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सुख-दुख

यूपी राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति की गरिमा का चीरहरण हो रहा है

मुँह में राम बगल में छुरी… इस कहावत पर उत्तरप्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव बेहद खरा उतरता है। पहली बार ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ और यूपी के सूचना विभाग के सौजन्य से राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने का गौरव प्राप्त हुआ। अब इस जमात का नेतृत्व करने वाली मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव का बिगुल बज़ उठा है। चुनाव की इस म्यान में दो तलवारें हैं। कोई कहता है चुनाव खर्च 100 रुपइया जमा कराओ। आज समिति के चुने हुए नुमाइंदे बैठक कर दस रुपइया जमा करने का फरमान सुनाते हैं। हमारे जैसे पहली बार जमात के सदस्य बने बेचारे सिर्फ चुनावी जंग देख रहे हैं। समझ नहीं आ रहा इधर जाऊं या उधर जाऊं।

मुँह में राम बगल में छुरी… इस कहावत पर उत्तरप्रदेश मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का चुनाव बेहद खरा उतरता है। पहली बार ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ और यूपी के सूचना विभाग के सौजन्य से राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकार बनने का गौरव प्राप्त हुआ। अब इस जमात का नेतृत्व करने वाली मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के चुनाव का बिगुल बज़ उठा है। चुनाव की इस म्यान में दो तलवारें हैं। कोई कहता है चुनाव खर्च 100 रुपइया जमा कराओ। आज समिति के चुने हुए नुमाइंदे बैठक कर दस रुपइया जमा करने का फरमान सुनाते हैं। हमारे जैसे पहली बार जमात के सदस्य बने बेचारे सिर्फ चुनावी जंग देख रहे हैं। समझ नहीं आ रहा इधर जाऊं या उधर जाऊं।

एक बात और नहीं समझ आ रही कि आखिर शीर्ष पत्रकार बिरादरी का नेतृत्व करने पर ऐसा कौन सा हड़प्पा की खुदाई में निकला खज़ाना मिला जा रहा है जो इतना सरफुटौअल हो रहा है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि शीर्ष पत्रकार बिरादरी का जो रहा सहा सम्मान है वो भी इस चुनावी जंग में शहीद होने को बिलकुल तत्पर है। अरे भई चुनाव कितनी बार होंगे और कौन सा चुनाव अधिकारी मान्य है कोई बताएगा। खैर असल गलती सूचना विभाग की है। गंभीर अपराधों में फसे लोगों, अंडे का ठेला लगाने वालों को, कंप्यूटर ऑपरेटरों, मार्केटिंग मैनेजरों, मंत्रियों के पीआरओ, सूचना विभाग के कर्मचारियों की पत्नियों और रिश्तेदारों को, अफसरों के रिश्तेदारों सरीखे लोगों को कलम का सिपाही अर्थात पत्रकार होने का राज्य मुख्यालय पर दर्ज़ा दिया जायेगा तो ऐसी गद्दम पटखनी तो होना तय है।

खुद संवाददाता समिति के पदाधिकारी भी ऐसे कथित पत्रकारों का विरोध नहीं करते। जब इस सरकार में मैंने विधानसभा सत्र की कवरेज के लिए जाना शुरू किया तब देखा कि 80 फीसदी पत्रकारों के हाथों में न कागज़ और न डायरी होती है और न ही कलम। शायद उनका दिमाग ही कंप्यूटर है तभी सब कुछ उसमे रिकॉर्ड हो जाता है। विधानसभा गैलरी में मुख्यमंत्री से लेकर मत्रियों तक को चेहरा दिखाने की होड़ सी मच जाती है। अब होड़ चुनाव के सहारे पत्रकार बिरादरी में ताकत दिखाने की हो रही है। देखिये ये पब्लिक है सब जानती है। आप सब शीर्ष पत्रकारों के सम्मानित संघ का नेतृत्व करते हैं। मेरे जैसे छोटे सदस्य की राय आपको भले ‘छोटा मुँह बड़ी बात’ लगे पर ये तमाशा बंद कीजिये और समिति के सम्मान का चीरहरण होने से रोकिये। वर्तमान माहौल में, जहाँ कभी पत्रकार जलाकर मारे जा रहे हैं तो कहीं अखबार के दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं, ये हमे शोभा नहीं देता।

खैर मैं तो सिर्फ इतना ही कर सकता हूँ कि चुनाव के नाम पर हो रही जंग का हिस्सा न बनूं और मेरे जैसे पहली बार राज्य मुख्यालय पर पत्रकार का दर्जा प्राप्त मित्रों से भी अनुरोध करूँगा- “सुनो सबकी, करो अपने मन की”।

मनीष श्रीवास्तव

ब्यूरो चीफ

निष्पक्ष प्रतिदिन, लखनऊ

[email protected]


कुल 60 पर्चे हुए दाखिल

लखनऊः पत्रकारों ने मान्यता प्राप्त संवाददाता समित के पदों के लिए भरे पर्चे. राज्य मान्यता प्राप्त संवाददाता समित के लिए दाखिल हुए पर्चे कुल 60. अध्यक्ष पद के लिए आठ लोगों ने भरा पर्चा. प्रांशु, सरोज चंद्र, मनमोहन, नरेंद्र श्रीवास्तव और प्रभात त्रिपाठी और अन्य ने अध्यक्ष पद के लिए दाखिल किए पर्चे. उपाध्यक्ष पद के लिए 12 लोगों ने भरे पर्चे. सचिव पद के लिए चार लोगों ने दाखिए किए पर्चे. वरिष्ठ पत्रकार नीरज श्रीवास्तव ने सचिव पद के लिए भरा पर्चा. संयुक्त सचिव के लिए सात उम्मीदवार मैदान में. कोषाध्यक्ष के लिए पांच उम्मीदवारों ने भरे पर्चे. सदस्य बनने के लिए 24 लोगों ने किया नामांकन.

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