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साहित्य

राजेंद्र यादव की दैहिक अनुपस्थिति के दस वर्ष पूरे, ‘हंस साहित्योत्सव’ का आयोजन

वीरेंद्र यादव-

28 अक्टूबर को राजेंद्र यादव की दैहिक अनुपस्थिति के दस वर्ष पूरे हो गए। विगत वर्ष की तरह इस वर्ष भी राजेंद्र यादव का स्मरण करते हुए तीन दिवसीय साहित्योत्सव का आयोजन 27, 28, 29 अक्टूबर को नई दिल्ली के इंडिया हैबिटाट सेंटर में किया गया। लुट्यन दिल्ली में यह जनसरोकारों का उत्सव था।

लिट फेस्ट के इस व्यवसायिक दौर में प्रेमचंद और राजेंद्र यादव की परंपरा का वहन करने वाली हिंदी की साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का यह आयोजन कई दृष्टियों से नवीनता लिए हुए था। आयोजन के प्रवेश द्वार से लेकर अंदर तक आयोजन स्थल हिंदी के पुरोधा लेखकों की चित्र प्रदर्शनी से लेकर आयोजन में शिरकत कर रहे लेखकों के चित्रों से सज़ा हुआ था।

यह उन व्यवसायिक लिट फेस्टों की परंपरा का विलोम था जो आयोजित तो साहित्य के नाम पर किये जाते हैं, लेकिन वहाँ जगमगाते हैं फिल्म या पेज थ्री कल्चर के लोग। हिंदी का लेखक तो वहाँ एकाध अपवादों को छोड़कर महज एक फिलर के तौर पर शामिल किया जाता है।

इस आयोजन की उल्लेखनीय विशेषता यह भी थी कि इसका उद्घाटन प्रख्यात दलित लेखक शरण कुमार लिम्बाले ने किया । उन्होंने हिंदी साहित्य की प्रगतिशील धारा को दलित लेखन के प्रस्थान विंदु के रुप में स्मरण करते हुए स्वयं को एक्टिविस्ट राइटर (कार्यकर्ता लेखक) करार दिया।

उद्घाटन सत्र में वयोवृद्ध लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी , अशोक वाजपेयी और मृदुला गर्ग के उद्बोधन द्वारा जहाँ वर्तमान दौर की चुनौतियों को चिंहित किया गया वहीं सक्रिय लेखकीय हस्तक्षेप का आह्वान भी किया गया। ध्यान देने वाली बात यह भी थी कि जिन, दलित, आदिवासी,स्त्री और अल्पसंख्यक सरोकारों को राजेंद्र यादव ने विमर्शकारी बनाया था , उन पर भरपूर चर्चा इस समारोह में हुईं।

कहा जा सकता है कि वर्चस्ववाद का साहित्यिक प्रतिपक्ष यहाँ विमर्शकारी होने के साथ साथ प्रतिरोधी भूमिका में था। दलित, आदिवासी, स्त्री और अल्पसंख्यक स्वर यहाँ पूरी बुलंदी के साथ मौजूद ही नही थे, बल्कि साहित्य की कथित मुख्य धारा को समस्याग्रस्त भी कर रहे थे।

यहाँ प्रेमचंद की साहित्यिक सामाजिक दृष्टि थी , आंबेडकर की संवैधानिक चिंता थी और राजेंद्र यादव के सरोकार थे। यानि यह विचार मंथन का ऐसा मंच था जहाँ लेखकों के साथ समाजशास्त्री, पत्रकार, लोकगायक, फिल्मकार, नाट्यकर्मी व व्यंग्यकार भी अपनी चिंता व सरोकारों को साझा कर रहे थे।

कुल मिलाकर यह आज के दौर में एक गंभीर व सार्थक विचार विनिमय का बहुप्रतीक्षित अवसर था। ‘ हंस’ की प्रबंध संपादक रचना यादव, संपादक संजय सहाय और उनकी टीम ने जिस सांगठनिक दक्षता के साथ इस समूचे आयोजन को सम्पन्न किया, वह सचमुच प्रशंसनीय है। उनकी टीम को बधाई।

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