हत्या की यह खबर जितना बताती है उससे ज्यादा छिपाती है

आज के ‘नवोदय टाइम्स’ में पहले पेज पर प्रमुखता से एक खबर छपी है, “गर्भपात से मना करने पर डॉक्टर की हत्या”। दो कॉलम, दो लाइन के शीर्षक के बाद दो लाइन में दो उपशीर्षक भी हैं। इनमें पहला है, “गर्भवती किशोरी के दोस्तों पर हत्या का शक” और दूसरा, “हत्या की जांच में जुटी पुलिस”। इसमें तीसरा या अंतिम शीर्षक बेकार है। वह तो पुलिस को करना ही है। अगर पुलिस ने कहा होता कि जांच नहीं करेगी तो खबर होती। इस खबर के विस्तार में जाने और उसपर चर्चा करने से पहले यह बताना लाजमी है कि इस मामले की रिपोर्टिंग पूरी पुलिसिया शैली में की गई है और ना तो रिपोर्टर ने अपना दिमाग लगाया है ना प्रकाशन से पहले संपादकों ने इसपर विचार किया है। इसीलिए मेरे निशाने पर है।


यह हिन्दी अखबारों में रिपोर्टिंग की आम शैली है और इससे लगातार खराब होती स्थिति का पता चलता है। कहने की जरूरत नहीं है कि रिपोर्टर पुलिस जो ‘लीक’ करती है उसपर खबरें लिखते हैं और पुलिस की ‘लीक’ पुलिसिया होती है। इसका उद्देश्य अपराधी को पकड़ने की सामान्य और गंभीर जरूरत से अलग, मामले को कोई मोड़ देना भी हो सकता है। यह इरादतन, किसी जरूरत से भी हो सकता है। यह भी बताने की जरूरत नहीं है कि पुलिस की लीक आधी-अधूरी, बिना जांची, बेजरूरत और किसी को बदनाम या अवमानना करने वाली भी हो सकती है। इसके बावजूद यह सब चल रहा है और स्थिति यह है कि खबर पढ़ने के बाद एक पाठक के रूप में कई सवाल उठते हैं। जवाब अक्सर नहीं मिलता है और रिपोर्टर ने उनकी चर्चा नहीं की होती है। प्रकाशित करने से पहले संपादक का काम होता है कि वह रिपोर्टर से उन बिन्दुओं पर जानकारी देने के लिए कहे – पर वह भी नहीं होता है।

अब खबर पर आते हैं। गर्भपात कराने के कुछ नियम हैं। कन्या भ्रूण हत्या रोकने और अवैध गर्भ के कारणों का पता लगाकर ही कोई कार्रवाई हो इसलिए। विवाहित महिला के सामान्य दिखने वाले गर्भ के मामले में अगर उसके दो-तीन बच्चे हों तो भी कन्या भ्रूण हत्या रोकने के कानून के तहत डॉक्टर आराम से गर्भपात नहीं कराएगा। ठीक-ठीक कानून क्या है अभी उसका विस्तार जरूरी नहीं है। पर 16 साल की किशोरी (और अविवाहित भी) का गर्भपात कराने अगर कोई डॉक्टर के पास आएगा तो वह या तो पैसे लेकर उसका गर्भपात करा देगा (गैर कानूनी तौर पर) या ऐसी मांग करने वाले को कानून बताकर टालने की कोशिश करेगा। कायदे से उसे पुलिस को सूचना भी देनी चाहिए। इस मामले में ऐसा कुछ हुआ कि नहीं यह खबर में नहीं बताया गया है और शीर्षक ही सवाल उठा रहा है कि ऐसे मामले में डॉक्टर की हत्या से मामला दबेगा या बढ़ेगा? इस लिहाज से यह खबर जितना बताती है उससे ज्यादा छिपाती है और यह इरादतन नहीं है। इसका कारण है, पुलिस के लीक के भरोसे रहना या अपनी बुद्धि नहीं लगाना।

इस खबर का दूसरा हिस्सा और महत्वपूर्ण है। शीर्षक है, “डॉक्टर की डिग्री नहीं दिखा सके परिजन”। मूल खबर में लिखा है, बीएएमएस डिग्री प्राप्त डॉक्टर सरला नाथ और नीचे इस खबर में एसपी सिटी श्लोक कुमार के हवाले से लिखा है कि सरला के परिजन उसकी डिग्री नहीं दिखा पाए। मुझे नहीं पता बीएएमएस क्या होता है औऱ किसलिए बताया गया है। जब डिग्री नहीं है तो डॉक्टर क्यों लिखा गया है और अगर इसलिए लिखा गया है कि वो खुद लिखती थीं, परिवार वाले कहते थे और डॉक्टर का काम करती थीं तो अभी डिग्री की क्या जरूरत? अगर वो बिना डिग्री न्यायखंड दो स्थित मकनपुर में फैमिली हेल्थकेयर नाम से क्लिनिक चला रही थीं और गर्भपात जैसे बहुत साधारण काम नहीं कर रही थीं तो क्या उनकी डिग्री पहले कभी देखी-पूछी नहीं गई होगी। और अभी तक नहीं पूछी गई तो अब क्यों पूछी जा रही है जब उनकी हत्या हो गई। यह साबित करने के लिए कि वे बिना डिग्री के अवैध रूप से क्लिनिक चला रही थीं इसलिए उनकी हत्या हो गई और इसलिए हत्या जायज है?

अब चूंकि यह सवाल एसपी सिटी ने उठाया है तो यह बेमतलब नहीं होगा पर इसे इतनी प्रमुखता से छापने का क्या मतलब? क्या एसपी सिटी से यह नहीं पूछा जाना चाहिए था कि क्या कोई बगैर डिग्री क्लिनिक चला सकता है और अगर चला ही सकता है तो अब डिग्री किस लिए? चलाने वाले की तो हत्या हो गई? कहने की जरूरत नहीं है कि एसपी सिटी कोई तेज-तर्रार आईपीएस या अनुभवी पुलिस वाला होगा और रिपोर्टर कोई अर्धसाक्षर किस्म का पढ़ा-लिखा। उसे चरने के लिए चारा मिला उसने परोस दिया। हद है। वैसे उसकी भी गलती नहीं है। सस्ता रिपोर्टर इससे ज्यादा क्या करेगा? वह पुलिस की ब्रीफिंग लेगा और टाइप करके मेल कर देगा। पर संपादक और डेस्क वाले?

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क anuvaad@hotmail.com

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