles to become an English language journalist. Shocked to hear of his death at 35, PARANJOY GUHA THAKURTA recalls his determination.

He was truly exceptional in more ways than one. Born into an extremely poor and socially backward family in a village in Khammam district in Andhra Pradesh (now Telengana), he was able to overcome the circumstances of his upbringing to work in an English – yes English! – daily newspaper in Hyderabad before cancer consumed him a few weeks before his 35th birthday.

Nagaraju Koppula (25 May 1980-12 April 2015) belonged to the Madiga Dalit community. His family was one among many families of migrant labourers who had come to the village of Sarapaka, situated on the banks of the River Godavari, to seek a livelihood as construction workers in a paper mill that was coming up.

The youngest of five siblings, he and his family lived in a mud and thatched-roof hut. His father died when he was just four. Together with his brothers and sisters, he sold ice to visitors at a local temple and painted signboards to earn a pittance. He had a burning desire to study. And he did.

When I met him as a student of journalism on a scholarship at a now-defunct teaching institution in Delhi, he had struggled through school and college, earned a master’s degree in history from Hyderabad Central University and also a diploma in mass communications.

He had set his mind on becoming a journalist, that too, an investigative journalist working in the English language. Many had tried to dissuade from pursuing his ambitions. As his teacher, I suggested that he seek a career in the Telugu language media. He had heard similar suggestions before from many others. But he was determined; he wanted to learn English and work in that language.

Unlike him, most students in his class came from a privileged background. Some of them were quite unsure what they wanted in terms of a future professional career. They would miss classes frequently and even when they attended classes, were inattentive. Nagaraju was different from the rest. He stood out. He had come to study. He was willing to slog. He was tenacious. I told him how to improve his English writing and speaking skills. I was not expecting him to take my suggestions seriously. But he did.

I used his services as a Telugu-to-English translator for a documentary film I was working on in 2010. He was grateful for the meagre remuneration I gave him. And he remained in touch.

A few years later, he came to meet me when I was in Hyderabad. By then, he was going through the anguish that is typically experienced by quite a few junior reporters who have to deal with superiors in their organisation who take a perverse pride in their cynicism. Every story idea put to them is met with the question: “So what’s new?”

Nagaraju reported about prisoners and their families, orphans and stray animals. Some of his articles on the poor “donating” their organs and the dilapidated public health-care system appeared as front-page anchors in the New Indian Express.

But before each of his articles was printed, he had to relentlessly wage a battle. The sub-editors didn’t exactly relish the idea of rewriting his copy. Some of his editors didn’t find his story ideas “sexy” enough.

He cribbed to me. I told him not to worry, but to continue along the path he had chosen, that he should not have any illusions about the difficulties he would encounter. Little did I realise then that that would be the last time I would be meeting him.

In Nagaraju’s short life he demonstrated the importance of determination in a way that almost all of us are incapable of enduring. There can be very few like him.

The Hoot has  published  a series of articles by Ajaz Ashraf starting with “The untold story of Dalit journalists” which highlight the lack of social inclusiveness in newsrooms in India’s mainstream media organisations. Nagaraju was the outlier, the exception to the rule.

According to a blogpost on him by Gurram Seetaramulu, a Dalit writer and political analyst, which has been translated into English from the Telugu, he had a cough which refused to go away. He got himself admitted in the Government Chest Hospital in Hyderabad where he was wrongly “treated” for six months for tuberculosis.

“When he finally went to the Basavatarakam Cancer Hospital… they told him that he was suffering from cancer, in an advanced stage…(that) he would not have… more than three-five months to live… Dear friend, death has liberated you. But you are invincible…” 

साभार: thehoot.org

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हेपेटाइटिस सी से पीड़ित ब्लागर अविनाश वाचस्पति को उनके बेटे ने पागल बताकर अस्पताल में कैद कराया

अविनाश वाचस्पति : मैं पागल हूं क्‍या… मेरी इकलौती पोती राव्‍या के पिता यूं तो मेरा बड़ा बेटा अंशुल वाचस्‍पति है पर उसने मुझे पागल मान लिया है… 9 अप्रैल 2015 को बतरा अस्‍पताल में एड‍मिट किए जाने पर डाक्‍टर शरद अग्रवाल और नरसिंग स्‍टाफ की सलाह पर मुझसे मिलकर समझाने की बजाय रस्सियों से मेरे हाथ पैरों इत्‍यादि को बांधने की अनुमति पर अपने हस्‍ताक्षर कर दिए। और, मैं रात भर अपने बेटे का इंतजार करके तड़पता रहा। वह घर में आराम से चैन की नींद लेता रहा। माबाइल पर गेम खेलता रहा। टीवी पर सुनता रहा राजनैतिक घटनाक्रम।

अब तो आपको मान लेना चाहिए कि मैं पागल हूं। यह सच्‍चाई बतरा अस्‍पताल से 16 अप्रैल 2015 को उसने मुझे बहुत शान से बताई और मैं खून के आंसू रोता रहा। अगर मुझे हेपे‍टाइटिस-सी जैसा खतरनाक रोग मिला तो इसमें मेरा क्‍या कसूर है। मेरी धर्मपत्‍नी का कहना है- ”आपने हमारे लिए जितना किया, उससे ज्‍यादा तो उनका हक बनता है। आपकी बीमारी में मेरी कोई जिम्‍मेदारी इसलिए नहीं बनती है क्‍योंकि रोग को लाने में हमारा कोई रोल नहीं है। आपके दोस्‍त तो आपकी मदद कर नहीं रहे हैं तो इससे आपकी लोकप्रियता का पता चलता है। फिर दोषी हम अकेले ही क्‍यों, हम न दें तो कोइ आपको दो रोटी के लिए नहीं पूछेगा, बात करते हो।”

ब्लागर अविनाश वाचस्पति के फेसबुक वॉल से.

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शामली में गैंगरेप से डरे मां-पिता ने बेटी के पैर में जंजीर डाल दिया!

एक स्टोरी लिख रहा था ‘बेटी के पैर में जंजीर’..आप भी सोच रहें होंगे कि आखिर एक बेटी के पैर में भला किसने और क्यों जंजीर डाल दी। सुनकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाएगा। घटना यूपी के शामली की है लेकिन पूरे देश को प्रतिबिंबित करती है। खुद माता पिता ने ही बेटी की अस्मत बचाने के लिए उसके एक पैर में जजीर बांध दी। वाकई माता पिता ने वो किया जिसे कानून इजाजत नहीं देता है लेकिन सोचिए लाचार माता पिता और क्या करते। महज 16 साल की उनकी बेटी मानसिक तौर से कमजोर है और कुछ दिन पहले उसे अज्ञात अपराधी घर के पास से बहकाकर ले गए और उसके साथ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दे दिया।

बेटी को बदहवासी की हालत में पाकर माता पिता पर जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा। इलाके के पुलिस थाने से लेकर जिले के एसएसपी तक से मुलाकात की लेकिन आरोपी पकड़ना तो दूर की बात है उनका सुराग तक नहीं मिल सका। अपराधी बेखौफ और आजाद घूम रहे हैं। ऊपर से बेटी की मानसिक हालत ठीक नहीं है। उम्र भले बढ़ गई हो लेकिन दिमाग किसी छोटे बच्चे की तरह। कब कहां चली जाए, कहा नहीं जा सकता।

अब बताइए कि लाचार मां बाप और क्या करते। बेटी को बचाने के लिए उसके पैर में जंजीर ही पहना दी। दुख होता है ये सब देखकर। क्या ऐसे ही बेटियों की रक्षा होगी। हमारे आस पास इंसान से ज्यादा दरिंदे मौजूद हैं। ऊपर से कहीं चले जाओ, पुलिस का रवैया बिलकुल लापरवाही भरा। आपकी पकड़ है तो पुलिस चाय ठंडा सब पिलाएगी और मदद भी करेगी और यदि आप कमजोर हैं तो लगाते रहो थाने के चक्कर..और अपराधियों से बचाने के लिए बेटियों को भी जंजीर लगा के रखो।

ऐसी ही एक घटना मुंबई के करीब वसई में भी हुई थी, जहां बेटियों को बचाने के चक्कर में एक पिता ने कई सालों तक उन्हें घर में कैद कर रखा था। यहां तक कि पड़ोसियों को भी भनक नहीं लगी और जब लगी भी तो बहुत देर हो चुकी थी। बेटियां महज हड्डियों का ढांचा भर रह गई थीं। बेहद ही शर्मनाक घटनाएं हैं और जब तक ये होता रहेगा, हम लाख दुनिया जीत लेने का दंभ भरें, हमारा सिर शर्म से झुका रहेगा।

अश्विनी शर्मा की रिपोर्ट.

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मेरठ के ‘प्रभात’ अखबार के मीडियाकर्मी सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी से परेशान

मेरठ के सुभारती समूह द्वारा हिंदी दैनिक अखबार ‘प्रभात’ का प्रकाशन किया जाता है. आरोप है कि अखबार के सिटी इंचार्ज के रवैये से कई पत्रकार अखबार छोड़कर चले गए. इन दिनों छायाकार समीर सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी के रवैये से सकते में हैं. 31 मार्च को दैनिक प्रभात समाचार पत्र में सुबह के समय सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी कई पत्रकार एवं छायाकारों के साथ बैठक कर रहे थे. इस बीच छायाकार समीर की कार्यप्रणाली को लेकर सिटी इंचार्ज ने गलत शब्द बोले. सिटी इंचार्ज ने फोटोग्राफर समीर को सभी लोगों के सामने ही बैठक से बाहर निकाल दिया. इससे फोटोग्राफर के सम्मान को काफी ठेस पहुंची.

फोटोग्राफर अपने साथ हुए कृत्य को लेकर दो दिन तक मानसिक तनाव में रहा. स्वास्थ्य खराब होने के बाद परिजनों ने निजी अस्पताल में भर्ती कराया. इस छायाकार ने हमेशा कंपनी के नियमों एवं हित में रहकर कार्य किया. उधर, सिटी इंचार्ज के रवैये से परेशान होकर पत्रकार कपिल, प्रीति, प्रशांत गौड़, सुमेंद्र व संजू सिंह दैनिक प्रभात समाचार पत्र से त्याग पत्र देकर जा चुके हैं.  कुछ अन्य लोग त्याग पत्र देने की तैयारी में हैं. सिटी इंचार्ज केपी त्रिपाठी पर कई किस्म के आरोप हैं. सिटी इंचार्ज ने क्राइम इंचार्ज जीवन कुमार को दो बार सस्पेंड किया. कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों ने संपादक एके अस्थाना के समक्ष गुहार लगाई लेकिन संपादक सभी को सिटी इंचार्ज से जाकर मिलने को कह देते हैं, जिससे सभी लोग निराश हैं.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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दिल्ली की यौन शोषित छात्रा न्याय के लिए जंतर-मंतर पर धरना देगी, पढ़ें प्रेस स्टेटमेंट

 (रेपिस्ट, धोखेबाज और चीटर मनोज कुमार की तस्वीर दिखाती पीड़ित मेडिकल छात्रा)

I am a student of ICMR DELHI. Mr Manoj Kumar, THE ACCUSSED also pursuing PhD in dept of Lab Medicine AIIMS came in my contact during academic interactions and induced me and repetitively raped on the false promise of marriage. He used to call me to his hostel room at AIIMS under the guise of guiding me for studying and forced upon me physically several times as a result of which I got pregnant. Due to his influence and clout in the academic circles I had no option then to serve his physical needs as per his dictates forcibly.

I got pregnant of his child then he said that he would marry me very soon but he secretly administered me so drug under the garb of some other treatment due to which I had excessive bleeding and several health complications developed as a result of which I was admitted to Sir Ganga Ram Hospital in very bad condition and practically semi-conscious condition. He took my signatures on several papers during this process and assured the doctors attending me that he is my husband and signed all the authorization forms of the hospital as a result of which doctors performed medical termination of my pregnancy (MTP). He made me pay the entire bills of the said treatment on the ground that he does not have any money. Earlier also he took money from me on several pretexts.

After much dilly dallying when he came to meet me in my house on 17/8/2014, he out rightly refused to marry me and violently forced upon me and raped me several times during the evening. I had no option then to bear all this as he was time and again threatening me that he would get me eliminated and spoil my career if I dare to protest him.and threatened me that he has MMS clips.

I lodged a complaint with the on 27/8/2014 and FIR bearing No. 947/2014, U/S 376, 506 IPC, PS Hauz Khas, New Delhi has been registered by the Delhi Police and now a charge sheet has been filed before the court for trial. The said person was arrested by the police and sent to jail and was released on bail after several days by the court of sessions. Since then he is using every dirty trick to derail the judicial process and manipulate the entire process.

Not only that, he is also threatening me that he will me kill me and my family members if I do not withdraw the FIR against him. He is working at AIIMS and threatening me that he will defame me in the entire institution so that I cannot get any job in any prestigious medical institution. He further claims that his guide Dr Sarman Singh, HOD of the Department of Lab Medicine at Microbiology Department is with him hence no one can harm him inside AIIMS.  I apprehend that his presence in AIIMS would certainly harm my personal life as very often he is visiting my institute and threatening me in full public view and coercing me to withdraw the FIR. I have made several rounds to AIIMS and met the officials concerned , no body is disclosing the status of the action taken against the said Mr Manoj Kumar and I feel that the said authorities are trying to divert the offense and helping the said Mr Manoj Kumar in fabricating evidence against me.

I may inform you that Jawaharlal Nehru University, New Delhi has taken stern action against one of their PhD scholars who was found indulged in similar incident and FIR No.171/2014, PS- Vasant Vihar, New Delhi was registered against him. JNU has taken a strict view of his conduct and has rusticated him from the University debarring his entry inside the University campus. AIIMS is however taking a favorable stand to the accused  despite the fact that the Fact Finding Committee constituted by the Ministry of Health and Family Welfare has clearly held the said Manoj Kumar guilty of sexual harassment for threatening, intimidating me.

I have made rounds to the office of the Delhi Commission for Women, Mrs Maneka Gandhi, Central Minister, Shri JP Nadha , Central Minsiter, Shri Ram Vilas Paswan, Central Minsiter and all of them have given due indulgence in the matter and have issued specific directions to the authorities of the AIIMS to take action against the said Manoj Kumar but the authorities of AIIMS, for the reasons best known are protecting him and have not initiated any action against the person who has exploited my vulnerable position and committing the ghastly crime of rape.

All my requests to take action against the said person and ensure my security and safety has fallen to deaf years and some of the authorities of AIIMS are bent upon protecting the said person hence I have decided to hold a peaceful DHARNA in JANTAR MANTAR to bring to the notice of the world the misdeed of the said Mr Manoj Kumar w.e.f. 19/3/2015 .

Thanking you,

Yours       

(Victim)

Mobile No. 7838614436

IMPORTANT:

As per Indian laws, the name and other particulars including the photographs,IDENTITY,address and any other details of the victim is not to be published by media.

PRESS STATEMENT


 इस पीड़ित छात्रा को न्याय दिलाने के लिए आप भी इसके फेसबुक पेज से जुड़ें, इस लिंक पर क्लिक करें:

Justice for Victim of FIR No.947


पूरे मामले को जानने-समझने के लिए आप इन शीर्षकों पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं…

दिल्ली में रेप की शिकार और सिस्टम से उत्पीड़ित इस मेडिकल छात्रा को कैसे मिले न्याय?

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दिल्ली में रेप, उत्पीड़न, उपेक्षा की शिकार मेडिकल छात्रा ने खुद की कहानी फेसबुक पर बयान की

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यशवंत सिंह, इरा झा और विनायक विजेता ने अपनी-अपनी खराब सेहत के बारे में जानकारी दी

Yashwant Singh : हाई बीपी के कारण अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। ecg से लेकर कई किस्म के चेकअप हुए। डॉक्टर ने पांच दिन तक अल्कोहल, नमक, अचार से दूर रहने और दी गयी दवाएं नियम से खाते रहने को कहा है। रोज एक निश्चित टाइम पर बीपी नापते हुए छठें रोज फिर मिलने का आदेश किया है। उसने ह्रदय और दिमाग में मचे आड़ोलन को किसी किस्म का अटैक या हैमरेज होने या इनकी आहट की आशंका होने को खारिज किया है। लेकिन अलर्ट की चेतावनी जारी कर दी है। नार्मल से एलर्ट मोड में जीवन को रख दिया है।

 

जांच, नतीजों, दवा और चिकित्सकीय सुभाषितानी के बावजूद मेरा अनइजी फील करना जारी रहा तो Kumar Sauvir को फोन लगाया। ये हाई बीपी के पुराने पीड़ित हैं। उनकी बेहद मामूली सी सलाहों पर अमल ने दवा से ज्यादा असर किया और कई घंटों से कायम पीड़ा व भय की घनघोर गिरफ्त से मुक्त हो सका। अब ठीक तो हूँ लेकिन नींद नहीं आने की समस्या से जूझ रहा। जिन दिनों जेल में था उन दिनों खूब अच्छी तसल्लीबख्श नींद आती थी। अब फिर जो मदिरा और अनिद्रा के चक्रव्यूह में फंसा हूँ तो लगता है इससे निजात तिहाड़ जाने पर मिलेगी या चरम विल पॉवर के जरिये खुद पर कठिन आत्मनियंत्रण से। अब तक तो आत्मानुशासन के सारे प्रयोग विफल रहे। आगे भी कोई उम्मीद नहीं। अब लगता है कि मेरा मुझ पर कंट्रोल नहीं। कोई दूसरा शख्स कोई अदृश्य ताकत कोई हिडन चीज मुझे कठपुतली की भाँति चला करा जिला रही है। मैं अब अक्सर खुद को उसी के हवाले कर सारी समस्याओं दुखों से मुंह छिपा लेता हूँ और इस शुतूरमुर्गी चालबाज़ी से तात्कालिक राहत पा लेता हूँ।

दीर्घावधि यानि लॉन्ग टर्म में क्या होता है, देखा जाएगा और जो भी होगा उचित ही होगा ये मानकर चलने में इस वक़्त कम से कम फीलगुड का लुत्फ़ तो उठा ही सकता हूँ। पास्ट फ्यूचर से मुक्त होकर इस पल को छाती में हिक भर हवा खींच के आँख बंद करके चरम उदात्तता से परम फैलाव में महसूस करना जीना ज्यादा सही रास्ता है, और अब यही सुकून देता है। ज़िन्दगी ने सबक देना सिखाना जारी रखा है। जब जब क्लास बंक करता हूँ या नहीं सीखने की शरारत करता हूँ तो बड़ी तगड़ी लात पड़ती है। कह सकता हूँ, मेरा अनचीन्हा अनजाना अदृश्य स्वघोषित टीचर बहुत निर्दयी क्रूर है। उसकी तगड़ी ट्रेनिंग से बहुत बाद में जब कभी ‘सफल’ हो गया तो उसकी जय जय उन दिनों ज़रूर कर दूँगा, लेकिन आज तो मुझे गरिया लेने दो। ओ रे मेरे पत्थरदिल गुरु, रहम भी कर दिया कर… अमानुष!!!!

