
अर्जुन शर्मा-
शराबी यानि पंजाबी… याद आते रहेंगे रामेश्वर पांडेय जी..
मुझे 1999 अगस्त के अंतिम सप्ताह में बुलावा आया। मुझे अमर उजाला के मेरठ हैडक्वार्टर में इंटरव्यू देना है। मैं पशोपेश में था। नौकरी न करने व अपना ही धंधा जमाने का मेरा निर्णय अडिग था पर इस नई व विचित्र किस्म की जंग का हिस्सा बनने का मोह भी नहीं छूट रहा था। घर वालों ने हौसला दिया कि काम तो चलता रहेगा। आप अपने मूल पेशे में वापिस जाएं।
मेरठ के कार्यालय में रामेश्वर पांडे एक छोटे से कैबिन में बैठे थे। वे पंजाब के आप्रेशन को अमर उजाला के मुख्यालय से ही चला रहे थे। उनके पास मेरा बायोडाटा पहले से ही पड़ा था। जहां शौक वाला कॉलम होता है उसे हरे रंग से मार्क किया हुआ था। उन्होंने अपनी भाव भंगिमाएं गंभीरता से बाहर निकाली व पहला प्रश्न किया कि ये बायोडाटा आपने बाजार से बनवाया है या खुद तैयार किया है। मैं हैरान था, ये क्या सवाल हुआ? मैं चुप रहा। उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि ऐसा विचित्र बायोडाटा पहले तो कभी नहीं देखा। जिसमें आवेदक ने अपने शौक वाले कॉलम में सिंगिंग, रीडिंग के साथ ड्रिंकिंग भी लिखा हो। बाज लोग तो अपने पीने पिलाने के शौक पर सात पर्दे डाल कर रखते हैं। जबकि आपने ड्रिंकिंग को इस तरह बताया है जैसे ये बहुत बढिय़ा शौक हो?
मुझे मन ही मन हंसी आ गई। फिर वे बोले कि पंजाबी तो वैसे ही पीने पिलाने के मामले में बहुत बदनाम लोग होते हैं। उपर से एक आदमी लिखित रूप में खुद को शराबी घोषित कर रहा हो तो उसके बारे में ये जरूर सोचना पड़ेगा कि कहीं वो हमारी प्रतिष्ठा को ही बट्टा न लगवा दे। मेरी हंसी छूट गई। मैने उनसे अग्रिम क्षमा मांगते हुए सवाल किया कि सर क्या आप शराब पीते हैं?
वे खामोश हो गए। फिर बोले कि भई मैं तो शूगर का मरीज हूं। पर कभी कभार घूंट लगा लेने को बुरा नहीं मानता। मेरा जवाब था कि आपने अपने विश्लेषण के बाद मुझे शराबी कहा है पर मेरा जवाब है कि शराबी वो होता है जो शराब पी कर राह चलते लोगों को ललकारता रहे और पिटता रहे। जो अक्सर ही पी कर गिर जाने वाला हो व जिसका नाली में डूबा मुख कुत्ते चाटते हों। वो शराबी होता है। जो शराब पी कर अपने बीवी बच्चों की बिना कारण पिटाई करता हो। पड़ोसियों को बिना वजह गालियां देता हो। वो शराबी होता है। मैं ऐसी किसी कैटिगरी में फिट नहीं हूं। मुझे अपना काम खत्म करने के बाद और सोने से पहले अपने घर बैठ कर तीन चार पैग पीने का शौक है। मेरे पड़ोसी भी नहीं जानते कि मैं शराब पीता हूं। मैं घर से बाहर शराब पीना पसंद नहीं करता। अलबत्ता शादी या किसी समारोह में पीनी भी पड़ जाती है। अब इसके इतर बाकी बातें भी हो जाएं जिसके लिए मैं जालंधर से आपकी इस एतिहासिक नगरी में आया हूं।
पांडेय जी एकदम तन कर बैठ गए। फिर ठहाका मार कर हंसे। उन्होंने कहा कि अतुल जी ने आपका नाम रिक्मेंड किया है। पर ये हरे पेन से गोला भी उन्होंने ही लगाया है। वैसे हमने दरयाफ्त भी कर लिया है कि तुम्हारी शराब को लेकर कोई वैसी शिकायत नहीं है। पर दूसरी बात ये है कि तुमने दस साल के करियर में दस जगह काम किया है। ऐसे अस्थिर स्वभाव के व्यक्ति पर कितना विश्वास किया जाए? मेरा जवाब था कि अपनी अस्थिरता के लिए मैं पूरी तरह से जिम्मेवार नहीं हूं। यदि संस्थान अच्छा माहौल दे, काम करने का मौका दे तो लंबा चलने में कोई दिक्कत नहीं। यदि काम करने का माहौल ही न हो तो आदमी क्या करे? घुट घुट कर जिए?
बात वहीं समाप्त हो गई। मैं पांडेय जी के केबिन से बाहर निकला व कैंटीन में चला गया। साथ में ही लायब्रेरी थी। वहां कुछ लोग मिले जो यू.पी. के दूरदराज से आए हुए थे व पांडे जी के आदेश का इंतजार कर रहे थे। मुझे लगा कि रामेश्वर पांडेय कई संस्करणों के प्रभारी होंगे। मैं सोच ही नहीं सका कि ये यूपी के दूरदराज जिलों से आए लोग पंजाब भी भेजे जा सकते हैं। मुझे सूचना मिलना शेष था कि मुझे कब ज्वायन करना है। मैं जालंधर वापिस आ गया। इधर अमर उजाला की तरफ से बुलावा आ गया। युसूफ किरमानी व ललित मोहन दूबे के अलावा तीसरा मैं था व चौथा बतौर आपरेटर गौरव को रखा गया जो सलमान खान जैसा चिकना लड़का था व हमारी वरिष्ठ पत्रकार साथी मंजुला दिनेश (अब दिवंगत) का बेटा था।
तभी सूचना मिली कि बस्ती बावा खेल स्थित प्रेस परिसर में मेरठ से एक लॉट आया है। किरमानी ने मुझे साथ लिया व हम प्रेस में पहुंच गए। वहां ऊपर की मंजिल पर अभी लकड़ी का काम चल रहा था। वहां रगड़ाई के लिए बने लकड़ी के पैंदों के उपर फट्टे लगा कर कुछ लोग लंबी तान कर सो रहे थे। किरमानी को वो नजारा देख कर बड़ी कोफ्त हुई। उन्होंने जबरदस्ती उन्हें जगाया व हडक़ाया। वो सूरत से सारे प्रवासी मजदूर लग रहे थे। किरमानी ने मुझे बताया कि इन लोगों में से कुछ लोग हमारी अखबार का संपादन करेंगे व कुछ लोग दूसरे स्टेशनों पर जाकर अमर उजाला की कमान संभालेंगे।
मैं हैरान था कि ये तो सारे के सारे यूपी व बिहार से इम्पोर्ट किये लगते हैं। ये लोग कैसे पंजाब के लोगों से तालमेल बिठा पाएंगे। खबरें निकालने के लिए भाषा, पहरावा व स्थानीय होने का तत्व तो बेहद जरूरी है जबकि गुटखा व मसाला लगा रही ये भीड़ सूरत से रिक्शे चलाने वाली लगती है। तब मुझे बताया गया कि अमर उजाला प्रबंधन का ये नीतिगत फैसला है कि पंजाबियों को अखबार से दूर ही रखा जाए। तर्क ये दिया गया कि पंजाब केसरी का ही एकाधिकार रहा होने के कारण पंजाब की पत्रकारिता में कोई विशेष प्राप्ति नहीं है। मैं हक्का बक्का रह गया! जिस पंजाब के लोगों ने देश विदेश तक जा कर सफलता के झंडे गाढ़ दिए। मुंबई जैसे फिल्म जगत में साठ फीसदी से ज्यादा पंजाबी छाए हुए हैं, उस पंजाब में अखबार बेचने आया अमर उजाला पंजाबियों से ही परहेज़ रखेगा! तो ये अखबार किसके लिए होगा व कौन इसका पाठक बनेगा।
पहले पहल मुझे अमर उजाला में काम करते हुए लगता जैसे मैं अपने शहर में न होते हुए यूपी बिहार के किशी शहर में काम करने लगा हूं। जालंधर ब्यूरो में दर्जन भर रिपोर्टरो में मैं एकमात्र पंजाबी था। मेरे चारों तरफ कम्प्यूरों पर बैठी फौज में से कोई गुटखा चबा रहा होता, कोई पान खा रहा होता तो किसी ने भोला का गोला छका होता। पहली मंजिल पर दफ्तर था, उपर जाती सीढ़ियों का दृष्य पान-गुटखामय हो गया था। बिल्डिंग का मालिक रोज किरमानी जी से शिकायत करके जाता कि उसके प्लाजा के बाकी किरायेदार भागने की फिराक में हैं। वहां किसी वकील, सीए या फाईनांस कंपनी के दफ्तर थे। मालिक ने अखबार के दफ्तर की प्रतिष्ठा को देखते बड़े शौक से अमर उजाला को दफ्तर दिया था पर उसकी रोजाना की चीख पुकार का कोई भी रिपोर्टर कोई नोटिस नहीं लेता था।
उपर से रामेश्वर पांडे जी का यह जुमला भी अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा था कि पंजाबी पत्रकार बदमाश व भ्रष्ट होते हैं। फाजिल्का भेजे गए संजय झा वहां बिहारी अंदाज में विचरने लगे थे। होशियारपुर भेजे गए अनिल श्रीवास्तव शाम ढलने का भी इंतजार न कर पाते व घूंट लगा लिया करते। क्राईम रिपोर्टरों, नगर निगम कवर करने वालों ने भी अपने अपने जुगाड़ फिट कर लिए थे।
पंजाब में पंजाबियों को नदरंदाज करने का फैसला संस्थान का था व नीतिगत था। मेरा चुनाव उस नीति को बाईपास करके हुआ था क्योंकि अतुल जी ने मेरा नाम रिकमेंड किया था। रामेश्वर पांडे जी ने प्रबंधन की नीति तो मानी पर पंजाब के साथ फिर भी बेहद घनिष्ठ रिश्ता स्थापित करके गए। वे मेरे साथ अंतिम समय आने तक लगातार संपर्क में थे। वे शानदार दिल के बंदे थे जैसा दिल हमारे पंजाबियों का दो घूंट लगाने के बाद होता है। वे कमाल के जरनैल थे। वे अपनी छोटी सी फौज के दम पर बड़े किले पर सफल आक्रमण करवाने की क्षमता रखते थे। उनका जाना दिल को बेहद आहत कर गया व अमर उजाला के दौर की कई खट्टी मीठी यादें ताजा कर गया।
पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार अर्जुन शर्मा से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.
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