राँची प्रेस क्लब का चुनाव चल रहा है… जो जीतेंगे उनसे क्या हैं अपेक्षाएँ!

निराला बिदेसिया-

रांची प्रेस क्लब का चुनाव हो रहा है. मैं मेंबर नहीं.मेंबर बनने की चाहत है.वर्तमान अध्यक्ष राजेश सिंह भइया ने कई बार कहा कि बन न जा सदस्य. उन्होंने फार्म भी दिया. पर, आलस्यं ही मनुष्यानाम,शरीरस्थो महारिपु: की वजह से फार्म नहीं भर सका. इसलिए अब तक बाहरी ही हूं. अबकी नयी कमिटी बनेगी और नियमानुसार गुंजाइश रहेगी, तो सबसे पहला काम सदस्य बनना ही होगा.किसी संस्था/संस्थान को आकार लेने में वक्त लगता है. एकबारगी से वह खड़ा नहीं हो जाता. रांची प्रेस क्लब अभी नया है. इतने ही कम समय में वह देश का एक मॉडल क्लब बन जाए, व्यावहारिक तौर पर यह संभव नहीं.नयी कार्यकारिणी, पदाधिकारी बनेंगे, उनसे कुछ अपेक्षा है—

  1. रांची प्रेस क्लब में चारो ओर,जहां—जहां गुंजाइश हो, वहां वाल पर पुराने अखबारों—पत्रिकाओं के फ्रंट पेज की तसवीरें लगे. सिर्फ हिंदी,अंग्रेजी नहीं बल्कि दूसरी भाषाओं के भी उन सभी ऐतिहासिक अखबारों—पत्रिकाओं के फ्रंट पेज, जिन पत्र—पत्रिकाओं ने भारतीय पत्रकारिता के सत्व,सरोकार की बुनियाद खड़ा करने में, आगे बढ़ाने में भूमिका निभायी है.
  2. इसी तरह एक विशेष गैलरी झारखंडी भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं का हो. झारखंडी भाषाओं में पत्र-पत्रिकाओं का अपना स्वर्णीम इतिहास रहा है. यहां तो जगदीश त्रिगुणायत जैसे लोग हुए, जिन्होंने अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर प्रेस लगाया था. उन सबके बारे में परिचय कराते हुए तसवीरें हो,गैलरी हो.
  3. साल भर का कैलेंडर बने. देश के तमाम पुरखा पत्रकारों की जयंती या पुण्यतिथि को मिलाकर. उन सबकी तसवीरें बने. फ्रेम करवाकर रखा जाए. सबकी जयंती या पुण्यतिथि पर एक छोटा आयोजन हो. एकल व्याख्यान हो अपने ही पत्रकार साथियों में से किसी का. जिनकी रुचि हो, वे तैयारी करे और आकर बोले. पुरखे पत्रकारों को याद करने का सिलसिला शुरू होगा तो पत्रकारिता में भ्रम का सत्यानाश होगा. पत्रकार भ्रमित नहीं होंगे. ऐसा नहीं होने से ही आजकल कोई भी खड़ा होकर कह देता है कि यह हमने ही पहली बार किया है. न भूतो, न भविष्यति.
  4. प्रेस क्लब के सदस्य व पदाधिकारी नजर रखें कि रांची में कौन विशिष्ट लोग आ रहे हैं. चाहे वे किसी क्षेत्र के हों. फिर पत्रकार साथी अपने स्तर से कोशिश कर उन्हें प्रेस क्लब में लाने की कोशिश करें. वे जहां आ रहे हों, वहां आये,पर एक संवाद उनका पत्रकारों के साथ भी हो. चाहे वे खिलाड़ी हों, कलाकार हों, वैज्ञानिक हों, अभिनेता-अभिनेत्री, लेखक हों, आदि.
  5. लाइब्रेरी चार उपखंडों में हो. एक सेक्शन पत्रकारिता और कम्युनिकेशन की किताबों का. पत्रकारिता की किताबों का मतलब कोर्स की किताबों से नहीं. इसमें पत्रकारिता विधा को लाभ देनेवाली तमाम किताबें हों. रेणूजी के ऋणजल-धनजल, पी साईनाथ के तिसरी फसल, विनोद मेहता की लखनउ ब्वाय से लेकर सभी तरह की किताबें. दूसरा सेक्शन झारखंड से संबंधित हो. झारखंड पर जितनी भी किताबें या दस्तावेज हैं,सब हो. तीसरा सेक्शन पत्रकारों या मीडियाकर्मियों के बाल बच्चों के लिए उपयोगी किताबों का हो. चौथा सेक्शन साहित्य,कला,संस्कृति,समाजविज्ञान,अर्थविज्ञान,राजनीति आदि से संबंधित क्लासिक और जरूरी किताबों का हो.
  6. हर महत्वूपर्ण अवसर पर रांची प्रेस क्लब भी एक खास आयोजन कराये. जैसे अभी आजादी का अमृत वर्ष चल रहा है तो आजादी की लड़ाई में पत्रकारों और पत्रकारिता की भूमिका पर. इसके पहले गांधी की 150वीं जयंती वर्ष का साल गुजरा तो गांधी की पत्रकारिता पर होता. इसी तरह से अवसर आते रहते हैं. ऐसे आयोजन के लिए स्पांसरशिप की तलाश हो.
  7. रांची और झारखंड में अनेक कॉलेज,विश्वविद्यालय आदि हैं, जहां पत्रकारिता की पढ़ाई हो रही है. पत्रकारिता की पढ़ाई या तो पुराने पैटर्न पर होती है या रटे-रटाये फार्मूला पर. नतीजा यह हो रहा है कि वहां से निकलने के बाद विद्यार्थियों के सामने विकल्प कम होते हैं. अकादमीक क्षेत्र में जायें, कारपोरेट कम्युनिकेशन में जायें कि तुरंत पत्रकार बन जायें, यह दुविधा बनी रहती है. पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्र-छात्राओं के लिए सभी संस्थाओं से कोआर्डिनेट कर साल में एक बार या दो बार वर्कशोप या ओरिएंटेशन प्रोग्राम प्रेस क्लब कराये. विशेषज्ञ व्यावहारिक तौर पर बतायें कि अब पत्रकारिता की दिशा-दशा क्या है और आपको किस तरह से अपने को तैयार कर इस पेशे में उतरना चाहिए.
  8. प्रेस क्लब से पत्रकार ही जुड़े रहते हैं तो सम्मिलित और संगठित प्रयास से एक बड़ा कॉर्पस फंड बनाने की पहल हो. प्रेस क्लब के लिए सहयोग,अनुदान आदि लेकर कॉर्पस फंड बने और फंड के ब्याज का उपयोग पत्रकारों व उनके परिजनों के लिए आपाता सहायता या कल्याणकारी योजनाओं में लगे.
  9. रांची प्रेस क्लब अपनी एक पत्रिका निकाले. पत्रिका में विज्ञापन मिलेगा. मेंबरशिप रहेगा. इससे उसे निकालने में संस्था पर अतिरिक्त बजट का दबाव नहीं रहेगा. इसमें देश भर के पत्रकारों से आग्रह कर लिखवाया जाए. रिपोर्टिंग के उनके अनुभव आदि. अंग्रेजी में किसी ने कहीं कुछ लिखा हो तो उसका हिंदी अनुवाद हो. पत्रकारों की या पत्रकारिता पर जो नयी किताबें आ रही हैं, उस पर चर्चा हो. अनेक विषय हो सकते हैं. स्वरूप तो मिलबैठकर तय हो सकता है.
  10. रांची प्रेस क्लब एक फेलोशिप प्रोग्राम चलाये. खासकर झारखंड विषय पर काम करनेवाले पत्रकारों के लिए. उसमें भी विशेषकर कस्बाई पत्रकारों के लिए. इसी तरह से एक सम्मान समारोह भी साल भर में आयोजित कर उन पत्रकारों को सम्मानित करे, जिनके काम का असर रहता है,पर उनके काम को एक दायरे में सिमटा कर रख दिया जाता है.
  11. बाद बाकि तो अनेक काम हैं. माइक्रो लेवल पर एक एक का विस्तार है. बहुत सारा काम तो चल ही रहे हैं.



 

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