मोदी को हराना मुश्किल तो है, नामुमकिन नहीं

संजय कुमार

महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव नतीजों के संदेश को अगर एक वाक्य में समझना हो तो ये बात बड़ी आसानी से कही जा सकती है, ‘मोदी को हराना मुश्किल तो है, नामुमकिन नहीं है।’ सत्ता पक्ष के लिए अगर ये खतरे की घंटी है तो विपक्ष के लिए भी ये किसी संजीवनी से कम नहीं है। बीते दशक में ये ऐसा चुनाव है जिसमें देश की महान जनता ने सबको कुछ ना कुछ संदेश दिए हैं। सबसे बड़ा संदेश मोदी सरकार के लिए है कि, उग्रराष्ट्रवाद का फॉर्मूला थोड़े समय के लिए तो चल सकता है, लेकिन इसके घिसने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

सांप्रदायिक कट्टरतावाद भी निश्चित दूरी तक सफर के बाद हांफने लगेगा। विपक्ष के लिए साफ संदेश है कि मिलकर अपने अस्तित्व को बचा सकते हो तो बचा लो। हम तुम्हारी मदद के लिए तैयार हैं। खासकर कांग्रेस या कह लीजिए राहुल गांधी के लिए बड़ा संदेश ये है कि पार्ट-टाइम राजनीति से काम नहीं चलने वाला। और आखिर में सबसे बड़ी बात ये कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी बुनियादी और दुनियावी मसले ही आनेवाले दिनों में देश के लिए अहम होंगे, जो भविष्य में सरकारों की तकदीर और तस्वीर तय करेंगे।

इसे ठीक से समझने के लिए हमें लोकसभा लोकसभा चुनाव 2019 और ताजा विधानसभा चुनावों के प्रचार को याद करना होगा। मोदी सरकार के तमाम मंत्री भले ही सरकारी आंकड़ों को झुठलाते हुए बेशर्मी के साथ दोहराते रहे हों कि देश 5 ट्रिलियन इकोनॉमी की ओर तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। दुनियाभर में मोदी के नाम का डंका बज रहा है।

मोदी-मोदी से पूरा विश्व गुंजायामान हो रहा है। पड़ोसी देश पाकिस्तान को सर्जिकल स्ट्राइक करके हमने सबक सिखा दिया है और हालात इतने खुशगवार हो गए हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी मोदीजी के साथ सांबरमती के तट पर झूला झूलने में फख्र महसूस करते हैं। लेकिन सच्चाई इससे उल्ट है। देश की गरीब और मेहनतकश जनता आज त्राहिमाम कर रही है। उद्योग-धंधों की कमर टूट गई है। बेरोजगारी चरम पर है। फिर भी मोदीजी और उनकी मंडली एक ‘फॉल्स नैरेटिव’ गढ़ने में कामयाब रहे हैं और सरकार की नाकामी का सारा ठीकरा भी विपक्ष के माथे पर फोड़ दिया है।

इसे समझने के लिए चलिए देश के बंटवारे से इसकी शुरूआत करते हैं। पाकिस्तान बना तो इसके लिए जवाहरलाल नेहरू जिम्मेदार हैं। जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर आज अगर पाकिस्तान का कब्जा है तो इसके लिए भी नेहरू ही जिम्मेदार हैं। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा मिला और संविधान में धारा 370 और 35ए का प्रावधान किया गया तो इसके लिए भी नेहरू ही जिम्मेदार। आजादी के बाद से ही नागालैंड के नागा जनजातीय गुटों के साथ सशस्त्र संघर्ष के लिए भी नेहरूजी जिम्मेदार। और तो और अगर देश की अर्थव्यवस्था आज पटरी से उतरी है तो इसके लिए भी नेहरूजी को ही जिम्मेदार बताया जा रहा है।

मजेदार ये है कि इन समस्याओं का बखान करते हुए मोदीजी, अटलबिहारी वाजपेयी के छह साल और खुद के पांच साल के कार्यकाल को भी भूल जाते हैं। मोदीजी भूल जाते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ही 1999 में बस से लाहौर गए थे और नवाज शरीफ को पाकिस्तान की धरती पर गले लगाया था। वो ये भूल जाते हैं कि ‘लाहौर बस यात्रा’ के दो महीने बाद ही करगिल युद्ध हुआ, जिसमें हमारे 500 से ज्यादा सैनिक शहीद हुए थे।

लगता है मोदीजी को भूलने की आदत है या फिर वो ऐसा जानबूझ कर करते हैं। तभी मोदीजी ये भी भूल जाते हैं कि उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ साहब को दिल्ली बुलाया था, उनसे गले मिले और उसे अपनी कूटनीतिक कामयाबी बताया। इतना ही नहीं, वो दिसंबर 2015 में काबुल से लौटते हुए खुद नवाज शरीफ के घर शादी में शरीक होने लाहौर जा पहुंचे और उनके साथ 90 मिनट बिताकर स्वदेश लौटे।

ये सब इसलिए याद दिलाना जरूरी है कि जोर से बोलने, बार बार बोलने और मीडिया घरानों के जेब भरकर उसे अपनी चाकरी के लिए मजबूर करने से सच्चाई पर ज्यादा देर तक पर्दादारी नहीं की जा सकती। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट तो ठीक है, लेकिन मोदीजी को ये भी बताना चाहिए कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते सुधारने के उन वायदों का क्या हुआ, जो उनकी पार्टी की घोषणा पत्रों की शोभा बढ़ाता रहा है। जिसकी वजह से पाकिस्तान की सीमा से सटे गांवों में रहनेवाले लोगों की जान पर खतरा मंडराता रहता है और सेना के जवान आतंकियों से लड़ते हुए शहादत देते रहते हैं।

मोदी की हर कामयाबी के बाद मीडिया में ‘फॉल्स नैरेटिव’ यानी झूठी कहानी गढ़ने वाले पत्रकार इसे कभी मोदी की जीत का मंत्र बताते हैं तो कभी इसे ‘मोदी मैजिक’ कहते हैं। दरअसल मोदी मैजिक है क्या? इसे समझने और इसकी व्याख्या के लिए संघ की शाखाओं और आरएसएस की उन पोथियों में झांकना होगा जो सवर्ण हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था में यकीन करता है लेकिन धर्म और संप्रदाय के आधार पर उन्हें गोलबंद भी करना चाहता है, ताकि माधवराव सदाशिव गोलवरकर के हिंदूराष्ट्र की अवधारणा को अमलीजामा पहनाया जा सके।

इस अवधारणा में कहा गया है कि भारत में वैदिक या सनातनी, बौद्ध, जैन, सिख और आर्यसमाजी आदि तो हिंदू की परिधि में आते हैं, लेकिन मुस्लिम, ईसाई और यहूदी बाहर हो जाते हैं। ये गोलबंदी समाज में जातीय व्यवस्था के प्रभाव के चलते लंबे समय तक मुमकिन नहीं हो पाई।

लेकिन देश में जैसे-जैसे समाजवादी और वामपंथी आंदोलन कमजोर हुए, बीजेपी को अपनी पैठ बनाने की जमीन मिल गई और इसे बाखूबी अंजाम दिया नरेंद्र दामोदर मोदी ने। जिनके पास बतौर आरएसएस प्रचारक देश और समाज के नब्ज को समझने की काबिलियत थी। अपने इस मुकाम को हासिल करने के लिए मोदीजी ने हिटलर के उसी उग्र राष्ट्रवाद के फॉर्मूले का सहारा लिया, जिसने आर्थिक मंदी, भूखमरी और भीषण बेरोजगारी के दौर में भी उसे हीरो बना दिया।

जर्मनी की जनता उस हिटलर के पीछे कदमताल करती नजर आई, जिसने जिल्लत के सिवाय उन्हें कुछ नहीं दिया। इतिहास गवाह है कि जब हिटलर के राज में यहूदियों का कत्लेआम हो रहा था तब जर्मनी की एक बड़ी आबादी उसका साथ दे रही थी।

दरअसल इतिहास केवल पढ़ने की चीज नहीं है, इससे सबक भी लिया जा सकता है। यंहूदियों के खिलाफ जिस नफरत का बीज बोकर हिटलर जर्मनी की सत्ता शिखर पर पहुंचा उसकी अनुगूंज आज देश में भी सुनाई पड़ रही है। चाहे सवाल राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानी एनआरसी का हो, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की विदाई का हो या फिर ईसाई बहुल नागालैंड में शांति वार्ता को पलीता लगाने का हो, इन सबमें एक चीज कॉमन है, और वो है ‘नफरत’।

धार्मिक समुदायों के बीच नफरत पैदा कर उसे राष्ट्रवाद की चासनी में डूबोना और फिर इस ‘लॉलीपॉप’ से जनता को आकर्षित करने की कला ही है जो मोदीजी को तमाम नाकामियों के बीच विजेता बनाती है। ये बात आज सबको समझने और समझाने की है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि मोदीजी को हराने का मंत्र क्या है? उग्रराष्ट्रवाद के जिन विषयों, मसलन राम मंदिर निर्माण, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने, सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट और सावरकर को भारत रत्न देने आदि को लेकर विपक्ष को जो वैचारिक चुनौती मिल रही है, उनसे मुंह चुराकर या उसे नजरअंदाज कर विपक्ष मोदी से मुकाबला नहीं कर सकता।

इन चुनौतियों को लेकर अलग-अलग सुर में बोलकर भी जनता का विश्वास हासिल नहीं किया जा सकता। जैसा कि बीते दिनों कांग्रेस के भीतर और विपक्षी दलों में भी देखने में आया है। दरअसल मोदीजी अपनी कमजोरी को भी अपनी ताकत बना कर पेश करते हैं और विपक्ष अपनी ताकत को भी कमजोर और पिलपिला मानने लगा है। मसलन, लोकसभा चुनाव से पहले पुलवामा हमले से जहां सरकार की छीछालेदर होनी चाहिए थी, वहीं इसे लेकर विपक्ष भींगी बिल्ली बना रहा और मोदीजी ने सुरक्षा में इतनी बड़ी चूक को भी अपनी कामयाबी में तब्दील कर दिया।

महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि देश की जनता के दिमाग से उग्रराष्ट्रवाद का नशा उतरने लगा है। और उसे रोजी-रोटी और रोजगार की चिंता सताने लगी है। किसानों को ये समझ में आने लगा है कि मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरत उन्हें सदियों से भरी जा रही घृणा के चलते थोड़ी देर के लिए मानसिक संतोष भले दे दे, उन्हें रोजी-रोटी नसीब नहीं होने जा रही है। उनके बच्चों के रोजगार के अवसकर सिकुड़ते जा रहे हैं।

ऐसे में वक्त आ गया है कि किसी नेता या दल के पीछे ना जाकर बुनियादी मुद्दों के साथ आगे बढ़ा जाए और समाज, देश और धर्मनरपेक्षंता की चिंता करने वाले नेताओं को रास्ता दिखाया जाए, ताकि समाज का ताना-बाना टूटने ना पाए। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने तो फिलहाल झांकी दिखाई है, मुमकिन है आनेवाले झारखंड, दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनावों में बीजपी पर पूरी फिल्म भारी पड़ जाए।

लेखक संजय कुमार दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं.



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One comment on “मोदी को हराना मुश्किल तो है, नामुमकिन नहीं”

  • एम के मिश्र says:

    जनता की तरफ से ऐसा कोई संदेश नहीं है विपक्ष को तुम अपना अस्तित्व बचा सको तो बचा लो हम तुम्हारे साथ में हैं । हरियाणा चुनाव में जिन पार्टियों की सीट बढ़ी है वो ओमप्रकाश चौटाला की लोकदल की कीमत पर हुआ है और भाजपा को जो क्षति हुई है वो उसके बागियों की वजह से हुआ । कमोवेश ऐसी ही परिस्थिति महाराष्ट्र में हुई जहां भाजपा ने पिछली बार से लगभग आधी सीटें कम लड़ी और कुछ बागियों की वजह से नुकसान हुआ विपक्ष को कोई लाभ नहीं हुआ । आंकलन से पूर्णतः सहमत ।

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