मीडिया कंपनियों के छंटनी करने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब तलब किया

jp Singh

उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उन सभी मीडिया संगठनों के खिलाफ दायर याचिका पर नोटिस जारी किया, जिन्होंने कर्मचारियों को देशव्यापी लॉकडाउन के मद्देनजर या तो उनकी छंटनी कर कर दी है या उन पर कम वेतन लेने का दबाव बनाया है। जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बी आर गवई ने कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन के बीच कर्मचारियों की नौकरी से छंटनी और उनकी नौकरी समाप्ति के उक्त मुद्दे पर चिंता व्यक्त की और कहा कि इस मुद्दे पर विचार की आवश्यकता है। पीठ ने निर्देश दिया कि याचिका की एक प्रति केंद्र को दी जाए और दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किया जाए, जिसके बाद इसे पीठ द्वारा फिर से सुना जाएगा।

यह याचिका नेशनल एलायंस ऑफ जर्नलिस्ट्स, दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स और बृहन मुंबई यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने मिलकर संयुक्त रूप से दायर की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी की जा रही एडवाइजरी और प्रधानमंत्री द्वारा दो बार अपील करने के बावजूद भी मीडिया क्षेत्र में नियोक्ता अपनी मनमानी कार्यवाही कर रहे हैं और लॉकडाउन के बहाने औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 का उल्लंघन कर रहे हैं।

याचिका में ऐसे 9 उदाहरणों का हवाला भी दिया गया है, जिनमें 15 मार्च, 2020 के बाद से ऐसी ही कार्रवाई की गई है। याचिका में मांग की गई है कि इस संबंध में केंद्र, इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन को निर्देश दिए जाएं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लॉकडाउन का दुरुपयोग करके ऐसी कोई मनमानी कार्रवाई न की जा सके।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने कई मीडिया संगठनों के पत्रकारों की लगातार समाप्त हो रही नौकरियों पर पीठ का ध्यान आकर्षित किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नोटिस जारी किया जाए और एक प्रति केंद्र को भी दी जाए। पीठ ने कहा कि कुछ गंभीर मुद्दों को उठाया गया है। इसके लिए सुनवाई की आवश्यकता है।

अन्य यूनियनों ने भी कहा है कि अगर कारोबार शुरू नहीं होता है, तो लोग कब तक बिना नौकरी रह सकेंगे। इस मुद्दे पर सुनवाई की जरूरत है।

याचिका (पीआईएल) में अखबारों के नियोक्ताओं और मीडिया सेक्टर पर आरोप लगाया गया है कि वह अपने कर्मचारियों के प्रति अमानवीय और गैरकानूनी व्यवहार कर रहे हैं। इस याचिका में मांग की गई है कि लाॅकडाउन की घोषणा के बाद, नौकरी से हटाने के लिए जारी नोटिस, वेतन कटौती, इस्तीफे के लिए नियोक्ताओं को किए गए मौखिक या लिखित अनुरोध और बिना वेतन पर छुट्टी पर जाने के जारी किए सभी निर्देश को तुंरत प्रभाव से निलंबित या रद्द कर दिया जाए।

याचिका में कहा गया है कि भारत सरकार ने विशेष रूप से प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों को कामकाज जारी रखने की अनुमति दी है। वहीं भारत सरकार ने भी एडवाइजरी जारी की है कि किसी की भी सेवाएं समाप्त न की जाए या कर्मचारियों के वेतन में कटौती न की जाए. इन तथ्यों के बावजूद भी कई नियोक्ताओं/समाचार पत्र संस्थानो/ मीडिया सेक्टर के मालिकों ने लॉकडाउन के बहाने एकतरफा फैसला लेते हुए कई कर्मचारियों की सेवाओं को समाप्त कर दिया है, वेतन में कटौती की गई और कर्मचारियों को जबरन अनिश्चित काल के लिए बिना वेतन के अवकाश पर भेज दिया गया है।

सरकारी एडवाइजरी और कानूनी प्रावधानों से साफ है कि बिना किसी उचित प्रक्रिया के छंटनी करना, निलंबित करना या नौकरी समाप्त करना और प्रकाशनों को बंद करने की अनुमति नहीं है, इसके बावजूद मीडिया कंपनियां इन उपायों के साथ आगे बढ़ी हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि मौजूदा लाकडाउन की स्थिति में लोगों को घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है और वह इन कर्मचारियों को नई नौकरी खोजने के लिए अकेला या बेसहारा छोड़ रही हैं।

वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।



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