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रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

किसी पत्रकार का भाई राजनीति करे ये भले गैर कानूनी ना हो लेकिन पत्रकार की नौकरी के लिए मुफीद नहीं। इससे पत्रकार पर ठप्पा लगना तय है, भले वो ज़िंदगी भर उसी पार्टी की लेनी देनी करता रहा हो। पत्रकार के रिश्तेदारों को ठेकेदारी भी नहीं करनी चाहिए और ना ही ऊंची नौकरी में जाना चाहिए.. हो ना हो ज़रूर पत्रकार ही ठेके दिलवा रहा होगा.. और वो ही नौकरी की भी सिफारिश कर रहा होगा। इस सबके बाद अगर पत्रकार का कोई दूर या पास का रिश्तेदार किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए.. फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा तो भी ये पत्रकार की ही गलती है।

आखिर उसके घर के सभी लोग संस्कारी क्यों नहीं हैं ? क्या हक है किसी ऐसे आदमी को पत्रकारिता करने का जिसके घरबार-परिवार में किसी का नाम किसी कानूनी मामले में आ जाए? इस देश में बिज़नेस, सरकारी नौकरी और राजनीति भले किसी नैतिक दबाव से मुक्त हो कर की जा सकते हों लेकिन पत्रकारिता करने के नियम बेहद कड़े हैं और मई 2014 के बाद तो ये और भी मुश्किल हो गए हैं। खैर, नया फैशन ये है कि जो पत्रकार आपके रुझान के मुफीद ना पड़ता हो और लड़कीबाज़ी से लेकर कमीशनखोरी तक के इल्ज़ाम उस पर ना टिकते हों तो फिर पत्रकार के रिश्तेदारों का कंधा सीधा कीजिए और उस पर बंदूक रखकर पत्रकार को गोली मार दीजिए।

यहां टीवी पर फिरौती लेते पत्रकार देखे गए हैं.. नकली स्टिंग चलाकर चैनल बैन करवा डालने वाले पत्रकार देखे गए हैं.. और ना जाने कहां-कहां क्या-क्या करनेवाले पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान भी देखे गए हैं (लिस्ट बनानी शुरू करूं तो वो भी शर्मसार होंगे जो कल अपनी पोस्टों में नैतिक ज्ञान बघार रहे थे.. उनके संस्थानों में लड़कियों के साथ क्या कुछ होता रहा है इन करतूतों की अधिक जानकारी के लिए Yashwant भाई का भड़ास पढ़ा जा सकता है)। इस देश ने फिरौती वसूलने के बाद कई साल तक अपनी इमेज मेकिंग के लिए अति राष्ट्रवादी और धार्मिक उन्माद फैलानेवाली पत्रकारिता करनेवालों को माफ किया है पर मैं देश की जनता से मांग करता हूं कि ऐसे पत्रकार को माफ ना किया जाए जिसका भाई अपने प्रदेश में मर चुकी एक पार्टी से राजनीति तो करता ही है, साथ में उस पर किसी नेता की ही बेटी आरोप लगा दे। वैसे मामला और निशाना दोनों समझनेवाले सब समझ रहे हैं लेकिन दिक्कत दो तरह के लोगों के साथ है। एक तो वो हैं जो किसी भी हाल में महिलावादी या दलितवादी दिखने को मजबूर हैं ( वजह वो ही जानें) और दूसरे वो जिन्हें मामले में दिलचस्पी कम बल्कि पत्रकार के चीर हरण में आनंद ज़्यादा आ रहा है (वजह सबको पता है)।

किसी को डिफेंड करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन रवीश को करूंगा। उन्हें इसलिए नहीं करूंगा कि मैं उनका कोई फैन-वैन हूं बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि एजेंडेबाज़ी का ये खेल यहीं नहीं थमनेवाला। अगर रवीश कुमार को गिराए जाने में कायमाबी मिल गई तो फिर इस्टेब्लिशमेंट के सामने खड़ा हर पत्रकार इसी रणनीति से गिराया जाएगा। अपने यारों,दोस्तों, रिश्तेदारों के कारनामों से अपना चरित्र जज होने से बचाने के लिए हर छोटे- बड़े पत्रकार को करियर की शुरूआत में ही अखबार में विज्ञापन निकलवाना पड़ेगा। उसमें पत्रकार घोषित करेगा कि, ”आज और अभी से मैं अपने सभी नाते-रिश्तेदारों से सारे संबंध खत्म कर रहा हूं। इनके किए-अनकिए के ज़िम्मेदार यही होंगे, मैं नहीं। मेरी निष्ठाओं को इनकी करतूतों पर ना परखा जाए।” ये घोषणा भले इस मुल्क के नेताओं को करने के लिए मजबूर ना होना पड़े.. नौकरशाहों से ना कराई जाएं लेकिन पत्रकारों से ज़रूर करवाएं.. आखिर देश के सारे फैसले वो ही तो लेेते हैं और आपकी ज़िंदगी के ना जाने कितने फैसले पत्रकार ही प्रभावित कर रहे हैं! पत्रकार ना हों तो देश आज ही चांद पर कॉलोनी बना ले। आपके खातों में 15 लाख भी आ जाएँ। समाजवाद का सपना ये पत्रकार प्रजाति ही रोक कर खड़ी है।