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Yashwant Singh : बिलकुल सही हूँ, सब नार्मल है, दवा खाये बगैर। दुखों को बाँट लेना, दुखों पर बतिया लेना आपस में… ये वो तरीका है जिसके जरिए दुखों को reduce करते हुए ख़त्म किया जा सकता है। इस बार दवाओँ ने नहीं, सच में दुवाओं और दोस्तों ने काम किया। रात 4 बजे सो पाया। 9 बजे उठा। 4 km टहला। नारियल पानी पिया। रात भिगो कर रखी मेथी और चने का थोडा सा सेवन किया। खीरा खाया। नहाने के बाद 2 रोटी दाल सब्जी with सलाद। 3 बार बीपी ले चुका। नार्मल है। इसलिए दवा भी नहीं लिया। सो, टेंशन नॉट। अब घास फूस का साथ।

उपरोक्त दो स्टेटस भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल पर पिछले दो दिनों में प्रकाशित हुए हैं.

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Ira Jha :  Main samay sakht beemar hoon.bukhar me padi hoon aur tez mirchi wale 10-12samose bhakosane ki talab ho rahi hai.koi mitra press club ke pass gande mahaul me tale jane wale samose mere pati se chhupakar muhaiya karaega?shakil munh mat bana.apne dost ka jazba dekh…103 bukhar me bhi…bin samosa sab soon.

दिल्ली की वरिष्ठ महिला पत्रकार इरा झा के फेसबुक वॉल से.

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Vinayak Vijeta : मित्रों ! आपकी दुआ के लिए आपका धन्यवाद… बीते शुक्रवार को दवा लेने के क्रम में अचानक मूर्छित होकर गिर जाने और तीन दिनों तक गंभीर रूप से अस्वस्थ रहने के बाद आज मैं कमजोरी के बावजूद अपने को पहले से कुछ बेहतर महसूस कर रहा हूं। इन तीन दिनों में 11 बोतल स्लाईन के साथ कई अन्य दवाईयां भी चलीं पर मै मानता हूं कि इन दवाइयों से ज्यादा उन मित्रों, शुभचिन्तकों और बड़ेजनों की वह दुआएं ज्यादा काम आईं जिन जनों के हाथ हमारे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए ‘सजदा’ में उठे। मेरे अस्वस्थ होने के बारे में मेरे बेटे सोनू द्वारा किए गए पोस्ट पर जिस तरह सैकड़ों मित्र जिनमें राजनेता, चिकित्सक, पत्रकार, समाजसेवी, अधिवक्ता व व्यवसायी वर्ग के लोग शामिल हैं, उन सभी मित्रों का मैं तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं। चिकित्सक द्वारा अभी कम्प्यूटर पर ज्यादा देर नहीं बैठने की हिदायत के बावजूद जब मैंने अपने बेटे के लिखे पोस्ट पर आप मित्रों की प्रतिक्रियाएं और मेरे शीघ्र स्वस्थ होने की दुआ संबंधी सैकड़ों कमेंट्स पढ़ा तो मै खुद को रोक नहीं पाया। आप सभी मित्रों का एक बार फिर से तहे दिल से शुक्रिया!

बिहार के पत्रकार विनायक विजेता के फेसबुक वॉल से.

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यूपी के डीजी कमलेन्द्र प्रसाद के खिलाफ गवाही देंगे आईजी अमिताभ ठाकुर

आईजी नागरिक सुरक्षा अमिताभ ठाकुर अपने ही डीजी कमलेन्द्र प्रसाद के खिलाफ मशहूर गीतकार संतोष आनंद के बेटे संकल्प आनंद आत्महत्या मामले में पुलिस के सामने गवाही देंगे. उन्होंने आज प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर इस बात से अवगत कराया है. पत्र में उन्होंने यह कहा है कि श्री प्रसाद के साथ पिछले लगभग डेढ़ माह में काम करते हुए उन्होंने उनकी कार्यप्रणाली में वे सभी बातें देखीं जो संकल्प आनंद ने अपने सुसाइड नोट में कहा था.

श्री प्रसाद नीचे के अफसरों पर दबाव बना कर उनसे आलेख लिखवा कर तमाम निर्णय करते हैं. साथ ही वे अपने काम में इतने अधिक जानकार हैं कि यह असंभव है कि उनकी जानकारी के बिना उनके दफ्तर में कोई भी सही या गलत काम हो जाए और श्री प्रसाद द्वारा उनकी गैरजानकारी में कोई काम हो जाने की बात पूर्णतया अमान्य है. उन्होंने श्री प्रसाद द्वारा नागरिक सुरक्षा में भी अस्थायी नियुक्ति और कंस्ट्रक्शन कार्य कराने का काम शुरू किया, जिनमे उनके द्वारा संकल्प आनंद ने अपने सुसाइड नोट में धन वसूली के आरोप लगाए हैं. इन तथ्यों के आधार पर श्री ठाकुर ने श्री प्रसाद की इस आत्महत्या में भूमिका की गहरी आशंका व्यक्त करते हुए इन तथ्यों को विवेचक के सामने लाने की बात कही है.

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राजस्थान पत्रिका में मजीठिया वेज बोर्ड के साइड इफेक्ट : डीए सालाना कर दिया, सेलरी स्लिप देना बंद

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं

जब से मजीठिया वेज बोर्ड ने कर्मचारियों की तनख्‍वाह बढ़ाने का कहा व सुप्रीम कोर्ट ने उस पर मोहर लगा दी तब से मीडिया में कार्य रहे कर्मचा‍रियों की मुश्किलें बढ रही हैं. इसी कड़ी में राजस्‍थान पत्रिका की बात बताता हूं। पहले हर तीन माह में डीए के प्‍वाइंट जोड़ता था लेकिन लगभग दो तीन वर्षों से इसे सालाना कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाते हुए तनख्‍वा बढ़ी तो जहां 100 प्रतिशत की बढ़ोतरी होनी थी तो मजीठिया लगने के बाद कर्मचारियों की तनख्‍वाह में मात्र 1000 रुपए का ही फर्क आया। किसी किसी के 200 से 300 रुपये की बढ़ोतरी।

इसके बाद बारी आई सालाना वेतन वृद्धि की जो इंक्रीमेंट के साथ डीए आदि मिलाकर देखा जाए तो कम से कम भी 1500 रुपये के लगभग बढती थी। राजस्‍थान पत्रिका में सालाना वेतन वृद्धि जनवरी एवं जुलाई में होती है। आज सालाना वेतन वृद्धि के बढ़ी हुई सैलेरी मिली लेकिन सैलेरी लेकर हंसी आ रही थी व दुख हो रहा था। अब डीए भी बंद व तनख्‍वाह बढी मात्र 200 रुपए यानि एक माह का सोलह रुपए 67 पैसा और एक दिन का हुआ लगभग 22 पैसा।

इतना वेतन एक साथ बढ़ने से मैं तो धन्‍य हो गया। अब तो मेरे बच्‍चे हमारे शहर की सर्वोच्‍च शिक्षण संस्‍था में पढ सकेंगे। मैं छुट्टियों के दौरान घूमने के लिए विदेश भी जा सकूंगा। अपने लिए एक गाड़ी व घर भी ले सकूंगा। आखिर लूं भी क्‍यों ना सकूंगा। आखिर एक साल में 200 रुपए की वेतन वृद्धि जो हुई है जो मैंने कभी सपने में नहीं सोचा था। खैर व्‍यंग्य को छोड़ दें।

कोठारी साहब जी, मन तो करता है पूरे परिवार को लेकर केसरगढ़ के सामने आकर आत्‍महत्‍या कर लूं ताकि दूसरे भाईयों का शायद कुछ भला हो जाए मेरा तो जो होगा देखा जाएगा बाकि पूरा परिवार साथ में होगा तो पीछे की चिंता भी नहीं रहेगी। एक बात और यदि सैलेरी के लिए पैसे कम हो तो कर्मचारियों से कह देना वो शायद चंदा इकठा करके आपके ऐशो आराम की जिंदगी जीन का प्रबंध कर ही देंगे इतने बुरे भी नहीं है कर्मचारी।

इसके अलावा राजस्‍थान पत्रिका ने सैलेरी स्लिप भी देना बंद कर दी। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसमें गुलाब कोठारी जी का संपादकीय छपता है। क्‍या यह वही राजस्‍थान पत्रिका है जिसके संस्‍थापक कुलिश जी ने उधार रुपए लेकर अखबार की शुरुआत की। लेकिन कुलिश जी ने कभी कर्मचारियों का बोनस नहीं रोका अब तो सरकार से मिलने वाली सुविधाएं खुद तो ले रहे हैं लेकिन कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाएं रोकने का प्रयास किया जा रहा है। यह सत्‍य भी कि यदि कुलिश जी उधार के पैसे से अखबार चला सकते हैं कर्मचारी उधार रुपए लेकर क्‍या अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकते क्‍योंकि सबको पता है कि पत्रिका के कर्मचारी को दिया उधार वो चुकाएगा कैसे।

यहां एक बात का ओर उल्‍लेख करना चाहता हूं कि वितरण विभाग में जो टैक्सियों का पेमेंट होता है उसमें टेक्सियों का बिल तो ज्‍यादा बनता है लेकिन उनके चैक को पत्रिका के वितरण विभाग के कर्मचारी साथ जाकर कैश करवाते हैं व उसमें से लगभग दो रुपये प्रति किलोमीटर का पैसा गुलाब जी के घर पहुंचता है जो हर ब्रांच से कम से कम 10 लाख बनता है। ये है इनकी सच्‍चाई।

एक पत्रिका कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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मौत ने दूसरी बार कृष्ण मुरारी किशन को मौका नहीं दिया

Vinayak Vijeta : किशन जी का हंसता हुआ वो नूरानी चेहरा… जुल्फें बिखरी पर खिंची तस्वीरों का रंग सुनहरा… 1981 में किशन जी से सासाराम में हुई थी पहली मुलाकात.. एक बार मौत को मात दे दी थी हमारे बड़े भाई किशन जी ने… बिहार ही नहीं देश के दस सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफरों में शुमार कृष्ण मुरारी किशन जी से हमारी पहली मुलाकात 14 जनवरी 1981 में तब हुई थी जब वो कोलकाता से प्रकाशित और तब के सबसे चर्चित साप्ताहिक ‘रविवार’ के लिए कार्य किया करते थे। उस वक्त किशन जी की कला की इतनी धधक थी कि उन्हें इस पत्रिका द्वारा बिहार के बाहर भी फोटोग्राफी के लिए बुलाया जाता था। किशन जी से जब पहली बार सासाराम में हमारी मुलाकात हुई तो उस वक्त मैं सातवीं कक्षा में पढ़ा करता था।

स्व. कृष्ण मुरारी किशन

उस वक्त बेगुसराय निवासी व रविवार में कार्यरत वरीय उपसंपादक विजय कुमार मिश्र जो हमारे नजदीकी रिश्तेदार हैं एक न्यूज के सिलसिले में डुमरांव (बक्सर) के पास स्थित एक गांव में मल्लू नामक मजदूर की व्यथा पर रिपोर्टिंग करने गए थे। तब 12 किलोमीटर पैदल चलकर तैयार की गई यह रिपोर्ट ‘रविवार’ में ‘मल्लू की आजादी, राय साहब के यहां गिरवी’ शीर्षक से छपी थी। स्टोरी ने तो हंगामा मचाया ही था कृष्ण मुरारी किशन की तस्वीरे भी काफी चर्चित हुई थीं। बक्सर से ही लौटने के दौरान विजय भैया और किशन जी रोहतास के तत्कालीन एसपी किशोर कुणाल और उनकी पत्नी के साथ रात हमारे घर पहंचे और चारो लोगों ने हमारे घर पर ही खिचड़ी का आनंद लिया। हमारे रिश्तेदार विजय कुमार मिश्र जो नेतरहाट विद्यालय से पासआऊट थे वो और किशोर कुणाल बाद में पटना कॉलेज मे बैचमेट रहे थे।

उस वक्त मेरे इंजीनियर पिता सासाराम में पदस्थापित थे। अपने रिश्तेदार से ज्यादा किशन जी से प्रभावित होकर तब मैंने कोलकाता जाकर उस वक्त का मशहुर कैमरा ‘जेनीथ’.खरीदा था और पत्रकारिता जीवन की पहली शुरुआत मैंने फोटोग्राफी से ही की थे। मैंने 12 वर्ष की उम्र से ही पत्रकारिता को अपना पहला और अंतिम लक्ष्य बनाने की ठान ली थी। मैंने किशन जी को कभी तनाव में नहीं देखा। हर क्षण उनके चेहरे पर मुस्कराहट ही देखी। न अहंकार न अभिमान। बड़ो को प्रणाम और छोटों को स्नेह व प्यार शायद किशन जी के जन्मजात संस्कारों में शामिल रहा।शयद कम ही लोगों को पता होगा कि किशन जी ने अपने घर के सामने एक चाय विक्रेता की छोटी बच्ची में पढ़ने की ललक देक अपने खर्च से उसका स्कूल में नामांकन कराया और अबतक वह उस बच्ची का खर्च उठा रहे हैं जो बच्ची उन्हें ‘मामा’ कहती है।

डेढ़ दशक पूर्वं मुजफ्फरपुर से देर रात पटना लौटते वक्त भगवानपुर के समीप रोड लुटेरों ने किशन जी की गाड़ी रुकवा उन्हें लूटने के क्रम में उन्हें गोली मार दी थी (तस्वीर) तब काफी गंभीर और चिंताजनक स्थिति में पटना लाए गए किशन जी को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इलाज के लिए दिल् ली भिजवाया था जहां चिंताजनक स्थिति रहने के बाद भी किशन जी ने मौत को मात दे दी थी पर इस बार वह मौत को मात नहीं दे सके और जिंदगी और मौत के बीच आठ दिनों से चल रही लड़ाई में कुख्यात मौत ने उन्हें अपने सामने घुठने टेकने पर मजबूर कर दिया। बड़े भाई समान और हमारे प्रेरणा किशन जी को हमारी भावभीनी श्रद्धांजली…..‘हम आपको यूं भूला न पाएंगे, जब भी आएगी याद तेरी-दो बूंद आंसू जरूर बहाएंगे!’

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता के फेसबुक वॉल से.

मूल खबर….

बिहार के चर्चित फोटो जर्नलिस्ट कृष्ण मुरारी किशन का निधन

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‘हिंदुस्तान’ के सताए एक ईमानदार और जुझारू पत्रकार अशोक श्रीवास्तव की हार्ट अटैक से मौत

(कुमार सौवीर)


Kumar Sauvir : पत्रकारिता पर चर्चा शुरू हुई तो अशोक श्रीवास्‍तव ने बुरा-सा मुंह बना लिया। मानो किसी ने नीम को करेले के साथ किसी जहर से पीस कर गले में उड़ेल दिया हो। बोला:- नहीं सर, अब बिलकुल नहीं। बहुत हो गया। अशोक श्रीवास्‍तव, यानी 12 साल पहले की जान-पहचान। मैं पहली-पहली बार जौनपुर आया था। राजस्‍थान के जोधपुर के दैनिक भास्‍कर की नौकरी छोड़कर शशांक शेखर त्रिपाठी जी ने मुझे वाराणसी बुला लिया। दैनिक हिन्‍दुस्‍तान में। पहली पोस्टिंग दी जौनपुर।

अशोक श्रीवास्‍तव उसी एडीशन में शाहगंज तहसील का संवाददाता था। बेहद अकखड़। लगता था कि जैसे अगर वह न हुआ तो पूरी दुनिया-कायनात ही खत्‍म हो जाएगी। 17 अगस्‍त-03 को खेतासराय-सोंधी में वहां के सपाई सरकार के राज्‍य मंत्री ललई यादव ने सरेआम गुंडई की तो उस वक्‍त तक अशोक सहमा हुआ था, लेकिन जब मैंने इस हादसे का खुला विरोध किया तो अशोक पूरे जोश में आ गया। उसके बाद से वह वाकई बेधड़क पत्रकार बन गया। पहले की झुकी हुई सींगें अब तीखे खंजर की तरह धारदार हो गयीं। कुछ ही दिनों में उसके तेवर तीखे हो गये। मेरे ट्रांस्‍फर के बाद बाद भी कुछ ऐसे सहकर्मी ऐसे थे, जो अक्‍सर मुझे फोन करके खबर की धार-प्रवाह समझने की कोशिश करते थे। मसलन, रूद्र प्रताप सिंह, इंद्रजीत मौर्या, राममूर्ति यादव, आनंद यादव, अशोक श्रीवास्‍तव और अर्जुन शर्मा वगैरह। हालांकि बाद में रूद्रप्रताप और इंद्रजीत जैसे लोग चूंकि बड़े पत्रकार हो गये, इसलिए मुझे फोन करने की जरूरत भी नहीं पड़ी उन्‍हें, लेकिन बाकी लोग लगातार सम्‍पर्क में रहे। अशोक और राममूर्ति लगातार सम्‍पर्क में रहे।

करीब ड़ेढ महीना पहले मैं राममूर्ति यादव की बेटी की शादी में शाहगंज-खेतासराय से भी आगे 19 किलोमीटर दूर गया, तो अशोक मुझे देखते ही चहक उठा। बातचीत का दौर शुरू हुआ तो उसका दर्द बिखरने-जुटने लगा। बोला:- अरे सर, छोडि़ये पत्रकारिता की बात। क्‍या सोचा था, और क्‍या हो गया। पूरी इलाके से दुश्‍मनी हो गयी, बदनामी अलग हो गयी। साथ किसी ने भी नहीं दिया। उस हिन्‍दुस्‍तान अखबार संस्‍थान ने तो पहले ही पल्‍ला झड़क लिया जिसके लिए मैंने जान तक लड़ा दी थी। 22 साल तक इस अखबार के लिए बिना पैसा के काम करता रहा। सोचता रहा कि आज न कहीं कल, कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा। अब निराश हो गया हूं। लेकिन सर, आपके लिए जान हाजिर है। आता हूं लखनऊ। शायद एक-डेढ महीने के भीतर ही। बस बच्‍चों में फंसा हूं। लेकिन आपके साथ अब लखनऊ में ही मुलाकात होगी। और आज, बिलकुल अभी-अभी, जौनपुर से राजेश श्रीवास्‍तव का फोन आया कि अशोक श्रीवास्‍तव की मौत हो गयी है। राजेश ने बताया कि उसे एक तगड़ा हार्ट-अटैक हुआ था। बस उसका सारा दुख-शोक अशोक में विलीन हो गया। छोड़ो यार अशोक। तुम से तो भगवान भी नहीं जीत सकता है। तुम मेरे जिगर के टुकड़े रहे हो और हमेशा रहोगे। तुम तो मेरी जान हो यार। क्‍या समझे बे लाला-लूली की जान!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से.

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह का एक पुराना इंटरव्यू

मीडियासाथी डॉट कॉम नामक एक पोर्टल के कर्ताधर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने 10 मार्च 2011 को भड़ास के संपादक यशवंत सिंह का एक इंटरव्यू अपने पोर्टल पर प्रकाशित किया था. अब यह पोर्टल पाकिस्तानी हैकरों द्वारा हैक किया जा चुका है. पोर्टल पर प्रकाशित इंटरव्यू को हू-ब-हू नीचे दिया जा रहा है ताकि यह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे और यशवंत के भले-बुरे विचारों से सभी अवगत-परिचित हो सकें.

यशवंत सिंह

 

कठघरे में ‘भड़ास4मीडिया’ के एडिटर यशवंत सिंह

साक्षात्कारकर्ता : महेन्द्र प्रताप सिंह

10.03.2011 11.30pm


(मीडिया साथी डॉट कॉम के कठघरे में इस बार हैं, भड़ास4मीडिया डॉट कॉम के एडिटर यशवंत सिंह। इस साक्षात्कार में हमने देशभर के मीडिया हाउसों की ख़बर लेने वाले यशवंत सिंह की ख़बर ली है और ‘मीडिया साथी डॉट कॉम’ के स्तर के अनुरूप बिना किसी लाग-लपेट के सीधी और खरी-खरी बातें की हैं। ‘भड़ास4मीडिया’ पर लगाए गए सभी आरोपों के जवाब में यशवंत ने जो कहा, उससे आप और हम असहमत हो सकते हैं, किन्तु इससे कम से कम ‘भड़ास4मीडिया’ से जुड़ी विचारधारा और यशवंत के पक्ष को तो समझा ही जा सकता है – महेन्द्र प्रताप सिंह)

-यशवंत जी, सीधे आरोपों से शुरुआत करते हैं। ‘भड़ास’ एक नकारात्मक शब्द है। क्या आपको नहीं लगता कि हमें विभिन्न मुद्दों पर सिर्फ़ अपनी भड़ास निकालने तक सीमित रहने के बजाय समस्या के समाधान के लिए कुछ सार्थक क़दम उठाने चाहिए?

–समाधान तो अंतिम चरण है। पर पहले तो हम लोग समस्या बताने वाले चरण से ही वंचित थे। कोई प्लेटफ़ॉर्म नहीं था, जो हम लोगों के सुखों-दुःखों को सामूहिक तौर पर व ईमानदारी से अभिव्यक्त करे। जब समस्या का प्रकटीकरण होता है, तभी समाधान की दिशा में क़दम बढ़ता है। और अब इसका असर दिख रहा है। पेड न्यूज़ से लेकर पत्रकारों को उत्पीड़ित करने तक में मीडिया प्रबंधन सतर्क हो गया है कि कहीं उनका भेद न खुल जाए।

-लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में बहुत लोकप्रिय वेबपोर्टल है और इस नाते केवल भड़ास निकालने के बजाय पत्रकारों की विचारधारा और रुचि में परिष्कार की भी आपकी नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है?

–बिल्कुल सही कही कहा आपने, ये कैसे हो सकता है, इस दिशा में आपके भी सुझाव जानना चाहूँगा।

-जी, इसी पर चर्चा करते हैं। बहुत से लोगों को लगता है कि ‘भड़ास’ लोकप्रिय अवश्य है, किन्तु गंभीर पत्रकारिता में इसका नाम सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता और इसे एक-दूसरे की छीछालेदर करने और गाली-गलौज वाली वेबसाइट माना जाता है।

–आज जिन्हें गंभीर माना जाता है, वे कितने छिछले निकले, ये आपको भी पता है। पत्रकारिता के वे बड़े नाम जो कभी गंभीरता के प्रतीक थे, राडिया कांड के बाद दलाली के प्रतीक के रूप में सामने आए। और जब भी, कुछ भी आप कभी नया करेंगे तो जमी-जमाई व्यवस्था शीघ्र आपको स्वीकार नहीं करेगी। वे आप पर तमाम तरह के आरोप व लांछन लगाएँगे। ग़नीमत है कि हम लोगों पर अभी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं। पर आज उनसे पूछिए कि ‘भड़ास’ क्या है जो कभी ‘भड़ास’ के आलोचक हुआ करते थे, तो वे भी मानेंगे कि ‘भड़ास’ चाहे जैसा हो इसे इगनोर नहीं कर सकते।

-लोगों का मानना है कि ‘भड़ास’ पर कैसा भी, कुछ भी आसानी से छपवाया जा सकता है। जहाँ तक कि झूठे-सच्चे आरोप और गालियाँ तक आसानी से जगह पा जाती हैं। इस पर आपकी क्या राय है?

–इसमें क्या दिक़्क़त है। कोई तो ऐसा खुला मंच हो। वैसे हम तो काफ़ी छानबीन करके छापते हैं। पर सोचिए गूगल के ब्लॉगों, बज़ व अन्य तमाम वेबसाइटों पर तो तमाम कुछ छपता रहता है। लेकिन लोग वहाँ नोटिस नहीं लेते, क्योंकि उनको लगता है कि गूगल को भला कैसे रोका जा सकता है। पर ‘भड़ास’ को लेकर आप उँगली उठा देते हैं, क्योंकि ‘भड़ास’ को भारत का एक बंदा चला रहा है और वह आपको फ़ोन-मोबाइल पर तत्काल उपलब्ध है, इसलिए उसे आप हड़का लोगे, मुक़दमा कर दोगे। पर आने वाले दौर में, यह जो मनुष्य व मीडिया के जनवादीकरण का दौर शुरू हुआ है, बहुत तेज़ होगा। सबका स्याह-सफ़ेद बाहर आना चाहिए और सब कुछ बेहद ट्रांसपेरेंट होना चाहिए।

-‘भड़ास’ पर न तो भाषा की शुद्धता का ख़याल रखा जाता है और न ही शालीनता का। भाषा पत्रकारिता का एक आधार स्तंभ है। ऐसे में आपको नहीं लगता ‘भड़ास’ पत्रकारों के भाषाई संस्कारों को परिमार्जित करने के स्थान पर उन्हें दूषित कर रहा है?

–पाखंडी क़िस्म की शालीनता से परहेज़ है हम लोगों को। ऐसे पाखंडी क़िस्म के शालीनों ने ही चुपके-चुपके सिस्टम करप्ट कर दिया है। थोड़ा बदज़ुबान ईमानदार चलेगा। और ‘भड़ास’ गुस्से व विरोध का प्लेटफ़ॉर्म है तो कई बार बात कहने में उग्रता, अशालीनता दिख सकती है, पर यह उससे तो अच्छा है, जो टीवी और अख़बारों में दिखाया-छापा जा रहा है। लिंगवर्धक यंत्र, बिग बॉस, सेक्सी सीरियल्स आदि-आदि।

-‘भड़ास’ पर गाली-गलौज और अभद्र भाषा का प्रयोग आम है। लेखों और टिप्पणियों में आपको ये खूब मिल जाएँगी। आपको नहीं लगता कि यह ग़लत है? जहाँ हमें सभी जगह गालियों का विरोध करना चाहिए, हम ख़ुद गालियाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

–मजबूर और भूखा आदमी गाली नहीं देगा तो क्या भजन गाएगा। भरे पेट वाले सुरुचि और शालीनता की ज़्यादा बातें करते हैं पर जिनके पेट खाली हैं, सिर पर सिपाहियों के डंडे हैं, वे कैसे शांत रह सकते हैं। मीडिया में एक बड़ा हिस्सा शोषित व उत्पीड़ित है। ये जब अपनी पीड़ा लिखते-बाँटते-बताते हैं तो कई बार उग्र हो जाते हैं।

-कंटेंट को लेकर भी ‘भड़ास’ तथ्यपरक नहीं होता और कई अप्रामाणिक और अपुष्ट समाचार यहाँ डाल दिए जाते हैं। जिन्हें बाद में लोग ग़लत ठहराते नज़र आते हैं। (जैसे पत्रकारों द्वारा भेजे पत्रों के आधार पर ख़बरें डाल दी जाती हैं और उनका नाम आदि भी नहीं दिखाया जाता।)

–पत्र प्रकाशित करना एक पक्ष होता है और उस पर आई टिप्पणियाँ दूसरा पक्ष। हम उन पत्रों को ही प्रकाशित करते हैं, जिन्हें हम लोग भी मानते हैं कि सही हैं। अगर कोई तथ्य ग़लत हो तो उसको लेकर आए स्पष्टीकरण को ससम्मान प्रकाशित करते हैं। बाक़ी जब आप काम करेंगे तो ग़लतियाँ तो होंगी ही। ग़लती वही नहीं करता, जो काम नहीं करता।

-आरोप यह भी है कि ‘भड़ास’ पत्रकारों में चटपटी बातों, झूठे-सच्चे गॉशिप और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को बढ़ावा दे रहा है।

–कोशिश करते हैं कि ऐसा न हो। लेकिन अगर मीडिया में गॉशिप है, घटनाएँ हैं, सरगर्मियाँ हैं तो वे प्रकाशित होंगी ही। न्यू मीडिया के लिए मीडिया के मायने काफ़ी बदल गए हैं। हम लोग गॉसिप व चर्चाओं को भी ख़बर मानते हैं। बदलते दौर में चीज़ें बदल जाती हैं।

-‘भड़ास’ पर एक कॉलम है ‘कानाफूसी’। उस पर कभी-कभी बहुत ही संवेदनशील ख़बरें बिना किसी प्रमाण और पुष्टि के डाल दी जाती हैं। जैसे, 15 फ़रवरी 2011 को ‘हिन्दुस्तान के भदोही, सोनभद्र, मिर्ज़ापुर ऑफ़िस पर भी लगेगा ताला’ और ‘राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर के संपादक और ब्यूरो चीफ़ आपस में भिड़े’ आदि। बाद में टिप्पणियों में ही लोग इन्हें ग़लत साबित करते हैं।

