सुशोभित-
पिछले दिनों ख़बर सुनी कि केसरबाग़ मार्ग, इन्दौर स्थित जिस भवन से अतीत में नईदुनिया अख़बार निकलता था, उसे ढहा दिया गया है। यह सुनते ही नईदुनिया और उस भवन से जुड़ी स्मृतियों ने मुझे घेर लिया।
वर्षों पूर्व मैं उज्जैन में संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य श्रीनिवास रथ से बातें कर रहा था। प्रसंगवश उन्होंने कहा कि “मध्यप्रदेश के लोगों की अंग्रेज़ी अगर ख़राब है तो इसमें नईदुनिया का बड़ा योगदान है।” मैं चौंका। नईदुनिया तो हिन्दी का अख़बार था, फिर वह किसी की अंग्रेज़ी कैसे ख़राब कर सकता था?
मुझे दुविधा में देखकर आचार्यप्रवर अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ बोले, “इसका कारण यह है कि नईदुनिया इतना अच्छा अख़बार है कि हिन्दी के पाठकों को अंग्रेज़ी के समाचार-पत्र पढ़ने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई। आखिर हिन्दी का पाठक तभी तो अंग्रेज़ी की तरफ़ जाएगा, जब उसकी भाषा में उसकी बौद्धिक ज़रूरतों की पूर्ति नहीं हो पाती हो। नईदुनिया इसमें पूरी तरह से सक्षम था।”
नईदुनिया हिन्दी का इकलौता ऐसा अख़बार था, जिसका स्वयं का एक वाचनालय था। कोई छोटा-मोटा पुस्तक-कक्ष नहीं, बल्कि एक विशाल, सुदीर्घ लाइब्रेरी। इसमें इतिहास, अर्थशास्त्र, पुरातत्त्व, दर्शन, समाजशास्त्र, राजनैतिक विज्ञान, साहित्य आदि विषयों पर हज़ारों किताबें थीं। कुछ पुस्तकें तो ऐसी भी थीं, जो भारत में भी दुष्प्राप्य थीं। कहते थे कि अब्बू जी (अभय छजलानी) जब विदेश-यात्राओं पर जाते थे तो वहाँ से वो दुर्लभ पुस्तकें ख़रीद लाते थे और उन्हें पढ़ने के बाद नईदुनिया के पुस्तकागार में भेंट कर देते थे।
यह पुस्तकालय केवल नईदुनिया के सम्पादकों-कर्मचारियों के लिए ही शोध-संदर्भ का काम नहीं करता था, बल्कि इन्दौर शहर के प्रबुद्ध-पाठक भी इससे लाभान्वित होते थे। वाचनालय की पुस्तकों पर मैंने कई मूर्धन्यों को जारी किए जाने की तिथि और उनके दस्तख़त देखे थे।
वर्ष 2012 में जब मैं इस नईदुनिया भवन में कार्य करने पहुँचा, तब भी वह भव्य लाइब्रेरी यथावत किंतु उपेक्षित थी। नईदुनिया का तब तक पराभव हो चुका था और उस पर जागरण-समूह का आधिपत्य स्थापित हो गया था, किन्तु अतीत के अंतिम अंगार अभी उसमें शेष थे। श्रवण गर्ग तब वहाँ सम्पादक थे। प्रभु जोशी, सरोज कुमार, राजकुमार कुम्भज आदि आते-जाते रहते थे। सम्पादकीय प्रभाग में वयोवृद्ध सुरेश ताम्रकर अभी उपस्थित थे। कभी-कभी पिगडम्बर से फिल्म रिकॉर्ड संग्राहक सुमन चौरसिया भी प्रकट होते।
जब मैंने पहली बार उस भवन में क़दम रखा तो मुझे लगा मैं पत्रकारिता के इतिहास के एक महान स्मारक में आया हूँ। लाइब्रेरी देखकर मैं मंत्रमुग्ध रह गया था। उस लाइब्रेरी से लाभार्थी होने वाले अंतिम पाठकों में मुझे सम्मिलित किया जाना चाहिए। कमलेश सेन वाचनालय के प्रभारी थे।
जब नईदुनिया का कार्यालय सयाजी होटल के समीप स्थित एक बहुमंजिला भवन में स्थानांतरित हुआ, तो लाइब्रेरी को एक छोटा-सा कक्ष प्रदान किया गया। तब कमलेश जी ने मायूस होकर कहा था कि “एक जहाज़ को एक छोटी-सी नैया में बिठाल दिया गया।” लाइब्रेरी की बहुत सी पुस्तकें अब्बू जी ने अपने निजी संग्रह में रख ली थीं, बहुत अन्य नगर के दूसरे वाचनालयों को भेंट कर दी गईं, कुछ ऐसी भी थीं जो इशू होने के बाद फिर लौटकर नहीं आईं। शीराज़ा बिखर गया था। जिस लाइब्रेरी ने अनेक प्रबुद्ध मस्तकों को पोषित किया था, वह छिन्न-भिन्न हो गई थी।
