अपनी भूमिका और दिशा से भटका भारतीय मीडिया

संसद के बजट सत्र में बीमा, खनन और कोल से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयक पारित हुए. देश के विकास से जुड़े तीनों महत्वपूर्ण कानूनों के बारे में इस देश की जनता की समझ क्या है? यह विचारणीय पहलू है कि जिस कोयला घोटाले को लेकर राष्ट्रीय मीडिया ने पूरे 24 महीने तक लगातार कवरेज कर तबकी यूपीए सरकार को जमीन पर लाने का काम किया, उसी मीडिया ने नयी सरकार की नयी कोयला नीति पर 24 सेकेण्ड की भी खबर प्राइम टाईम में दिखाना उचित नहीं समझा. हाँ मनमोहन सिंह को इस घोटाले में जारी समन पर जरूर विशेष बुलेटिन 24 घंटे खबरिया चैनलों ने प्रसारित किए।

अक्सर सवाल उठाया जाता रहा है कि क्या देश का मीडिया तंत्र अपनी भूमिका और दिशा दोनों से भटक चुका है. राष्ट्रीय हितों के मामलों पर भी उसकी प्राथमिकता तय नहीं है। जिस दिन संसद ने बीमा, खदान, और कोयले पर नये विधेयक कानून में परिवर्तित किए उस दिन प्राइम टाईम पर इसे सिर्फ सूचनात्मक खबर के तौर पर महज 10 सेकेण्ड के स्लॉट के रूप में दिखाया गया। वहीं जिस क्रिकेट वर्ल्डकप में भारत खेल भी नहीं रहा था उसके फायनल मुकाबले को सभी चैनलों के प्राइम टाईम पर 30 मिनिट का कवरेज मिला। सवाल बुनियादी रूप से यही है कि स्वयं को राष्ट्रीय मीडिया बताने वाले 24 घंटे के खबरिया चैनल और दिल्ली के छपने वाले अंग्रेजी अखबार क्या वाकई अपने चरित्र से राष्ट्रीय है? या नहीं ? 20 अप्रैल से संसद सत्र फिर आरंभ हो रहा है लेकिन पिछले सत्र में हमारी संसद ने क्या किया इसे देश की 95 फीसदी जनता नहीं जानती है। राहुल गांधी कहां हैं? कब आयेंगे? इसे पूरे 55 दिन तक चलाया गया, आप में क्या हो रहा है ये भी बेनागा हमें दिखाया और पढ़ाया जा रहा है। विराट कोहली और अनुष्का शर्मा का प्रेम राष्ट्रीय महत्व का प्रेम संबंध मीडिया ने घोषित कर रखा है। चैनलों पर इस प्रेमी जोड़े का प्रलाप हीर-रांझा, लैला-मजनू, सोहनी-मेहवाल को हमारी स्मृतियों से मिटाकर ही खत्म होगा ऐसा लगता है। सुरेश रैना की शादी किसी राज्य के राजकुमार की शादी से कम नहीं है ये भी हमें राष्ट्रीय चरित्र के मीडिया ने बताया। सिनेमा, राशिफल, भूतप्रेत, प्रवचन, व्यायाम, और सनसनी से भरे अपराधों पर एक एक घंटे का कवरेज देने वाले राष्ट्रीय चैनल्स इस देश की संसद में बनने वाले कानून, इन पर होने वाली बहस, और कानून निर्माण में हमारे प्रतिनिधियों की भूमिका पर मौन क्यों रहते हैं? इसे आसानी से समझा जा सकता है। 

असल में चैनल्स और अखबार दोनों के मालिक, संपादक, मैनेजर, पाठक, सब शहरी हैं और शहरी हिन्दुस्तान गांव के हिन्दुस्तान से अलग देश आज भी है। पूंजी पर सवार नेशनल मीडिया यदि क्रिकेट, सिनेमा, और बेमतलब की राजनीतिक खबरों को प्रसारित करने के स्थान पर सूखा, ओलावृष्टि, या बेमौसम बरसात से बेहाल किसान की खबर प्राइम टाईम पर दिखायेगा तो बाजार का क्या होगा? बाजार पैसे से चलता है, मीडिया बाजार के हवाले है और जब बाजार में यह धारणा स्थापित हो जायेगी कि लोगों के पास पैसा नहीं हैं तो बाजार कैसे चमकेगा? बाजारवादी शक्तियों के हवाले हमारा मीडिया देश के सरोकारों से पूरी तरह कट चुका है और सिर्फ सुविधा की पत्रकारिता पर केन्द्रित है. वरन् क्या कारण हैं कि एक क्षेत्रीय पार्टी ‘आप’ की हर छोटी-मोटी घटना, बयानबाजी को नेशनल परिदृश्य में ब्रेकिंग न्यूज बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। क्योंकि ये सब खबरें बिना दिल्ली से बाहर जायें आसानी से उपलब्ध हो जाती है। दिल्ली के एक पूर्व विधायक राजेश गर्ग रातोंरात एक संटिंग लाकर सभी चैनल्स पर हीरो की तरह स्थापित हो गए। 

इस दौरान देश का किसान ओलों की मार झेल रहा था. लेकिन किसी को भी किसान राजेश गर्ग से ज्यादा महत्वपूर्ण नजर नहीं आए। मीडिया ने कभी विचार नहीं किया कि ये महाशय किस सामाजिक, राजनीतिक भूमिका से आए है? सुविधा का तराना देखिए कि कल तक पत्रकार रहे आशुतोष कैसे देश के मुख्य राजनीतिक बना दिए गए हैं? आशुतोष, आशीष खेतान, कुमार विश्वास, संजय सिंह, जैसे लोगों का क्या राजनीतिक सामाजिक योगदान है? फिर भी ये लोग देश के राष्ट्रीय चैनल्स पर छाये हुये हैं। मानों भारत की संसदीय राजनीति के ये ही सर्वाधिक स्वीकार पुरोधा हों। जिस कोयला घोटाले की कालिख ने कांग्रेस को एतिहासिक पतन की दहलीज पर पहुंचाया उसके बरबस सरकार की नयी नीति जब संसद में पारित हुयी तब इस मामले पर हमें कहीं कोई बहस संवाद सुनायी नहीं दिया। 

संसदीय राजनीति ने जिस तरह नागरिकों की नजर में मोहभंगिता को जन्म दिया है उसके लिहाज से संसद द्वारा पारित बीमा, खदान, कोयला के नये कानून बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि संसदीय साख इन कानूनों से बहाल होती है। सरकारों के दौर में खदानों और कोयले की लूट संगठित ढंग से देश में हो रही थी वह नये कानूनों से रुक गयी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जिन 120 कोयला खदानों का आवंटन निरस्त हुआ था उनकी नये सिरे से नीलामी में सरकार को एक लाख करोड़ से अधिक का राजस्व मात्र 20 खदानों से आ चुका है. सीएजी जैसी संवैधानिक संस्था जिसे कपिल सिब्बल खारिज करने पर उतारू थे आज इस नये कानून से हुयी नीलामी के चलते और भी प्रतिष्ठित हुयी लेकिन किसी नेशनल चैनल्स पर यह बात उभरकर नहीं आयी। इसी तरह खदानों के आवंटन की नयी नीति को सरकार ने संसद के जरिए लागू किया है जिससे बंदरवांट पर लगाम लग जायेगी। बीमा क्षेत्र में भी सरकार ने आम आदमी की राज आसान करने का काम किया। ये तीनों विधेयक देश के संसाधनों की लूट को रोकने वाले मील के पत्थर हैं। लेकिन जिस सतही अंदाज में हमारे मीडिया ने इन्हें लिया वह इनके राष्ट्रीय चरित्र को खोखला साबित करने के लिए पर्याप्त हैं। 

यह तथ्य है कि कोयला, और खदान कानून निर्माण कर संसद ने अपनी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को स्वयंसिद्ध किया है। वैचारिक मतभेद के बावजूद आप इसका श्रेय मोदी सरकार को देने से नहीं रोक सकते हैं। सिर्फ मोदी सरकार ही नहीं तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, जेडीयू, सपा, और कांग्रेस ने भी इन विधेयकों का बुनियादी रूप से समर्थन किया इसलिए इसका श्रेय समूची संसद को दिया ही जाना चाहिए। प्रेस यदि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है तो उसे अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करना ही होगा क्योंकि संसदीय साख से ही प्रेस की आजादी टिकी है. देश के संसाधनों की लूट रोकने में संसद की नाकामी यदि खबर बनती है तो इस लूट का बंद करती संसद की कार्यवाही भी प्राइम टाईम का हिस्सा क्यों नहीं हो सकती? क्या देश का शहरी कस्बाई वोटर मीडिया द्वारा प्रस्तुत मामलों से अपनी राय नहीं बनाता? यदि ऐसा न होता तो मौजूदा सरकार को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता। 

जाहिर है नागरिक अपना मानस मीडिया के माध्यम से बनाते हैं अब यहां सवाल उठाया जा सकता है कि सरकार की उपलब्धियां बताने का काम मीडिया का नहीं है। यह सही है लेकिन बड़ा बुनियादी सवाल इसका जबाव है कि क्या देश के राष्ट्रीय हित, जनसरोकार के प्रति हमारी ड्यूटी कुछ बनती है क्या ? क्या संसद और संसदीय राजव्यवस्था से मीडिया की आजादी आकट्य रूप से संबद्ध नहीं है? यदि लोगों की नजर में इसी तरह संसद की विश्वसनीयता क्षीण होती रही तो क्या मीडिया भी इससे बच सकेगा? राष्ट्रीयता का सवाल उठाकर जब हमारा मीडिया भारत पाक क्रिकेट मैच को एक युद्ध में तब्दील कर सकता है तब देश की संसद में राष्ट्र से जुड़े अच्छे निर्णयों पर नागरिकों को वाकिफ कराने में हर्ज क्या है? यह सही है कि सरकार और संसद का अपना मीडिया तंत्र है, प्रसार भारती, लोकसभा, राज्यसभा टी.व्ही. पर करोड़ों की धनराशि खर्च हो रही है इसके बावजूद हमारे स्वतंत्र मीडिया की अपनी विशिष्ट भूमिका स्वयंसिद्ध है।

पिछले कुछ समय से मीडिया के खबरिया चैनल्स अत्यधिक संकीर्ण और सुविधाजनक पत्रकारिता पर केन्द्रित हो गए हैं। दिल्ली, एनसीआर, मुंबई के अलावा कुछ और इन्हें नजर नहीं आता। यह सही है कि दिल्ली, और मुंबई का अपना महत्व है लेकिन दिल्ली में संसद और सचिवालय से निकलने वाले निर्णय 125 करोड़ भारतीयों के हित, उनके विकास और संसदीय राजव्यवस्था के प्रति उनकी धारणा को सीधे प्रभावित करते हैं इसलिए ऐसा नहीं लगना चाहिए कि दिल्ली के बोझ ने हमारी मीडिया में देश को दबा रखा है। इसकी ताजा नजीर 15 अप्रैल को दिल्ली के शिक्षामंत्री मनीष सिसौदिया के एक स्कूल में निरीक्षण में खबर से समझी जा सकती है. निरीक्षक में यह खबर सभी चैनल्स पर ब्रेक में गयी फिर दिनभर और रात 11 बजे तक सचित्र ये खबर प्रसारित होती रही। क्या दिल्ली से यह खबर देश के लिए इतनी महत्वपूर्ण थी ? हमने कभी आसाम, गुजरात, उड़ीसा, बंगाल, केरल, मध्यप्रदेश, जैसे राज्यों के सामाजिक मुद्धों पर नेशनल मीडिया के नवाचार या समस्याओं को स्थान पाते नहीं देखा। एक अधूरे राज्य के सीएम अरविंद केजरीवाल की तुलना में तीन-तीन बार जनता से चुनकर आये नवीन पटनायक, शिवराज सिंह, रमन सिंह तरूण गोगोई, माणिक सरकार को दो प्रतिशत भी स्थान पाते नहीं देखा। क्योंकि ये सभी सीएम दिल्ली से काफी दूर अपने राज्यों में सरकारें चला रहे हैं। इसलिए देश को लगता है कि दिल्ली के बोझ में देश दबा जा रहा है? आत्म अनुशासन के नाम पर हमारी मीडिया को चाहिए कि वह प्राइम टाईम और इसके आगे पीछे राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय, क्षेत्रीय खबरों का स्लॉट तय करें और हमारा नेशनल ब्रॉडकास्टर प्रसार भारती भी अपनी पहँुच बढ़ाने का प्रयास करें।

लेखक डॉ.अजय खेमरिया फोन संपर्क : 9407135000, ई-मेल : ajaikhemariya@gmail.com

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