विवेक तिवारी हत्याकांड पर मीडिया कवरेज से नाराज़ लखनऊ के सिपाही अब न बख्शेंगे पत्रकारों को!

Naved Shikoh : अब सिपाहियों की लाठी पत्रकारों पर टूटेगी? रंगबाज़-अकड़बाज़ और फर्जी क़िस्म के पत्रकार हो जायें सावधान… लखनऊ में विवेक तिवारी हत्याकांड पर मीडिया कवरेज से भी नाराज़ हैं सिपाही… डांसिंग कार और पार्कों में अश्लीलता युक्त आशिकी के लिए भी तेल में भिगोये जा रहे हैं पुलिसिया डंडे… Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

उत्तर प्रदेश में कानून मौत बांटता है और सरकारें मुआवजा!

विवेक हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं! अगर आपकी हत्या पर 25 लाख का मुआवजे मिले तो आपको इससे ज्यादा क्या चाहिए जनाब. लखनऊ में पुलिस की गोली और पुलिस से मिलने वाली मौत के बदले पच्चीस लाख रुपये दिए जाते हैं. अब भी नहीं समझे तो आपके समझते समझते घर के दो लोगों को 25-25 लाख का मुआवजा और घर के सदस्य को सरकारी नौकरी मिल ही जाएगी, तब शायद आप समझ जाएंगे मैं क्या कह रहा हूं.

Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

गायत्री प्रजापति धमकी के एफआईआर में लखनऊ पुलिस ने किया खेल

मुझे और मेरे पति पति आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर को एक कथित टीवी पत्रकार द्वारा दी गयी धमकी में दी गयी शिकायत पर गोमतीनगर थाने में पूरी तरह गलत तरीके से एफआईआर दर्ज की गयी है. मेरे प्रार्थनापत्र के अनुसार मामला 506 आईपीसी तथा 66ए आईटी एक्ट 2000 का संज्ञेय अपराध बनता है लेकिन थानाध्यक्ष ने इसे सिर्फ धारा 507 आईपीसी के असंज्ञेय अपराध में दर्ज किया. आम तौर पर धमकी देने पर 506 आईपीसी का अपराध होता है जबकि 507 आईपीसी तब होता है जब कोई आदमी अपना नाम और पहचान छिपाने की सावधानी रख कर धमकी देता है.

एक निश्चित मोबाइल नंबर से दी गयी धमकी कभी भी अनाम नहीं मानी जा सकती क्योंकि इसे आसानी से ट्रेस किया जा सकता है. संज्ञेय अपराध में पुलिस स्वयं विवेचना और गिरफ़्तारी करती है जबकि असंज्ञेय अपराध में मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद ही विवेचना या गिरफ़्तारी होती है. अतः मैंने पुलिस द्वारा जानबूझ कर मामले को ठन्डे बस्ते में डालने का आरोप लगाते एसएसपी लखनऊ को मुकदमे को सही धाराओं में दर्ज कर उसकी विवेचना कराने के लिए प्रार्थनापत्र दिया है ताकि प्रदेश के एक मंत्री से जुड़े इस मामले में सच्चाई सामने आ सके.

डॉ नूतन ठाकुर
# 094155-34525

सेवा में,
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक,
लखनऊ
विषय- एनसीआर संख्या 0001/2015 धारा 507 आईपीसी विषयक
महोदय,

निवेदन है कि मैंने अपने पत्र संख्या-NT/Complaint/40 दिनांक- 04/01/2015 के माध्यम से थानाध्यक्ष, थाना गोमतीनगर को दिनांक 03/01/2014 को मेरे पति आईपीएस अफसर श्री अमिताभ ठाकुर तथा मेरे मोबाइल पर फोन नंबर 093890-25750 द्वारा अपने आप को किसी टीवी चैनेल का पत्रकार कोई श्री मिश्रा बताते हुए मुझे श्री गायत्री प्रजापति मामले से अलग हो जाने की धमकी के सम्बन्ध में एफआईआर दर्ज करने को एक प्रार्थनापत्र दिया था.

कल दिनांक 05/01/2015 को समय लगभग 21.10 बजे रात्रि थाने जाने पर मुझे इस एफआईआर की प्रति प्राप्त हुई. अभिलेखों के अनुसार यह एफआईआर दिनांक 04/01/2015 को समय 21.45 धारा 155 सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अंतर्गत मु०अ०स० 0001/2015 धारा 507 आईपीसी में दर्ज हुआ. (एफआईआर की प्रति संलग्न) निवेदन करुँगी कि धारा 507 आईपीसी एक असंज्ञेय अपराध है जिसमे पुलिस धारा 155(2) सीआरपीपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना सक्षम मजिस्ट्रेट के आदेश के विवेचना नहीं कर सकती और धारा 2(घ) सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती.

उपरोक्त से स्पष्ट है कि मेरी शिकायत पर जो अभियोग पंजीकृत हुआ है उसकी विवेचना अब तभी होगी जब मैं अथवा पुलिसवाले इसके लिए मा० न्यायालय से अनुमति लें. यह भी लगभग स्पष्ट है कि पुलिसवाले इसके लिए अनुमति लेने से रहे, ऐसे में यह मुझसे ही अपेक्षित हुआ कि मैं मा० न्यायालय जाऊं और अनुमति प्राप्त करूँ.  इसके विपरीत सत्यता यह है कि मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र असंज्ञेय अपराध धारा 507 आईपीसी की श्रेणी में आता ही नहीं है बल्कि यह धारा 506 आईपीसी के अधीन आता है. मैं इसके लिए इन दोनों धारा को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रही हूँ.

धारा 507- Criminal intimidation by an anonymous communication.—Whoev­er commits the offence of criminal intimidation by an anonymous communication, or having taken precaution to conceal the name or abode of the person from whom the threat comes, shall be punished with imprisonment of either description for a term which may extend to two years, in addition to the punishment provided for the offence by the last preceding section.

धारा 506- Punishment for criminal intimidation.—Whoever commits, the offence of criminal intimidation shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to two years, or with fine, or with both; If threat be to cause death or grievous hurt, etc.—And if the threat be to cause death or grievous hurt, or to cause the destruction of any property by fire, or to cause an offence punishable with death or 1[imprisonment for life], or with imprisonment for a term which may extend to seven years, or to impute, unchastity to a woman, shall be punished with imprison­ment of either description for a term which may extend to seven years, or with fine, or with both.

उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि धारा 507 आईपीसी अनाम संसूचना अथवा धमकी देने वाले व्यक्ति द्वारा अपना नाम या निवास छिपाने की पूर्व सावधानी बरतने पर लगाया जाता है. इसका अर्थ हुआ कि यह धारा तब लगेगी जब आपराधिक अभित्रास करने वाला व्यक्ति अपना नाम, पता, अपनी पहचान छिपाने का उपक्रम करे. जिस मामले में व्यक्ति ने एक ज्ञात फोन नंबर (जिसे शिकायत में लिखा गया है) से फोन किया वह किसी भी स्थिति में अनाम या पहचान छिपाने का मामला नहीं हो सकता क्योंकि यह बात सर्वविदित है कि आज के टेक्नोलॉजी युग में तत्काल ही किसी भी नंबर से उसके धारक, धारक के सिम नंबर, आईएमई नंबर, उसके पता आदि की तत्काल जानकारी हो जाती है और यह बात आज के समय हर कोई जानता है. ऐसे में ज्ञात फोन नंबर से किये गए फोन को अनाम व्यक्ति अथवा पता, नाम छिपाने के साथ किया गया अपराध किसी भी सूरत में नहीं माना जा सकता. यह बात इतना सर्वज्ञात है कि यह किसी भी स्थिति में नहीं माना जा सकता कि थानाध्यक्ष गोमतीनगर को यह नहीं मालूम है. अतः प्रथमद्रष्टया ही लगाई गयी धारा पूरी तरह गलत है जो बात कोई भी समझ सकता है. इतना ही नहीं, तहरीर के अनुसार उस व्यक्ति ने अपना एक नाम भी बताया था जो मिश्रा जी लिखा हुआ है. साथ ही उसमे यह भी लिखा है कि उस व्यक्ति ने खुद को टीवी पत्रकार बताया. जब एक व्यक्ति अपना मोबाइल नंबर दे रहा है, अपना नाम बता रहा है, अपनी आइडेंटिटी बता रहा है तो वह धारा 507 आईपीसी में कैसे हुआ? जाहिर है कि थानाध्यक्ष द्वारा यह धारा गलत लगाई गयी है और मेरा यह खुला आरोप है कि उनके द्वारा यह जानबूझ कर आरोपी को बचाने के लिए किया गया है.

ऐसा इसीलिए क्योंकि दोनों धारा में दंड सामान है- 2 वर्ष, पर इन दोनों में एक बहुत बड़ा अंतर है. वह यह कि धारा 507 आईपीसी असंज्ञेय अपराध है और दिनांक 02/08/1989 को उत्तर प्रदेश गज़ट में प्रकाशित शासनादेश संख्या 777/VIII-9-4(2-(87) दिनांक 31/07/1989 के अनुसार धारा 506 आईपीसी उत्तर प्रदेश में संज्ञेय अपराध घोषित किया जा चुका है. थानाध्यक्ष को ज्ञात है कि इस धारा में विवेचना नहीं होगी और कोई पूछताछ नहीं होने के कारण यह मामला यहीं रुक जाएगा और ठप्प हो जाएगा. मैं यह आरोप इसीलिए भी लगा रही हूँ कि मेरी जानकारी के अनुसार यह धारा शायद ही किसी मामले में लगाई जाती हो पर यहाँ यह मात्र मामले को असंज्ञेय बनाए के लिए लगाई गयी. मैं यह बात इस आधार पर भी कह रही हूँ कि कल रात जब मैंने थानाध्यक्ष से फोन पर पूछा था कि दिए गए नंबर पर कॉल कर देखा गया है कि किसका फोन है तो उन्होंने बहुत रूखेपन से कहा था कि यह उनका काम नहीं है.

स्पष्ट है कि एफआईआर में मोबाइल नंबर, एक नाम और एक आइडेंटिटी होने के बाद भी बिना उस पर फोन किये, बिना उसकी कोई जानकारी लिए, बिना कोई प्रयास किये  अपने स्तर से ही उसे अनाम या अपनी पहचान छिपाने के लिए किया गया अपराध बताना सीधे-सीधे दोषियों को बचाना और यह जानते हुए कि असंज्ञेय अपराध की विवेचना नहीं होती मामले को जस का तस दफ़न करने का प्रयास है.

निवेदन करुँगी कि यह मामला मात्र धारा 506 आईपीसी का अपराध ही नहीं है बल्कि धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 का भी अपराध है. मैं यह धारा आपके सम्मुख रखना चाहूंगी “Punishment for sending offensive messages through communication service, etc- Any person who sends, by means of a computer resource or a communication device,—(a) any information that is grossly offensive or has menacing character; or (b) any information which he knows to be false, but for the purpose of causing annoyance, inconvenience, danger, obstruction, insult, injury, criminal intimidation, enmity, hatred or ill will, persistently by making use of such computer resource or a communication device,(c) any electronic mail or electronic mail message for the purpose of causing annoyance or inconvenience or to deceive or to mislead the addressee or recipient about the origin of such messages,shall be punishable with imprisonment for a term which may extend to three years and with fine. Explanation.— For the purpose of this section, terms “electronic mail” and “electronic mail message” means a message or information created or transmitted or received on a computer, computer system, computer resource or communication device including attachments in text, images, audio, video and any other electronic record, which may be transmitted with the message”
आईटी एक्ट की धारा 2 (1) (ha) के अनुसार “Communication Device” means Cell Phones, Personal Digital Assistance or combination of both or any other device used to communicate, send or transmit any text, video, audio, or image.

उपरोक्त तथ्यों से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि मोबाइल फ़ोन के मामले में criminal intimidation (आपराधिक अभित्रास) धारा 66ए, इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के तहत अपराध है, जो पुनः संज्ञेय अपराध है. लेकिन थानाध्यक्ष ने इस धारा को भी इस मामले में नहीं लगाया है जो इनकी जानबूझ कर की गयी गलती प्रतीत होती है.

उपरोक्त तथ्यों के दृष्टिगत न्याय के हित में आपसे निवेदन है कि आप तत्काल मामले को सही धाराओं धारा 506 आईपीसी तथा धारा 66ए, आईटी एक्ट  2000 में तरमीम कराते हुए इस मामले की निष्पक्ष विवेचना कराने की कृपा करें. निवेदन करुँगी कि यह प्रकरण प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से श्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के नाम से जुड़ा है जो वर्तमान में प्रदेश सरकार में मंत्री हैं और यह मामला मेरे और मेरे पति की सुरक्षा के भी जुड़ा है अतः इस पर यथेष्ट गंभीरता से ध्यान देने की कृपा करें ताकि यह सन्देश न जाए कि विवेचना से बचने का कोई प्रयास हो रहा है और जानबूझ कर मामले को दबाया जा रहा है.

पत्र संख्या-NT/Complaint/40                               
दिनांक- 06/01/2015
भवदीया,                                                     
(डॉ नूतन ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
nutanthakurlko@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

वाह रे लखनऊ पुलिस! : जो लड़की को बचा रहा था उसे एएसपी पर फायरिंग का आरोपी बना दिया

हमने हजरतगंज, लखनऊ में एएसपी दुर्गेश कुमार पर हुए कथित फायरिंग मामले में अपने स्तर पर जांच की. हमने आरोपी पुलकित के घर जाकर उसके पिता राम सुमिरन शुक्ला, माँ सावित्री शुक्ला, भाई पीयूष शुक्ला तथा अन्य परिचितों से मुलाकात की. इन लोगों ने बताया कि घटना प्रोवोग शॉप के पास हुई जिसमें परिचित लड़की को छेड़े जाते देख पुलकित और साथियों ने बीच-बचाव किया.

तभी पुलिस आ गयी और आपाधापी में बिना समझे पुलकित का एएसपी पर हाथ चल गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया और थाने पर काफी मारा-पीटा गया. यह भी बताया कि गिरफ्तारी की सूचना अगले दिन 11.00 बजे दी गयी. उस रात भी वह लड़की थाना गयी थी पर पुलिस ने उसे भगा दिया था. उन्होंने कहा कि यदि प्रोवोग शॉप के पास के सीसीटीवी फुटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी. पुलकित के पिता ने स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रहने के कारण इसकी विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने की मांग की.

हमने एफआईआर तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इसमें फायरिंग का उल्लेख है जबकि ना कोई हथियार नहीं मिला और ना खोखा आदि. अतः हमने प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर मामले की सीबी-सीआईडी जांच कराने और दस दिनों में मामले की प्रशासनिक जांच किसी सचिव स्तर के अधिकारी से कराने की मांग की है.

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- थाना हजरतगंज पर एएसपी और पुलिस पर हुए कथित फायरिंग मामले में श्री पुलकित की गिरफ़्तारी विषयक

महोदय,

पिछले कुछ दिनों से थाना हजरतगंज, जनपद लखनऊ में 23/11/2014 एएसपी श्री दुर्गेश कुमार पर श्री पुलकित शुक्ला तथा तीन अन्य द्वारा फायरिंग करने की घटना के विषय में कई प्रकार की बातें लिखी जा रही थीं. हम अमिताभ और नूतन ठाकुर ने इस सम्बन्ध में दिन भर गहराई से मामले की अपने स्तर पर जांच की. हमने इसके लिए पुलकित के 5/25, 5ई, वृन्दावन कॉलोनी स्थित निवास स्थान भी गए जहां हमें उनके पिता श्री राम सुमिरन शुक्ला (फोन नंबर 098385-78971), माँ सुश्री सावित्री शुक्ला, भाई श्री पियूष शुक्ला (फोन नंबर 098391-30012), मामा बद्री प्रसाद शुक्ला पुत्र श्री महेश नारायण,  719, सीतापुर रोड महायोजना, निकट महादेव रोड, (फोन नंबर #098391-72505) तथा परिचित श्री ए के मिश्रा पुत्र श्री एस पी मिश्रा, 2ए/287, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 097951-67623 ), श्री आशुतोष ओझा पुत्र श्री गया प्रसाद ओझा, 5 ई, 3/24, वृन्दावन कॉलोनी तथा श्री राजेश कुमार पुत्र श्री दुर्गा प्रसाद, 5ई, 1/225, वृन्दावन कॉलोनी (फोन नंबर # 074088-10980) मिले.

इनमे श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन, भाई श्री पियूष, माँ सुश्री सावित्री श्री पुलकित से उनकी गिरफ़्तारी के बाद मिल चुके थे. उन्होंने हमें यह बताया कि श्री पुलकित का कहना है कि यह पूरी घटना हज़रातगंज से थोड़ी दूर पर स्थित Provogue शॉप के पास हुआ. घटना मूल रूप से यह हुई कि एक लड़की, जो उनकी परिचित थी, को कुछ अज्ञात लड़के छेड़ रहे थे, जिस पर इन लोगों ने बीच-बचाव किया जिसके बाद इनमे आपसी कहासुनी शुरू हो गयी. इतने में पुलिस आ गयी और उनमे एक ने श्री पुलकित पर हाथ चलाया. श्री पुलकित यह समझ नहीं पाए कि ऐसा किसने किया और उनका हाथ भी अकस्मात उठ गया. उसने कत्तई जानबूझ कर पुलिस पर हाथ नहीं उठाया था. जैसे ही उसे मालूम हुआ कि उन्होंने गलती से एएसपी साहब पर हाथ चला दिया है, वह एकदम से घबरा गया. फिर उसे गिरफ्तार कर लिया गया. उसने यह भी बताया कि उसे थाने पर काफी मारा-पीटा गया. उसने यह भी कहा कि यदि Provogue शॉप के पास के सीसीटीवी कैमरों के फूटेज ले लिए जाएँ तो पूरी बात खुदबखुद साफ़ हो जायेगी.

श्री राम सुमिरन से बताया कि उन्हें अपने बेटे की गिरफ़्तारी की सूचना दिनांक 24/11/2014 को लगभग 11.00 बजे हजरतगंज थाने के किसी तिवारी जी ने उनके मोबाइल पर दिया. उन्होंने यह भी कहा कि श्री पुलकित ने कहा कि उसे थाने में बहुत मारा गया. इन लोगों ने यह भी बताया कि उस रात भी वह लड़की स्वयं थाना हजरतगंज गयी थी पर पुलिस ने उसे थाने से भगा दिया था.

हमने इस सम्बन्ध में लड़की से भी उसके मोबाइल नंबर पर बात की और उससे मिलना चाहा पर लड़की ने शायद घबराहट के कारण हमसे मिलने में हिचक दिखाई. लेकिन हमें उस लड़की द्वारा प्रमुख सचिव गृह को दिया प्रार्थनापत्र मिला जिसमे उन्होंने दिनांक 23/11/2014  को शाम की पूरी घटना स्वयं बतायी. उसने बताया कि गिरफ्तार श्री पुलकित आदि उसकी मदद कर रहे थे, ना कि उससे छेड़छाड़. उसने यह भी लिखा है कि पुलिस के अफसर सादे में थे जिनसे श्री पुलकित से झड़प हो गयी. हमने कल हजरतगंज थाने पर आ कर बयान देने वाले श्री विशाल तिवारी से उनके फोन नंबर 097944-15703 पर कई बार फोन किया लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

हमने गोपनीय स्तर पर इस मामले के जानकार कई लोगों से बात की. हमने इस मामले में पंजीकृत एफआईआर संख्या 592/2014 धारा 307/354/ख/354घ आईपीसी का तहरीर और गिरफ़्तारी प्रमाणपत्र देखा. इनके अनुसार दिनांक 23/11/2014 को समय 19.40 शाम गिरफ़्तारी हुई है. एफआईआर में फायरिंग का उल्लेख हुआ जबकि अन्य किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार के फायरिंग की कोई बात सामने नहीं आई है. गिरफ़्तारी के फर्द से भी स्पष्ट है कि गिरफ्तार व्यक्ति के पास से कोई हथियार नहीं मिला. यह भी स्पष्ट है कि हथियार के अलावा कोई खोखा आदि भी मौके पर नहीं मिला. गिरफ़्तारी के फर्द में मा० उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार तत्काल गिरफ़्तारी की सूचना परिजनों को देने की बात कही गयी.

श्री पुलकित के पिता श्री राम सुमिरन ने हमें लिखित रूप से एक प्रार्थनापत्र दे कर सभी बातें लिखते हुए बताया कि उन्हें अब स्थानीय पुलिस पर कोई विश्वास नहीं रह गया है और उन्होंने हमें मामले की विवेचना सीबी-सीआईडी से करवाने में मदद करने की प्रार्थना की. उपरोक्त के दृष्टिगत निम्न तथ्य आवश्यक प्रतीत होते हैं-

1. चूँकि मामला लखनऊ पुलिस के एएसपी से सम्बंधित है, अतः इसमें स्थानीय पुलिस की जगह निश्चित रूप से सीबी-सीआईडी से विवेचना कराया जाना प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से अनिवार्य प्रतीत होता है

2. विवेचना तत्काल/अविलम्ब सीबी-सीआईडी को दिया जाना न्याय की दृष्टि से अपरिहार्य प्रतीत होता है

3. इस पूरे मामले की प्रशासनिक जांच दस दिन के निश्चित समयावधि में शासन के किसी प्रमुख सचिव/सचिव स्तर के अधिकारी से अलग से करवाने की आवश्यकता प्रतीत होती है

अतः आपसे निवेदन है कि उपरोक्त बिंदु संख्या एक से तीन पर प्रस्तुत तीनों अनुरोधों को स्वीकार करते हुए तदनुसार आदेश निर्गत करने की कृपा करें

डॉ नूतन ठाकुर                          
अमिताभ ठाकुर
मोबाइल: 094155-34525 और 94155-34526
पता: 5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
प्रतिलिपि- पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

हिन्दी दैनिक जन माध्यम के मुख्य सम्पादक और पूर्व आईपीएस मंजूर अहमद का फर्जीवाड़ा

: जन माध्यम के तीन संस्करण चलाते हैं मंजूर अहमद : दूसरे की जमीन को अपने गुर्गे के जरिए बेचा, खुद बने गवाह : ताला तोड़कर अपने पुत्र के मकान पर भी कराया कब्जा, पुलिस नहीं कर रही मुकदमा दर्ज : लखनऊ, पटना व मेरठ से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक समाचार पत्र जन माध्यम मुख्य सम्पादक, 1967 बैच के सेवानिवृत्त आई0पी0एस0 अधिकारी एवं लखनऊ के पूर्व मेयर एवं विधायक प्रत्याशी प्रो0 मंजूर अहमद पर अपने गुर्गे के जरिए दूसरे की जमीन को बेचने व खुद गवाह बनने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया है। प्रो0 मंजूर अहमद के इस फर्जीवाड़े का खुलासा खुद उनके पुत्र जमाल अहमद ने किया।

जमाल अहमद ने बताया कि अपनी नौकरी के दौरान मंजूर अहमद ने अरबों रूपयों की नामी-बेनामी सम्पत्ति बनाई है। लखनऊ के नजदीक जनपद बाराबंकी, कुर्सी रोड के ग्राम गुग्गौर में मंजूर अहमद ने अपने सगे भांजे मों0 निजामुद्दीन पुत्र एनुलहक निवासी खालिसपुर जिला सीवान बिहार, जो ड्रग्स बेचने का धंधा करते थे, कई साल तिहाड़ जेल में बंद रहे, के नाम ग्राम गुग्गौर में गाटा सं0 385 क्षेत्रफल 1.481 हेक्टेयर भूमि खरीदी। मों0 निजामुद्दीन का लोकल पता सी-189, इन्दिरानगर लखनऊ यानि मंजूर अहमद के अपने घर का पता लिखाया। इसी बेशकीमती करोड़ों-अरबों  की जमीन पर अब प्लाटिंग की जा रही है। इस जमीन को दिनांक 27.08.2013 को बही सं0 1, जिल्द सं0 3099, पृष्ठ सं0 347 से 400 क्रमांक 5881 पर रजिस्टर्ड किया गया है।

श्री मंजूर अहमद ने इस जमीन को धोखे से बेचा है एवं जालसाजी की है, जिस व्यक्ति को मंजूर अहमद ने मों0 निजामुद्दीन निवासी बिहार बताया है, वह कोई बहुरूपीया है एवं मंजूर अहमद का गुर्गा है, क्योंकि रजिस्ट्री में गवाह मंजूर अहमद स्वयं हैं। मों0 निजामुद्दीन ने स्वयं रजिस्ट्री नहीं की है, बल्कि उनके नाम से किसी फर्जी आदमी को खड़ा करके रजिस्ट्री की गई है। उप निबंधक कार्यालय में इस फर्जी निजामुद्दीन की डिजिटल फोटो व डिजिटल अंगूठे के निशान मौजूद हैं।  जमाल अहमद ने बताया कि उनके पिता ने तीन शादियां की एवं तीनों पत्नियां जीवित हैं, वह उनकी पहली पत्नी के पुत्र हैं। जमाल ने बताया कि उनके सगे नाना स्व0 खुर्शीद मुस्तफा जुबैरी बिहार कैडर के 1953 बैच के आई0ए0एस0 अधिकारी थे, उनकी मौत एक किराए के मकान में हुई थी, आज भी उनकी नानी, मां एवं उनकी अविवाहित बहन किराए के मकान (गौतम कालोनी, आशियाना नगर फेस-2, पटना) में ही रहते हैं।

जमाल ने बताया कि मंजूर अहमद अपनी हवस के चलते गैंग बनाकर आदतन अपराध करते हैं। दूसरे की सम्पत्ति पर कब्जा करना, व्यवधान डालना इनकी आदत है। जमाल ने बताया कि उनके मकान 1/140 विश्वास खण्ड, गोमती नगर, लखनऊ पर भी मंजूर अहमद की नीयत खराब है। मकान का ताला तोड़कर श्री मंजूर अहमद, श्री यूसुफ अयूब व अन्य लोगों ने कब्जा कर लिया, जिसके खिलाफ वह लगातार दिनांक 14.05.2014 से एफ़0आई0आर0 दर्ज कराने का प्रयास कर रहा है।

इसी क्रम में उन्होंने दिनांक 28.10.2014 को महामहिम राज्यपाल महोदय, से मिलकर न्याय की गुहार लगाई थी। महामहिम जी ने अपने ए0डी0सी0 श्री गौरव सिंह, आई0पी0एस0 के माध्यम से एस0एस0पी0 लखनऊ को फोन कराकर जमाल के साथ न्याय करने के लिए कहा था। एस0एस0पी0 लखनऊ ने दिनांक 31.10.2014 को थानाध्यक्ष गोमती नगर, जहीर खान को फोन पर निर्देश दिए कि प्रकरण में एफ़0आई0आर0 दर्ज की जाए। थानाध्यक्ष गोमतीनगर ने उनके प्रार्थना पत्र को देखते ही कहा कि मंजूर साहब तो अच्छे अधिकारी रहे हैं, एफ़0आई0आर0 दर्ज होने से साहब की बड़ी बदनामी हो जाएगी। थानाध्यक्ष ने कहा कि वह एस0एस0पी0 साहब से बात कर लेंगे। एफ़0आई0आर0 दर्ज नहीं होने पर ही जमाल ने दिनांक 03.11.2014 को मुख्य सचिव उ0प्र0 से मुलाकात की, जिस पर उन्होंने प्रमुख सचिव गृह को कार्यवाही के निर्देश दिए। प्रकरण पर प्रमुख सचिव गृह ने स्वयं दिनांक 03.11.2014 को ही एस0एस0पी0 लखनऊ से वार्ता कर उनको न्याय देने की बात कही।

जमाल ने बताया कि अभी तक एफ0आई0आर0 इसलिए दर्ज नहीं हो सकी क्योंकि  उनके पिता मंजूर अहमद, आई0पी0एस0, ए0डी0जी0 उ0प्र0 के पद से रिटायर अधिकारी हैं, मंजूर अहमद लखनऊ से मेयर एवं विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं, कई विश्व विद्यालयों के कुलपति रह चुके हैं एवं वर्तमान में शुभार्ती वि0वि0 मेरठ के कुलपति हैं। उनके पिता के खास गुर्गे यूसुफ थाना क्षेत्र गोमतीनगर लखनऊ में ही जीरो डिग्री बार, रेस्टोरेन्ट व डिस्कोथेक चलाते है। इनकी दबंग छवि व बार आदि के चलते स्थानीय पुलिस से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं।

मंजूर अहमद किस हद तक सम्पत्ति के भूखे हैं, इसका अंदाजा इसी से होता है कि इन्होंने अपनी एक कोठी शेरवानी नगर, मडि़यांव, लखनऊ से ठीक सटे एक प्लाट दस हजार वर्ग फीट पर लिखा दिया कि प्लाट बिकाऊ नहीं है, ताकि लोग विवादित समझकर प्लाट न खरीदें। इनके पास एक मकान बी-102, वसुन्धरा इन्क्लेव दिल्ली में है। सी-189, इन्दिरा नगर, लखनऊ में मकान है, इसके अलावा कई सम्पत्तियां हैं। मंजूर अहमद के खास गुर्गे यूसुफ के पास लखनऊ में ही करोड़ों रुपये की अपनी सम्पत्ति है। यूसुफ का लखनऊ में ही नाका क्षेत्र में जस्ट 9 इन नाम का होटल, गोमतीनगर, लखनऊ में जीरो डिग्री बार व रेस्टोरेन्ट है, अपना स्वयं का मकान 107 गुरू गोविन्द सिंह मार्ग, लालकुआं, लखनऊ के साथ ही और भी कई सम्पत्तियां हैं। साथ ही यूसुफ लगभग पांच कम्पनियों के मालिक भी हैं।   जमाल ने बताया कि वह पुनः दिनांक 08.11.2014 को एस0एस0पी0 से मिले तो एस0एस0पी0 ने पूरे मामले को समझने के बावजूद कहा कि प्रकरण सिविल नेचर का है, वह जांच करवा लेंगे, जबकि सबको पता है कि ताला तोड़कर जबरन कब्जा किया गया है।  जमाल के अधिवक्ता विनोद कुमार ने एस0एस0पी0 से मांग की है कि तत्काल एफ0आई0आर0 दर्ज करके जमाल के साथ न्यायोचित कार्यवाही की जाए।

