ब्रम्हांड के रहस्य जानने को आतुर सुशांत की नई गैलेक्सी यात्रा पर एक धरतीवासी की चिट्ठी

अलविदा गुरु भाई!

सुशांत तुम्हारा जाना बहुतों के लिए अप्रत्याशित रहा, कुछ हद तक मेरे लिए भी. पर मुझे एक बॉलीवुड के एक सितारे के जाने से उतना फर्क शायद नहीं पड़ता, जितना एक गुरु भाई के जाने से पडा है.

हम सब जीवन की सच्ची ख़ुशी ढूंढते रहते हैं, पर कभी पा नहीं पाते. शायद ईश्वर ने प्रकृति को ऐसा ही बनाया है, और यदि ईश्वर नहीं है तो प्रकृति ने अपने आप को ऐसा ही बनाया है. प्रकृति चाहती है हम जीवन भर उस ख़ुशी, उस सम्पूर्णता को पाने के लिए दौड़ते भागते हाँफते रहें. कभी कुछ मिल जाने पर प्रसन्नता के अतिरेक में जश्न भी मनाते रहें. और तभी महसूस भी करें कि जो अभी अभी पाया वो तो बस एक छलावा है.

तुमने दौलत खूब कमाई. दोस्तियाँ खूब कमाईं. शोहरत ख़ूब कमाई. बस कमी रह गयी तो उस एक चीज़ की, जो कि हम में से भी किसी के पास नहीं है. हम भी खुश नहीं है. पर जीवन चलता रहता है. लाइफ गोज ऑन. धक्के खाते हुए. कभी स्रष्टा के तो कभी इंसानों के दिए हुए धक्के.

फिजिक्स के तुम एक अच्छे विद्यार्थी और ज्ञाता थे. फिजिक्स ओलम्पिआड के राष्ट्रीय विजेता थे. ब्रम्हांड के रहस्यों को जानने के लिए रोज़ाना घंटों चिंतन मनन और पढाई किया करते थे. तुम्हारे दोस्त हमेशा कहते थे तुम एक अभिनेता हो, इन सबमें समय नष्ट क्यों कर रहे हो. उस बड़ी सी टेलिस्कोप से, जो तुमने अपने कमरे में लगाई हुयी थी, तुमने सौर मंडल के सारे ग्रह नक्षत्र देखे थे. चाँद को रोजाना घंटों ताका था.

चाँद पर ज़मीन भी है तुम्हारी खरीदी हुयी. इसीलिए मैं तुम्हे अपना गुरु भाई मानता हूँ. पिछले कई सालों से मैं भी यही सब करता हूँ. करने की कोशिश करता हूँ.

तुम ये सब क्यों करते थे, शायद मैं ये जानता हूँ. इसीलिए ये ख़त तुमको आज लिख रहा हूँ. इस धरती पर जब तुम्हें हर जगह झूठ, फरेब, सनक, लालच, स्वार्थ दिखा होगा तो तुमने ये महसूस किया होगा कि इन सबका वजूद इतना बड़ा भी नहीं है. अपनी धरती के बाद सौर मंडल, उसके बाद गैलेक्सी, फिर लोकल क्लस्टर, फिर सुपर क्लस्टर, फिर विज़िबल यूनिवर्स, और उसके बाद का अनंत अथाह यूनिवर्स. दरअसल सच्चाई तो यह है. अनंत ही सच है.

जब हम इस अनंत को जानने समझने लगते हैं, तब हमें अपने आस पास के स्वार्थी और मक्कार धरतीवासी बहुत छोटे और तुच्छ लगने लगते हैं. यही तो आनंद है संपूर्ण प्रकृति को जानने समझने का.

पिछले कुछ सालों में मैंने भी ज्यादातर मक्कार धूर्त स्वार्थी ही पाए हैं अपने आस पास. पर जब मैं अनंत ब्रम्हांड के ब्लैक होल्स, सुपर नोवा, डार्क एनर्जी, मल्टीवर्स इन सब में खो जाता हूँ, तो लगता है कि जहां से आया हूँ उसी प्रकृति माँ की गोद में खेल रहा हूँ.

गुरु भाई, हम नहीं जानते कि मरने के बाद हमारा धूर्तों से पीछा छूट जाता है या वहां भी ये सारे धूर्त भूत के रूप में मिलते हैं. शायद नहीं मिलते होंगे. इसीलिए इतने सारे लोग शान्ति पाने के लिए दूसरी दुनिया में जाते हैं.

तुम न जाते तो बहुत कुछ करते. करना चाहते थे तुम. ऐसा कुछ जिसके लिए दुनिया में तुम्हे याद रखा जाए. जाते जाते कुछ ऐसा ही कर भी गए तुम. पर इससे बेहतर तुम कर सकते थे. जब अपना टाइम आएगा, और मैं भी उसी ब्रह्म में लीन हो जाऊंगा जहाँ तुम अभी हो, तब खूब बातें होंगी. तब तक जहाँ हो वहां खुश रहना मेरे गुरु भाई.

डीपी सिंह

नोएडा

divakar.p.singh@gmail.com

  • भड़ास की पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए आपसे सहयोग अपेक्षित है- SUPPORT

 

 

  • भड़ास तक खबरें-सूचनाएं इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *