मजीठिया की राह के दुश्मनों को हर मोर्चे पर शिकस्त दो, अखबार मालिकों की करतूतें उजागर करो

साथियों, हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं है। हम सभी इस शक्तिशाली तंत्र से लड़ रहे हैं। हमारे मन में अन्याय के प्रति आक्रोश तो हो लेकिन ऐसे कोई विचार लिखित रूप में व्यक्त न करें जो उनके लिए हमारे खिलाफ सबूत बने। हम सब फ़िलहाल कानूनी जंग लड़ रहे हैं सशस्त्र लड़ाई नहीं। आप सभी से अनुरोध है कि मजीठिया की राह के दुश्मनों को हर उस मोर्चे पर शिकस्त दें जो उनकी ताकत है।

आप सब अख़बार मालिकों के शुभचिंतकों को यह सन्देश पहुंचाएं कि जो अपने परिवाररूपी कर्मचारियों को कुचल रहे हैं, क्या उन्हें खुद को बुद्धिजीवी कहलाने का हक़ है? राजस्थान पत्रिका के मालिक गुलाब कोठारी का बयान है कि उन्होंने मई माह में अपने कर्मचरियों को 16 करोड़ रुपये बांटे। क्या कर्मचारियों में 16 करोड़ रुपये बांटने वाले अपने हर कर्मचारी को इस राशि का औसत 32 हज़ार रुपया मिलना अपने बैंक अकाउंट में दिखा सकते हैं? सवाल यह भी है कि अख़बार के नाम पर कौड़ियों में ली गई जमीन पर व्यावसायिक कॉम्लेक्स क्यों बनाये गए?

पत्रकारों को मिलने वाली सुविधा पर  अख़बार मालिकों के पेट में दर्द हो जाता है जबकि ये खुद सस्ता अखबारी कागज़, मशीनरी के आयत पर कस्टम आदि शुल्क में रियायत, सरकारी विज्ञापनों के लिए तयशुदा दर से अधिक राशि की मांग आदि सरकारी रियायतों का इस्तेमाल क्यों करते हैं। साथियों, इनके काले कारनामे खोद-खोद कर लाओ, उनके पेम्फलेट, पोस्टर आदि छपवाकर इन्हें नंगा करो। इस लड़ाई में किसी एक अख़बार नहीं बल्कि हर उस अख़बार को लपेटो जो मजीठिया का दुश्मन बना हुआ है। पाठकों सहित आम लोगों को बताएं कि मजीठिया आयोग की सिफारिशें क्या है? सुप्रीम कोर्ट में लड़ी जा रही हमारी जंग का मकसद क्या है? मात्र 500 रुपए की उधार पूंजी से शुरू हुआ राजस्थान पत्रिका कैसे करोड़ों का मालिक बना? समूचे तंत्र को भ्रष्ट करने में इन अख़बार मालिकों का क्या योगदान है?

मेरा सभी साथियों से अनुरोध है कि वे मानसिक जुगाली बंद कर इस लड़ाई को निर्णायक मुकाम पर ले जाएँ, सिर्फ अख़बार मालिकों को उनके अन्याय में लिए कोसना काफी नहीं है। लड़ाई लंबी है और दुश्मन क्रूर। ऐसे में ठंडी सोच रखकर उनके हर हथियार को भोंटा करने की सोचो। याद रखें सारे अख़बार सुप्रीम कोर्ट को खिलौना बनाने के लिए एक हो गए हैं। उनसे निपटने के लिए सोच उनसे एक कदम आगे हो। कड़वे शब्द कहने के लिए क्षमा मांगता हूँ। साहस के साथ आपके बुद्धि कौशल के परीक्षण का समय आ गया है। चाणक्य की चन्द्रगुप्त को दी गई सीख याद करें कि गर्मागर्म खिचड़ी को किनारे-किनारे से फूंक मारते हुए ही खाया जा सकता है। बीच में से खाई गई खिचड़ी सिर्फ मुंह जलायेगी। इस सीख पर चलते हुए ही चन्द्रगुप्त चाणक्य की सरपरस्ती में अपना राज्य स्थापित कर पाया।

लेखक राजेंद्र गुप्ता से संपर्क : rajendraastrologer@gmail.com

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *