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सियासत

मोदी सरकार ने ग़लत पंगा ले लिया ‘अग्निवीरों’ से, धधकने लगा देश, हिलेगी गद्दी!

एक साल में सीएए-एनआरसी, दूसरे साल किसान… अब जवान.. हर साल देश जलेगा… तर्क यही कि लोग समझ नहीं रहे हैं.. सारे लाल बुझक्कड़ सरकार में और भक्त बिरादरी में ही बैठे हैं.. हद है! -अनुराग द्वारी (पत्रकार)



सौमित्र रॉय-

बीजेपी के लिए डिजिटल प्रचार करने वाले एक पूर्व सहयोगी का आज फ़ोन आया। कहा-ई बच्चा लोगन के साथ बहुत गलत किए हैं। जनाब का भतीजा फिलहाल पुलिस के डंडे खाकर अस्पताल में पड़ा है।

4 साल तक तैयारी करते हैं बच्चे। मैंने भी की थी। पहले NDA फ़िर CDS. रायपुर में पुलिस लाइन के पास ही घर था। सुबह 4 बजे से दौड़-कूद, रस्सी पर चढ़ना और फिर पढ़ाई। एक परसेंट से चूके तो मां की गोद में सिर रखकर रोये थे।

कॉलेज के ज़माने में आरक्षण आंदोलन में कूदे। कालीबाड़ी के पास लड़कों ने एक बस को फूंक दिया। लाठियां चलीं। 13 दिन के लिए जेल में रहे। फिर सरकार ने केस वापस लिया।

आज मोदी सरकार ने फिर नौजवानों को भड़काया है। उनके सपनों को कुचला है। नतीजा- ट्रेनें फूंकी गईं। आग ग्वालियर तक आ पहुंची है।

आप अपने ठंडे कोने में बैठकर उन्हें नसीहतें पेल रहे हैं। देश का नौजवान आज शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का हाल देख रहा है।

सरकार और प्रशासन अकड़ में है। पुलिस बिना नाम-पट्टी लगाए डंडे चला रही है। लोगों को कोविड काल में ऑक्सीजन देने वाले युवक को लात मारी जा रही है।

पत्थर तो उठेंगे। आग तो लगेगी। नौजवान इसे ही भीड़ की ताकत मानने लगे हैं, क्योंकि दूसरी तरफ खाकी की भीड़ भी उतनी ही उन्मादी है।

फिर सवाल और उंगलियां एकतरफ़ा क्यों? मुद्दा आरक्षण का हो या फिर अग्निपथ का- सरकार ने नौजवानों से कब, कहां, कितना संवाद किया?

उनकी सहमति के बगैर सपनों को कुचल दिया? सरकार बार-बार ये क्यों भूल जाती है कि इन नौजवानों के पास जेपी जैसा कोई नेतृत्व नहीं है, वरना दिल्ली की सत्ता का तंबू कबका उखड़ गया होता।

मुमकिन है कि इनमें से बहुतों ने बीजेपी को वोट दिया होगा। लेकिन इसी बात पर तंज़ कसने वाले विद्वान 2014 और 2019 में किसके साथ थे- यह कौन तय करेगा?

इन नौजवानों को सुनिए। कोई आधा पेट खाकर, तो कोई अपनी बहन की शादी, अम्मा के इलाज और बापू का क़र्ज़ चुकाने की उम्मीद में दौड़-भाग रहा है।

इनकी समझदारी को तौलिए। ये आपसे ज़्यादा जानते हैं। इन्होंने मुझसे-आपसे ज़्यादा तैयारी की है। ये हम-सब से ज़्यादा शिक्षित हैं- क्योंकि इनकी प्रतिस्पर्धा लाखों से है।

एक झटके में मोदी सरकार ने इन्हें ठेका श्रमिक बना दिया? 2020 में केंद्र सरकार ने 13.24 लाख ठेका श्रमिक रखे थे, 2021 में 24.30 लाख हो गए।

आपको नहीं मालूम, लेकिन ये नौजवान जानते हैं कि अमित शाह झूठ बोल रहे हैं। CAPF में 1.29 लाख वेकैंसी है। भर्ती हुई है सिर्फ 10184 की।

लोकतंत्र जनता के लिए, जनता के द्वारा और जनता को ही समर्पित है- भूलें नहीं। ये मोदी और अमित शाह की बपौती नहीं है।

लिहाज़ा, नौजवानों के गुस्से को समझिए। इसे दिशा दीजिए। अगर न हो सके तो इनके साथ खड़े होकर नाइंसाफ़ी का विरोध कीजिये।