दिनांक 15.11.2014

(जमाल अहमद)
पुत्र श्री मंजूर अहमद
निवासी- 1/140, विश्वास खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ
09654871990 (मो0)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

नूतन ठाकुर के धरने की सूचना मिलते ही लखनऊ पुलिस ने ताबड़तोड़ कार्यवाही शुरू की

हमारे घर हुई चोरी में भारी पुलिस निष्क्रियता के विरुद्ध मेरे द्वारा डीजीपी कार्यालय के धरने की सूचना मिलते ही पुलिस विभाग यकायक तेजी में आ गया. 15 अक्टूबर की रात हुई इस चोरी के बाद किसी पुलिस वाले ने मामले की सुध नहीं ली थी. घटना के दिन से ही मामले के विवेचक छुट्टी पर चले गए थे. पांच लाख से ऊपर की चोरी होने के बावजूद मामले में एसआर केस दर्ज नहीं किया गया था और एसएसपी लखनऊ सहित किसी भी वरिष्ठ पुलिस अफसर ने नियमानुसार घटनास्थल का निरीक्षण नहीं किया था.

पुलिस की इस घोर लापरवाही से क्षुब्ध हो कर मैंने कल रात यह घोषणा की थी कि मैं आज डीजीपी कार्यालय पर धरने पर बैठूंगी. यह सूचना मिलते ही पुलिस विभाग में तेजी आ गयी. सुबह पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर और उसके बाद सीओ गोमतीनगर सत्यव्रत और एसपी ट्रांसगोमती दिनेश यादव घर आये और शीघ्र अनावरण का आश्वासन दिया. फिर एसएसपी लखनऊ प्रवीण का मेरे पति अमिताभ ठाकुर को फोन आया कि उन्होंने एसपी क्राइम को यह मामला सौंप दिया है और तीन दिन में बरामदगी हो जायेगी, अतः मैं धरना स्थगित कर दूँ.

मैं पूर्व सूचना के अनुसार डीजीपी कार्यालय गयी जहां चोरी होने पर कोई कार्यवाही नहीं होने वाले कई और लोग भी आये थे. मैंने एसएसपी के कहने पर दस दिन का समय देते हुए धरना स्थगित किया है पर हमने एसपी लोक शिकायत से मिल कर उन्हें ज्ञापन दिया. हम इस तरह के चोरियों में एफआईआर नहीं लिखने अथवा अन्य निष्क्रियता दिखाने के तमाम मामलों को इकठ्ठा कर रहे हैं और इन सब मामलों को सामूहिक रूप से उठाएंगे.

ज्ञापन—

सेवा में,
श्री ए एल बनर्जी,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ
विषय- मेरे घर पर हुई चोरी में पुलिस के पूर्णतया उपेक्षात्मक रुख तथा इसके नाम पर मानवाधिकार विषयक  
महोदय,

कृपया निवेदन है कि दिनांक 15/16-10-2014 की रात्री को मेरे निवास 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ में नकबजनी/चोरी की घटना उस समय घटी थी जब हम गाजियाबाद गए थे. इस घटना के सम्बन्ध में मैंने दिनांक 16/10/2014 को थाना गोमतीनगर पर मु०अ०स० 884/2014 अंतर्गत धारा 457/380 आईपीसी पंजीकृत कराया है.

इस घटना में हमारा करीब छ-सात लाख रुपये का नुकसान हुआ है. यह हमारे लिए बड़ी धनराशि है.  दो लाख रुपये से ऊपर की चोरी होने के नाते यह प्रकरण पुलिस की परिभाषा में एसार केस की श्रेणी में आता हैं, अतः मेरे पति श्री अमिताभ ठाकुर ने अपने पत्र संख्या- AT/Security/01 दिनांक-17/10/2014 द्वारा एसएसपी को और मैंने थानाध्यक्ष गोमतीनगर को इसे एसआर केस में तरमीम करते हुए समस्त आवश्यक प्रक्रिया अपनाने हेतु निवेदन किया था. हमने इस प्रकरण में हमारे सामाजिक कार्यों से परेशान या नाराज किन्ही ताकतवर व्यक्तियों द्वारा किसी प्रकार की साजिश की सम्भावना के बारे में भी सम्बंधित अधिकारियों को अवगत कराया था.

उस दिन से अब तक किसी पुलिस वाले ने मौके का निरीक्षण नहीं किया था और ना ही हमसे इस बारे में कोई पूछताछ की थी. कल जब मैं इस घटना की प्रगति जानने थाना गोमतीनगर गयी थी तो पहले तो किसी पुलिसवाले ने कुछ भी बताने से इनकार कर दिया और जब मैंने बहुत जोर दिया तो मुझे यह बताया गया कि इस मामले में विवेचक श्री श्रीराम घटना से पहले ही छुट्टी पर रवाना हो गए थे. इस प्रकार इस मामले की विवेचना एक ऐसे दरोगा को दी गयी थी जो अवकाश पर थे. हम सभी जानते हैं कि चोरी के मामले में घटना के ठीक बाद का समय बहुत ही महत्वपूर्ण होता है पर इस मामले में घटना के बाद कोई कार्यवाही ही नहीं हुई क्योंकि विवेचक छुट्टी पर थे.

दूसरी बात यह कि जैसा मैंने ऊपर बताया है, मेरे घर की चोरी लगभग पांच-छः लाख रुपये की है और दो लाख से ऊपर की चोरी एसआर केस होती है पर इस मामले में अब तक एसआर केस नहीं लगाया गया है. साथ ही सीओ से ऊपर किसी भी पुलिस अफसर द्वारा मौका मुआयना तक नहीं किया गया है जब कि मेरी जानकारी के अनुसार एसआर केस में थानाध्यक्ष से ले कर जनपद के एसएसपी तक को मौका मुआयना करना होता है और इन मामलों का पर्यवेक्षण डीआईजी और आईजी द्वारा की जाती है. हमारे घर की चोरी एसआर केस होने के बाद भी इसे एसआर केस नहीं बनाया जाना भी पुलिस की लापरवाही को स्पष्ट बताता है.

इस प्रकरण का एक तीसरा दुखद पहलू यह है कि आज जब सुबह मेरे पति सब्जी लेने गए तो वहां दूकान पर सब्जीवाले और अन्य लोगों ने बताया कि परसों (18/10/2014) की रात करीब नौ बजे गोमतीनगर थाने के पुलिसवालों ने विराम खंड पांच के जीवन प्लाजा से ले कर हुसडिया चौराहे तक सड़क के किनारे खोमचा, ठेलिया आदि लगाने वाले कई गरीब दुकानदारों को हमारे घर में हुई चोरी के नाम पर यह कहते हुए बुरी तरह पीटा कि वे लोग ही चोरी करते हैं. इनमे से कई लोगों को शारीर पर काफी चोटें भी आयीं. इनमे ज्ञान (मोबाइल नंबर 080819-66943), शोभित पान वाला, हुसडिया मंडी आदि सब्जीवाले की दुकान पर मिले. यह निश्चित रूप से अनुचित और अमानवीय आचरण है और इन गरीब लोगों का स्पष्टतया मानवाधिकार हनन भी. उन लोगों ने मेरे पति से कहा कि आप इतने दयालु आदमी हैं और आपके नाम पर हमारे ऊपर यह अत्याचार हो रहा है. मैं निवेदन करना चाहूंगी कि भले हमारे घर की चोरी नहीं खुले पर इसने नाम पर इस प्रकार के अत्याचार नहीं किये जाएँ.

इस मामले में सबसे दुखद पहलू यह है कि जब मैंने आज विरोध प्रदर्शन की घोषणा की तो सुबह से ही पुलिस के अफसर हमारे घर आना शुरू कर दिए. पहले इंस्पेक्टर गोमतीनगर हमारे घर आये जिन्होंने बताया कि हमारे मामले में विवेचक बदल दिए गए हैं और एसएसआई गोमतीनगर नए विवेचक हैं. यह भी बताया कि इस मामले में एसआर रिपोर्ट भेजी जा चुकी है. इसके बाद एसपी ट्रांसगोमती श्री दिनेश यादव और सीओ गोमतीनगर हमारे आये. उन्होंने भी हमें तमाम बाते कहीं. अंत में एसएसपी लखनऊ श्री प्रवीण कुमार का मेरे पति के पास फोन आया जिन्होंने कहा कि वे इस मामले को क्राइम ब्रांच को दे रहे हैं और एसपी क्राइम स्वयं इसका पर्यवेक्षण करेंगे. उन्होंने मेरे पति से मुझे धरना नहीं करने का निवेदन किया और आश्वासन दिया कि तीन दिनों में यह केस खुल जाएगा.

जाहिर सी बात है कि धरने की बात जानने के बाद इस तरह की सक्रियता पुलिस की कार्यप्रणाली के बारे में सब कुछ कह देती है. यदि पहले ही यह सब किया गया होता तो यह स्थिति ही नहीं आई होती. फिर भी मैं एसएसपी लखनऊ के आश्वासन पर तीन दिन की जगह दस दिनों के लिए अपना यह विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम स्थगित कर रही हूँ.

उपरोक्त समस्त तथ्यों के दृष्टिगत मेरा आपसे निम्न अनुरोध हैं-

1. कृपया इस घटना के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश पुलिस को सभी चोरी की घटनाओं में बराबर सक्रियता और संवेदनशीलता बरतने हेतु आदेश देने की कृपा करें ताकि किसी धरना प्रदर्शन आदि अथवा किसी के कथित रूप से बड़े आदमी होने पर ही नहीं बल्कि प्रत्येक आम आदमी के मामले में भी तत्काल गंभीरता पूर्वक कार्यवाही हो

2. कृपया पुलिस को चोरी या अन्य आपराधिक घटनाएँ रोकने के लिए इस प्रकार के अवैधानिक तरीके अपनाने से रोकने के आदेश देने की कृपा करें 

भवदीय,
डॉ नूतन ठाकुर )
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34525
पत्र संख्या- AT/Security/01                                            
दिनांक-20/10/2014

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: