गायत्री प्रजापति धमकी के एफआईआर में लखनऊ पुलिस ने किया खेल

मुझे और मेरे पति पति आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को एक कथित टीवी पत्रकार द्वारा दी गयी धमकी में दी गयी शिकायत पर गोमतीनगर थाने में पूरी तरह गलत तरीके से एफआईआर दर्ज की गयी है. मेरे प्रार्थनापत्र के अनुसार मामला 506 आईपीसी तथा 66ए आईटी एक्ट 2000 का संज्ञेय अपराध बनता है लेकिन थानाध्यक्ष ने इसे सिर्फ धारा 507 आईपीसी के असंज्ञेय अपराध में दर्ज किया. आम तौर पर धमकी देने पर 506 आईपीसी का अपराध होता है जबकि 507 आईपीसी तब होता है जब कोई आदमी अपना नाम और पहचान छिपाने की सावधानी रख कर धमकी देता है.

एक निश्चित मोबाइल नंबर से दी गयी धमकी कभी भी अनाम नहीं मानी जा सकती क्योंकि इसे आसानी से ट्रेस किया जा सकता है. संज्ञेय अपराध में पुलिस स्वयं विवेचना और गिरफ़्तारी करती है जबकि असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही विवेचना या गिरफ़्तारी होती है. अतः मैंने पुलिस द्वारा जानबूझ कर मामले को ठन्डे बस्ते में डालने का आरोप लगाते एसएसपी लखनऊ को मुकदमे को सही धाराओं में दर्ज कर उसकी विवेचना कराने के लिए प्रार्थनापत्र दिया है ताकि प्रदेश के एक मंत्री से जुड़े इस मामले में सच्चाई सामने आ सके.

डॉ नूतन ठाकुर
# 094155-34525

सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
लखनऊ
विषय- एनसीआर संख्या 0001/2015 धारा 507 आईपीसी विषयक
महोदय,

निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या-NT/Complaint/40 दिनांक- 04/01/2015 के माध्यम से थानाध्यक्ष, थाना गोमतीनगर को दिनांक 03/01/2014 को मेरे पति आईपीएस अफसर श्री अमिताभ ठाकुर तथा मेरे मोबाइल पर फोन नंबर 093890-25750 द्वारा अपने आप को किसी टीवी चैनेल का पत्रकार कोई श्री मिश्रा बताते हुए मुझे श्री गायत्री प्रजापति मामले से अलग हो जाने की धमकी के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज करने को एक प्रार्थनापत्र दिया था.

कल दिनांक 05/01/2015 को समय लगभग 21.10 बजे रात्रि थाने जाने पर मुझे इस एफआईआर की प्रति प्राप्त हुई. अभिलेखों के अनुसार यह एफआईआर दिनांक 04/01/2015 को समय 21.45 धारा 155 सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत मु०अ०स० 0001/2015 धारा 507 आईपीसी में दर्ज हुआ. (एफआईआर की प्रति संलग्न) निवेदन करुँगी कि धारा 507 आईपीसी एक असंज्ञेय अपराध है जिसमे पुलिस धारा 155(2) सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के विवेचना नहीं कर सकती और धारा 2(घ) सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि मेरी शिकायत पर जो अभियोग पंजीकृत हुआ है उसकी विवेचना अब तभी होगी जब मैं अथवा पुलिसवाले इसके लिए मा० न्यायालय से अनुमति लें. यह भी लगभग स्पष्ट है कि पुलिसवाले इसके लिए अनुमति लेने से रहे, ऐसे में यह मुझसे ही अपेक्षित हुआ कि मैं मा० न्यायालय जाऊं और अनुमति प्राप्त करूँ.  इसके विपरीत सत्यता यह है कि मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र असंज्ञेय अपराध धारा 507 आईपीसी की श्रेणी में आता ही नहीं है बल्कि यह धारा 506 आईपीसी के अधीन आता है. मैं इसके लिए इन दोनों धारा को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ.

धारा 507- Criminal intimidation by an anonymous communication.—Whoev­er commits the offence of criminal intimidation by an anonymous communication, or having taken precaution to conceal the name or abode of the person from whom the threat comes, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, in addition to the punishment provided for the offence by the last preceding section.

धारा 506- Punishment for criminal intimidation.—Whoever commits, the offence of criminal intimidation shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both; If threat be to cause death or grievous hurt, etc.—And if the threat be to cause death or grievous hurt, or to cause the destruction of any property by fire, or to cause an offence punishable with death or 1[imprisonment for life], or with imprisonment for a term which may extend to seven years, or to impute, unchastity to a woman, shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to seven years, or with fine, or with both.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि धारा 507 आईपीसी अनाम संसूचना अथवा धमकी देने वाले व्यक्ति द्वारा अपना नाम या निवास छिपाने की पूर्व सावधानी बरतने पर लगाया जाता है. इसका अर्थ हुआ कि यह धारा तब लगेगी जब आपराधिक अभित्रास करने वाला व्यक्ति अपना नाम, पता, अपनी पहचान छिपाने का उपक्रम करे. जिस मामले में व्यक्ति ने एक ज्ञात फोन नंबर (जिसे शिकायत में लिखा गया है) से फोन किया वह किसी भी स्थिति में अनाम या पहचान छिपाने का मामला नहीं हो सकता क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि आज के टेक्नोलॉजी युग में तत्काल ही किसी भी नंबर से उसके धारक, धारक के सिम नंबर, आईएमई नंबर, उसके पता आदि की तत्काल जानकारी हो जाती है और यह बात आज के समय हर कोई जानता है. ऐसे में ज्ञात फोन नंबर से किये गए फोन को अनाम व्यक्ति अथवा पता, नाम छिपाने के साथ किया गया अपराध किसी भी सूरत में नहीं माना जा सकता. यह बात इतना सर्वज्ञात है कि यह किसी भी स्थिति में नहीं माना जा सकता कि थानाध्यक्ष गोमतीनगर को यह नहीं मालूम है. अतः प्रथमद्रष्टया ही लगाई गयी धारा पूरी तरह गलत है जो बात कोई भी समझ सकता है. इतना ही नहीं, तहरीर के अनुसार उस व्यक्ति ने अपना एक नाम भी बताया था जो मिश्रा जी लिखा हुआ है. साथ ही उसमे यह भी लिखा है कि उस व्यक्ति ने खुद को टीवी पत्रकार बताया. जब एक व्यक्ति अपना मोबाइल नंबर दे रहा है, अपना नाम बता रहा है, अपनी आइडेंटिटी बता रहा है तो वह धारा 507 आईपीसी में कैसे हुआ? जाहिर है कि थानाध्यक्ष द्वारा यह धारा गलत लगाई गयी है और मेरा यह खुला आरोप है कि उनके द्वारा यह जानबूझ कर आरोपी को बचाने के लिए किया गया है.

