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मीडिया समूह अब अपने पत्रकारों को सरकार की अच्छाई वाली रिपोर्टें बनाने की कीमत दे रहे हैं!

सुरेश महापात्रा-

कभी—कभी कुछ ऐसी बातें, बातों—बातों में निकल जाती हैं जो लंबा वक्त बीतने के बाद जब वह एक बार फिर विचार बनकर कौंधने लगता है। ऐसा विचार जो वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उन बातों का अर्थ निकालने लगता है। आज सुबह ही पत्रकार रवीश कुमार की एक पोस्ट पर नजर पड़ी। उन्होंने बताया कि यूट्यूब ने एक पत्रकार के चैनल को बंद कर दिया। उस पत्रकार ने अब दूसरा चैनल शुरू किया है। साथ ही इस पोस्ट पर रवीश यह भी बता रहे हैं कि यह सही बात है कि यूट्यूब पर चलने वाले चैनलों का असली मालिक तो यूट्यूब ही है। किसे रखना है और किसे नहीं… यह उसका फैसला हो सकता है।

पर हालिया समय में यह साफ दिखाई देने लगा है कि किसे किस कंटेंट के साथ चलने देना है और किसे किस कंटेंट के लिए रोक लगा देना है इसे लेकर लगातार दबाव यूट्यूब पर भी बढ़ रहा है। हम सोशल मीडिया के तौर पर फेसबुक पर पोस्ट लिखते हैं। ट्वीटर यानी एक्स पर भी लिखते हैं। इंस्टा में रील बनाते हैं। फेसबुक पर रील बनाते हैं। स्टोरी डालते हैं। वाट्सएप पर स्टेटस रखते हैं। यानी लोगों के बीच में अपने विचारों और अपनी अभिव्यक्ति के लिए बहुत सारे रास्ते हैं।

इन रास्तों में तब तक कोई बाधा नहीं है जब तक मामला केवल इंटरटेनमेंट से जुड़ा है। भले ही वह भारी दर्जे का अश्लील ही क्यों ना हो। या ऐसा कंटेंट जिसे हर कोई अकेले में ही देखना पसंद करे और कोशिश करे कि वह क्या देख रहा है उसे कोई देख ना सके। समझ रहे हैं ना कि मैं किस तरह के कंटेट की बात कर रहा हूं।

हम सभी को अब चिंता हो रही है कि समाज में बलात्कार जैसी घटनाओं की बाढ़ कैसे आ गई है। पहले पुरूष प्रधान समाज में पति प्रताड़ित महिलाएं अब पतियों को मारकर, काटकर ड्रम में सीमेंट कांक्रीट डालकर मनाली घूमने निकल जा रही हैं।

पतियों की हत्याओं का एक बड़ा सिलसिला बीते महीने भर से इसी सोशल मीडिया में देखने और सुनने को मिला। इलाहबाद हाईकोर्ट ने बलात्कार के एक मामले में आरोपी को यह कहते हुए जमानत दे दी कि पीड़िता ने स्वयं को ऐसी परिस्थिति में डाला था।

छत्तीसगढ़ के दुर्ग में कन्याभोज पर निकली अबोध बालिका के साथ जिस तरह का अमानवीय कृत्य हुआ।

एक महिला अपनी बेटी की शादी की तैयारियों का सामान लेकर होने वाले दामाद के साथ घर बसाने के लिए चली गई। इस तरह की घटनाओं को लेकर तमाम विडियो कंटेंट सोशल मीडिया में हर किसी के सामने आते ही रहते होंगे।

एक दिन पहले फेसबुक पर छत्तीसगढ़ के गंभीर पत्रकार आलोक पुतुल ने एक पोस्ट लिखी कि अनजाने लोगों की पोस्ट की बाढ़ आ गई है। लगता है अब यहां आना अच्छा नहीं है। यानी फेसबुक पर…।

आप कोई गंभीर मुद्दे पर विचार लिखिए और देखिए तो उसकी रीच यानी पहुंच सबसे कम है। फेसबुक हो या सोशल मीडिया का कोई भी प्लेटफार्म आम लोगों के लिए गंभीर चिंतन वाले मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए अपने एल्गोरिदम में सेटिंग करके बैठा है। किसकी पोस्ट की रीच बढ़ानी नहीं है और किसके के लिए बाधा खड़ा करना है यह अब सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म का नीतिगत मसला हो गया है।

सवाल जैसा कि विषय में लिखा है हाशिये की पत्रकारिता और पत्रकारिता का हाशिया… उसी लाइन पर बात रखने के लिए यह समझना जरूरी है कि हमारे आस—पास पत्रकारिता के लिए अब पहले जैसा माहौल नहीं है या पहले जैसे पाठक, दर्शक नहीं है। बल्कि यह समझना होगा कि पाठक और दर्शक सब तैयार हैं पर हम ही अब अपने हिस्से की पत्रकारिता का हाशिया दिखाने में नाकामयाब हैं।

काफी समय पहले छत्तीसगढ़ के गंभीर पत्रकार आलोक पुतुल के साथ एक ऐसी ही अनौपचारिक बात हो रही थी। किसी वाकये का उदाहरण देते हुए उन्होंने दैनिक भास्कर के नेशनल एडिटर श्रवण गर्ग जी का उल्लेख करते हुए बताया कि ‘श्रवण जी ने एक बार उन्हें दैनिक भास्कर में बुलाया था और अखबार में जुड़कर पत्रकारिता करने के लिए सलाह दी।

इस पर जब आलोक जी ने पत्रकारिता के लिए स्पेस कितना रहेगा जैसा सवाल किया तो उन्होंने एक पन्ने को चौथ कर खोल दिया और हाशिये की जगह को दिखाते हुए कहा कि तीन हिस्सा मालिक का और चौथा हिस्सा पत्रकार का…।’

यानी केवल वही हाशिये का हिस्सा पत्रकार के लिए मीडिया संस्थान में होता है। यह साफ समझ लें। अभी हाल ही में एक इलेक्ट्रानिक मीडियाकर्मी से बात हो रही थी। उससे पूछा कि और क्या मिल रहा है इस समय रिपोर्ट बनाने पर… उक्त मीडियाकर्मी का जवाब हर किसी का नशा उतार सकता है।

भैय्या मैनेजमेंट ने साफ कह दिया है कि सरकार की अच्छाई वाली रिपोर्ट बनाते जाएं और कीमत लेते जाएं…’ मैं महीने में कम से कम छह—सात ऐसी रिपोर्ट बना दे रहा हूं जिसमें सरकार की सफलता की कहानियां होती हैं। भरपूर पैसा मिल रहा है।

अब सोचिए कि पाठक और दर्शक के ‘हाशिये’ में किस तरह की पत्रकारिता है। दरअसल अब परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकीं हैं। सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफार्म पर यदि आप गंभीर पत्रकारिता वाली खबरें देते हैं तो उसकी रीच नहीं मिलेगी। बेहद फूहड़, अश्लील कंटेट आप डालिए जिससे किसी का भला नहीं होना है वह आपकी उम्मीद से ज्यादा तेजी से वायरल होगा।

रील और शार्ट वाली मीडिया के दौर में कहां से क्या काटकर क्या बना सकते हैं क्या दिखा सकते हैं इससे आपके फालोवर तेजी से बढ़ेंगे, रीच और व्यूव भी बढ़ेगा। हो सकता है उससे आपको कमाई भी हो… पर इस कंटेंट से किसी को कोई लाभ नहीं है बल्कि यह कंटेंट आपको वास्तविक मुद्दों और चिंताओं से दूर कर देगा। शायद सभी मिलकर यही चाहते हों…

इन सब बातों को यदि समझ लेंगे तो साफ समझ में आएगा कि समाज के भीतर उत्पन्न हो रही विकृतियों के लिए ये ‘हाशिया’ ही जिम्मेदार है। जिसमें रहते हुए पत्रकारिता हाशिये में चली गई है… जब पत्रकारिता के लिए मालिक हाशिया भर जगह भी देता था अब तो वह भी खत्म हो चुका है। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टा में नई पीढ़ी जो तलाश रही है उसे सार्वजनिक तौर पर देखना भी अब संभव नहीं है।

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