इन्दौर को अपनी राजधानी मानकर नईदुनिया अख़बार ने एक समय मध्यप्रदेश में अभूतपूर्व बौद्धिक संस्कृति का निर्माण किया था। रज्जू बाबू (राजेन्द्र माथुर) विदेश-नीति के गहरे जानकार माने जाते थे और उनके सम्पादकीयों को शीर्ष नेतृत्व द्वारा भी ध्यान से पढ़ा जाता था। बाबा (राहुल बारपुते) की देश-समाज की नब्ज़ पर गहरी पकड़ होने के साथ ही कला-संगीत की दुनिया में भी पैठ थी। कुमार गंधर्व से उनकी मैत्री थी, भानुकुल देवास उनका आना-जाना रहता था।

रणवीर सक्सेना नईदुनिया के सम्पादक बनने से पहले अर्थशास्त्र के प्राध्यापक थे। प्रभाष जोशी की रुचि खेलों में गहरी थी। यह उनके पुत्र सोपान जोशी में भी चली आई है। प्रभु जोशी चित्रकार-कथाकार थे। शरद जोशी नईदुनिया में नियमित स्तम्भ लिखते थे। राजू भारतन, शिरीष कणेकर, सुरेश गावड़े के लेख अख़बार में आते रहते।
श्रीराम ताम्रकर ने नईदुनिया में फिल्म-प्रभाग की कमान सम्भाली और उच्च गुणवत्ता के फिल्म-विशेषांक 1980 के दशक के अंत में निकाले, जिन्हें मैंने संदर्भ के तौर पर आज तक सहेज रखा है। कार्टूनिस्ट देवेन्द्र की अपनी ही शैली थी। शरद पंडित समाचार-पत्र के प्रतिष्ठित छायाकार थे। यशवंत व्यास, शाहिद मिर्ज़ा, राहुल बृजमोहन सरीखे प्रखर युवा-तुर्क भी नईदुनिया-स्कूल की पैदाइश रहे! उस समय नईदुनिया के पाठकों के पत्र स्तम्भ में प्रकाशित होना भी गर्व का विषय समझा जाता था।
नईदुनिया सम्पादकीय विभाग में कार्य करने से पूर्व से ही मैं उससे एक वितरक और युवा पाठक के रूप में जुड़ा था। 1990 के दशक में जब मैं पेपर-हॉकर के रूप में उज्जैन में अख़बार बाँटता था, तब नईदुनिया सबसे प्रतिष्ठित अख़बार था और नगर के सभी प्रबुद्धजनों, शिक्षकों, प्राध्यापकों, प्रशासनिक अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के यहाँ उसकी बंदी लगी थी।
एक युवा पाठक के रूप में नईदुनिया में मेरे आकर्षण का केंद्र दो वस्तुएँ थीं : ‘खेल हलचल’ नामक पत्रिका में स्वरूप बाजपेयी के क्रिकेट पर शोधपूर्ण आलेख। वे क्रिकेट के चलते-फिरते एनसाइक्लोपीडिया थे। दूसरे, मेरे गुरुवर अजातशत्रु द्वारा लिखा जाने वाला ‘गीत-गंगा’ नामक उच्चकोटि का स्तम्भ, जिससे प्रेरित होकर स्वयं मैंने कालान्तर में फिल्म-संगीत पर लेखन किया और वह पुस्तक भी अजातशत्रु को ही समर्पित की। बुधवार को छपने वाली नईदुनिया की ‘धड़कन’ पाठकों में विशेष लोकप्रिय थी।
नईदुनिया देश की आज़ादी से दो माह पूर्व जून, 1947 में प्रकाशित होना शुरू हुआ था और 2012 में अपने पराभव तक उसमें प्रकाशित सामग्री में समकालीन भारत के राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का दस्तावेज़ीकरण हुआ है। केसरबाग़ मार्ग स्थित नईदुनिया भवन पत्रकारिता, साहित्य और सरोकारों के महत् प्रतिमानों का साक्षी रहा है। इस भवन का ढह जाना एक युग का अंत है। नईदुनिया पढ़कर हिन्दी सीखने वाला, नईदुनिया-स्कूल की आखिरी बैच का यह विनयी छात्र उसे अपनी आदरांजलि व्यक्त करता है!
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