ऐसा इसीलिए क्योंकि दोनों धारा में दंड सामान है- 2 वर्ष, पर इन दोनों में एक बहुत बड़ा अंतर है. वह यह कि धारा 507 आईपीसी असंज्ञेय अपराध है और दिनांक 02/08/1989 को उत्तर प्रदेश गज़ट में प्रकाशित शासनादेश संख्या 777/VIII-9-4(2-(87) दिनांक 31/07/1989 के अनुसार धारा 506 आईपीसी उत्तर प्रदेश में संज्ञेय अपराध घोषित किया जा चुका है. थानाध्यक्ष को ज्ञात है कि इस धारा में विवेचना नहीं होगी और कोई पूछताछ नहीं होने के कारण यह मामला यहीं रुक जाएगा और ठप्प हो जाएगा. मैं यह आरोप इसीलिए भी लगा रही हूँ कि मेरी जानकारी के अनुसार यह धारा शायद ही किसी मामले में लगाई जाती हो पर यहाँ यह मात्र मामले को असंज्ञेय बनाए के लिए लगाई गयी. मैं यह बात इस आधार पर भी कह रही हूँ कि कल रात जब मैंने थानाध्यक्ष से फोन पर पूछा था कि दिए गए नंबर पर कॉल कर देखा गया है कि किसका फोन है तो उन्होंने बहुत रूखेपन से कहा था कि यह उनका काम नहीं है.

स्पष्ट है कि एफआईआर में मोबाइल नंबर, एक नाम और एक आइडेंटिटी होने के बाद भी बिना उस पर फोन किये, बिना उसकी कोई जानकारी लिए, बिना कोई प्रयास किये  अपने स्तर से ही उसे अनाम या अपनी पहचान छिपाने के लिए किया गया अपराध बताना सीधे-सीधे दोषियों को बचाना और यह जानते हुए कि असंज्ञेय अपराध की विवेचना नहीं होती मामले को जस का तस दफ़न करने का प्रयास है.

निवेदन करुँगी कि यह मामला मात्र धारा 506 आईपीसी का अपराध ही नहीं है बल्कि धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 का भी अपराध है. मैं यह धारा आपके सम्मुख रखना चाहूंगी “Punishment for sending offensive messages through communication service, etc- Any person who sends, by means of a computer resource or a communication device,—(a) any information that is grossly offensive or has menacing character; or (b) any information which he knows to be false, but for the purpose of causing annoyance, inconvenience, danger, obstruction, insult, injury, criminal intimidation, enmity, hatred or ill will, persistently by making use of such computer resource or a communication device,(c) any electronic mail or electronic mail message for the purpose of causing annoyance or inconvenience or to deceive or to mislead the addressee or recipient about the origin of such messages,shall be punishable with imprisonment for a term which may extend to three years and with fine. Explanation.— For the purpose of this section, terms “electronic mail” and “electronic mail message” means a message or information created or transmitted or received on a computer, computer system, computer resource or communication device including attachments in text, images, audio, video and any other electronic record, which may be transmitted with the message”
आईटी एक्ट की धारा 2 (1) (ha) के अनुसार “Communication Device” means Cell Phones, Personal Digital Assistance or combination of both or any other device used to communicate, send or transmit any text, video, audio, or image.

उपरोक्त तथ्यों से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि मोबाइल फ़ोन के मामले में criminal intimidation (आपराधिक अभित्रास) धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत अपराध है, जो पुनः संज्ञेय अपराध है. लेकिन थानाध्यक्ष ने इस धारा को भी इस मामले में नहीं लगाया है जो इनकी जानबूझ कर की गयी गलती प्रतीत होती है.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत न्याय के हित में आपसे निवेदन है कि आप तत्काल मामले को सही धाराओं धारा 506 आईपीसी तथा धारा 66ए, आईटी एक्ट  2000 में तरमीम कराते हुए इस मामले की निष्पक्ष विवेचना कराने की कृपा करें. निवेदन करुँगी कि यह प्रकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से श्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के नाम से जुड़ा है जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और यह मामला मेरे और मेरे पति की सुरक्षा के भी जुड़ा है अतः इस पर यथेष्ट गंभीरता से ध्यान देने की कृपा करें ताकि यह सन्देश न जाए कि विवेचना से बचने का कोई प्रयास हो रहा है और जानबूझ कर मामले को दबाया जा रहा है.

पत्र संख्या-NT/Complaint/40                               
दिनांक- 06/01/2015
भवदीया,                                                     
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

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