यह भी याद रखें- आपका खून सरकारी/प्राइवेट की गुलामी कर पानी हो चुका है। लेकिन उनकी रगों में दौड़ रहा खून अभी सुर्ख़ और गर्म है।



यशवंत सिंह-

बेरोज़गार सिर्फ़ जुमले से संतुष्ट नहीं हो जाएँगे! ये नौजवान हैं। गरम खून वाले। आप को महान बना सकते हैं तो कूड़ेदान में भी डाल सकते हैं। जिस ओर जवानी चलती है उस ओर ज़माना चलता है… इन युवाओं के साथ मैं हूँ। एक बार विधायक /सांसद चुन कर ज़िंदगी भर पेंशन पाने वाले हरामख़ोर नेता इन युवाओं को लालीपॉप दे रहे हैं। सही बोल रहे बालक, ‘नो रैंक नो पेंशन’ की नीति ले आए हैं मोदी जी। कभी ये ‘वन रैंक वन पेंशन’ के नाम पर वोट लेते थे…! ये मोदी नामक आदमी जो कुछ कहता है उसके ठीक उलट करता है। भारत को श्रीलंका बना के मानेगा ये भगवा गैंग!

भाजपा के लोग समझाते समझाते गरियाने लगे हैं नौजवानों को। जो लौंडे कल तक भाजपा की तरफ़ से भक्त बन कर आलोचकों से मोर्चा लेते थे, आज वही लड़के अग्निपथ पर चलते हुए भाजपाइयों को ही घसीट घसीट कूट रहे हैं।

नोटबंदी के प्रतिफल में भाजपा वाले खुद का महल टाइप आफिस देश भर में बनवा लिए। मोदी जी ने सरकारी कंपनियों को एक एक कर बेच डाला। अडानी के नाम हर सामान करते जा रहे हैं। महंगाई बेरोजगारी इनकी चिंता से बाहर है।

अब वो तीली जल चुकी है। देश धधकना शुरू हो चुका है। सब कुछ इनके हाथ में है पर बेचारे ये संघी सिवाय नौजवानों को गाली देने के, और कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

किसानों को सरकार के लोग गरियाते रहे और किसान संगठित होते गए। सरकार को घुटनों के बल ला दिया।

अब बेरोज़गार नौजवानों को ये लोग गरिया रहे। लड़के इनकी गालियों से उग्र होंगे और संगठित होंगे। फिर इन सत्ताधारियों को भागने की जगह नहीं मिलेगी।


अमीश राय-

रोज़गार को लेकर सरकार के अंदर फैल रही बेचैनी को समझिए. इस बेचैनी के सूत्र समाज के अलग अलग हिस्सों में छिपे हुए हैं. भारत में चाय की दुकानों की तरह से उग आए शैक्षणिक संस्थाओं से निकल रहे युवाओं के पास नौकरी नहीं है. महंगाई इतनी ज़्यादा है कि नई पीढ़ी की हसरतें परिवार के बस के बाहर जा रही हैं.

सरकार नई नौकरियों के सृजन में विफल है और प्राइवेट सेक्टर में एक अच्छा कैरियर बनाने के लिए शिक्षा में निवेश कर पाना हर परिवार के बस की बात नहीं.

संप्रदायिकता टाइप नशा ज़्यादा दिनों तक किसी को बरगला कर नहीं रख सकता. क्योंकि नशे के सिर्फ़ दो नतीजे होते हैं. या तो नशे के ओवरडोज़ से मौत हो जाती है या एक वक़्त के बाद नशा उतर जाता है. पहले ऑप्शन बेकार है. कहीं ऐसा तो नहीं कि भारत भाग्य विधाताओं को दूसरे ऑप्शन के संकेत दिखने लगे हैं?

ऐसा लगता है कि देश का मूड भाँपने वालों ने सरकार को बता दिया है कि थर्मामीटर डालकर बुख़ार नापने पर सखी का टेम्प्रेचर बढ़ा हुआ आ रहा है. जिनको ये लाइन नहीं समझ में आयी हो वो गायक Guddu रंगीला जी के गाने सुनें.

इधर बीच आपने भी फ़्री राशन टाइप्स पर खुश होकर ऐसा दबा कर वोट दिया है कि सरकारों को लगने लगा है कि कुछ भी थमा दो, पेट की मारी जनता मान जा रही है.

पर युवाओं के मामले में यहाँ धोखा हो सकता है.

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