रमेश आजाद से मिलकर अच्छा भी लगा और दुख भी हुआ!

अमरेन्द्र राय-

बहुत दिनों बाद बहुत पुराने मित्र रमेश आजाद से मिलना हुआ। एक दौर था जब हम अक्सर मिला करते थे। लेकिन जीवन की आपाधापी ने सबकुछ छीन लिया। हमलोगों के साझे मित्र ब्रजमोहन की कनॉट प्लेस में फोटो कॉपी की दुकान थी। मद्रास होटल के पीछे। सेंट्रल न्यूज एजेंसी के पीछे वाले दरवाजे पर दुकान की बगल से होकर जाना पड़ता था।

कनॉट प्लेस में जितना मशहूर मद्रास होटल और सेंट्रल न्यूज एजेंसी थी, साहित्यकारों के बीच उससे ज्यादा मशहूर ब्रजमोहन की फोटोकॉपी वाली दुकान थी। दिल्ली के सारे साहित्यकार तो वहां पहुंचते ही थे, बाहर से आने वाले साहित्यकार भी वहां पहुंचने का लोभ नहीं रोक पाते थे। यहीं मेरी पहली मुलाकात अदम गोंडवी, शलभ श्री राम सिंह, कुबेर दत्त जैसे शीर्ष रचनाकारों से हुई। ब्रजमोहन खुद बहुत अच्छे लेखक और मेहमाननवाज हैं।

मैं, कुबेर दत्त, रमेश आजाद, रमेश बत्रा तो लगभग रोज ही ब्रजमोहन की दुकान पर जाते। मेरा तो पत्राचार का पता भी वह दुकान ही थी। बाद में नौकरी करने मैं मेरठ चला गया और ब्रजमोहन भी फिल्मी दुनिया में काम की संभावना तलाशने मुंबई चले गए। फिल्मों में तो बहुत कामयाबी नहीं मिली लेकिन सीरियलों में खूब नाम कमाया। उनके एक एक साथ अलग अलग चैनलों पर तीन तीन सीरियल चला करते थे।

एक दिन फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। शिवानी आजाद की। उन्होंने बताया आपके मित्र रमेश आजाद की बेटी हूं। उन्हीं से रमेश आजाद के बारे में पता चला। सुनकर दुख हुआ कि रमेश जी को दो बार लकवा का अटैक हुआ। पहली बार तो बिलकुल ठीक हो गए लेकिन दूसरे अटैक ने ज्यादा ही नुकसान पहुंचा दिया। तरह तरह के इलाज और भाभीजी की सेवाओं ने उन्हें काफी हद तक अच्छा कर दिया। लेकिन आवाज अभी भी वापस नहीं हो पाई। बोलते तो हैं पर समझ नहीं आता। ध्यान से सुनने और अंदाजा लगाने से थोड़ा थोड़ा समझ आ जाता है।

रमेश बहुत खुद्दार, मेहनती और जुझारू आदमी थे। 1954 में बिहार में जन्मे रमेश आजाद 20 साल की उम्र में ही 1974 में दिल्ली चले आए थे। जीविकोपार्जन के लिए दिल्ली के छापाखानों और पुस्तक व्यवसाइयों के यहां प्रूफ रीडिंग, जिसे ये मजदूरी कहते हैं, किया करते थे। इसके साथ ही साहित्य लेखन, सांस्कृतिक गतिविधियों और ट्रेड यूनियन आंदोलनों में भी अग्रणी भूमिका निभाते थे।

इनकी कई प्रकाशित पुस्तकें हैं। सुन भाई भालू ( बाल गीतों का संग्रह), डिबिया में गुलाब ( बाल कहानियों का संग्रह ), और कंप्यूटर बैठ गया ( बाल विज्ञान कथाएं ), चौथी धरती का खिलौना, सौ साल की नींद, आसमान ऊपर उठ गया, कंजूस की कहानी, ताड़ भर पानी ( बाल उपन्यास ) दोस्त हैं भींगना नहीं चाहते, अपराधी गैर हाजिर और सरफरुद्दीन बांग्लादेशी है आदि। इनकी रचनाओं के लिए इन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया है, जिसमें दिल्ली हिंदी अकादमी का पुरस्कार भी शामिल है। इनकी पुस्तक दोस्त हैं भींगना नहीं चाहते का आवरण ब्रजमोहन की पत्नी अल्पना ( अब दिवंगत ) ने बनाया है, जबकि सरफरुद्दीन बांग्लादेशी है का आवरण इनकी बेटी शिवानी ने बनाया है। शिवानी बहुत अच्छी पेंटर हैं और वो भी पुस्तक प्रकाशन के कामकाज से ही जुड़ी हैं।

रमेश आजाद से मिलकर अच्छा भी लगा और दुख भी हुआ। रमेश का हौसला अभी भी बना हुआ है। लिखना पढ़ना भले कम हुआ है पर जीवन का उत्साह अभी भी कायम है। लेकिन दुख इस बात का हुआ कि इतना जीवंत आदमी एक कमरे में घिर कर रह गया है।



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