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हिंदी को उसका स्थान आज तक नहीं मिला!

देश की आजादी के समय कहा गया था कि दस साल तक अंग्रेजी रहेगी उसके बाद हिंदी आ जाएगी लेकिन दुर्भाग्य से आज तक दस साल पूरे नहीं हुए। अभी तक हिंदी को उसका स्थान नहीं मिला।  उक्त बात कुलदीप नैयर ने कुलदीप नैयर ने  दिल्ली स्थित गांधी शांतिप्रष्ठिान में नवोदित लेखक जैनेन्द्र जिज्ञासु के उपन्यास ‘पूरब का बेटा’ का लोकार्पण के दौरान कही।  उन्होंने कहा कि यदि कोई जाति, धर्म और क्षेत्र की खाई को पाटने का काम करता है तो यह सराहनीय है । जैसा कि इस उपन्यास का मुख्य पात्र और कुछ और पात्र भी करते हैं। सबसे अच्छी बात है कि इतने संवेदनशील मुद्दे पर किसी युवा लेखक ने हिंदी में लिखा है। देश आजादी से आज तक हिंदी को उसका स्थान नहीं मिला इस के लिए किसी युवा का इस तरह का प्रयास बहुत प्रशंसनीय है।

इस लोकार्पण समारोह में पहली बार लोकार्पित पुस्तक पर आधारित नाटक का मंचन भी किया गया। इस अवसर पर विष्णुप्रभाकर फउंडेशन के सचिव अतुल प्रभाकर, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुशील कुमार, सामाजिक कार्यकर्ता मोहिनी माथुर, और बीना हांडा ने पुस्तक पर अपने विचार दिए। साहित्यकार रचना आभा ने ओजस्वी वाणी से कार्यक्रम का संचालन किया।  कुलदीप नैयर ने हिंदी की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि  आज तक हिंदी को अपना स्थान नहीं मिल सका सविंधान अपने संविधान में कहा गया कि दस साल के लिए अंग्रजी आएगी और फिर हिंदी आजाएगी  और आज तक दस साल पूरे नहीं हुए। हिंदी को उसका स्थान दिलाना होगा।

सुशील कुमार ने पुस्तक के बारे में बताते हुए कहा कि यह आज के समय की कहानी है और बेहद प्राशंगिक है। समाज में उपन्यास के पात्र नारायण काका, नाजिम , मेहरूनिशा और किशोर जैसे लोगों की आवश्यकता है। जैनेन्द्र की यह पुस्तक समाज और देश की कई विषयों पर प्रकाश डालता है। यह पुस्तक के लेखन कि खासियत है कि पढ़ते समय हर दृश्य चलचित्र की तरह गुजरता है। यह लेखक की पहली रचना है इसलिए अधिक आलोचना नहीं होनी चाहिए। पुस्तक के बारे में बताते हुए अतुल प्रभाकर ने कहा कि नए विचार वाले युवा ही इस तरह की पुस्तक की रचना कर सकते हैं। बहुत से विषयों पर एक साथ विचार बनाना मुश्किल है। पर इस पुस्तक में इस युवा लेखक ने अपनी कहानी के माध्यम से कई विषयों पर विचार बनाए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ कमियों के बावजूद लेखक का प्रयास काफी प्रशंसनीय है।

मोहिनी माथुर ने बताया कि लेखक खुद महानगर में सघर्र्ष का जीवन जिया है। काल्पनिकता के बाजूद महानगरों में गांव के लोगों के संघर्ष के बेहतर वर्णन किया है। बीना हांडा ने बताया कि इस पुस्तक की सबसे बड़ी खासियत है कि अलगाववादी राजनीति से लेकर तमाम समस्या पर प्रकाश डालने के साथ ही हर समस्या पर कहीं न कहीं उसका सामाधान खोजने की भी कोशिश करता है। कार्यक्रम के अंत में देव जी द्वारा निर्देशित पुस्तक पर आधारित नाटक की लोगों ने काफी प्रशंसा की। कार्यक्र म में युवा पत्रकारों की संख्या अधिक रही।

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