–हिन्दुस्तान के कई ऑफ़िसों में ताले लगे हैं और कई जगह लगने बाक़ी हैं। होता क्या है कि कई बार ख़बरें छपने के बाद मीडिया हाउस कुछ निर्णयों का एक्ज़ीक्यूशन रोक देते है या टाल देते हैं ताकि साइड इफ़ेक्ट कम से कम हो। दूसरे, अगर चर्चा है तो छाप दिया, वो ग़लत है या नहीं, लोग बता रहे हैं कमेंट में तो स्पष्ट हो गया कि पूरी तस्वीर क्या है। यहाँ आपको बता दूँ कि हम लोग न तो कोई मीडिया हैं, और न कोई अनुदान लाभ प्राप्त मीडिया हाउस। हमें आप मीडिया सेंट्रिक एक इनफ़ॉरमेशन सेंटर कह सकते हैं। इसलिए तथ्यों को सत्यापित करने का काम हमारे पाठकों का भी होता है, क्योंकि हमारे पास कोई लंबा-चौड़ा बजट व टीम नहीं है, जो हर स्टोरी पर पूरी गहराई से काम कर सके।

-‘भड़ास’ वैसे तो ‘भड़ास4मीडिया’ है, किन्तु यदि आपको लगता है कि कोई बात आपकी दर्शक संख्या बढ़ा सकती है, तो आप असंबद्ध बातें भी यहाँ प्रकाशित कर देते हैं। जैसे, ‘मैं मर्द हूँ-तुम औरत, मैं भूखा हूँ-तुम भोजन हो’ या ‘इसे माँ-बेटे का प्यार कहेंगे या रोमांस’ या ‘सरकार चिंतित है कि सेक्स करने की उम्र ज़्यादा क्यों?’ इत्यादि।

–‘भड़ास4मीडिया’ के पाठक आम लोग नहीं होते। पढ़े-लिखे लोग होते हैं। इन पढ़े-लिखे व वयस्कों के सामने सेक्स से संबंधित बात करने में क्या दिक़्क़त है। ट्रेडिशनल मीडिया ने जो दायरे बनाए हैं, अगर उसी दायरे में हम लोग फँस जाएँगे तो फिर काहे का न्यू मीडिया। न्यू मीडिया प्रयोगात्मक है। इसीलिए प्रयोग होते रहेंगे। कभी प्रयोग अच्छे लग सकते हैं और कभी बुरे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना। तो अगर किसी का कोई विचार है, जिससे आप भले असहमत हों तो उसे प्रकाशित करने में क्या दिक़्क़त। हमें विरोधी विचारों का सम्मान करना चाहिए। सीखना चाहिए और उससे सबक लेना चाहिए कि मनुष्य बहुत विविधता भरी चीज़ है, जिसे किसी एक डंडे से हाँक पाना अन्याय होगा। यह विविधता अगर हमारे यहाँ झलक रही है तो यह अच्छी बात है।

-आरोप यह भी है कि आप बेमतलब के लेखों को सनसनीख़ेज़ बनाते हुए शीर्षक लगाकर प्रकाशित करते हैं। जैसे ‘पत्रकार हैं, लुगाई कहाँ से लाएँ?’  

–ऐसा नहीं है। हेडिंग और कंटेंट में साम्य होता है। हम लोग टीवी और अख़बारों के द्वारा निर्जीव क़िस्म की हेडिंगों के आदी हैं। पर वेब पर तो प्रयोग होंगे। जिस शीर्षक का आपने ज़िक्र किया है, वह ठीक-ठाक रचना है, जिसका कंटेंट बढ़िया है। हेडिंग तो एक माध्यम होता है, कंटेंट पढ़ाने के लिए, आगे बढ़ने के लिए। इसी कारण हेडिंग में प्रयोग होते रहते हैं।

-‘भड़ास4मीडिया’ के विचार सेक्शन में एक सज्जन का नक्सलवाद पर गृहमंत्री को गरियाता हुआ एक लेख बहुत विवादास्पद हुआ था। उन सज्जन का आरोप था कि आपने पुलिस के डर से वो आलेख वेबसाइट से हटा दिया। बाद में आपने स्पष्टीकरण देते हुए कहा था कि प्रकाशन से पूर्व आपने वह पत्र पढ़ा नहीं था। क्या ये बात वास्तव में सच थी और क्या आपको नहीं लगता कि आपको निडर होकर अभिव्यक्ति के अधिकार को लेकर अडिग रहना चाहिए था?

–आपने पूरे प्रसंग के बारे में इसलिए जाना क्योंकि जिन्होंने विरोध किया था, उसका भी लेख हम लोगों ने छापा और अपना पक्ष भी रखा। तो ये अच्छी बात है कि हम लोग एक बेहद डेमोक्रेटिक प्लेटफ़ॉर्म बनने की तरफ़ तेज़ी से बढ़ चले हैं। कई बार सबकी बात रखने के चक्कर में कुछ चाइल्डिश या एक्स्ट्रीमिस्ट क़िस्म की चीज़ें भी छप जाती हैं, जिस पर ध्यान दिलाए जाने पर उसे हटा लिया या संशोधित कर दिया जाता है। मैं हर चीज़ नहीं देख पाता, क्योंकि सब कुछ पढ़ पाना मुश्किल है एक आदमी के लिए।

-क्या आपको नहीं लगता कि आप जिन वजहों से वर्तमान मीडिया हाउसों को कठघरे मे खड़ा करते हैं, वही काम ‘भड़ास’ पर आप ख़ुद भी करते हैं?

–जैसे बताएँ, उदाहरण दें कुछ। इतना जान लें आप कि हम लोग भी वही काम कर रहे होते तो भड़ास कभी का मर चुका होता। क्योंकि मीडिया के कई मगरमच्छ इसी फ़िराक़ में हैं कि यशवंत या भड़ास से कोई ग़लती हो, इनका कोई स्टिंग हो और इनका सत्यानाश हो जाए। हम लोग बेहद ट्रांसपेरेंट हैं। जो जानना चाहेंगे वो जानकारी पूरी ईमानदारी से आपको दी जाएगी। लेकिन यह ज़रूर मैं कह रहा हूँ कि हम लोग कहीं से कोई रजिस्टर्ड मीडिया नहीं हैं, न कोई अनुदान, भुगतान या लाभ पातें हैं सरकारों से। बावजूद इसके हम नब्बे फ़ीसदी ईमानदार हैं। 90 फ़ीसदी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करते। 10 फ़ीसदी करते हैं तो इसलिए ताकि ‘भड़ास’ का सर्वाइवल रहे। और इस दस फ़ीसदी में भी वो लोग हैं, जिन्हें हम बेहतर मानते हैं, नया ग्रुप मानते हैं, जिनको प्रमोट करना अपना धर्म मानते हैं ताकि जमे-जमाए व बेहद करप्ट बड़े मीडिया हाउसों को चेलेंज मिल सके।

-तथाकथित न्यू मीडिया को लेकर बहुत बवाल मचा हुआ है। न्यू मीडिया के लोगों का आरोप है कि मुख्य धारा के लोग इस क्षेत्र के अनाधिकृत मठाधीश बनने की कोशिश कर रहे हैं। आपके क्या ख़याल हैं?

–बेवजह का बवाल है। जो लोग हल्ला कर रहे हैं, दरअसल वे खुद मठाधीश बनने की फ़िराक़ में हैं। आप काम करते रहिए, मठाधीश अपने आप क़िनारे लग जाएँगे। कोई बनने से मठाधीश नहीं बन जाता।

-आपके मुताबिक़ न्यू मीडिया की ताक़त और कमज़ोरियाँ क्या हैं और इसका क्या भविष्य देखते हैं?

–परंपरागत अख़बारों व न्यूज़ चैनलों के बाज़ार व सरकार संरक्षित होते जाने की वजह से न्यू मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है। भविष्य न्यू मीडिया का है। न्यू मीडिया का काम ही मीडिया के असली काम के रूप में प्रकट होगा। भारत में न्यू मीडिया की कमज़ोरी यही है कि अभी इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक नहीं है। जिस दिन गाँव-गाँव में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड होगा, उस दिन सही मायने में न्यू मीडिया के लोग क्रांति कर रहे होंगे और फिर मिस्र जैसी क्रांति भारत में संभव हो जाएगी।

-यशवंत जी, आइए अब आपकी निजी ज़िंदगी की ओर रुख़ करते हुए चलते हैं… अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बताइए।

–मेरा गाँव अलीपुर बनगाँवा है। ग़ाज़ीपुर ज़िले से 22 किलोमीटर दूर। शहर में भी एक मकान है, जिसे बाबा ने बनवाया था, जहाँ रहकर हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई की। उसके पहले कक्षा आठ तक गाँव में रहकर पढ़ाई की। पिता का नाम लालजी सिंह है और माँ यमुना सिंह। पिता रिटायर्ड फ़ौजी हैं, माँ हाउस वाइफ। हम लोग तीन भाई हैं। बहन नहीं है। बहन न होने की कमी रक्षाबंधन के दिन ख़लती है।

-अपने बचपन के विषय में कुछ बताएँ।

–बचपन में हाईग्रेड की शरारतें करता था। पैसा चोरी से लेकर भुट्टा व गन्ना चोरी तक। इन्नोवेशन हर फ़ील्ड में करता था, बचपन में ही। सेक्स से लेकर समाधि तक में बचपन में प्रयोग किया। कभी परम पुजारी बन जाता था, हनुमान चालीसा और सुंदरकांड याद करके, तो कभी गाँव से बाहर किसी खेत में हम कुछ मित्र अपने गुप्तांगों का सामूहिक प्रदर्शन कर इस छुपी दुनिया के रहस्य जानने की कोशिश करते।

-अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में बताइए।

–गाँव में ही प्राइमरी और मिडिल स्कूल की पढ़ाई की। बाद में ग़ाज़ीपुर ज़िले के इंटर कॉलेज से इंटर किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए किया और उसके बाद बीएचयू से बीजेएमसी की डिग्री ली।

-दिल्ली कब और कैसे आना हुआ और गाँव और शहरी जीवन तथा ग़ाज़ीपुर और दिल्ली में आपने कितना अंतर पाया और इसने आपको कैसे प्रभावित किया?

–दिल्ली चार साल पहले आया। पहले दिल्ली से डर लगता था, लेकिन दिल्ली आने की ठान भी चुका था, क्योंकि प्रतिभाओं को सही मुक़ाम दिल्ली-मुंबई में ही मिल पाता है। दिल्ली में सारी टेक्नोलॉजी और तरह-तरह के क्षेत्रों के वरिष्ठ लोग हैं। इससे अगर आप प्रयोगधर्मी हैं तो काफ़ी कुछ सीखने-करने की ग़ुंजाइश होती है। बाक़ी गाँव के लोगों को शहरी जीवन में जो मुश्किलें होती हैं, वो मेरे साथ भी होती रही हैं। भीड़ में अकेले होने का भाव, सामूहिकता का अभाव। तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में भावनाओं को न समझा जाना आदि-आदि।

-अध्ययन के दौरान आपने आजीविका के लिए कौन-सा क्षेत्र चुना था? और बाद में क्या परिस्थितियाँ बनीं? क्या मनचाही फ़ील्ड में कार्य किया या समझौता करना पड़ा?

–अध्ययन करने इलाहाबाद पहुँचा तो मक़सद था, आईएएस बनना, पर बीच पढ़ाई में भगत सिंह को आदर्श मानते हुए ग़रीबों के लिए लड़ने और सिस्टम से लोहा लेने को एक नक्सलवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गया और पूरी तरह, होलटाइमर के रूप में काम करने लगा। बाद में लगा कि इतना मुश्किल काम मैं नहीं कर सकता।

-पत्रकारिता में आपकी रुचि कब पैदा हुई? और किस-किस मीडिया संस्थान में कार्य किया? और वहाँ आपके अनुभव कैसे रहे?

–पत्रकारिता में रुचि पॉलिटिकल एक्टीविज़्म के दौर में पैदा हुई। अमर उजाला और जागरण में काम किया। दोनों जगहों के अच्छे व बुरे दोनों तरह के अनुभव रहे।

-साथी कर्मचारियों में आपकी छवि कैसी थी और उनका आपके प्रति कैसा व्यवहार था?

–चूँकि मैं ज़्यादा तेज़ी से और ज़्यादा इन्नोवेशन के साथ काम करता हूँ, और ऐसे ही लोगों को पसंद करता हूँ तो कई बार जो लोग मेरी सोच के अनुसार नहीं चल पाते, उनसे मतभेद-मनभेद आदि होते रहते हैं।

-बॉस और कर्मचारियों के रिश्ते बहुत नाज़ुक होते हैं। बॉसों की क्रूरता के बहुत से क़िस्से प्रचलित हैं। आपके और आपके बॉसों के रिश्ते कैसे थे?

–आम तौर पर मेरे बॉस ही मुझसे डरा करते थे, क्योंकि मैंने कभी किसी बॉस की चेलहाई नहीं की। वीरेन डंगवाल जैसे संपादकों के साथ काम किया, जो चेला नहीं, अच्छे दोस्त की तरह अपने अधीनस्थों से काम करते-कराते हैं।

-मीडिया छोड़कर कुछ दिनों आपने एक मोबाइल वैल्यू एडेड सर्विस कंपनी में वाइस प्रेसीडेंट (मार्केटिंग एंड कंटेंट) के पद पर भी काम किया। ये फ़ील्ड में परिवर्तन कैसे हो गया?

–एक टीवी संपादक से रात में फ़ोन पर गाली-गलौज हो गई और उन्होंने मेरी गालियों को रिकॉर्ड कर दैनिक जागरण के मालिक के पास भेज दिया तो इस स्टिंग में मैं नप गया। पत्रकार की नौकरी हर जगह तलाश की। नौकरी न मिली तो जो मिला उसको ग्रहण कर लिया। मार्केटिंग फ़ील्ड में जाने से बहुत कुछ नई चीज़ें समझ में आईं और उसी समझ के कारण मुझे लगा कि ख़ुद का काम करना चाहिए, किसी की नौकरी करने की जगह।

-नौकरी के वक़्त का कोई रोचक प्रसंग बताइए।

–अमर उजाला कानपुर की बात है. एक बार मेरे संपादक वीरेन डंगवाल ने मुझे डाँटा, तो मैंने उन्हें चुपके से इस्तीफ़ा थमा दिया और कमरे पर जाकर दारू पीने लगा। उन्होंने कुछ वरिष्ठों को मुझे मनाने के लिए भेजा, पर मैं नहीं माना। सुबह संदेशा भिजवाकर अपने कमरे पर बुलवाया। उन्होंने कहा कि तुम पहले तय कर लो कि जीवन में करना क्या है। तुम आईएएस बनने इलाहाबाद गए थे, वह न बन सके। लगे क्रांति करने। क्रांति करने के लिए निकले तो वो न कर सके। चल पड़े पत्रकार बनने। अब पत्रकारिता की राह छोड़ने की बात कर रहे हो। जीवन में इतनी अस्थिरता ठीक नहीं। अपनी प्रियारटीज़ तय कर लेनी चाहिए। उनकी इस बात ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया और तय किया पत्रकारिता के क्षेत्र में लगकर काम करना है, सो उनकी प्रेरणा से आज तक इस पेशे में बना हुआ हूँ।

-ब्लॉगिंग में रुचि कैसे हुई?

–वो हिन्दी ब्लॉगों के शुरू होने का दौर था। कई ब्लॉग खुल रहे थे, सो मैंने भी एक ब्लॉग बनाने का निश्चय किया और कुछ अलग-सा, कुछ हटके ब्लॉग बनाने की प्रक्रिया में ‘भड़ास’ ब्लॉग बनाया।

-ब्लॉग तो ठीक है, पर उसका नाम ‘भड़ास’ कैसे सूझा?

–यूँ ही। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगों के जितने नाम थे, सबको देखने के बाद लगा कि अलग व विचित्र-सा नाम ‘भड़ास’ ही है, जो हिन्दी की देसज आत्मा को प्रतिध्वनित करता है और यह भी बताता है कि हम हिन्दीवालों में शहरों और अंग्रेज़ियत के ख़िलाफ़ काफ़ी भड़ास है, जिसे निकाले जाने की ज़रूरत है।

-और उसके बाद ‘भड़ास4मीडिया’ वेबसाइट शुरू करने का ख़याल कैसे आया?

–‘भड़ास’ ब्लॉग पर मीडिया से संबंधित पोस्टों को काफ़ी लोकप्रियता मिलने लगी। कम्युनिटी ब्लॉग होने के कारण ढेरों लोग डायरेक्ट अपनी जानकारियाँ पोस्ट करने लगे कि फलाँ पत्रकार ने फलाँ जगह ज्वॉइन कर लिया, उनको बधाई। इस तरह से करते-करते मुझे लगा कि मीडिया पर सेंट्रिक हिन्दी में एक अलग पोर्टल होना चाहिए।

-पाठकों का तो ‘भड़ास’ को खूब प्रतिसाद मिला, लेकिन आपके मित्रों और नज़दीकी लोगों ने इसे कैसे लिए और कितना सहयोग किया?

–मिला-जुला रहा। ‘भड़ास’ ब्लॉग के कारण जागरण में एक बार नौकरी जाते-जाते बची थी। तब ‘भड़ास’ को डिलीट करना पड़ा था। वहाँ से मुक्त होने के बाद फिर ‘भड़ास’ बनाया। कई दोस्त बने ‘भड़ास’ के कारण और कई दुश्मन भी पैदा किए ‘भड़ास’ ने।

-‘भड़ास’ के शुरुआती दौर में जब मैं आपसे मिला था, आपने बताया था कि उस वक़्त आपके किसी परिचित ने ‘भड़ास’ के नाम का ग़लत इस्तेमाल किया था। क्या इस तरह के वाक़ये भी हुए और आप उनसे कैसे निपटे?

–पहले मुझे लगता था कि ‘भड़ास’ का मतलब यशवंत सिंह होना चाहिए। अब मुझे लगता है कि भड़ास या कोई और शब्द किसी एक का नहीं है, सबका होना चाहिए। इसी कारण ‘भड़ास’ नाम से ढेरों ब्लॉग और पोर्टल बन रहे हैं और यह सब देखकर मुधे ख़ुद पर गर्व होता है कि मैंने एक शब्द को इतनी ताक़त दे दी।

-‘भड़ास’ के पहले और बाद में मीडिया को लेकर आपके नजरिए में कितना और क्या बदलाव आया?

–पहले मीडिया रूपी समुद्र में मैं एक तैराक भर था। अब मीडिया रूपी समुद्र का सर्वेयर हूँ जो तैराकों पर नज़र रखता है और उनके भले-बुरे को समझता-महसूसता है और दुनिया को बताता है। बहुत बदला हूँ अंदर से, यह काम करते हुए। कई बार मैं कन्फ़्यूज़्ड हो जाता हूँ कि सही क्या है और ग़लत क्या है। कई बार मुझे सही कहे जाने वाला व्यक्ति ज़्यादा ख़राब दिखता है, बजाय बुहरा कहे जाने वाले से।

-आपके जीवन का लक्ष्य क्या था और क्या ‘भड़ास4मीडिया’ ने इसे पूरा किया?

–लक्ष्य भी समय-समय पर बदलते रहते हैं पर मेरा एक मक़सद शुरू से रहा है मनुष्यता के लिए किसी बड़े स्तर पर काम आना और काम करना। मदर टेरेसा, ओशो, मार्क्स, भगत सिंह जैसे लोग मेरे आदर्श रहे हैं और इसमें दर्शन सिर्फ़ एक है कि मनुष्य को कैसे उसके दुःखों से मुक्ति दिलाई जाए। मुझे लगता है कि अंततः मैं कोई आध्यात्मिक टाइप का जीव हो जाऊँगा जो अपने में मगन रहेगा, गाते-माँगते।

-‘भड़ास’ ने वेब-पत्रकारिता में अपना अलग मुक़ाम बनाया है। कैसा अनुभव है इतने लोकप्रिय पोर्टल का मॉडरेटर और मालिक होने का, जिससे इतने सारे लोग जुड़े हैं और रोज़ देखते-पढ़ते हैं?

–मालिक होने का भाव रोज़ सुख नहीं देता। इस सुख का अहसास तब होता है, जब कराया जाता है। जैसे आपने अभी अहसास कराया है, तो मुझे महसूस हो रहा है कि हाँ, मैं मालिक हूँ। लेकिन सही बात तो यह है कि मैं क्लर्क हूँ जो पूरे दिन लोगों के मेलों का निस्तारण करता रहता है, उनकी सूचनाओं पर काम करता है। इसी ऊर्जा ने ‘भड़ास’ को खड़ा किया और कोशिश करता हूँ कि यही ऊर्जा क़ायम रहे।

-‘भड़ास’ ने अनेक मामले ऐसे उठाए हैं, जो मीडिया हाउसों के मालिकों और प्रबंधकों को पसंद नहीं आए। इन लोगों ने आप पर अनेक मुक़दमे दायर किए हैं। हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि इस वक़्त आप पर कितने मुक़दमे चल रहे हैं; उनकी क्या स्थिति है और ‘भड़ास’ उनसे कैसे निपट रहा है?

–क़रीब एक दर्जन मुकदमे हैं। कई नोटिस हैं। हम लोगों ने भी एक लीगल सेल बना दिया है। जब तक आप ज़िंदा हैं, यह मानकर चलिए कि केस, मुक़दमे, थाना, पुलिस ये सब आपके जीवन के हिस्से हैं। इनसे अगर आप बचे हुए हैं, तो आप बहुत सीमित दुनिया में जी रहे हैं। जो लड़ते हैं, उन्हें हराने के लिए चौतरफ़ा घेराबंदी होती है और सिस्टम का हर अंग-प्रत्यंग उसे भाँति-भाँति से क़ाबू में करने की कोशिश करता है। पर अच्छी बात है कि अगर आप सही हैं तो बहुत देर तक कोई आपको परेशान नहीं कर सकता।

-इतना बड़ा और जटिल पोर्टल चलाना बहुत तनाव भरा काम है। कभी-कभी ये आपके लेखों में भी झलकता है। इतनी मुश्किलें, उलाहने, आलोचना और मुक़दमेबाज़ी से कभी निराशा भी होती होगी। ऐसे हालात में स्वयं को कैसे संभालते हैं और फिर से ऊर्जा और आशा कहाँ से जुटाते हैं?

–दारू पीकर, भजन गाकर। सच बता रहा हूँ। दारू मेरे लिए मुक्ति का माध्यम है। कुछ लोगों के लिए सेक्स होता है, कुछ लोगों के लिए सिर्फ़ संगीत होता है। पर मेरे लिए दारू और संगीत, दोनों मिक्स होकर परम मुक्ति के मार्ग बन जाते हैं और मैं अपने सारे अवसाद, दुःखों, तनावों को इसमें होम कर देता हूँ। किसी के प्रति कोई पाप जो होता है मन में, वो भी इसी अवस्था में तिरोहित हो जाता है।

-यदि ‘भड़ास’ न होता तो आज आप क्या कर रहे होते?

–किसी कंपनी में पत्रकार या मार्केटियर बनकर नौकरी कर रहा होता। बच्चों, पत्नी को जिलाने में अपनी ज़िंदगी होम कर रहा होता।

-अपनी रुचियों (हॉबीज़) के विषय में कुछ बताइए। फ़ुरसत का वक़्त कैसे बिताते हैं?

–इधर तो मेरी एक ही हॉबी है, भड़ास और सिर्फ़ भड़ास। इस कारण ज़्यादातर वक़्त भड़ास के लिए देना पड़ता है। बचे हुए वक़्त में दारू और म्यूज़िक।

-हमारे पाठक ज़रूर जानना चाहेंगे कि ‘भड़ास’ का कामकाज कैसे चलता है? कितने लोग इस काम में आपका हाथ बँटाते हैं और ख़बरें कैसे जुटाते हैं और कैसे प्रकाशित की जाती हैं?

–ख़बरें जनता भेजती है। मीडिया के लोग भेजते हैं। छह लोगों की टीम है, जिनमें कुछ अंशकालिक और कुछ पूर्णकालिक हैं। अनिल सिंह कंटेंट एडिटर हैं, जो अमूमन ख़बरों के संपादन व प्रकाशन का काम करते हैं। पोर्टल के लिए पैसे वग़ैरह के जुगाड़ में मैं लगा रहता हूँ ताकि सर्वर का खर्चा और हम लोगों रहने-खाने का खर्चा निकलता रहे।

-‘माँ को न्याय’ ‘भड़ास4मीडिया’ का बहुत ही मार्मिक प्रसंग था। आपको क्या लगता है कि हम पत्रकार इतने कमज़ोर क्यों हैं कि अपनी माँ को छोड़िए, ख़ुद तक को इंसाफ़ नहीं दिला पाते?

–जैसा सिस्टम होता है, वैसा ही असर उस समय की जनता पर पड़ता है। मैं तो भाग्यशाली हूँ कि मैंने अपनी माँ के लिए अभियान चलाया। तमाम लोग तो पुलिस के चंगुल में फँसकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सिस्टम लगातार असंवेदनशील, क्रूर, भ्रष्ट और आपराधिक होता जा रहा है। जनविरोधी सिस्टम में आम जनता को न्याय नहीं मिल पाता। सिर्फ़ ताक़तवर और पैसे वाले लोग ही न्याय ख़रीद कर अपने को सुरक्षित रख पाते हैं। ऐसे माहौल में लगता है कि अब बिना किसी क्रांति से कम पर काम चलने वाला नहीं है। पत्रकार भी तो किसी मीडिया कंपनी में नौकरी करते हैं। अगर मीडिया कंपनी न चाहे, तो भला कौन पत्रकार अपने लिए लड़ पाएगा।

-वर्तमान मीडिया पर कुछ सवाल। मीडिया की वर्तमान स्थिति के बारे में आपकी क्या राय है?

–परंपरागत मीडिया जनता के सुखों-दुःखों से तेज़ी से कट गया है तथा विज्ञापन के लिए सिर्फ़ मेट्रो केंद्रित, शहर केंद्रित है जो बहुत दुःखद है। वर्तमान मीडिया में पेड न्यूज़ का चलन भयंकर रूप से बढ़ा है और इस पर नियंत्रण के लिए चारों ओर से आवाज़ उठने का क्रम शुरू हुआ है।

-आपके विचार मीडिया के क्या दायित्व है और क्या वर्तमान मीडिया अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन कर पा रहा है?

–मीडिया का उद्देश्य समाज को जाग्रत करना है, सही दिशा दिखाना है, वैज्ञानिक सोच पैदा करना है। पर दुःखद है कि कई चैनल व अख़बार समाज को मध्ययुगीन दौर में ले जाने का काम कर रहे हैं।

-हाल ही में राडिया टेप प्रकरण ने मीडिया की छवि को बहुत नुक़्सान पहुँचाया है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं?

–अब लोग पत्रकारों से पूछने लगे हैं कि आप मीडिया से हैं या राडिया से। यानी मीडिया में ऊपर के स्तर पर दलालों की जो बड़ी फ़ौज तैयार कर दी गई थी, उसके चेहरे का पहली बार ऐसा ख़ुलासा हुआ है। मुनाफ़ा कमाने के लिए मीडिया कंपनियाँ संपादक की नियुक्ति करती हैं और इसी वजह से राडियाएँ उन्हें जूती के नीचे रखने की कोशिश कर रही हैं।

-भविष्य के लिए आपकी क्या योजनाएँ हैं?

–बहुत जल्दी मैं संन्यासी बनना चाहता हूँ। वैसे मन से तो मैं संन्यासी बन चुका हूँ, अब तन से भी बनना है। संन्यासी का यहाँ आशय भगवा पहनने और दाढ़ी-मूँछ बढ़ाकर राम-राम करने से नहीं बल्कि लोगों को ख़ुश रखने, लोगों को जागरूक करने, लोगों से इंटरेक्ट करने जैसे स्वांतः सुखाय काम में लगना है। आजकल मैं गाता भी रहता हूँ, कबीर को…”नइहरवा हमका न भावे..” और “मन लागा यार फ़क़ीरी में..”

-“मीडिया साथी डॉट कॉम” की ओर से आपको ढेर सारी शुभकामनाएँ और अपना बहुमूल्य वक़्त देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

–आपका भी बहुत धन्यवाद।

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