अब अंत में एक और बात.. लड़की ने आरोप लगाए हैं तो उसकी एफआईआर भी दर्ज हुई.. तुरंत कार्रवाई करते हुए मामला सीआईडी के हाथों में दिया गया। एसआईटी ने जांच करते हुए लड़की के आरोपों को सही भी पाया। नीतीश कुमार की पुलिस की तारीफ होनी चाहिए। इतनी जल्दी कार्रवाई गुजरात के कच्छ में नहीं हुई जहां पर एक लड़की ने बीजेपी के कई आला नेताओँ पर लड़कियां सप्लाई करने का आरोप लगाया था और बाकायदा अपनी वीडियो क्लिप के साथ सामने आई थी। उसने रैकेट के बारे में सबूत भी दिए थे। यहां मसला और ही कुछ है।

लड़की ने 22 दिसंबर को एफआईआर में एक लड़के निखिल, उसके पिता और भाई का नाम डलवाया। भाई पर जातिसूचक गाली देने के आरोप भी लगाए।याद रहे कि आरोप छेड़छाड़ के थे, रेप के नहीं। यहां तक ब्रजेश पांडे कहानी में नहीं हैं। खैर, पुलिस एक हद तक दबाव डालकर अक्सर एफआईआर हल्की करा देती है इसलिए बाद में मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में बयान लिए जाते हैं और वही आखिरी माने भी जाते हैं। दो दिन बाद कोर्ट में यही लड़की धारा 164 के तहत बयान देती है और निखिल नाम के मुख्य अभियुक्त पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाती है। यहां भी ब्रजेश पांडे का नाम कहीं नहीं है। 30 दिसंबर को सीआईडी ने मामला हाथ में लिया मगर पीड़िता ने बार-बार बयान देने के बावजूद ब्रजेश पांडे का नाम नहीं लिया। सीआईडी ने जो एसआईटी बनाई उसकी जांच में एक महीने के बाद लड़की ने एक पार्टी में ब्रजेश पांडे से मिलने और छेड़छाड़ के इल्ज़ाम लगाए।

बिहार के टीवी पत्रकार Santosh Singh ने मामले की तफ्तीश की है। सारे कागज़ निकलवाए और मामले की प्रक्रिया देखी। उन्होंने फेसबुक पर ही सारी जानकारी तारीख के हिसाब से दी है और ये भी लिखा है कि पीड़िता ने ब्रजेश पांडे को फेसबुक पर देखा कि ये निखिल की फ्रेंड लिस्ट में हैं। पीड़िता का कहना है कि इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो। पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल की अवारागर्दी की चर्चा खूब की। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया।

वैसे मैंने भी शिकायतकर्ता लड़की के आरोप सुने हैं। पत्रकार ने पूछा कि सैक्स रैकेट चलाने वाली बात कैसे कह सकती हैं तो उसने कहा कि चूंकि निखिल ने मुझे ब्रजेश के साथ दिल्ली जाने को कहा था तो मुझे उससे लगता है। लड़की ने जो पत्रकार से कहा उससे ये भी मालूम चलता है कि वो निखिल से शादी करना चाहती थी और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तब वो उसके पिता से मिलने पहुंची थी। वैसे लड़की की पहचान नहीं खोलनी चाहिए लेकिन अब चूंकि वो खुद मीडिया में इंटरव्यू दे रही है और बीजेपी नेताओं ने काफी हद तक पहचान खोल दी है तो इतना तो जान ही लीजिए कि उसका बैकग्राउंड कमज़ोर कतई नहीं है, अच्छा खासा पॉलिटिकल है तो संभावनाएं और आशंकाएं खूब हैं। बहरहाल लड़की का मीडिया ट्रायल करना गलत है, भले वो खुद मीडिया तक आई है.. लेकिन उतना ही गलत उस पत्रकार का मीडिया ट्रायल भी है जो खुद इसमें कहीं से शामिल नहीं। हां, अगर किसी को मज़ा ही रवीश कुमार को फंसाने में आ रहा हो तो बात अलग है। केजरीवाल को काबू करने के सिलसिले में जब केंद्र उनके खिलाफ कुछ ना ढूंढ सका तो विधायकों को जिस बेशर्मी से औने-पौने मामलों में जेल भेजा गया वो सबके सामने है.. ये अलग बात है कि ऐसे ही मामलों में फंसे होने के बावजूद ना स्मृति ईरानी को छेड़ा गया और ना ही निहालचंद को।

सोशल मीडिया के चर्चित और जनपक्षधर लेखक नितिन ठाकुर की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

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