मिड-लाइफ क्राइसिस!

जे सुशील-

एक संदेश आया आज इनबॉक्स में. मैं संदेश इग्नोर कर सकता था लेकिन मैंने उचित समझा कि वो संदेश और जो जवाब मैंने दिया वो शेयर करूं. संदेश किसने भेजा क्यों भेजा उस पर मत जाइए. संदेश पर जाइए. संदेश भेजने वाले ने कहा है—

मेरी उम्र पैंतीस साल से ऊपर है. मैं राइटविंग लेफ्ट विंग किसी तरफ का नहीं हूं. मैं सीखना चाहता हूं. आपसे सीखता भी हूं. अपने काम में अच्छा कर रहा हूं. लेकिन पिछले कुछ दिनों से कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है. जीवन के मायने समझ में नहीं आ रहे हैं. कुछ समय पहले पिता बना हूं. साथ ही परिवार के कुछ सदस्यों को खोया भी है और बहुत रोया हूं. मैं रोता नहीं था लेकिन पिछले एक दो साल से खूब रोना आता है. आस पास कई लोग हैं लेकिन किसी से खुल कर बात नहीं होती. डर लगता है सब जज करेंगे. मुझे समझ नहीं आता क्या करूं तो आपको मैसेज किया. मैं अपने जीवन के साथ क्या करूं.

मैंने उनको जो जवाब दिया है वो ये है-

असल में जीवन में एक खालीपन आ जाता है तीस पैंतीस के बाद. असल में वो खालीपन नहीं होता है. हम लोग तीसेक साल तक असल में जूझते रहते हैं चीजों से. स्कूल फिर कॉलेज, फिर नौकरी, शादी तमाम चीज़ें होती हैं. जो अपने काम में सफल नहीं हैं वो इस उम्र में भी जूझते हैं तो कुछ सोचने का मौका नहीं मिलता. जो ठीक कर रहे होते हैं असल में उनके जीवन में पहली बार उनके पास समय होता है ये सोचने का कि उन्होंने जीवन क्या जिया.

साइकोलॉजी में शायद इसे मिड-लाइफ क्राइसिस कहा गया है. मैं इसे नए जीवन की शुरूआत मानता हूं. पिता बनने के बाद वैसे भी आदमी भावुक हो जाता है अगर आप थोड़े से भी सेंसिबल हों तो. रूक कर सोचता है आदमी. रोना अच्छी बात है. रोना चाहिए. हमें बचपन में गलत सिखाया गया कि लड़कों को नहीं रोना चाहिए. मैं खूब रोता हूं.

जीवन का उद्देश्य कुछ नहीं है. सबसे पहले एक काम कीजिए। फेसबुक पर आना कम कीजिए. जितना यहां रहिए उतना ही ये सवाल दिमाग में रहेगा कि आपका जीवन बेकार है. आपने कुछ नहीं किया लाइफ में. यहां से हट जाइए. फोन फेंक दीजिए. नहीं फेंक सकते तो समय तय कर दीजिए कि दिन में एक घंटा देखेंगे. वाट्सएप पर फॉरवर्ड आते हों तो सारे ग्रुप से निकल जाइए. पारिवारिक ग्रुप से भी. माफी मांग लीजिए.

अब अगला कदम- बैठ कर सोचिए कि बचपन में आप क्या करना चाहते थे. किस काम में खुशी मिलती थी. किताब पढ़ने में, जंगल घूमने में फुटबॉल खेलने में……..जो भी वो काम था जिसमें खुशी मिलती थी उस काम को शुरू कीजिए छोटे वर्जन में. उदाहरण के लिए अगर फुटबॉल खेलना अच्छा लगता था तो फुटबॉल खरीदिए तो शाम को एक घंटा खेलिए. इसी तरह से जो काम करना अच्छा लगता था वो कीजिए.

दूसरों की मदद करूंगा टाइप मत सोचिए. अपने लिए सोचिए कि किसमें खुशी मिलती है. अगर शारीरिक काम पसंद नहीं तो फोन को घर में रख कर हर दिन एक घंटा वॉक करने जाइए. लौट कर घर के काम में मदद कीजिए. झाड़ू लगाइए, बर्तन धोइए. बीवी को प्यार कीजिए. हफ्ते में तीन दिन सेक्स कीजिए.

पौधा लगाइए. अचानक रात में आइसक्रीम खाने निकल जाइए परिवार को साथ लेकर. छुट्टी लीजिए घूमने जाइए….फोन को दूर रखिए.

ऐसा छह महीने करिए. जीवन का उद्देश्य समझ में आ जाएगा कि जीना ही उद्देश्य है. पढ़ने का मन हो तो किताब खरीदिए. ये मत सोचिए कि दस किताब पढ़ना है. महीने में एक किताब का टारगेट रखिए. अधिक नहीं.

नोट- ऐसा नहीं है कि मैं एकदम इमानसिपेट हो गया हूं. मैं भी फोन, सोशल मीडिया और कंप्यूटर के साथ हर दिन संघर्ष कर रहा हूं. कई बार फोन फेंक देता हूं. तीन चार दिन नहीं देखता. ये कठिन है लेकिन बस हो रहा है….कर रहा हूं. मैं सिर्फ दो वाट्सएप ग्रुप में हूं जहां मैं कमेंट नहीं करता. महीने या हफ्ते में कभी वाट्सएप खोलकर पढ़ लेता हूं. काम की चीज़ होती है तो निकाल कर प्रिंट ले लेता हूं. कोई बहस नहीं करता वहां.

इस पोस्ट को ज्ञान न समझा जाए. अनुभव शेयर किया है. और कुछ नहीं.

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें-

https://chat.whatsapp.com/Bo65FK29FH48mCiiVHbYWi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *