रवीश जी, अगर Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये!

Divakar Singh : रवीश जी, आपने सही लिखा हमारी मीडिया रीढविहीन है. साथ ही नेता भी चाहते हैं मीडिया उनकी चाटुकारिता करती रहे. आप बधाई के पात्र हैं यह मुद्दे उठाने के लिए. पर क्या बस इतना बोलने से डबल स्टैंडर्ड्स को स्वीकार कर लिया जाए? आप कहते हैं कि ED या CBI की जांच नहीं हुई तो कोई मानहानि नहीं हुई. आप स्वयं जानते होंगे कितनी हलकी बात कह दी है आपने. दूसरा लॉजिक ये कि अमित शाह स्वयं क्यों नहीं आये बोलने. अगर वो आते तो आप कहते वो पिता हैं मुजरिम के, इसलिए उनकी बात का कोई महत्त्व नहीं. तीसरी बात आप इतने उत्तेजित रोबर्ट वाड्रा वगैरह के मामले में नहीं हुए. यहाँ आप तुरंत अत्यधिक सक्रिय हो गए और अतार्किक बातें करने लगे. ठीक है नेता भ्रष्ट होते हैं, मानते हैं, पर कम से कम तार्किक तो रहिये, अगर निष्पक्ष नहीं रह सकते.

हालांकि हम जैसे लोग जो आपका शो पसंद करते हैं, चाहते हैं कि आप निष्पक्ष भी रहें. किसी ईमानदार पत्रकार का एक गुट के विरोध में और दूसरे के समर्थन में हर समय बोलते रहना एक गंभीर समस्या है, जिसमें आप जैसे आदरणीय (मेरी निगाह में) पत्रकार हठधर्मिता के साथ शामिल हैं. मोदी सरकार के कट्टर समर्थक मीडिया को आप बुरा मानते हैं, तो कट्टर विरोधी जोकि तर्कहीन होकर आलोचना करने लग जाते हैं, उतने ही बुरे हैं. एक और बात भी आपसे कहना चाह रहा था. आप को शायद बुरा लगा कि भारत की मीडिया कुछ कर नहीं पा रही है और ऑस्ट्रेलिया की मीडिया बहुत बढ़िया है.

क्या आप जानते हैं कि आप जिस इंडस्ट्री में है, उसके लिए भारत में सबसे धाकड़ मीडिया स्तम्भ कौन सा है? कुछ महीने पहले आपने हिंदी मीडिया के कुछ पोर्टल गिनाये थे, कल फिर कुछ गिनाये थे. Yashwant Singh से कुछ पर्सनल खुन्नस है तो कम से कम उनके काम की तो तारीफ कर दीजिये, जो वो तमाम पत्रकारों के हित में करते हैं. उनको भी थोडा महत्त्व दें जब आप हिंदी मीडिया की बात करते हैं. नहीं तो आप भी मोदी और शाह के लीक में शामिल नहीं हैं जो अपने आलोचक को तवज्जो नहीं देते? तो सर मुख्य समस्या डबल स्टैंडर्ड्स की है. सोचियेगा जरूर. न सोचेंगे तो भी ठीक. जो है सो हईये है.

एक आईटी कंपनी के मालिक दिवाकर सिंह ने उपरोक्त कमेंट एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार के जिस एफबी पोस्ट पर किया है, वह इस प्रकार है—

Ravish Kumar : मानहानि- मानहानि: घोघो रानी, कितना पानी… आस्ट्रेलिया के जिन शहरों का नाम हम लोग क्रिकेट मैच के कारण जानते थे, वहां पर एक भारतीय कंपनी के ख़िलाफ़ लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। शनिवार को एडिलेड, कैनबरा, सिडनी, ब्रिसबेन, मेलबर्न, गोल्ड कोस्ट, पोर्ट डगलस में प्रदर्शन हुए हैं। शनिवार को आस्ट्रेलिया भर में 45 प्रदर्शन हुए हैं। अदानी वापस जाओ और अदानी को रोको टाइप के नारे लग रहे हैं। वहां के करदाता नहीं चाहते हैं कि इस प्रोजेक्ट की सब्सिडी उनके पैसे से दी जाए।

अदानी ग्रुप के सीईओ का बयान छपा है कि प्रदर्शन सही तस्वीर नहीं है। स्तानीय लोग महारा समर्थन कर रहे हैं। जेयाकुरा जनकराज का कहना है कि जल्दी ही काम शुरू होगा और नौकरियां मिलने लगेंगी। यहां का कोयला भारत जाकर वहां के गांवों को बिजली से रौशन करेगा। पिछले हफ्ते आस्ट्रेलिया के चैनल एबीसी ने अदानी ग्रुप पर एक लंबी डाक्यूमेंट्री बना कर दिखाई। इसका लिंक आपको शेयर किया था। युवा पत्रकार उस लिंक को ज़रूर देखें, भारत में अब ऐसी रिपोर्टिंग बंद ही हो चुकी है। इसलिए देख कर आहें भर सकते हैं। अच्छी बात है कि उस डाक्यूमेंट्री में प्रशांत भूषण हैं, प्रांजॉय गुहा ठाकुरता हैं।

प्रांजॉय गुहा ठाकुरता ने जब EPW में अदानी ग्रुप के बारे में ख़बर छापी तो उन पर कंपनी ने मानहानि कर दिया और नौकरी भी चली गई। अभी तक ऐसी कोई ख़बर निगाह से नहीं गुज़री है कि अदानी ग्रुप ने एबीसी चैनल पर मानहानि का दावा किया हो। स्वदेशी पत्रकारों पर मानहानि। विदेशी पत्रकारों पर मानहानि नहीं। अगर वायर की ख़बर एबीसी चैनल दिखाता तो शायद अमित शाह के बेटे जय शाह मानहानि भी नहीं करते। क्या हमारे वकील, कंपनी वाले विदेशी संपादकों या चैनलों पर मानहानि करने से डरते हैं?

एक सवाल मेरा भी है। क्या अंग्रेज़ी अख़बारों में छपी ख़बरों का हिन्दी में अनुवाद करने पर भी मानहानि हो जाती है? अनुवाद की ख़बरों या पोस्ट से मानहानि का रेट कैसे तय होता है, शेयर करने वालों या शेयर किए गए पोस्ट पर लाइक करने वालों पर मानहानि का रेट कैसे तय होता है? चार आना, पांच आना के हिसाब से या एक एक रुपया प्रति लाइक के हिसाब से?

पीयूष गोयल को प्रेस कांफ्रेंस कर इसका भी रेट बता देना चाहिए कि ताकि हम लोग न तो अनुवाद करें, न शेयर करें न लाइक करें। सरकार जिसके साथ रहे, उसका मान ही मान करें। सम्मान ही सम्मान करें। न सवाल करें न सर उठाएं। हम बच्चे भी खेलते हुए गाएं- मानहानि मानहानि, घोघो रानी कितना पानी। पांच लाख, दस लाख, एक करोड़, सौ करोड़।
यह सब इसलिए किया जा रहा है कि भीतरखाने की ख़बरों को छापने का जोखिम कोई नहीं उठा सके। इससे सभी को संकेत चला जाता है कि दंडवत हो, दंडवत ही रहो। विज्ञापन रूकवा कर धनहानि करवा देंगे और दूसरा कोर्ट में लेकर मानहानि करवा देंगे। अब यह सब होगा तो पत्रकार तो किसी बड़े शख्स पर हाथ ही नहीं डालेगा। ये नेता लोग जो दिन भर झूठ बोलते रहते हैं,

क्या इनके ख़िलाफ़ मानहानि होती रहे?

अमित शाह एक राजनीतिक शख्स हैं। तमाम आरोप लगते रहे हैं। वे उसका सामना भी करते हैं, जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। वायर की ख़बर में आरोप तो हैं नहीं। जो कंपनी ने रिकार्ड जमा किए हैं उसी का विश्लेषण है। फिर कंपनी रजिस्ट्रार को दस्तावेज़ जमा कराने और उस आधार पर लिखने या बोलने से समस्या है तो ये भी बंद करवा दीजिए।

अमित शाह के बेटे के बारे में ख़बर छपी। पिता पर तो फेक एनकाउंटर मामलों में आरोप लगे और बरी भी हुए। सोहराबुद्दीन मामले में तो सीबीआई ट्रायल कोर्ट के फैसले पर अपील ही नहीं कर रही है। उन पर करप्शन के आरोप नहीं लगे हैं। इसके बाद भी अमित शाह आए दिन राजनीतिक आरोपों का सामना करते रहते हैं। जवाब भी देते हैं और नज़रअंदाज़ भी करते हैं। कायदे से उन्हें ही आकर बोलना चाहिए था कि पुत्र ने मेरी हैसियत का कोई लाभ नहीं लिया है। मगर रेल मंत्री बोलने आ गए। मानहानि का फैसला अगर पुत्र का था तो रेल मंत्री क्यों एलान कर रहे थे?

इस ख़बर से ऐसी क्या मानहानि हो गई? किसी टीवी चैनल ने इस पर चर्चा कर दी? नहीं न। सब तो चुप ही थे। चुप रहते भी। रहेंगे भी। कई बार ख़बरें समझ नहीं आती, दूसरे के दस्तावेज़ पर कोई तीसरा जिम्मा नहीं उठाता, कई बार चैनल या अखबार रूक कर देखना चाहते हैं कि यह ख़बर कैसे आकार ले रही है? राजनीति में किस तरह से और तथ्यात्मक रूप से किस तरह से। यह ज़रूरी नहीं कि टीवी दूसरे संस्थान की ख़बर को करे ही। वैसे टीवी कई बार करता है। कई बार नहीं करता है। हमीं एक हफ्ते से उच्च शिक्षा की हालत पर प्राइम टाइम कर रहे हैं, किसी ने नोटिस नहीं लिया।

लेकिन, जब चैनलों ने कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस का बहिष्कार किया तो उन्हें पीयूष गोयल की प्रेस कांफ्रेंस का भी बहिष्कार करना चाहिए था। जब सिब्बल का नहीं दिखाए तो गोयल का क्यों दिखा रहे थे? अव्वल तो दोनों को ही दिखाना चाहिए था। लाइव या बाद में उसका कुछ हिस्सा दिखा सकते थे या दोनों का लाइव दिखा कर बाद में नहीं दिखाते। यह मामला तो सीधे सीधे विपक्ष को जनता तक पहुंचने से रोकने का है। सिब्बल वकील हैं। उन्हें भी अदालत में विपक्ष के स्पेस के लिए जाना चाहिए। बहस छेड़नी चाहिए।
इस तरह से दो काम हो रहे हैं। मीडिया में विपक्ष को दिखाया नहीं जा रहा है और फिर पूछा जा रहा है कि विपक्ष है कहां। वो तो दिखाई ही नहीं देता है। दूसरा, प्रेस को डराया जा रहा है कि ऐसी ख़बरों पर हाथ मत डालो, ताकि हम कह सके कि हमारे ख़िलाफ़ एक भी करप्शन का आरोप नहीं है। ये सब होने के बाद भी चुनाव में पैसा उसी तरह बह रहा है। उससे ज़्यादा बहने वाला है। देख लीजिएगा और हो सके तो गिन लीजिए।

एक सवाल और है। क्या वायर की ख़बर पढ़ने के बाद सीबीआई अमित शाह के बेटे के घर पहुंच गई, आयकर अधिकारी पहुंच गए? जब ऐसा हुआ नहीं और जब ऐसा होगा भी नहीं तो फिर क्या डरना। फिर मानहानि कैसे हो गई? फर्ज़ी मुकदमा होने का भी चांस नहीं है। असली तो दूर की बात है। एबीसी चैनल ने अदानी ग्रुप की ख़बर दिखाई तो

ENFORCEMENT DEPARTMENT यानी ED अदानी के यहां छापे मारने लगा क्या? नहीं न। तो फिर मानहानि क्या हुई?

अदालत को भी आदेश देना चाहिए कि ख़बर सही है या ग़लत, इसकी जांच सीबीआई करे, ईडी करे, आयकर विभाग करे फिर सबूत लेकर आए, उन सबूतों पर फैसला हो। ख़बर सही थी या नहीं। ख़बर ग़लत इरादे से छापी गई या यह एक विशुद्ध पत्रकारीय कर्म था।

एक तरीका यह भी हो सकता था। इस ख़बर का बदला लेने के लिए किसी विपक्ष के नेता के यहां लाइव रेड करवा दिया जाता। जैसा कि हो रहा है और जैसा कि होता रहेगा। सीबीआई, आयकर विभाग, ईडी इनके अधिकारी तो पान खाने के नाम पर भी विपक्ष के नेता के यहां रेड मार आते हैं। किसी विपक्ष के नेता की सीडी तो बनी ही होगी, गुजरात में चुनाव होने वाले हैं, किसी न किसी को बन ही गई होगी। बिहार चुनाव में भी सीडी बनी थी। जिनकी बनी थी पता नहीं क्या हुआ उन मामलों में। ये सब आज से ही शुरू कर दिया जाए और आई टी सेल लगाकर काउंटर कर दिया जाए।

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न्यूज़ एंकर हमारे समय का थानेदार है, गुंडा है और बाहुबली है : रवीश कुमार

एक ऐसे वक्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, सहनशीलता को कुचल रही है, अपमान का संस्कार स्थापित कर रही है, उसी वक्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना उस घड़ी को देखना है जो अभी भी टिक-टिक करती है। दशकों पहले दीवारों पर टिक टिक करने वाली घड़ियां ख़ामोश हो गई। हमने आहट से वक्त को पहचानना छोड़ दिया। इसलिए पता नहीं चलता कि कब कौन सा वक्त बगल में आकर बैठ गया है। हम सब आंधियों के उपभोक्ता है। लोग अब आंधियों से मुकाबला नहीं करते हैं। उनका उपभोग करते हैं। आंधियां बैरोमीटर हैं, जिससे पता चलता है कि सिस्टम और समाज में यथास्थिति बरकरार है। …

(दोनों तस्वीरें कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह ने अपने मोबाइल से उतारीं, इसलिए फोटो श्रेय उन्हीं को.)

असली डिग्री बनाम फ़र्ज़ी डिग्री के इस दौर में थर्ड डिग्री नए नए रूपों में वापस आ गई है। न्यूज़ एकंर हमारे समय का थानेदार है। टीवी की हर शाम एक लॉक अप की शाम है। एंकर हाजत में लोगों को बंद कर धुलाई करता है। एंकर हमारे समय का गुंडा है। बाहुबली है। हुज़ूर के ख़िलाफ़ बोलने वाला बाग़ी है। हुज़ूर ही धर्म हैं, हुज़ूर ही राष्ट्र हैं, हुज़ूर ही विकास हैं। प्राइम टाइम के लॉक अप में विपक्ष होना अपराध है। विकल्प होना घोर अपराध है। तथ्य होना दुराचार है। सत्य होना पाप है। इसके बाद भी आप सभी ने एक न्यूज़ एंकर को पहले पुरस्कार के लिए चुना है यह इस बात का प्रमाण है कि दुनिया में (पुरस्कार देने का) जोखिम उठाने वाले अब भी बचे हुए हैं। हम आपके आभारी हैं। …

गांधीवादी, अंबेडकरवादी, समाजवादी और वामपंथी। आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं। बोन्साई का बाग़ीचा बनने से बचिये। आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है। वहां परिवारवाद हावी हुआ है। वहां कोरपोरेटवाद हावी हुआ है। उनमें सांप्रदायिकता स लड़ने की शक्ति न पहले थी न अब है। फिर उनके लिए अफसोस क्यों हैं। अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को यह चुनौती स्वीकार करनी चाहिए। मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं कि राजनीतिक दलों की तरफ लौटिये। सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलना चाहिए। सेमिनार अकादमिक विमर्श की जगह है। राजनीतिक विकल्प की जगह नहीं है। राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन होना चाहिए। …

न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वाशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाएं। मैं न्यूयार्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं, लेकिन उसी ख़राबे में यह भी देखने को मिल रहा है। भारत के न्यूज़ रूम में पत्रकार विदा हो रहे हैं। सूचना की आमद के रास्ते बंद है। ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है। एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त है। वो पत्रकार नहीं है। सरकार का सेल्समैन है। .. प्रेस रिलीज तो पहले भी छाप रहे थे। फर्क यही आया है कि अब छाप ही नहीं रहे हैं बल्कि गा भी रहे हैं। यह कोई मुंबई वाला ही कर सकता है। चाटुकारिता का भी इंडियन आइडल होना चाहिए। पत्रकारों को बुलाना चाहिए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है। …

न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं। एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है। राजनीतिक विकल्प बनाने के लिए इन नए राजनीतिक दलों से भी लड़ना पड़ेगा। नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं। जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो गई है कि कई लोग कहने आ जाते हैं कि आप सवाल क्यों करते हैं। स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। पत्रकारिता का वर्तमान प्रोपेगैंडा का वर्तमान है। …

नैयर सम्मान से सम्मानित किए जाने के दौरान एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार द्वारा दिए गए वक्तव्य का कुछ अंश.

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एक लाख रुपये वाला ‘कुलदीप नैयर सम्मान’ पत्रकार रवीश कुमार को देने की घोषणा

Om Thanvi : भाषाई पत्रकारिता के लिए स्थापित पहला कुलदीप नैयर सम्मान संजीदा पत्रकार रवीश कुमार को दिया जाएगा। प्रेस क्लब, दिल्ली में इसकी घोषणा आज सम्मान समिति के अध्यक्ष आशीष नंदी ने की। इस मौक़े पर कुलदीप नैयर भी मौजूद थे। सम्मान में प्रशस्ति के साथ एक लाख रुपए की राशि दी जाएगी।

सम्मान का आयोजन गांधी शांति प्रतिष्ठान के तत्वावधान में हुआ है। प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत ने बताया कि यह सम्मान हर वर्ष दिया जाएगा। सुपात्र का निर्णय सात सदस्यों की समिति करेगी। रवीश कुमार को हार्दिक बधाई।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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इंडिया टीवी के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के नाम खुला ख़त…

जमशेद क़मर सिद्दीक़ी


प्रिय अभिषेक उपाध्याय

बीते एक हफ्ते में आपने फेसबुक पर जो कुंठा ज़ाहिर की है, उससे अब घिन आने लगी है। सुना है आपने खाना-पीना छोड़ दिया है। खुद को संभालिये, आप ‘वो’ नहीं बन सकते इस सच को जितनी जल्दी स्वीकार लेंगे आपको आराम हो जाएगा। लकीर को मिटाकर बड़ा नहीं बन सकते आप, आपको बड़ी लकीर खींचना सीखना होगा, अपने सीनियर्स से सीखिये उन पर कीचड़ मत उछालिये। हालांकि इस मामले में आपकी चुस्ती देखकर मुझे अच्छा भी लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे ‘स्वर्ग की सीढ़ियां’, ‘नाग-नागिन का डांस’ और ‘क्या एलियंस गाय का दूध पीते हैं’ जैसी स्टोरीज़ में अब आपकी दिलचस्पी कम हो गई है। ये अच्छा संकेत है, मुबारकबाद।

आपकी हालिया पोस्ट पढ़कर महसूस हो रहा है जैसे पत्रकारिता की दुनिया में एक नए नारीवादी पत्रकार ने जन्म लिया है, जो महिला के एक आरोप भर से इतना आहत है कि खाना पीना छोड़ दिया है, सड़क पर बदहवास होकर दाएं-बाएं भाग रहा है, लेकिन फिर मैं ये सोचकर उदास हो जाता हूं कि काश ये क्रांति की ज्वाला थोड़ा पहले जल गई होती तो उस दोपहर आपको प्रेस क्लब में आपके आका रजत शर्मा के लिए किसी बाउंसर की तरह बर्ताव करते न देखता, जिन पर और जिनकी पत्नी पर इंडिया टीवी की एंकर ने गंभीर आरोप लगाए थे।

आरोप भी वही थे जो अब आपको ना काबिले बर्दाश्त लग रहे हैं। वो एंकर मेरी सहकर्मी भी रह चुकी हैं इसलिए मैं समझता हूं कि वो किस पीड़ा से गुज़री थीं जब उन्होंने फेसबुक पर अपना सुसाइड नोट लगाया था। इंडिया टीवी पर तब उस ख़बर के न चलने पर आपने छाती नहीं पीटी थी। काश आपका नारीवाद तब अपने मालिक के नमक का हक अदा करने न गया होता तो कितना अच्छा होता, वैसे मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं आप नारीवाद के झंडाबरदार के तौर पर अपना नाम दर्ज कराना चाहते हैं तो कराइये लेकिन उससे पहले अपने अंदर के जातिवाद के मैल को साफ कीजिए। आपकी हालिया पोस्ट में आप रवीश कुमार को ये कहकर टारगेट कर रहे हैं कि वो रवीश पांडेय है तो पांडेय क्यों नहीं लगाते? पढ़ाई-लिखाई सब बेच खाई है क्या? ये भी कोई गुनाह है?

मेरा दरख्वास्त है आपसे कि फैज़, दुष्यंत कुमार और बाबा नागर्जुन का नाम बार-बार लेने से परहेज़ कीजिए उनकी आत्माएं तड़पती होंगी। ओम थान्वी जैसे वरिष्ठ पत्रकार के शरीर का मज़ाक उड़ाते हुए उन्हें थुलथुल थान्वी लिखते हुए आपको शर्म आई होगी या नहीं, इस पर अलग से बात की जा सकती है लेकिन हां, कभी अकेले में आइने के सामने खड़े होकर खुद से पूछिएगा कि जिस पत्रकारिता के उसूलों की फिक्र में आप दुबले हुए जा रहे हैं वो तब कहां गए थे जब क़मर वहीद नकवी साहब ने आपके संस्थान से इसलिए इस्तीफा दे दिया था क्योंकि आप प्रधानमंत्री का पेड इंटरव्यू चला रहे थे? तब वो मशालें कहां छुपा दी थी आपने जिन्हें अब झाड़-पोंछ कर सुलगा रहे हैं।

मैं मानता हूं आपके लिए नौकरी बड़ी चीज़ है, घर-परिवार की ज़िम्मेदारी है, मकान की किश्तें हैं, बच्चों की स्कूल फीस है लेकिन फिर भी आपको इतनी हिम्मत तो दिखानी चाहिए थी कि एक बार अपने मालिक से पूछते “सर, आपको ‘कला और साहित्य’ में पद्म भूषण तो मिला है लेकिन कला-साहित्य में आपका क्या योगदान है?” मानता हूं डर लगता होगा आपको, लेकिन सारी दिलेरी सिर्फ अपनी कुंठा निकालने के लिए दिखाना ग़लत है, धोखेबाज़ी है। आपकी घटिया और दो कोड़ी की फूहड़ कविताएं अक्सर फेसबुक पर देखते हुए नज़रअंदाज़ करता था लेकिन अब आप पोस्ट से भी गंदगी फैला रहे हैं इसलिए लिखना पड़ा। उम्मीद है आप खाना-पीना वापस खाना शुरू कर देंगे, इतनी नाराज़गी ठीक नहीं है।

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जमशेद क़मर सिद्दीक़ी

विभिन्न टीवी चैनलों में काम कर चुके जमशेद कमर सिद्दीक़ी फिलहाल ‘गाँव कनेक्शन’ में स्पेशल कॉरसपोंडेट हैं। वो रेड एफएम के लिए कहानियां भी लिखते हैं। इनसे jamshed@gaonconnection.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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रवीश को रवीश में उलझाना एक साज़िश है!

Sheeba Aslam Fehmi : जबकि पत्रकारिता पर गहरा नैतिक संकट आया हुआ है और मौजूदा दौर के लिए ज़रूरी हैं रवीश कुमार, तो सत्ता यही चाहेगी की रवीश खुद खबर बन जाएं और सफाई देने में उलझे रहें. लेकिन हमें सतर्क रहना होगा. इस मामले में रवीश खुद बेहद सतर्क हैं. अपने काम में निजी जीवन का कोई पहलू कभी आड़े ना आये इसके लिए उनके कई नियम और त्याग तो मैं भी जानती हूँ.

बिहार चुनाव के दौरान जब क़रीबी रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे थे तो वो उनके क्षेत्र के आस-पास भी नहीं फटके. हालाँकि बिहार कवर कर रहे थे लेकिन राजनैतिक रिपोर्टिंग की ही नहीं जिससे कोई ये न कहे की अमुक पार्टी की तरफ झुकाव रहा या दुराव रहा. भाभी बुरा भी मान गयीं हों लेकिन नहीं गए.

ऐसा ही एक और निषेध जो उन्होंने खुद पर लगा रखा है वो ये की सिफारिश का फ़ोन कभी नहीं करेंगे, सिर्फ क्रिटिकल मरीज़ के लिए ही अब तक फ़ोन घुमाया है वरना कोई कितना भी सगा हो या मित्रवत हो, सिफारिशी फ़ोन नहीं करेंगे.

किसी ऐसी शादी में शरीक नहीं होंगे जिसमे दहेज़ का आदान-प्रदान हो चाहें परिवार में ही क्यों न हो.

और हाँ बेटी के एडमिशन के समय पेरेंट्स के बतौर दोनों पति-पत्नी ने एक नयी भाषा सीखने में कितनी मेहनत की ये बात भी यहाँ बताने लायक़ है. रसूख या सेलिब्रिटी स्टेटस का इस्तेमाल नहीं किया, नियम के तहत सभी मरहले तय किये.

इसके अलावा ईमानदार और बेलाग पत्रकारिता के जो नुकसान सगे संबंधी झेल रहे हैं, उनके उलाहने अलग है. दोनों तरफ से पिस कर ये शख्स संयम बनाये हुए है.

इनके एक सीनियर सहकर्मी ने पिछले हफ्ते ही एक निजी बातचीत में कहा की रवीश अकेले दम पर हिंदी चैनल खींच रहे हैं अब, प्राइम टाइम के अलावा किसी कार्यक्रम में जान नहीं बची है. सिर्फ वही हैं जो मेहनत करते हैं जबकि इतने सीनियर हैं.

रवीश की पत्रकारिता तो लाजवाब है ही लेकिन निजी जीवन में भी इज़्ज़त करने लायक़ इंसान हैं ये.

सोशल एक्टिविस्ट शीबा असलम फ़हमी की एफबी वॉल से.

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‘बागों में बहार है’ के लिए रवीश को सज़ा..?

टीवी एंकर रवीश कुमार के भाई पर यौन शोषण का आरोप क्या लगा मानों कुछ गुमनाम पत्रकारों को अपने नाम को सुर्खियों में लाने का मौका मिल गया…रवीश कुमार पर इन पत्रकारों के हमले से मुझे जलन की बू आ रही है…वो इसलिए कि… शायद रवीश के साथ जिन पत्रकारों ने अपना सफर तय किया था उन्हें वक्त के साथ उतनी शोहरत नहीं मिली जितनी उन्होंने ख्वाहिश पाल रखी थी… और रवीश ने रोज नए- नए मकाम हासिल कर अपनी एक अलग पहचान बनाई…

मैं ना तो रवीश का समर्थक हूं और ना ही आपका आलोचक,,,लेकिन मियां कुछ छुठभैय्ये पत्रकार तो मानों रवीश के पीछे एसे पड़ गए हैं जैसे दोषी रवीश हो उसका भाई नहीं….एक वो इंडिया टीवी वाले दीन दययाल उपाध्याय,,औहो माफ किजिएगा अभिषेक उपाध्याय जी… आप तो उसके पीछे एसे पड़ गए जैसे रवीश ने आपका बचपन में मेमना (बकरी का बच्चा) खोल लिया हो,,अरे अभिषेक भाई रामायण में कुभंकरण जब राम के हाथों मरने जा रहा था उसने कहा था की भाई भाई की भुजा (हाथ) होता है…लेकिन कोई अपना पेट कैसे नंगा करके दिखा दे…

मैं पूछना चाहता हूं उन पत्रकारों से जो पानी पी पी कर रवीश को कोस रहे हैं कि… अगर उनका भाई- बाप या रिश्तेदार कुछ गलत करता है,,,तो वो उतनी सच्चाई से उस खबर को दिखाएंगे जितनी ईमानदारी से रवीश पर निशाना साध रहे हैं….हां… संपादक की कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, लेकिन अगर रवीश के भाई ने कुछ गलत किया है तो उसकी सजा उसे कानून देगा,, इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं कि अगर किसी पत्रकार का भाई कहीं चोरी करता पकड़ा जाए तो पत्रकार भी चोर बन जाए,,,अब क्या… भाई की गलती ‘जिसे अभी साबित करना भी बाकी है’ की सजा रवीश को दी जाए… आप ये कह रहे हो? या फिर नैतिकता के आधार पर रवीश पत्रकारिता छोड़ दें ? क्या यही आपकी नैतिकता है…?

भई ऐसा है…अगर नैतिकता की बात की जाए तो पहले उस नैतिकता की तरफ भी झांक लें, जो कम-से-कम आप में भी नहीं दिखाई दे रही है…और अगर इसे गलत माना जाए तो फिर उनका क्या… जो पिछले कुछ महीनों ‘या फिर साल भी कह सकते हैं’ से  पत्रकारिता के सारे उसूलों को दरकिनार कर अपने फायदे का सौदा कर रहे हैं। आप समझदार हैं मेरा इशारा अच्छी तरह समझ गए होंगे…धन्यवाद 

राजेश कुमार
एंकर
चैनल वन न्यूज
rajesh.targotra@gmail.com

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रवीश कुमार सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा!

प्राइम टाइम को रामजस कॉलेज में बदलना खेल नहीं था

-रवीश कुमार-

गुरुवार सुबह नौ बजे जब हम मूलचंद फ्लाईओवर से एंड्र्यूज गंज केंद्रीय विद्यालय की तरफ उतर रहे थे, तभी कार की खिड़की से देखा कि थोड़ी दूर एक बुज़ुर्ग अपना नियंत्रण खोते हैं और स्कूटर से गिर जाते हैं। टक्कर कैसे लगी, यह तो नहीं देखा, मगर काफी तेज़ थी। वे सर के बल गिरते हैं और तभी ठीक पास से एक कार गुज़रती है। देखने से लगा कि कार ने सर कुचल दिया। मगर ऐसा नहीं हुआ। उनकी मदद के लिए वही कार सबसे पहले रूकती है। पल भर में वहाँ भीड़ बन जाती है और मेरी कार को रुकने के लिए जगह नहीं बनती है। काफी आगे जाकर हम रूकते हैं और दौड़ कर घटनास्थल की तरफ आते हैं।

टीवी वाला हूँ। हर समय टाइम के फ्रेम में रहता हूं। रामजस कॉलेज पर शो रिकार्डिंग करनी थी, एक दिमाग़ इसमें उलझा था कि इन सबमें उलझा तो शो के लिए टाइम नहीं मिलेगा। वापस चलते हैं, यहाँ लोग हैं वो अस्पताल ले जायेंगे। तब तक महसूस हुआ कि लोग देरी कर रहे हैं। सबने बुज़ुर्ग को घेर तो लिया था मगर पुलिस को किसी ने फोन नहीं किया। एंबुलेंस को फोन किसी ने नहीं किया। घायल के आसपास भीड़ बड़ी होती जा रही थी।

मुझे अपना टाइम छोड़ गोल्डन टाइम का ख़्याल आया। अगर आधे घंटे से कम समय के भीतर अस्पताल पहुँचा दिया जाए तो जान बच सकती है। बस अब मैं अपने ड्राईवर को पुकारने लगा। भीड़ के कारण गाड़ी काफी दूर थी। वो गाड़ी को बैक भी नहीं कर सकता था। हम इन्हें अस्पताल लेकर चलते हैं। देर मत कीजिये। उठाइये और कार तक ले चलिए। मैं मेडिकल कारण से उठा नहीं सकता था। दिमाग़ रास्ता खोज रहा था कि इतना भारी शरीर कार तक कैसे ले जायेंगे। तभी एक सैंट्रो कार जगह बनाती हुई वहाँ रूकती है। महिला चालक उतरती हैं। किसी तरह उन्हें कार में लादा गया और मैंने उन्हें ज़ोर से कहा कि मूलचंद अस्पताल ही ले जाना है। यही पास में है।

तब तक कार और बाइक की भीड़ इतनी बढ़ गई कि रास्ता बंद। अगर लोग भीड़ न बनाते तो मैडम अपनी कार ग़लत साइड से चलाकर दो मिनट के भीतर अस्पताल पहुँचा सकती थीं। उन्हें यू टर्न लेकर वापस जाना पड़ा। अब इस आपाधापी में उनसे एक ग़लती होने से रह गई। वे वापस मूलचंद फ्लाईओवर पर चढ़ने वाली थीं मगर मेरे ड्राइवर ने मना किया कि अभी मैं खुद किसी को लेकर इस रास्ते से अस्पताल गया था। मैडम ने उसकी बात मान ली वर्ना अस्पताल ले जाने में बीस मिनट लग जाते क्योंकि बहुत आगे जाकर यू ट्रर्न लेकर आना पड़ता। सबक है कि ऐसे मामलों में रास्ते को लेकर सजग रहें।

मगर मैंने वही ग़लती की जो मेरे ड्राईवर ने मैडम को नहीं करने दिया। मैं पीछे से अपनी कार चलाकर पहले अपनी पत्नी को छोड़ा और फिर अस्पताल आया। इसमें दस मिनट का समय लगा मगर एक अच्छी बात हुई। गोल्डन समय में अस्पताल पहुँचाने के कारण घायल की जान बच गई। अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में डाक्टरों ने शांति से उन्हें भरती कर लिया। मुस्कुराते हुए एक सरदार जी डाक्टर मिले। बताया कि काफी चोट हैं मगर ठीक हैं। सब मुस्तैदी से लगे थे मुझे तो लगा था कि वे नहीं बचेंगे मगर बिस्तर पर अवाक लेटे थे। दर्द से क़राह रहे थे लेकिन जान बच गई थी। उनके ही फोन से बेटे अमित भाटिया को बता दिया कि आपके पिताजी ठीक लग रहे हैं मगर उनका एक्सीडेंट हुआ है। वे नोएडा से रवाना हुए तो कहा कि सावधानी से आइयेगा। हड़बड़ी में आपके साथ न कुछ हो जाए।

इस घटना के बारे में इसलिए लिखा क्योंकि हम कई ग़लतियाँ करते हैं। किसी की दुर्घटना हो तो तमाशा देखने के लिए कभी न रूकें। इरादा करके रूकें कि पल भर में अस्पताल पहुँचा देना है। बाकी लोग रूक कर आगे पीछे भीड़ न बनायें। इससे घायल को काफी नुक़सान हो सकता है। बाइक चलाते हैं तो ज़रा तमीज़ से चलायें। याद रखें कि आप सबसे कम सुरक्षित हैं। कई बार मन करता है कि बाइकर्स का वीडियो बनाकर उनके घर भेज दूँ। हेल्मेट अच्छा पहनें। मैंने साफ साफ देखा था कि वे सर के बल गिरे थे। जब किसी ने उनका हेल्मेट लाकर दिया तो उसमें कुछ नहीं हुआ था। उनकी जान बचने में हेल्मेट का बहुत बड़ा योगदान रहा होगा।

पुलिस और एंबुलेंस को फोन करें। मैंने देखा कि किसी ने नहीं किया है। सौ नंबर पर फोन किया। फोन उठाने वाले ने काफी अच्छे से बात की और पल भर में पुलिस के फोलो अप फोन आने लगे। किसी ने मुझे पुलिसिया अंदाज़ में नहीं पूछा। दोस्त की तरह अच्छे से बात कर रहे थे।

इन सबमें एंबुलेंस वाले का फोन तब आया जब मैं पत्नी को छोड़ अस्पताल के लिए लौट रहा था। तब तक गोल्डन टाइम का अच्छा ख़ासा हिस्सा निकल चुका था। दिल्ली के जाम में एंबुलेंस कितनी जल्दी आएगा, इसका हिसाब लगाना चाहिए। ये फैसला आपको घटनास्थल पर करना होगा। अदालत कहती है कि आप घायल को अस्पताल पहुँचायें। आपसे पुलिस कुछ नहीं पूछेगी। हममें से किसी से नहीं पूछा। तो आप इस पहलू से बेख़ौफ़ किसी की भी मदद कीजिये । अस्पताल तक ले जाने वाली महिला भी डाक्टर थीं। जल्दी में हम नाम पूछना भूल गए मगर यह क्या कम है कि दिल्ली में लोग मदद के लिए रूकते हैं।

इन सब बातों को लिखने का एक मक़सद है। ताकि पढ़कर उन तमाम ग़लतियों को जान सकें जो अक्सर सभी दुर्घटनास्थल के आसपास करते हैं। वहाँ रूकने वाले सभी लोग बुरी नीयत से नहीं रूकते होंगे। मगर सब अच्छी नीयत के साथ अपराधबोध से भी रूकते हैं कि मदद के लिए नहीं रूकें। चार पाँच लोग रूक गए तो बाकी को आगे बढ़ जाना चाहिए मगर चार पाँच वहीं रुकें जो मदद करना चाहते हों। दिल्ली की सड़क कारों से भर गई है। इसमें न पुलिस समय से आ सकती है न एंबुलेंस।

ख़ैर भाटिया जी बच गए। मेरे समय का भयंकर नुक़सान हुआ। उसी दिन कोर्ट फिल्म के एक्टर वीरा साथीदार जी मिलने आए थे। कोर्ट एक शानदार फिल्म है। उनसे काफी कुछ बात करनी थी मगर दो चार लाइन की मुलाकात के बाद मैंने हाथ खड़े कर दिये कि आपको जाना होगा। मैं उन्हें सुन रहा था और अपनी स्क्रिप्ट लिख मिटा रहा था। फिर लगा कि नहीं होगा तो साथीदार जी से माफी मांग ली कि सर नहीं बात कर सकता। मुझे शो के लिए लिखना है। रिसर्च करना है। एक घंटे में रिकार्डिंग है।

मैंने इतने महान कलाकार और लोगों के लिए लड़ने वाले को इतनी सहजता और विनम्रता से जाते नहीं देखा। वे किसी आदिवासी महिला के इंसाफ़ के लिए आए थे जिसे पहले पुलिस अगवा करके ले गई फ़िर जो लोग महिला को बचाने के लिए आगे गए उन्हें ही पुलिस ने महिला के अगवा करने के आरोप में बंद कर दिया। कहानी भी सुनाई और लिखकर दिया भी। दो मिनट इस पर भी बात हो गई कि आप आदिवासी महिला के लिए दिल्ली आ गए मगर कोई पत्रकार दिल्ली से वहाँ नहीं जाएगा। क्योंकि सबको सरकार के प्रमुख की सेवा करनी है। फ़र्ज़ी फ़र्ज़ी एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने होते हैं। भयानक कहानी थी वो। आदिवासी महिलाएँ शायद भारत माता की कैटेगरी की नहीं हैं वर्ना इस कहानी को लेकर आंदोलन हो रहे होते। अब सब तो रवीश कुमार नहीं करेगा न। सब करने ही लगेगा तो नंगों के बीच बदनाम कब होगा। मीडिया का विकल्प बने फेसबुक के एक्टिविस्ट क्या करेंगे। मेरी जाति खोजने के अलावा भी तो कुछ कर सकते हैं।

बहरहाल, अब जब प्राइम टाइम को रामजस कालेज बनाने की तरफ मुड़ा तो घड़ी ने हाथ खड़े कर दिये। सारा समयनिकल चुका था। दो दो बार रिकार्डिंग का टारगेट मिस कर गया। इसी अफ़रातफ़री में शो का फार्मेट भी सोच रहा था, बात कर रहा था और लिख रहा था। कुछ याद आ रहा था, कुछ भूल रहा था। की बोर्ड पर उँगलियाँ राकेट की तरह भाग रही थीं। प्रिया इधर से कुछ बता रही थी तो उधर से कुछ। फुटेज देख रही थी तो किसी से बात कर रही थी। दो बजे और चार बजे की रिकार्डिंग की डेडलाइन मिस करने के कारण स्टुडियो की बुकिंग हाथ से चली गई। कोई स्टुडियो ख़ाली नहीं था।

इस बीच स्क्रिप्ट लिख लिया। कोई पंद्रह मिनट भी नहीं लगा होगा स्क्रिप्ट लिखने में। सुशील महापात्रा भाग भाग कर लोगों का इंटरव्यू ले आया। दो लोगों की रिकार्डिंग नहीं मिली क्योंकि जाम में फँसने के कारण सुशील उन तक नहीं पहुँच सका। इससे शो की टाइमिंग ख़राब हो गई। फिर पूरी स्क्रीप्ट पलट दी। ताकि बाद में आने वाली चीज़ें बाद में जोड़ी जा सकें। तभी ख़्याल आया कि विक्रमादित्य से व्हाट्स अप पर रिकार्डिंग मँगा लेते हैं।रोहिणी पहुँचना संभव नहीं है। साँस अटक गई थी। क्योंकि साढ़े चार बजे के लिए जहाँ कैमरा तैयार था वो हाथ से चला गया। वहाँ किसी और शो की रिकार्डिंग शुरू हो चुकी थी। अब लगा कि रामजस कॉलेज नहीं हो पाएगा।

तभी पाँच बजे हमारी प्रोड्यूसर को एक तरकीब सूझी। स्पोर्ट्स एंकर अफशां को दूसरे चैनल के स्टुडियो में भेज दिया और उनकी जगह मैं अपने स्टुडियो में। सब भयंकर तनाव में। मुझे बीस मिनट का ही समय मिला। एक ही डायरेक्टर अफशां को भी डायरेक्ट कर रहा था और मेरी रिकार्डिंग भी। समझिये एक डायरेक्टर एक ही समय में दो फ़िल्में डायरेक्ट कर रहा हो। हम साथ साथ ग्राफिक्स एनिमेशन की कमियों को भी ठीक कर रहे थे। जो लिखा था वो उसी भाव से पढ़ना भी था।

पढ़ ही रहा था कि किसी ने बताया कि सुमंगला दामोदरन आफिस आ रही हैं। वो आकर अपनी रिकार्डिंग देंगी और छह मिनट का कर लेंगे। चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गई। यही कि अब शो हो जाएगा। वरना शो में कुछ और रिपोर्ट शामिल करनी पड़ जाती तब पूरा शो रामजस कॉलेज नहीं बन पाता। इस भागीदौड़ी में बहुत सी बातें भूल गया। कई वीडियो देख भी नहीं पाया। शायद उनका बेहतर इस्तमाल हो सकता था।

सुबह नौ बजे से साढ़े पाँच बजे तक हम बेख़ुदी के आलम में रहे। पता ही नहीं चला कि हमने क्या किया। मैं अपने शो के बारे में कम बात करता हूँ। बहुत कम याद रखता हूँ। काम साधारण ही होते हैं और मैं यूँ ही चलते चलते करके घर निकल जाता हूँ। इस बार लिख रहा हूँ ताकि आपको पता चले कि प्राइम टाइम को रामजस कालेज बना देने की कल्पना तरकीब से नहीं आती है। ज़िद और जुनून से आती है। एक फिल्मी संवाद है। दिल पर मत लीजियेगा। “कह देना कि छेनू आया था।” यही मैं हूँ। हारूँगा भी तो हुकूमत की ताकत से। ये क्या कम बड़ी बात है कि हुकूमत की साँस फूल जाती है।वो अफवाहों की फौज से मुझसे लड़ती है। दारोग़ाओं की फौज से लड़ती है। मेरी बातों और सवालों को सुनकर उसके होश उड़े रहते हैं। उसके समर्थक बेहोश हो जाते हैं। बाकी मार तो मच्छर भी दिया जाता है दुनिया में। मेरी हार होगी तो यही मेरी जीत होगी। जीत जाऊंगा तो उनकी हार होगी ही होगी।

एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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बालभोगी बनाम भुक्तभोगी

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े रहे एक छात्रनेता पर छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) से जुड़े छात्रनेता ने एक नारा उछाला। बालभोगी, बालभोगी। विद्यार्थी परिषद के लोगों ने दूसरा नारा निकाल लिया। भुक्तभोगी, भुक्तभोगी। जब तक बालभोगी का आरोप था वो मजे का विषय था। परिषद में काम करने वाले उस समय के हर कार्यकर्ता का मजाक ये कहकर उड़ाया जा सकता था।

यहां तक कि संघी के नाम पर अभी भी बहुत से- सामान्य और चरित्रहीन टाइप के भी- बुद्धिजीवी ये आरोप लगाकर दांत चियार देते हैं। संघी होने भर से लोगों पर ऐसे आरोप ये तथाकथित बुद्धिजीवी लगा देते थे और त्याग, संयम से जीने वाले प्रचारकों का मजाक उड़ा देते थे। संघियों की सरकार आने के बाद थोड़ा ठिठकते हैं, डरते हैं, ये कहने से। और वही संघी जब पलटकर बालभोगी का आरोप लगाने वाले को भुक्तभोगी साबित करने पर जुट जाता है, तो चिट चिट की आवाज सुनाई देने लगती है।

ऐसा ही कुछ पत्रकार रवीश कुमार के भाई पर सेक्स रैकेट में शामिल होने के आरोपों पर भी दिख रहा है। बड़का-बड़का पत्रकार, बुद्धिजीवी लोग रवीश पर आरोप न लगाने की बात कर रहे हैं। इससे मैं भी सहमत हूं कि पत्रकार रवीश कुमार की पत्रकारिता अपनी जगह और उनके भाई ब्रजेश पांडे की कांग्रेसी नेतागीरी अपनी जगह। लेकिन, दुनिया के लिए आइना लेकर घूमने पर कभी तो आइना आपकी भी शक्ल उसमें दिखा ही देगा। रवीश जी को ये बात समझनी चाहिए। बस इत्ती छोटी सी ही बात है। और तो जो है सो तो हइये हैं।

कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने यह टिप्पणी अपने एफबी वॉल पर प्रकाशित की है.

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आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो क्या अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे?

Abhishek Upadhyay : ये अखबार वाले भी न। ये भी नही समझते एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के प्रताप को। अब कल मैंने जो लिखने से मना किया था। आज वही छाप दिए। दंग हूँ मैं आज का टाइम्स ऑफ़ इंडिया पढ़कर। ये तो खबर छाप दिए है बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष और बिहार कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के बेहद करीबी ब्रजेश पांडेय सेक्स स्कैंडेल में फंसे। पद से इस्तीफ़ा दिए। रेप के साथ-साथ पॉस्को (बच्चों का शोषण वाली धारा) भी लगा। हाँ हाँ वही। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय (उफ़ ये आदत), माफ़ कीजिएगा, रवीश कुमार के सगे बड़े भाई ब्रजेश पांडेय।

अरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया वालों, तुम्हारी मति मारी गई है। अभी रवीश कुमार ने इस मामले में चुप्पी तोड़ी नही और तुम ख़बर छाप दिए। अरे रवीश कुमार चुप हैं, इसका मतलब कि वो दलित लड़की झूठी है। मतलब कि वो साजिश कर रही है। जो आरोप लगा दी है। और बिहार पुलिस की सीबीसीआईडी भी वाकई में पगलाए गई है जो अपनी जांच में प्रथम दृष्टया आरोप सही पाय रही है। सुन लो, ऐ दुनिया वालों, सूली पर टांग दो ऐसी दलित लड़कियों को जो रवीश कुमार के भाई पर। जो रवीश कुमार के परिवार पर। कोई आरोप लगा दें। अब बताओ इतनी बड़ी बात हुई है। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष दलित बच्ची के यौन शोषण में फंसा है। सेक्स रैकेट का मामला अलग है। पॉस्को अलग लगा है। बिहार पुलिस तलाश रही है। वो फरार अलग है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से लेकर आजतक चैनल तक। सब अब तक इस ख़बर पर आए चुके हैं। छाप रहे हैं। दिखाए रहे हैं। पर रवीश पांडेय…. उफ़…. रवीश कुमार चुप हैं। अरे, भाई लोगों कोई तो वजह होगी। समझो इस बात को।

झूठी होगी वो दलित की बिटिया। नही तो अभी तक कोट टाई पहनकर शमशेर, बाबा नागार्जुन और गोरख पांडेय की एक दुई क्रांतिकारी कविता पढ़ते हुए रवीश कुमार आ गए होते 2जी में फंसी एनडीटीवी की स्क्रीन पर। और चीख चीखकर अपने भाई ब्रजेश पांडेय से सवाल कर रहे होते। धोय रहे होते पटना पुलिस को। कि ऐसी कौन सी जगह छुप गया है ब्रजेश पांडेय कि अब तक उसे गिरफ्तार भी न कर पाय रही है। सुन लो ए दलित लड़कियों! जब तक रवीश कुमार से नैतिकता का सर्टिफिकेट न मिल जाए, तुम सब अनैतिक हो। झूठी हो। साज़िश करने वाली हो। सुधारो अपने आप को। माफ़ी मांगो तुरन्त। ब्रजेश पांडेय से। रवीश पांडेय से। माफ़ कीजियेगा, रवीश कुमार से।

कल से ही रवीश पांडेय के भक्त हमको गालियां दिए पड़े हैं। पूछ रहे हैं कि तुम इंडिया टीवी से हो। जलते होगे एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय से। अरे मोरे भाई, हम इलाहाबाद से हैं। इलाहाबादी हैं। इसी यूनिवर्सिटी का लहू बहता है हमारी धमनियों में। हम न जलते हैं। न डरते हैं। न किसी नाम से आतंकित होते हैं। न किसी पद से प्रभावित होते हैं। हम तो बस सिविल लाइन्स के सुभाष चौराहे पर एक कुल्हड़ वाली चाय पकड़कर बैठ जाते हैं, वहीं की फुटपाथों पर। पाश को पढ़ते हुए। पाश को गाते हुए –

“हमारे लहू को आदत है
मौसम नहीं देखता, महफ़िल नहीं देखता
ज़िन्दगी के जश्न शुरू कर लेता है
सूली के गीत छेड़ लेता है
शब्द हैं की पत्थरों पर बह-बहकर घिस जाते हैं
लहू है की तब भी गाता है।”
जय हिंद

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चलो आज सीधा सीधा लिख मारते हैं। सुनो वामपंथ की लंपट औलादों। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय का भाई ब्रजेश पांडे बलात्कार और सेक्स रैकेट में फंसा है। तो लड़की का चरित्र बताए रहे हो। ये समझा रहे हो कि ओरिजिनल एफआईआर में उसका नाम नही था। बाद में सामने आया। तुमने आसाराम के बेटे नारायण साई का नाम सुना है। वो जिस मामले में साल 2013 में गिरफ्तार हुआ। वो साल 2002 से 2005 के बीच का मामला था। न यक़ीन हो तो सूरत की पीड़ित महिला के आरोप की एफआईआर निकलवा कर देख लो। पूरे 8 साल बाद की शिकायत थी। फिर भी हुई गिरफ्तारी। नारायण साईं आज भी जेल में है। सूरत की। वो भी राजनीति में दिलचस्पी रखता है। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, अरे हाँ भाई, रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पांडे की तरह। चुनाव भी लड़ चुका है। फिर भी मुझे उससे कोई सहानुभूति नही। ऐसे 1000 उदाहरण हैं। गिनवाऊंगा तो बगैर क्लोरोफॉर्म सुंघाए बेहोश हो जाओगे।

किसी वामपंथ के जले हुए बुरादे पर बलात्कार का आरोप लगेगा तो मानक बदल जाएंगे तुम्हारे। तब लड़की का चरित्र बताने की औकात पर उतर आओगे। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, हाँ हाँ वही, ‘बागों में बहार’ वाले रवीश कुमार, के सगे बड़े भाई बृजेश पांडे पर बलात्कार और सेक्स रैकेट का संगीन आरोप लगा है। वो भी एक नाबालिग दलित लड़की ने लगाया है। तो तुम उस दलित लड़की के चरित्र का सर्टिफिकेट जारी किए दे रहे हो। कि वो चरित्रहीन है। रवीश पांडे का भाई मजबूरी में कुर्सी छोड़ने से पहले। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष था। तुम तो खा गए होते अभी तक, अगर ऐसे ही कोई बीएसपी का प्रदेश उपाध्यक्ष फंसा होता। कोई समाजवादी पार्टी। या फिर कांग्रेस का ही ऐसा नेता फंसा होता। बशर्ते वो तुम्हारी बिरादरी के ही किसी कॉमरेड का भाई न होता। और बीजेपी का फंस जाता तो फिर तो तुम्हारे थुलथुल थानवी जी ‘हम्मा-हम्मा’ गाते हुए अब ले शकीरा वाला डांस शुरू कर दिए होते। लिख लिखकर, पन्ने के पन्ने। स्याही के मुंह से कालिख का आखिरी निवाला तक छीन लिए होते। अमां, कौन सी प्रयोगशाला में तैयार होता है खालिस दोगलेपन का ये दीन ईमान। थोड़ा हमे भी बताए देओ।

ऐसे ही खुर्शीद अनवर का केस हुआ था। साहब पर नार्थ-ईस्ट की एक लड़की से बलात्कार का आरोप था। अनवर साहब जेएनयू के निवासी थे। फिर क्या था। रुसी वोदका के कांच में धंसे सारे के सारे वामपंथी। उस बेचारी नार्थ ईस्ट की लड़की की इज्ज़त आबरू का कीमा बनाने पर उतर आए थे। एक से बढ़कर एक बड़े नाम। स्वनाम धन्य वामपंथी। बड़ी-बड़ी स्त्री अधिकार समर्थक वामपंथी महिलाएं। सब मिलकर उस बेचारी लड़की पर पिल पड़े थे। वो स्टोरी मैंने की थी। बड़े गर्व के साथ लिख रहा हूँ। उस केस में पुलिस की एफआईआर थी। लड़की की शिकायत थी। मेरे पास पीड़िता का इंटरव्यू था। राष्ट्रीय महिला आयोग की चिट्ठी थी। आरोपी खुर्शीद अनवर के अपने ही एनजीओ की कई महिला पदाधिकारियों की उनके खिलाफ इसी मामले में लिखी ईमेल थी। ये सब हमने चलाया। खुर्शीद का वो इंटरव्यू भी जिसमें वो सीधी चुनौती दे रहे थे कि पीड़ित लड़की में दम हो तो सामने आए। शिकायत करे। वो सामना करेंगे। लड़की आगे आई। शिकायत भी की। पर खुर्शीद अनवर सामना करने के बजाए छत से कूद गए।

भाई साहब, ये पूरी की पूरी वामपंथी लॉबी जान लेने पर आमादा हो गई। कई वामपंथी वोदका में डूबे पत्रकार ‘केजीबी’ की मार्फत पीछे लगा दिए गए। जेएनयू को राष्ट्रीय शोक में डूबो दिया गया। शोर इतना बढ़ा कि दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल टीम नार्थ ईस्ट रवाना की गई। ये केंद्र में यूपीए के दिन थे। वरना तो पूरी की पूरी सरकार हिला दी जाती। मैं आज भी उस नार्थ ईस्ट की लड़की की हिम्मत की दाद देता हूँ। तमाम धमकियां और बर्बाद कर देने की वामपंथी चेतावनियों को नज़रंदाज़ करती हुई वो दिल्ली पुलिस की टीम के साथ मजिस्ट्रेट के आगे पहुंची और सेक्शन 164 crpc के तहत कलमबंद बयान दर्ज कराया कि खुर्शीद अनवर ने उसके साथ न सिर्फ रेप किया, उसे sodomise भी किया। एक झटके में सारे वामपंथी मेढ़क बिलों में घुस गए। हालांकि टर्र टर्र अभी तक जारी है। उस बिना बाप की लड़की की आंखो में जो धन्यवाद का भाव देखा वो आज भी धमनियों में शक्ति बनकर दौड़ता है। इस हद तक कमीनापन देख चुका हूँ इंसानियत के इन वामपंथी बलात्कारियों का।

और हाँ। डिबेट का रुख काहे ज़बरदस्ती मोड़ रहे हो? ये कह कौन रहा है कि एनडीटीवी वाले रवीश पांडे इस बात से दोषी हो जाते हैं कि सगा बड़ा भाई बलात्कार और सेक्स रैकेट के आरोप में फंसा है? कौन कह रहा है ई? हाँ। ज़बरदस्ती बात का रुख मोड़ रहे हो ताकि मुद्दे से ध्यान हट जाए। मुद्दा ये कि दोहरा चरित्र काहे दिखाए रहे हो अब? आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे। और कोई गैर हुआ तो चला चलाकर स्क्रीन काली कर दोगे?

सुनो, बड़ी बात लिखने जा रहा हूँ अब। अपने भाई के ख़िलाफ़ ई सब चलाने का साहस बड़े बड़ों में न होता है। सब जानते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि ये जो नैतिकता का रामनामी ओढ़कर सन्त बने बैठे हो, इसे अब उतार दो। तीन घण्टे पूरे होय चुके हैं। पिक्चर ओवर हो गई है। अब ई मेकअप उतार दो। नही तो किसी रोज़ चेहरे में केमिकल रिएक्शन होय जाएगा।

और हाँ, मेरी वॉल पर आए के चिल्ल-पों करने वाले रवीश पांडे के चेलों, सुनो। हम किसी ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी पत्रकार से कहीं ज़्यादा इज़्ज़त ज़िले के स्ट्रिंगर की करते हैं। जो दिन रात कड़ी धूप में पसीना बहाकर, धूल धक्का खाकर टीवी चैनल में खबर पहुंचाता है। इस देश के टीवी चैनलों का 70 फीसदी कंटेंट ऐसे ही गुमनाम स्ट्रिंगरों के भरोसे चलता है। न यक़ीन हो तो सर्वे कराए के देख लो। तुम जैसे ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी इन्हीं की उगाई खेती पर लच्छेदार भाषा की कटाई करके चले आते हो और बदले में वाह-वाही लूटकर अपने-अपने एयर कंडिशन्ड बंगलों में दफ़न हो जाते हो। तुम हमे न समझाओ सेलिब्रिटी का मतलब। हम अभी अभी अपने चैनल के इलाहाबादी सेलिब्रिटी से मिलकर लौटे हैं।

इंडिया टीवी में कार्यरत तेजतर्रार पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें….

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यह हमला रवीश पर नहीं, आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है : ओम थानवी

Om Thanvi : आलोचक उनके लिए दुश्मन होता है; ‘दुश्मनी’ निकालने का उनके पास एक ही ज़रिया है कि आलोचक को बदनाम करो, उसका चरित्र हनन करो। भले वे विफल रहें, पर जब-तब अपनी गंदी आदत को आज़माते रहते हैं। उनकी आका भाजपा की वैसे ही रवीश से बौखलाहट भरी खुन्नस है। रवीश कुमार फिर उनके निशाने पर हैं। रवीश के भाई ब्रजेश बिहार में चालीस साल से कांग्रेस की राजनीति करते हैं।

एक नाबालिग़ लड़की ने एक ऑटोमोबाइल व्यापारी निखिल और उसके दोस्त संजीत के ख़िलाफ़ यौन शोषण का आरोप लगाया। लड़की के पिता भी कांग्रेसी नेता हैं और बिहार सरकार में मंत्री रहे हैं। एक महीने बाद उसने, सीआइडी की जाँच में, ब्रजेश पांडेय का भी नाम “छेड़छाड़” बताकर लिया और एसआइटी को बताया कि जब उसने अपने दोस्तों से बात की तो उन्होंने कहा कि “लगता है” ये सब लोग एक सैक्स रैकेट चलाते हैं। ग़ौर करने की बात यह भी है कि केस दर्ज़ होने के बाद वहाँ के अख़बारों में अनेक ख़बरें छपीं (भाजपाई जागरण में चार बार), लेकिन ब्रजेश पांडे किसी ख़बर में नहीं थे क्योंकि मूल शिकायत में उनका नाम नहीं था।

भले ही ब्रजेश का नाम शिकायतकर्ता ने एफ़आइआर दर्ज़ करवाते वक़्त नहीं लिया गया, न वीडियो रेकार्डिंग में उनका नाम लिया, न ही मजिस्ट्रेट के सामने नाम लिया; फिर भी अगर आगे जाकर एसआइटी के समक्ष छेड़छाड़ और दोस्तों के हवाले से सैक्स-रैकेट चलाने जैसा संगीन आरोप लगाया है तो उसकी जाँच होनी चाहिए, पीड़िता को न्याय मिलना चाहिए और असली गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सज़ा होनी चाहिए।

लेकिन महज़ आरोपों के बीच सोशल मीडिया पर रवीश कुमार पर कीचड़ उछालना क्या ज़ाहिर करता है? निश्चय ही अपने आप में यह निहायत अन्याय भरा काम है। आरोप उछले रिश्तेदार पर और निशाने पर हों रवीश कुमार? इसलिए कि उनकी काली स्क्रीन कुछ लोगों के काले कारनामों को सामने लाती रहती है?

ज़ाहिर है, यह हमला रवीश पर नहीं, इस दौर में भी आलोचना का साहस रखने वाली पत्रकारिता पर है। पहले एनडीटीवी पर “बैन” का सीधा सरकारी हमला हो चुका है। अब चेले-चौंपटे फिर सक्रिय हैं। इन ओछी हरकतों में उन्हें सफलता नहीं मिलती, पर लगता है अपनी कोशिशों में ख़ुश ज़रूर हो लेते हैं। अजीब लोग हैं।

इस प्रसंग में अभी मैंने बिहार के एक पत्रकार Santosh Singh की लिखी पोस्ट फ़ेसबुक पर देखी है। दाद देनी चाहिए कि उन्होंने तहक़ीक़ात की, थाने तक जाकर आरोपों के ब्योरे जानने की कोशिश की। उन्होंने जो लिखा, उसका अंश इस तरह है:

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“मैंने सोचा पहले सच्चाई जान लिया जाये (इसलिए) पूरा कागजात कोर्ट ने निकलवाया …

22-12-2016 को एसीएसटी थाने में एफआईआर दर्ज होता है जिसमें निखिल प्रियदर्शी उनके पिता और भाई पर छेड़छाड़ करने और पिता और भाई से शिकायत करने पर हरिजन कह कर गाली देने से सम्बन्धित एफआईएर दर्ज करायी गयी। इस एफआईआर में कही भी रेप करने की बात नही कही गयी है …इसमें ब्रजेश पांडेय के नाम का जिक्र भी नही है …

24-12-2016 को पीड़िता का बयान कोर्ट में होता है धारा 164 के तहत। इसमें पीड़िता शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप निखिल प्रियदर्शी पर लगाती है। ये बयान जज साहब को बंद कमरे में दी है। इस बयान में भी ब्रजेश पांडेय का कही भी जिक्र नही है …

30–12–2016 को यह केस सीआईडी ने अपने जिम्मे ले लिया। इससे पहले पीड़िता ने पुलिस के सामने घटना क्रम को लेकर कई बार बयान दिया लेकिन उसमें भी ब्रजेश पांडेय का नाम नही बतायी।।

31-12-2016 से सीआईडी अपने तरीके से अनुसंधान करना शुरु किया और इसके जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया। इस जांच के क्रम में पीड़िता ने एक माह बाद कहा कि एक पार्टी में ब्रजेश पांडेय मिले थे, उन्होने मेरे साथ छेड़छाड़ किया। फेसबुक पर देखा ये निखिल के फ्रेंड लिस्ट में हैं। इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो।

पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल का अवारागर्दी की चर्चा खुब किया है। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …
मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया है।

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मामला जो हो, जाँच जिधर चले मैं फिर कहूँगा कि रवीश जैसे ज़िम्मेदार और संजीदा पत्रकार को इसमें बदनाम करने की कोशिश न सिर्फ़ दूर की कौड़ी (वहाँ कौड़ी भी नहीं) है, बल्कि सिरफिरे लोगों का सुनियोजित कीचड़-उछाल षड्यंत्र मात्र है। ऐसे बेपेंदे के अभियान चार दिन में अपनी मौत ख़ुद मर जाते हैं।

जाने माने पत्रकार ओम थानवी की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Urmilesh Urmil इस मामले में बेवजह रवीश को निशाना बनाने का क्या औचित्य है? अगर कहीं किसी के परिजन पर कोई आरोप लगा है तो कानून की प्रक्रिया के तहत जांच होगी। इसमें सैकड़ों किमी दूर रहने वाले उक्त व्यक्ति के परिवार के एक पत्रकार-एंकर का भला क्या कसूर कि कुछ शरारती तत्व कीचड़ उछालने की कोशिश कर रहे हैं! इस दुष्प्रचार अभियान की जितनी निंदा की जाय, कम है।

Qamrul Hasan Siddiqui Urmilesh ji आदाब। बहुत अफ़सोस होता है ये सब पढ़ कर और देख कर। क्या देश में अब आप निष्पक्ष पत्रकारिता भी नहीं कर सकते। क्या एक पार्टी और विचार धरा की चाटुकारिता ही पत्रकारिता का मतलब रह गया है। पिछले 1 महीने से मैं रवीश के प्रोग्राम देख रहा हूँ। वो पैनापन बिलकुल नहीं दिख रहा है। तनाव और थकान साफ नज़र आ रहा है। हालांकि मैं इस छेत्र में नहीं हूँ फिर भी राजनीती को मैंने भी इमरजेंसी के समय से फॉलो किया है जब मैं इलाहाबाद से बीएससी कर रहा था। उस समय भी माहोल बहुत खराब था। मगर आज तो सोशल मीडिया और टीवी के कारण हर बात बहुत जल्दी फैलती है। इसी का फायदा ये तथा कथित देश भक्त उठा रहे हैं। और जो इनसे सहमत नहीं होता उनके ऊपर ये हुक्का पानी लेकर चढ़ दौड़ते है।

Chandra Prakash Pandey यह एक दलित महिला के शारीरिक उत्पीड़न का मामला है,, जिसमें एक दबंग सवर्ण पर आरोप लगा है,, इस पर रवीश बाबू का एक प्राइम टाइम तो जरूर बनता है, इससे उनकी निष्पक्षता ही साबित होगी और वह शक के दायरे में भी नहीं होंगे,,

Urmilesh Urmil Qamrul Hasan Siddiqui साहब, अपने मुल्क में स्वतंत्र और वस्तुपरक पत्रकारिता करना बहुत कठिन और जोखिम भरा काम है। तभी तो हम प्रेस फ्रीडम के मामले में 2016 के ताजा सूचकांक में 180 देशों की सूची में 133 वें नंबर पर हैं।

Om Thanvi मुख्य आरोप (बलात्कार का) जिस रईसज़ादे निखिल और उसके मित्र पर है, उसे परे रख आप उस व्यक्ति को ही आरोपी मान लें जिस पर अनुचित रूप से छूने का आरोप है (वह भी बेशक आपराधिक काम है) तो इसे आपका दुराग्रह न मानें तो क्या मानें? हो सकता है आपकी कोई रार हो, पर पीड़िता से आपको कोई सहानुभूति नहीं, वरना उन रईसज़ादों को आड़ न देते।

Chandra Prakash Pandey Om Thanvi यह एक दलित महिला के सम्मान की बात है,, कृपया इसे हल्के में न लें,, इस बारे मे श्रीमान रवीश जी को एक प्राइम टाइम कर दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिए,, और अपने भाई पर दलित महिला द्वारा लगाये कथित आरोपों को गलत सिद्ध कर देना चाहिए,,

Ashutosh Tripathi ग़लत सिद्ध करने का काम वक़ील का है और वो भी कोर्ट मे। न्यूज़ स्टूडियो कोर्ट नही है। अभी कुछ दिनों पहले दिल्ली मे ससुराल के झगड़े के हवाले से एक विधायक को जेल मे डाल दिया गया था। बाद मे पुलिस की किरकिरी हुयी और छूट गये।…See more

Chandra Prakash Pandey Ashutosh Tripathi अभी तक तो हम देख रहे थे कि रवीश बाबू न्यूज़ रूम में ही कोर्ट लगाते थे,, अब इसमें भी एक प्राइम टाइम तो बनता है,, बड़े भाई

Ashutosh Tripathi रवीश पर न्यूज़ रूम मे कोर्ट लगाने का इल्ज़ाम तो नही लगा सकते। उनके पैनल मे तो विषय विशेषज्ञ ही रहते है, पार्टियों के वक़ील नही।

Subir Khanna इससे ये तो पता चला की आप जैसे पत्रकारों की पत्रकारिता किस तरह 10 जनपथ की गुलाम है. रविश विधान सभा चुनाव में अपने भाई का प्रचार करने गए थे उन्हें अब सामने आकर माफ़ी मांगना चाहिए. अब आपको जाँच और कानून याद आ रहा है पहले तो सिर्फ आरोपो पर स्टूडियो में बैठ कर खूब चिल्लाते थे……..

Om Thanvi दलित बच्ची की न्याय दिलाना है तो उन बलात्कार के दो आरोपियों का नाम लो, जो आप अब तक नहीं ले रहे। आप तीसरे छेड़खानी के आरोपी के भी भाई के पीछे टहल रहे हैं। यह दलित बच्ची को न्याय दिलाना नहीं है, मुख्य आरोपियों से ध्यान भटकाना है। झूठ गढ़ना और फैलाना भी एक मानसिक बीमारी है।

Chandra Prakash Pandey Om Thanvi जी दलित महिला ने एक आरोप लगाया है,, जिसका संज्ञान पुलिस/न्यायालय ने लिया है,, जिस व्यक्ति का नाम आया है वह बिहार कांग्रेस का उपाध्यक्ष है,, अब यह कोई सामान्य घटना नहीं है,, हो सकता है कांग्रेस की सरकार के चलते पुलिस प्राथमिकी में यह बात दबा दी गई हो,, यह जाँच का विषय है,, इसे सिरे से नकार देना या झूठा कह देना एक दलित महिला के प्रति अन्याय होगा,, रवीश NDTV को इसे प्राइम टाइम का विषय बनाना चाहिए,, बाकी आप वरिष्ठ हैं और गरिष्ठ भी,, चाहें तो इस बात को हज़म भी कर सकते हैं,,

Ratan Pandit इस प्रकरण में सवर्णों का दलित प्रेम देखते ही बन रहा है कारन गंगा मइया जाने

Om Thanvi आपको कुछ पता नहीं है, मैं जवाब देता हूँ तो फिर कुछ लिख देते हैं। वह महिला नहीं है, नाबालिग़ बच्ची है। प्राथमिकी कांग्रेस सरकार के चलते दबा दी गई होगी? कांग्रेस की सरकार बिहार में कितने वर्ष पहले थी पहले मालूम कर लीजिए। मामला तीन महीने पहले का है। और प्राथमिकी पढ़ भी लीजिए, उसमें दो ही नाम हैं, व्यापारी निखिल और संजीत का। नेता का नाम नहीं है। जिनका है उनके ख़िलाफ़ एक शब्द आपके मुँह से नहीं टपकता है।

Abhay Saxena शायद कुछ लोग रवीश कुमार को टीवी एंकर /पत्रकार नही बल्कि मंत्री या किसी पार्टी का अध्यक्ष समझ रहे हैं जो उनके भाई पर लगे आरोप पर सफाई देने को कह रहे हैं ! रवीश के भाई के तथाकथित अपराध के लिये रवीश पर आरोप लगाना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी की महानता की तारीफ इस तरह की जाये कि “इतनी बड़ी पोस्ट मे हैं पर इनके भाई छोटा सा धंधा कर रहे हैं”। प्राइम टाइम की बहुत डिमांड हो रही है ! ISI certified ध्रुव सक्सेना के “DNA” की कोई फरमाइश नही कर रहा है!

Om Thanvi बेतुकी “डिमांड” है। न सिर न पैर।

Rakesh Singh सक्सेना जी ध्रुव सक्सेना के पीछे राबिया नाम की महिला का नाम आ रहा है। क्या आप नही जानना चाहेंगे कि कही बड़े भाई के पीछे छोटे का तो हाथ नही ?

Chandra Prakash Pandey एक प्राइम टाइम तो बनता है,, दलित महिला के शारीरिक उत्पीड़न का मामला है,, और पत्रकारिता का तक़ाज़ा भी है,, वैसे उन्होंने कैराना, धूलागढ, केरल, बंगाल में हो रही आरएसएस के स्वंसेवकों की दर्जनों हत्याओं, पर भी चर्चा नहीं करी,, ये उनका चैनल है उनके मालिक का विशेषाधिकार है क्या दिखायें और क्या छिपायें,, MSM भी एक धंधा है और धंधा प्राफिट के लिए किया जाता है,, फिर उसमें नैतिकता की बात करना बेमानी है,, बेतुकी है,,

Somu Anand Om सर . प्रणाम । आप बार-बार निखिल प्रियदर्शी और संजीत के नाम लिए जाने की बात करते हैं। सही है, नाम लिया जाना चाहिये लेकिन नाम उनका भी लिया जाना चाहिए जो सार्वजानिक मंचों से नैतिकता की दुहाई देते रहे हैं । हमने कभी निखिल प्रियदर्शी या संजीत को महिला कल्याण की बात करते नहीं सुना (हालांकि इसका अर्थ यह नही की उन्हें दुष्कर्म करने की आजादी है) लेकिन ब्रजेश बाबु को सुना है, इसीलिए उनका नाम तो आएगा ही और दूसरे किसी आरोपी से ज्यादा आएगा। हो सकता है कि आपको सोशल मीडिया पर हो रही बहस सड़कछाप लगे लेकिन सच्चाई यह है कि सत्ता और पत्रकारिता के साझेदारी से किसी आरोपी को बचाने की कोशिश को नाकाम यही सोशल मीडिया करती है।

Prabhat Ranjan आज इन्डियन एक्सप्रेस ने ब्रजेश पांडे की खबर को पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा है. आप जिस तरह से लिख रहे हैं बताने की कोशिश कर रहे हैं बात उतनी एकतरफा नहीं है.

Om Thanvi एक्सप्रेस की ख़बर में एक भी बात ऐसी नहीं है, जो मैंने नहीं लिखी। यह ख़बर भी पुलिस के हवाले से यही कहती है कि एफ़आइआए दो महीने पहले दर्ज हुई थी, पर ब्रजेश पांडेय का नाम तीन हफ़्ते पहले एसआइटी के सामने लिया गया, कि निखिल ने बलात्कार किया (जो आरोप एफ़आइआर में भी था), पांडेय ने अनुचित ढंग से छुआ (जो आरोप एफ़आइआर में नहीं था)। … मैंने साफ़ लिखा है कि क़ानून अपना काम करे, पीड़िता को न्याय मिले, अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा – मगर इसमें रवीश को क्यों घसीटा जा रहा है? … आपको मेरी बात में इकतरफ़ा क्या लगा, ज़रा स्पष्ट कीजिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर, एकतरफा इसलिए क्योंकि न्याय की लड़ाई लड़ने वाले रवीश कुमार को इस के बारे में भी बोलना चाहिए. आप लोगों के लिखने से लगता है जैसे वह कोई मसीहा हो. वैसे जिस संतोष सिंह का आप हवाला दे रहे हैं वह बिहार चुनाव के समय रवीश कुमार के साथ अपनी फोटो लगाकर यह भी लिख चुका है कि वह उनका कितना बड़ा फैन है. इसलिए मैंने एकतरफ़ा कहा. अपनी बात को पुष्ट करने के लिए आप जिन तथ्यों का सहारा लेता हैं उससे ही यह जाहिर हो जाता है कि आप क्या कहना चाह रहे हैं.

Sarvapriya Sangwan आपके घर में जिस-जिस पर जो मुकदमा चलता है, आप लेख लिखते हैं उस पर?

Prabhat Ranjan Sarvapriya Sangwan जी, जब चलेगा और मेरा नाम आएगा तो लिखूँगा। दुर्भाग्य से अभी तक चला नहीं है। ना मैं इतनी बड़ी शख़्सियत हूँ

Sarvapriya Sangwan क्यों बड़ी शख़्सियत पर ही ये ज़िम्मेदारी है? खोजने चलेंगे तो एक ऐसा घर भी ऐसा नहीं मिलेगा जिन पर मुक़दमे ना चल रहे हों। ज़िन्दगी बहुत लंबी है, भगवान ना करे कि आपके परिवार पर या आप पर कोई कीचड उछले लेकिन हुआ तो आप ज़रूर टीवी पर चलवाइयेगा।

Om Thanvi आपका तर्क इतना हास्यास्पद है कि साथी हैं इसलिए जवाब देता हूँ, वरना इसके योग्य नहीं। आरोप भाई पर, जवाब उनके परिजन देंगे? कितने परिजन देंगे? कल आप कहेंगे वे सज़ा भी भुगतें! यह तो संघ वाले अभी से कर रहे हैं, कि उन्हें विवाद में घसीट रहे हैं। वही काम आप करें अच्छा नहीं लगता।

Urmilesh Urmil मुझे भी प्रभात रंजन जैसे समझदार व्यक्ति और सक्रिय रचनाकर्मी की टिप्पणी पर अचरज हो रहा है!

Prabhat Ranjan Urmilesh Urmil सर मुझे थानवी जी पर आश्चर्य हो रहा है. जिस तरह से उन्होंने संतोष सिंह की बात को साझा किया. संतोष सिंह के बारे में वे जानते कितना हैं? भारत की राजनीति में परिवारवाद की बात बार बार तंज़ में उठाने वाले पत्रकार का परिवारवाद नहीं है यह(रवीश के सन्दर्भ में)? थानवी जी ने लिखा है कि ब्रजेश जी 40 साल से राजनीति कर रहे हैं. ब्रजेश जी की उम्र क्या है? सर यह जनतांत्रिक मंच है अगर कोई एकतरफा बात करेगा तो दूसरा भी सवाल उठाएगा ही न. मैं आपका और थानवी जी दोनों का बहुत सम्मान करता हूँ लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि रवीश जी का भी करूं. उनकी पत्रकारिता का बहुत बड़ा संबल उनका नैतिक होना रहा है. जिसके कारण मैं भी उनका बेहद प्रशंसक था लेकिन इस पूरे प्रकरण से उनकी वह नैतिक छवि दरक रही है. आप एक झटके में सबसे अलग नहीं हो सकते. बिहार में तो भाजपा की सरकार भी नहीं है फिर कौन ब्रजेश जी को फंसा रहा है. पंक्तियों के बीच में भी बहुत सारी पंक्तियाँ होती हैं सर

Sarvapriya Sangwan ब्रजेश पांडेय को कौन फंसा रहा है या नहीं फंसा रहा है, वो तो जांच के बाद सामने आ जायेगा। क्योंकि जांच चल ही रही है। वो अपने पद से इस्तीफा भी दे चुके हैं। लेकिन रवीश कुमार को आप फंसा रहे हैं। राजनीति के परिवारवाद को समझते हैं आप? इस जवाब से लगता है कि आप सिर्फ उत्तेजना में किसी भी तरह रवीश को गुनहगार साबित करना चाहते हैं। इस चक्कर में आप ज़रूर अतार्किक दिख रहे हैं। मुझे भी बहुत हैरानी हुई। लेकिन ठीक है, ऐसे किसी वक़्त में ही व्यक्ति का स्टैंड पता चलता है। आपके कुछ कहने से उनकी नैतिकता या उनका ‘ब्रैंड’ एक पॉइंट भी कम नहीं होगा।

Prabhat Ranjan Sarvapriya Sangwan जी, मैं क्षमा चाहता हूँ लेकिन जिस तरह से थानवी जी ने संतोष सिंह नामक बिहार के पत्रकार के हवाले से लिखा मुझे उससे दुःख हुआ. उनको उसके बारे में जानना चाहिए था पहले. यह भी नैतिकता का तकाज़ा होता है

Om Thanvi संतोष सिंह को जानने की क्या ज़रूरत? पत्रकार हैं और एफआइआर और अब तक की जाँच के दस्तावेज़ ले आए यही अहम बात है। इसी से स्पष्ट हुआ कि मूल शिकायत में ब्रजेश कहीं थे ही नहीं। रेकार्ड हुए बयान में भी नहीं। फिर, रवीश ख़ुद इस मामले में हैं कहाँ? यही तो बात है। मुख्य आरोपी का आप नाम तक नहीं लेते। बस रवीश और उनके भाई। आपकी गाँठ भी वहीं लगी है जहाँ संघ/भाजपा वालों की है। उन्हें तो कोई हिसाब चुकाना होगा, आपको?

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर, मुझे क्या हिसाब चुकाना है. लेकिन यह एक नैतिक सवाल है जो मैं बार बार उठाऊंगा क्योंकि रवीश जी पत्रकारिता की धुरी नैतिकता रही है. उनके ऊपर किसी तरह का सवाल नहीं उठा रहा हूँ. उनके उस नैतिक बल पर सवाल उठा रहा हूँ जिसके कारण उनकी आवाज में हम जैसे कमजोर अपनी आवाज को महसूस करते रहे हैं.

Sarvapriya Sangwan प्रभात जी, संतोष सिंह रवीश के फैन हो सकते हैं लेकिन उन्होंने केस से जुड़े तथ्यों का ज़िक्र किया है। अगर आपको शक़ है तो आप भी तो पता करवा सकते हैं कि ऐसा है या नहीं। अगर वो तथ्य गलत हैं तब आप भी बोलिये, मैं भी बोलूंगी। बाकी जब जांच चल ही रही है और उसको किसी तरह प्रभावित नहीं किया जा रहा तो ज़बरदस्ती अपने घरवालों के लिए मुसीबत कोई क्यों बढ़ाएगा। आप अपने वकील से परामर्श लेंगे, उसकी बात मानेंगे या यहाँ सोशल मीडिया पर शुरू हो जायेंगे? मतलब एक तरीके की बात करिये सब पहलू सोच कर। रवीश कुमार पर तो कोई आरोप है ही नहीं। ज़बरदस्ती आरोप क्यों? लिखेंगे तो कहा जायेगा कि वो बचाव कर रहे हैं, मीडिया का सहारा लेकर प्रभावित कर रहे हैं। नहीं लिख रहे हैं तो आप लोग उन्हें और परेशान कर रहे हैं। अपने ऊपर लेकर सोचिये पहले।

Prabhat Ranjan Sarvapriyaजी, संतोष सिंह की विश्वसनीयता के ऊपर मुझे संदेह है. बाकी थानवी जी यही बात अगर इन्डियन एक्सप्रेस के हवाले से लिखते तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती. आपसे फिर माफ़ी.मेरी ऐसी कोई मंशा नहीं थी. मैं भी उनका बड़ा प्रशंसक हूँ. अब नहीं लिखूंगा

Rakesh Rk दिल्ली में काम कर रहे रवीश कुमार को बिहार में रह रहे और कार्यरत उनके भाई के मामले में घसीटना ऐसा ही है जैसा आजकल दहेज विरोधी क़ानून का सहारा लेकर कुछ महिलायें अपने पति, सास-ससुर, ननद, देवर सहित ससुराल पक्ष के उन सभी सम्बन्धियों को नाप देती हैं जो वहाँ से सैंकड़ों मील दूर रहते हैं| अगर रवीश अपने नाम और रुतबे का फायदा उठाकर अपने भाई के पक्ष में जांच को प्रभावित कर रहे हैं जैसे कभी दिल्ली में एक कश्मीरी मूल की दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ राही लड़की के रेप में आरोपी युवक के आईपीएस पिता कर रहे थे तब तो उन पर उंगली उठाना सही भी हो सकता है| रवीश के भाई के मामले में यदि कोई भी शक्तिशाली व्यक्ति उन्हें बचाते हुए शिकायतकर्ता युवती को डरा धमका रहा है तब तो रवीश पर इस केस के बारे में कुछ लिखने बोलने या कार्यक्रम करने का दबाव आता है, वैसे क्यों आएगा? देश में रोजाना हजारों शिकायतें होती होंगी पुलिस में क्या रवीश कुमार सबकी रिपोर्टिंग करते फिरेंगे? उनके विरोधियों को तफसील से और बारीकी से जांच करके उन्हें वहाँ पकड़ना चाहिए जहां वे अपने भाई के खिलाफ जांच को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हों| बाकी उन्हें इस घटना से जो दुख पहुंचा होगा उस दुख को वे लिख कर सबसे साझा करें न करें यह उन पर एक सभी समाज को छोड़ देना चाहिए| अभी तक तो उनकी नैतिकता पर इस केस की छवि का कोई वाजिब दबाव है नहीं|

Om Thanvi संतोष सिंह के पास जो दस्तावेज़ हैं, उनकी विश्वसनीयता मायने रखती है। वे मैंने देखे हैं, तभी लिखा। वे प्रामाणिक हैं। उन्हें लगा देता, पर पीड़िता का नाम उजागर नहीं होना चाहिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi आज इन्डियन एक्सप्रेस में भी उसी तरह की खबर थी सर. आपको प्रमाणिक स्रोत का इस्तेमाल करना चाहिए था. ऐसे स्रोत का नहीं जिसको आप जानते ही न हों. किसी मामले में किसका नाम कब आ जाये यह तो जांच से पता चलता है. शीना बोरा काण्ड में बहुत बाद में पीटर मुखर्जी का नाम आया और बाद में वे ही मुख्य अभियुक्त निकले. ब्रजेश पांडे का नाम लेकर उस लड़की ने कोई गंभीर आरोप नहीं लगाये हैं, बलात्कार का तो नहीं ही लगाया है. लेकिन लड़की नाबालिग है, दलित है. यह मामला बहुत संवेदनशील है. आप से हम बहुत उम्मीद रखते हैं. ऐसे नहीं कि किसी कशिश न्यूज के पत्रकार को आप सबसे विश्वसनीय मान लें.

Bawari Sudipti हिंदी पब्लिक स्फीयर में एक ‘रविश सिंड्रोम’ है। जाने किस-किस की कुंठा को तुष्टि मिल रही है।

Prabhat Ranjan सच कह रही हैं मैं बहुत कुंठित हूँ।

Bawari Sudipti आपका नाम मैंने नहीं लिया, बेवजह मुझे अपनी कुंठा में न घसीटें

Prabhat Ranjan जी ठीक है माफ़ी आपसे।

Om Thanvi तो आप हमें पत्रकारिता भी सिखाने लगे! बंधु, एक्सप्रेस की ख़बर आज छपी है, कल आधी रात की पोस्ट के लिए एक्सप्रेस सपने में आता क्या? दूसरी बात, संतोष सिंह ने मूल एफआइआर और अन्य दस्तावेज़ दिए, उन्हें उद्धृत भी किया। मेरे लिए वह प्रामाणिक स्रोत था। आप आज एक्सप्रेस पढ़कर जागे हैं, मैं कल टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के बाद दस्तावेज़ पाने में जुटा था। पोस्ट सुबह लिख दी थी, दस्तावेज़ रात को मिले।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर जो मैं जानना चाहता था आपने वह बता दिया। संतोष रवीश जी का भक्त है। उसने इस मामले में अतिरिक्त मेहनत की।

Om Thanvi अच्छा किया। इससे संतोष सिंह के प्रति मन में आदर अनुभव हुआ।

Prabhat Ranjan सर दो बातें हैं एक तरफ़ आप यह कह रहे हैं कि पाण्डे जी निर्दोष हैं दूसरी तरफ़ यह भी कि रवीश का इस मामले से कोई लेना देना नहीं। पाण्डे जी के प्रति आपकी यह अतिरिक्त सहानुभूति क्यों है?

Purnanand Singh डूबते को तिनके का सहारा।। जिन कुंठाग्रस्त लोगों को रविश और उनकी पत्रकारिता से नफ़रत है,आज उनके भाई पर लगे आरोप से ही मोर बन कर नाचने लगे हैं।। मानसिक दिवालियेपन का इससे अच्छा उदाहरण और क्या मिलेगा।।

Sanjaya Kumar Singh अगर रवीश के मामले में संतोष सिंह की खबर पर यकीन नहीं किया जाए तो इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर भी नहीं करना चाहिए। कुल मुद्दा यह है कि रवीश के भाई राजनीति में हैं, उनपर राजनीतिक मामला है उन्होंने राजनीतिक कार्रवाई की, इस्तीफा दे दिया। भाजपा में लोग इतना भी नहीं करते। जहां तक रवीश के इसपर लिखने-बोलने की बात है – यह एनडीटीवी की संपादकीय नीति का मामला होगा कि कर्मचारी अपने रिश्तेदार के बारे में खुद क्या करे, स्पष्टीकरण वही दे या क्यों दे आदि। रवीश को इसपर ब्लॉग लिखना चाहिए। उसके हिसाब से अभी देर नहीं हुई है। पांडे जी निर्दोष हैं यह कोई नहीं कह रहा। उनपर जो मामला है वह कितना बड़ा है यह तय होना है।

Himanshu Luthra इतनी बढ़िया बहस फेसबुक पे बहुत ही काम पड़ने को मिलती है।। salute to all of you.. अगर फेसबुक का इस तरह से उपयोग किया जाये तो सच में ये main stream media को कोसों पीछे छोड़ देगा।।।

Om Thanvi पांडेय जी निर्दोष हैं, यह मैंने कहा? ऐसी बेसिरपैर की बहस ही फ़ेसबुक को सड़कछाप बनाती है और मैं इससे जब-तब हट जाना चाहता हूँ। आप इतना साफ़ झूठ कैसे बोल सकते हैं? मैंने तो कल ही लिखा है। आज भी सब सामने रखा है। ज़रा वह पंक्ति निकाल कर बताइए जहाँ मैंने किसी को भी दोषी या निर्दोष ठहराया हो। यह मेरा काम नहीं है, अदालत का है। शब्द मुझ पर थोपिए मत।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर अब आपने सड़क छाप कहा है तो सादर बहस से हटता हूँ। लेकिन दो बात फिर – मैंने आपसे हमेशा दो सवाल पूछे आपने सुविधानुसार एक जवाब दिया। ऊपर मैंने एक विरोधाभास की तरफ़ इशारा किया था। आपने जवाब में एक सवाल किया। दूसरी बात सिर्फ़ ऊपर किए गए एक सवाल की याद दिलाता हूँ- मैंने पूछा था पाण्डे जी अगर 40 साल से राजनीति कर रहे हैं तो उनकी उम्र कितनी है? इस सवाल का जवाब भी आप टाल गए थे। आपको मेरे जैसे सड़क छाप के लिए इतना समय व्यर्थ करना पड़ा इसके लिए माफ़ी।

Om Thanvi मेरा दायित्व नहीं है कि मैं हर सवाल का जवाब दूँ। पर आपको क्या स्पष्ट नहीं करना चाहिए आपने कहाँ पढ़ लिया कि मैंने कहा है पाण्डे जी निर्दोष हैं? बिना सोचे बिना आधार कुछ भी बोल देना क्या ज़ाहिर करता है? एक संगीन आरोप (कि आरोपी को निर्दोष बता दिया) हवा में मढ़ देना बेवक़ूफ़ाना है। अब जवाब देते क्यों नहीं बनता? जवाब कोई हो नहीं सकता क्योंकि मैंने कभी किसी आरोपी को निर्दोष बताया नहीं। न मेरा काम है न बता सकता हूँ।

Mohammad Hasan Omji मुझे नहीं लगता कि आपका तारकिक विशलेसन रंजन जैसे धीढ़ पत्रकारों को कोई समझ दें पायेगा. कोयला कितना ही द्दोया, पोता या जलाया जाये यूँ ही रहेगा, धुन्वा देगा या राख बनेगा. निचले स्तर के पत्रकार लगते हैं. रवीश जी से इर्षा रखते हैं. आपका support अहम बात है. आपसे बहस में निखार आया.

Prabhat Ranjan Om Thanvi सबकी भाषा ठीक करने वाले सर आपने संतोष सिंह की भाषा को कैसे बर्दाश्त किया। वह हर दूसरा शब्द अशुद्ध लिखता है। आप ग़लत बयानी करेंगे और कोई पूछेगा तो कहेंगे हर सवाल का जवाब देना आपका दायित्व नहीं है। जिस ब्रजेश पांडे के बारे में आपने लिखा कि वे 40 साल से राजनीति में हैं आप पहले उनकी असलियत पता कीजिए वे कब राजनीति में आए और कैसे इतनी जल्दी प्रदेश कोंग्रेस के उपाध्यक्ष बन गए।

Om Thanvi जब तथ्य देखने हों तब भाषा की त्रुटियां बीनने वाला मूल मुद्दे से आँख चुराने वाला या उस पर परदा डालने का ख़्वाहिशमंद ही होगा। 40 मुद्दा नहीं है। फिर भी ग़लत है तो पहले आप इसे साबित करें। आपके हर आरोप में मूल मुद्दे को भटकाने की कोशिश है, मैं इसमें आपको सहयोग नहीं करूँगा। और हाँ, आपने अब तक नहीं बताया कि मैंने पांडेय को निर्दोष कब बताया? अगर इतना संगीन आरोप आपने मुझ पर हवा में लगा डाला तो मान लीजिए, 40-50 आड़ में मत दुबकिए।

Prabhat Ranjan Om Thanvi सर आपने निर्दोष सीधे सीधे नहीं कहा लेकिन पाण्डे जी के मामले में एफआईआर की प्रति मँगाकर इस मामले पर आनन फ़ानन में लिखने का क्या आशय था? आप समझ नहीं पाए संतोष की वह एफआईआर की प्रति बहुत लोगों के पास थी। मेरे पास भी थी। जो ज़ाहिर है जानकी पुल के लिए किसी और स्रोत से आई थी। अब मैं विराम देता हूँ। आपका आदर करता रहा हूँ इसलिए दुःख हुआ। सादर

Rakesh Rk ऐसा लगता है हिन्दी जानने समझने वाले भी फेसबुक जैसे माध्यम पर या तो मन के आक्रोश के कारण या जल्दबाजी के कारण सरल हिन्दी में लिखे का सही अर्थ नहीं निकाल पाते| ऊपर एक टिप्पणी में लिखा गया ” ऐसी बेसिरपैर की बहस ही फ़ेसबुक को सड़कछाप बनाती है ” उसे इस तर्क बहस में एक सज्जन ने ऐसे पढ़ा कि उन्हें सड़कछाप कहा गया है| 🙂

Nitin Thakur रवीश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो रिश्तेदारों पर लगे इल्ज़ामों के दम पर ही राजनीति शुरू कर दी गई। जैसे केजरीवाल के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो विधायकों को ही औने-पौने मामलों में फंसाया जाने लगा था। ये एक रणनीति है और इसे एक पक्ष हमेशा दूसरे के खिलाफ अपनाता ही है। ब्रजेश दोषी हैं या नहीं ये तो मामला ही अलग है और वैसे भी रवीश के विरोधियों को इसमें दिलचस्पी है भी नहीं।

Pankaj Chaturvedi जो निहाल चंद पर मुंह में दही जमा कर बैठे है। वे ऐसे झूठ गढ़ने में संजीदा हैं

Nitin Thakur कच्छ में भी आला भाजपा नेताओं पर लड़कियां सप्लाई करने का मामला है। अब तक उस पर भी ऱाष्ट्रीय नेताओँ का बयान नहीं आया है।

Chandra Prakash Pandey यह तर्क अच्छा है,, जब तक निहालचंद पर मुकम्मल कार्यवाही न हो जाये,, तब तक सभी महिला उत्पीड़न व बलात्कार के केस मुल्तवी कर देने चाहिए

Pankaj Chaturvedi Chandra Prakash Pandey भगवन किसने कहा कि गायत्री प्रजापति को पकड़ कर जेल मत भेजो लेकिन सूप तो सूप, छलनी भी बोले जिसमे ९५६ छेद

Chandra Prakash Pandey Pankaj Chaturvedi प्रभु आपने स्वयं लिखा है कि यह झूठ गढ़ा गया है,, फिर आगे कोई जाँच की बात ही बेमानी है,,

Pankaj Chaturvedi Chandra Prakash Pandey गयात्री प्रजापति वाला मसला अलग अहि, हाँ जांच तो होनी चाहिए सच की और झूठ कि लेकिन उससे पहले रवीश कुमार को उसमें लपेटने वाले निहाल चंद पर चुप क्यों हैं

Chandra Prakash Pandey Pankaj Chaturvedi आपने लिख ही दिया कि रवीश का मामला झूठा है फिर कैसी जाँच और कौन सी जाँच ,, हाँ दलित महिला पर झूठा केस करने पर उसपर मुक़दमा दर्ज होना चाहिए,, और जाँच होनी चाहिए,,

Nitin Thakur ब्रजेश की जांच हो.. रवीश का ट्रायल क्यों हो पांडे जी?

DrVibhuti Bhushan Sharma ये तो होना ही था, इसमें कैसा आश्चर्य! रवीश कुमार ने सच्चाई कही, बुराई को आईना दिखाया तो भुगतना ही होगा।।  फासीवादी ताकतों से भला क्या उम्मीद की जा सकती है। ये लोग महान षड्यंत्रकारी हैं।  शुक्र है आरोप रवीश के भाई पर ही लगे, आश्चर्य तो इस बात पर होना चाहिए कि अभी तक रवीश क्यों बचे हुए हैं?
“भारत में अगर रहना है। ।
मोदी मोदी कहना है।।”
मोदी की आलोचना करने वालों के लिए पाकिस्तान अथवा जेल भेजा जाएगा।।
चयन आपको करना है।
मोदी सरकार में मोदी की आलोचना एक अपराध है और अपराध करोगे तो भुगतोगे।
आप सब लोगों ने बहुत सालों तक आलोचना करने का आनंद उठाया है ये अब नहीं चलेगा। अब अगर सच्ची आलोचना भी की तो धरे जाओगे। देश यूँ ही नहीं चलता।।
मोदी जी की और स्मृति ईरानी की शैक्षणिक योग्यता जग जाहिर नहीं की जाएगी। चाहे वो सफेद झूठ कहें। भाजपा के नेता चाहे गंभीर आरोपों में लिप्त हों सब न्यायालय द्वारा बरी कर दिए गए या कर दिए जाएगें। चाहे उन्हें तड़ीपार का तमगा मिला हो। इसे कहते हैं सत्ता चलाना।।
“सत्ता की ताकत तुम क्या जानो रवीश बाबू।।”
लेकिन रवीश भाई चिंता मत कीजिए, हम इस भयावह दौर मे भी आपके साथ हैं।
“रात भर का है मेहमाँ अंधेरा।
किसके रोके रूका है सवेरा।।”

Dhirendrapratap Dhir आज तक का रिकॉर्ड गवाह है कि इस राष्ट्रवादी गिरोह ने जो भी कीचड दूसरों पर उछाला है, वह इसी के मुंह पर आ कर गिरा है. इनसे हम इतर आचरण की उम्मीद कर भी नहीं सकते इस लिए रवीशजी से यही कहेंगे कि मन ख़राब न करें और अपने नागरिक-अधिकारों का प्रयोग करते हुए प्रतिकार करें और अपना कार्य पूर्ववत करें लोग अब पहले की तरह जड़ नहीं हैं और वे जवाब देंगे.

Kishor Joshi बिल्कुल सर, इस मामले में रवीश को निशाना बनाने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन माफ कीजिएगा सर, यहां आपका डबल स्टैंर्डड साफ नजर आता है। आपकी और थान्वी सर (ट्वीट भी) की कई ऐसी पोस्ट हैं, जहां आप कोई भी छोटी से छोटी हो या बड़ी से बड़ी घटना हो तो उसके लिए इनडायरेक्ट वे में सीधे-सीधे मोदी या संघ को जिम्मेदार भी ठहरा देते हैं, भले ही वह देश के किसी भी हिस्से में घटित हुई हो, तब आप ये नहीं कहते कि पीएम या अन्य को इस मामले में निशाना बनाने का क्या औचित्य है?

Yogesh Nagar इस भक्ति काल में ‘सबसे बड़े कुमार’ ने भी ऐसे भक्त जुटा लिये हैं जो सेक्स रैकेट के भी जस्टिफिकेशन खोज ला रहे हैं। यह पत्रकारिता का चरमोत्कर्ष है। (भारी शर्मिंदगी)

Pankaj Pathak आपको भी पता चल गया गुजरात वाला मामला?

Om Thanvi आप सेक्स रैकेट लिखने से पहले कथित या आरोप शब्द तक नहीं लिखते, यह है आप कि न्याय-बुद्धि। और रिश्तेदार पर आरोप पर पत्रकार को निशाना बनाना चाहते हैं मगर ख़ुद एक बलात्कार के आरोपी निहालचंद को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शोभित करते हैं? शर्म तुमको मगर नहीं आती…

विक्की शरण सर ये तारिक फत्तेह के भक्त हैं।

Yogesh Nagar हाँ सही बात लेकिन क्या ये खबर उक्त ब्लेक स्क्रीन वाले कुमार साहब उसी निष्पक्षता के साथ दिखाएंगे? जिस निष्पक्षता का वे दम्भ भरते है यहाँ सवाल ये है justification को लेकर… और आप मेरे कॉमेंट को तुरंत बीजेपी के साथ जोड़ रहे है बगैर किसी आधार के यह है आपकी न्यायिक बुद्धि,यह आपकी कैसी निष्पक्षता है जो एक पत्रकार को लेकर की गयी मेरी टिप्पणी पर निहालचंद का udharan देने लगे?

Pankaj Pathak Yogesh Nagar जी, कितने स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय मीडिया में जगह मिलते देखा है आपने? एक राजनीतिक हितों से आरोप लगाने वाले मामले को बेवज़ह तूल सिर्फ इसलिये मिल रहा है क्योंकि Ravish Kumar ने निष्पक्ष पत्रिकारिता करते हुए सत्ता पक्ष को अक्सर कटघरे में ही खड़ा किया है, चाहे वो 2014 से पहले का काल हो या बाद का। है किसी और पत्रकार में इतना दम?

Om Thanvi Yogesh Nagar क्योंकि आप उसी जमात के साथ जा खड़े हुए हैं।

Yogesh Nagar बिलकुल देखा है,दादरी मामला राष्ट्रीय मामला था? लेकिन बंगाल मामला लोकल मामला था कुमार जी की नज़र में ज़ी न्यूज़ के पत्रकार पर fir हुई,जागरण के पत्रकार की up में गिरफ़्तारी हुई तब मिडिया का गला नही घोटा गया यह है उनकी निष्पक्षत! थानवी जी मेरे आपके इतर राय रखते ही मैं कैसे उसी जमात में शामिल हुआ? आप तब कहते जब मैं बीजेपी इत्यादि का नाम लेता मैंने भक्तिकाल शब्द का प्रयोग किया जो निष्पक्षता की ओर इशारा करता है

Santosh Singh योगेश जी आप सही कह रहे है हमारी तो ये आदत में सुमार है राजा हरिशचन्द्र कि कहानी याद है ना राम सीता और धोबी याद है ना

Rajendra Kulashri पूरी पोस्ट में किसी न किसी बहाने से बृजेशकुमार साहब को बेगुनाह साबित करने की को़शिस है।

Om Thanvi रवीश के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया में चलाए गए कुत्सित अभियान की बात है; आरोप की बात जाँच एजेंसियाँ जानें या अदालत।

Rakesh Rk रवीश कुमार के परम्परागत विरोधी जैसे चाहे ऑनलाइन मुहीम चलायें उनके खिलाफ परन्तु वास्तविकता में तो उनके भाई का मामला बिहार की लोकल पुलिस और कोर्ट देख रहे होंगे, और वहाँ जद यू और राजद का शासन है| उन्हें तो रवीश कुमार से व्यक्तिगत रंजिश नहीं होनी चाहिए| वे तो न्याय की सही तसवीर सामने ला ही सकते हैं|

Shubham Upadhyay फ़िल्म द राइज़ ऑफ़ ईविल में अंत में हिटलर के पागलपन के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार को गोली मार दी जाती है । ये दौर भयावह है । नितीश बाबू की शराबबंदी टाइप हो गया । करे कोई और भुगते कोई और

Anil Chaurasia जो जो लोग साहेब और उनकी पार्टी की आलोचना करेंगे वो वो इन लोगों की गैंग के शिकार होंगे इसमें अचरज की कोई बात नहीं , रवीश भी इनके लिए अनोखी बात नहीं.  इनकी इस प्रवृत्ति का परदा फाश होना ज़रूरी है.

Vinod Kumar Singh सर आप से पूर्ण सहमति। आशा है कि कम से कम बुद्धिजीवी वर्ग सिर्फ आरोपों पर नहीं बल्कि पूर्ण जाँच के बाद दोषी सिद्ध होने पर ही कोई अभियान चलायेगा । रवीश कुमार पर कोई आरोप भी नहीं लगा है। अगर उनके भाई सेक्स रैकेट चलाते हैं तो भी इस बहाने रवीश कुमार का चरित्र हनन सर्वथा अनुचित है। हाँ आरएसएस – भाजपा जैसे संगठन और काग्रेस के बीच इतना विभेद सर्वथा वाँक्षनीय है बौद्धिकता की मर्यादा की रक्षा के लिये।

इसे भी पढ़ें….

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भाई दोषी है तो कोर्ट सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है : रवीश कुमार

बिहार के टीवी पत्रकार संतोष सिंह से बातचीत में रवीश कुमार ने कहा कि अगर भाई दोषी है तो कोर्ट उन्हें सजा दे, इसमें मेरी क्या गलती है. पढ़िए संतोष सिंह की पूरी पोस्ट…

Santosh Singh : मतभेद होना चाहिए और किसी भी समाज में मतभेद ना हो तो समझिए वो समाज मर चुका है लेकिन मतभेद मनभेद में बदल जाये तो समझिए वो समाज अपना नैतिक मूल्य खो रहा है और फिर उसके बाद ही उस समाज का पतन शुरू हो जाता है…. जी हां, बात रवीश कुमार की कर रहे हैं. वही रवीश कुमार जो अक्सर बीजेपी और नरेन्द्र मोदी की खिंचाई करते रहते हैं.. आप इनके विचार से असहमत हों लेकिन असहमति का ये मतलब तो नहीं होनी चाहिए कि उनके चरित्र पर सवाल खड़ा करें, उन्हें गाली दें, उन्हें देशद्रोही तक कह दें….. और, इससे भी बात नहीं बने तो उनका खामियाजा उनके परिवार को भुगतना पड़ जाये… अंधेरगर्दी वाली स्थिति है क्या?

रवीश कुमार से हमारे रिश्ते हैं, जगजाहिर है, मैंने उसे कभी छुपाया भी नहीं…

कल कांग्रेस के ही एक नेता जो हमारे फेसबुक से जुड़े हुए हैं प्रवीण मिश्रा, ये एनएसयूआई के बड़े लीडर हैं, ने मेरे चैट बाक्स में ‘रवीश कुमार के भाई सेक्स का धंधा कराते हैं’ इससे जुड़े कई लिंक और टाइम्स आफ इंडिया अखबार का लिंक भेजा, साथ ही मुझसे कहा कि ये खबर क्यों नहीं चल रही है… क्यों मीडिया वाले खामोश हैं… मुझे बहुत गुस्सा आया… मैंने कहा- टाइम्स आफ इंडिया क्या है, कोई साक्ष्य हो तो दीजिए… देखिए कैसे खबर चलती है… खैर उसके बाद वो भाग खड़े हुए…

ब्रजेश पांडेय को मैं तो ना जानता हूं और ना ही पहले कभी इनसे मुलाकात हुई है… मैंने सीधे रवीश जी को फोन किया… क्या ये सही है… उन्होंने बस इतना ही कहा- मेरी क्या गलती है जो मेरे साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है… भाई दोषी है तो कोर्ट सजा दे… बातचीत के दौरान वे उदास और निराश थे… खैर, मैंने सोचा पहले सच्चाई जान लिया जाये…

22-12-2016 को एसीएसटी थाने में एफआईआर दर्ज होता है जिसमें निखिल प्रियदर्शी उनके पिता और भाई पर छेड़छाड़ करने और पिता और भाई से शिकायत करने पर हरिजन कह कर गाली देने से सम्बन्धित एफआईएर दर्ज करायी गयी इस एफआईआर में कही भी रेफ करने कि बात नही कही गयी है..इसमें ब्रजेश पांडेय के नाम का जिक्र भी नही है,,,

24-12-2016 को पीड़िता का बयान कोर्ट में होता है धारा 164 के तहत इसमें पीड़िता ने शादी का झासा देकर रेप करने का आरोप निखिल प्रियदर्शी पर लगाती है ये बयान जज साहब को बंद कमरे में दी है इस बयान में भी ब्रेजश पांडेय का कही भी जिक्र नही है,,,,दो दिन में ही छेड़छाड़ रेफ में बदल गया

30–12–2016 को यह केस सीआईडी ने अपने जिम्मे ले लिया इससे पहले पीड़िता ने पुलिस के सामने घटना क्रम को लेकर कई बार बयान दिया लेकिन उसमें भी ब्रजेश पांडेय का नाम नही बतायी।।

31-12-2016 से सीआईडी अपने तरीके से अनुसंधान करना शुरु किया और इसके जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया जांच के क्रम में पीड़िता ने एक माह बाद बतायी कि एक पार्टी में ब्रेजश पांडेय मिले थे उन्होने मेरे साथ छेड़छाड़ किया… फेसबुक पर देखा तो ये निखिल के फ्रेंड लिस्ट में हैं इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो…. पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है पहली बार उन्होनें ब्रेजश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया निखिल का अवारागर्दी कि चर्चा खुब किया है उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई और इस बार उसके गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ जिसमें इन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी निखिल ने पीड़िता को कोल्डडिग्स पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे… मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है लेकिन उसमें ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है ऐसा बयान नही दिया है…

वैसे इस मामले में बहुत कुछ ऐसा है जिसका खुलासा कर दिया जाये तो पूरा खेल एक्सपोज हो जायेगा लेकिन इससे कही ना कही निखिल को लाभ मिल जायेगा जो पीड़िता के साथ न्याय नहीं होगा…

पुलिस का अनुसंधान अभी तक यही तक पहुंचा है वैसे मेडिकल रिपोर्ट भी …..बहुत कुछ बया कर रहा है छोड़िए आप बताये क्या इसी आधार पर ब्रजेश पांडेय को दोषी मान लिया जाये फांसी चढा दिया जाये क्यों कि यूपी चुनाव के बाद ब्रजेश बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते थे इसलिए इन्हें फांसी चढा दिया जाये कि ये रवीश के भाई है… वैसे आपके पास कुछ जानकारी हो तो जरुर दिजिए क्यों कि अगर सच में सैक्स रैकेट चलाते हैं तो फिर कड़ी सजा मिलनी चाहिए।।

बिहार के टीवी पत्रकार संतोष सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें…

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भक्तों की टोली को हुआं हुआं करने दो, रविश का बाल भी बांका न कर सकेंगे शिकारी

Sheeba Aslam Fehmi : बेदाग़ करियर वाले सेक्युलर बुद्धिजीवियों को घेरने के लिए एक ही रास्ता बचा है की यौन शोषण का आरोप लगा दो. जहाँ आरोप लगाने वाले को कुछ साबित नहीं करना पड़ता. अगर वो ख़ुद बेहद्द सतर्क हों तो कोई बात नहीं परिवार के किसी सदस्य पर लगा दो, और भक्तों की टोली हुआं हुआं करती सोशल मीडिया के ज़रिये जान ले लेगी. लेकिन रविश ने बीस साल के बेदाग़, रौशन करियर में घास नहीं छीली है, उन्होंने जो इज़्ज़त, भरोसा और समर्थन हासिल कर लिया है, उसके रहते शिकारी उनका बाल बांका नहीं कर सकेंगे.

Priyabhanshu Ranjan : आजकल एक बड़े पत्रकार सुबह उठकर मुंह भी तब धोते हैं जब NDTV वाले रवीश कुमार को जी भर के गाली दे लेते हैं….उन पर एकदम सड़ा हुआ कीचड़ उछाल देते हैं। खैर, ये पत्रकार महोदय वही हैं जिनकी बेवकूफाना रिपोर्टिंग ने एक शख्स को खुदकुशी के लिए मजबूर कर दिया था। इस चिरकुट पत्रकार ने तथ्यों की जांच किए बिना उस पर बलात्कार का आरोप होने की खबर चलवा दी थी, जिससे आहत होकर ‘आरोपी’ ने खुदकुशी कर ली। कायदे से इस ‘डफर’ को IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने की सजा होनी चाहिए थी, लेकिन ये रवीश पर कीचड़ उछालता फिर रहा है। वो भी रवीश के बड़े भाई के बहाने। इनके कुकर्मों की फेहरिस्त लंबी है। लिखने बैठ जाऊं तो सुबह से शाम हो जाए।

Syed Salman Simrihwin : इंडिया टीवी के एक पत्रकार हैं… Abhishek Upadhyay..क्या लिखते हैं..तेज़ाबी तेवर, रोशनाई रोने लगे..स्याही सिसकने लगे..कमाल के कलमकार हैं..गज़ब की बमबारी करते हैं शब्दों से..पढ़ा मैंने, बम-बारूद, तोप, गोले, मिज़ाइल, टैंक, और फाइटर प्लेन्स सारे अल्फाज़ी अमले शामिल होते हैं इनकी लेखनी के कुरुक्षेत्र में..इस बार उनकी भिड़ंत हो गई ‘एनडीटीवी’ वाले रविश बाबू से..भिड़ंत नहीं..बल्कि भड़ास कहिये..इसलिए भड़ास भी भड़ासी जज़्बात को पहचान गया…तुरंत पन्ने पर चिपका मारा…खबर छप गई..टांय-टूंयी, ठांय-ठुंई, धड़ाम-धुडिम उपाध्याय जी ने शब्दों की मिशिनगन से इतनी गोलियां दागी..इतनी गोलियां दागी…कि कई भिखारी खोखा चुनकर अडानी के अब्बा बन गए..और बाक़ी शब्दों की शक्ल में मरे कारतूस को बीन के बड़के राष्ट्रवादी पत्रकार बन गए..सौ सालों से शांत बैठा ज्वालामुखी अचानक फट गया…दहकते शब्द, लावा की शक्ल में सब कुछ राख करने को आतुर थे..लेकिन भगवान भला करे रविश का..उन्हें इस हमले में खरोंच तक न आई..अब जान लीजिए रविश का बड़का गुनाह…उनके बड़के भाई के ऊपर रेप के आरोप लगे हैं…बस इतना पता चलते ही…उपाध्याय जी हनुमान हो गए…रावणरुपी रविश के पाप को भस्म करने के लिए..पूरी लंका को आग लगा दी..एक बार में इतने ज़हर उगल डाले…की कोबरा भी शर्म से पानी मांगता फिर रहा है…मगर उपाध्याय जी की तीसरी आंख उस वक़्त नहीं खुली जब…कुछ महीने पहले उन्ही के संस्थान इंडिया टीवी में एक फीमेल एंकर ने, चैनल मालिक रजत शर्मा सहित चैनल के कई लोगों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था..और चैनल के दफ्तर में ही आत्म हत्या करने की कोशिश की थी…तब आरोप भाई/रिश्तेदार पर भी नहीं..बल्कि सीधे सीधे उपाध्याय जी के मालिक पर था..तब उपाध्याय जी के सभी हथियारों में जंग लग गए थे..कलम की रोशनाई सूख गई थी..इत्तेफाकन तब चाइनीज़ सामान का अपने इधर बहिष्कार चल रहा था..इसलिए स्मार्ट फोन का इस्तेमाल भी नहीं कर सके उपाध्याय जी…लैपटॉप भी उनका खराब पड़ा था..दिल्ली में ठंढ भी इतनी थी की दलदली से हांथ में कंपकपी छूट रही थी..उपाध्याय जी बिच्छू नहीं, फिर भी डंक ज़बरदस्त मारते हैं..हमें इनके डंक’ की कद्र करनी चाहिए..इन्हें सच लिखना बहुत प्रिय है…झूठ लिखने से इनकी उंगली ऐंठने लगती है..ईमानदार लेखनी इनकी सबसे बड़ी पूंजी है…इसीलिए ओढ़ने-बिछाने में भी ईमानदारी को ही वरीयता देते हैं…हालांकि मालिक के खिलाफ जब बम पटकने की बात आती है…तो ये ईमानदारी को बनियान से ज़्यादा महत्व नहीं देते..तब उपाध्याय जी कहते हैं..कि एक बनियान दो दिन पहनना मुश्किल है..बदबू करने लगता है..कभी कभी ईमानदारी भी बदबूदार बनियान की तरह होता है..इसलिए जितनी देर ईमानदारी को पहनोगे उतनी देर आसपास में बदबू फैलेगी…अब तो हमने भी सीख लिया है..जहां अवसर हो वहां ईमानदारी की रामनामी चादर ओढ़ लेनी चाहिए..गज़ब की सोच है उपाध्याय भइया की..उनकी सोच को साक्षात प्रणाम..हम सब को मिलकर प्रात: स्मरणीय उपाध्याय जी की दीर्घायु की कामना करनी चाहिए…ताकि गंगू तेली जैसे लोग खोखे चुन-चुन कर राजा भोज बन सकें।

सौजन्य : फेसबुक

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रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

किसी पत्रकार का भाई राजनीति करे ये भले गैर कानूनी ना हो लेकिन पत्रकार की नौकरी के लिए मुफीद नहीं। इससे पत्रकार पर ठप्पा लगना तय है, भले वो ज़िंदगी भर उसी पार्टी की लेनी देनी करता रहा हो। पत्रकार के रिश्तेदारों को ठेकेदारी भी नहीं करनी चाहिए और ना ही ऊंची नौकरी में जाना चाहिए.. हो ना हो ज़रूर पत्रकार ही ठेके दिलवा रहा होगा.. और वो ही नौकरी की भी सिफारिश कर रहा होगा। इस सबके बाद अगर पत्रकार का कोई दूर या पास का रिश्तेदार किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए.. फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा तो भी ये पत्रकार की ही गलती है।

आखिर उसके घर के सभी लोग संस्कारी क्यों नहीं हैं ? क्या हक है किसी ऐसे आदमी को पत्रकारिता करने का जिसके घरबार-परिवार में किसी का नाम किसी कानूनी मामले में आ जाए? इस देश में बिज़नेस, सरकारी नौकरी और राजनीति भले किसी नैतिक दबाव से मुक्त हो कर की जा सकते हों लेकिन पत्रकारिता करने के नियम बेहद कड़े हैं और मई 2014 के बाद तो ये और भी मुश्किल हो गए हैं। खैर, नया फैशन ये है कि जो पत्रकार आपके रुझान के मुफीद ना पड़ता हो और लड़कीबाज़ी से लेकर कमीशनखोरी तक के इल्ज़ाम उस पर ना टिकते हों तो फिर पत्रकार के रिश्तेदारों का कंधा सीधा कीजिए और उस पर बंदूक रखकर पत्रकार को गोली मार दीजिए।

यहां टीवी पर फिरौती लेते पत्रकार देखे गए हैं.. नकली स्टिंग चलाकर चैनल बैन करवा डालने वाले पत्रकार देखे गए हैं.. और ना जाने कहां-कहां क्या-क्या करनेवाले पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान भी देखे गए हैं (लिस्ट बनानी शुरू करूं तो वो भी शर्मसार होंगे जो कल अपनी पोस्टों में नैतिक ज्ञान बघार रहे थे.. उनके संस्थानों में लड़कियों के साथ क्या कुछ होता रहा है इन करतूतों की अधिक जानकारी के लिए Yashwant भाई का भड़ास पढ़ा जा सकता है)। इस देश ने फिरौती वसूलने के बाद कई साल तक अपनी इमेज मेकिंग के लिए अति राष्ट्रवादी और धार्मिक उन्माद फैलानेवाली पत्रकारिता करनेवालों को माफ किया है पर मैं देश की जनता से मांग करता हूं कि ऐसे पत्रकार को माफ ना किया जाए जिसका भाई अपने प्रदेश में मर चुकी एक पार्टी से राजनीति तो करता ही है, साथ में उस पर किसी नेता की ही बेटी आरोप लगा दे। वैसे मामला और निशाना दोनों समझनेवाले सब समझ रहे हैं लेकिन दिक्कत दो तरह के लोगों के साथ है। एक तो वो हैं जो किसी भी हाल में महिलावादी या दलितवादी दिखने को मजबूर हैं ( वजह वो ही जानें) और दूसरे वो जिन्हें मामले में दिलचस्पी कम बल्कि पत्रकार के चीर हरण में आनंद ज़्यादा आ रहा है (वजह सबको पता है)।

किसी को डिफेंड करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन रवीश को करूंगा। उन्हें इसलिए नहीं करूंगा कि मैं उनका कोई फैन-वैन हूं बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि एजेंडेबाज़ी का ये खेल यहीं नहीं थमनेवाला। अगर रवीश कुमार को गिराए जाने में कायमाबी मिल गई तो फिर इस्टेब्लिशमेंट के सामने खड़ा हर पत्रकार इसी रणनीति से गिराया जाएगा। अपने यारों,दोस्तों, रिश्तेदारों के कारनामों से अपना चरित्र जज होने से बचाने के लिए हर छोटे- बड़े पत्रकार को करियर की शुरूआत में ही अखबार में विज्ञापन निकलवाना पड़ेगा। उसमें पत्रकार घोषित करेगा कि, ”आज और अभी से मैं अपने सभी नाते-रिश्तेदारों से सारे संबंध खत्म कर रहा हूं। इनके किए-अनकिए के ज़िम्मेदार यही होंगे, मैं नहीं। मेरी निष्ठाओं को इनकी करतूतों पर ना परखा जाए।” ये घोषणा भले इस मुल्क के नेताओं को करने के लिए मजबूर ना होना पड़े.. नौकरशाहों से ना कराई जाएं लेकिन पत्रकारों से ज़रूर करवाएं.. आखिर देश के सारे फैसले वो ही तो लेेते हैं और आपकी ज़िंदगी के ना जाने कितने फैसले पत्रकार ही प्रभावित कर रहे हैं! पत्रकार ना हों तो देश आज ही चांद पर कॉलोनी बना ले। आपके खातों में 15 लाख भी आ जाएँ। समाजवाद का सपना ये पत्रकार प्रजाति ही रोक कर खड़ी है।

अब अंत में एक और बात.. लड़की ने आरोप लगाए हैं तो उसकी एफआईआर भी दर्ज हुई.. तुरंत कार्रवाई करते हुए मामला सीआईडी के हाथों में दिया गया। एसआईटी ने जांच करते हुए लड़की के आरोपों को सही भी पाया। नीतीश कुमार की पुलिस की तारीफ होनी चाहिए। इतनी जल्दी कार्रवाई गुजरात के कच्छ में नहीं हुई जहां पर एक लड़की ने बीजेपी के कई आला नेताओँ पर लड़कियां सप्लाई करने का आरोप लगाया था और बाकायदा अपनी वीडियो क्लिप के साथ सामने आई थी। उसने रैकेट के बारे में सबूत भी दिए थे। यहां मसला और ही कुछ है।

लड़की ने 22 दिसंबर को एफआईआर में एक लड़के निखिल, उसके पिता और भाई का नाम डलवाया। भाई पर जातिसूचक गाली देने के आरोप भी लगाए।याद रहे कि आरोप छेड़छाड़ के थे, रेप के नहीं। यहां तक ब्रजेश पांडे कहानी में नहीं हैं। खैर, पुलिस एक हद तक दबाव डालकर अक्सर एफआईआर हल्की करा देती है इसलिए बाद में मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में बयान लिए जाते हैं और वही आखिरी माने भी जाते हैं। दो दिन बाद कोर्ट में यही लड़की धारा 164 के तहत बयान देती है और निखिल नाम के मुख्य अभियुक्त पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाती है। यहां भी ब्रजेश पांडे का नाम कहीं नहीं है। 30 दिसंबर को सीआईडी ने मामला हाथ में लिया मगर पीड़िता ने बार-बार बयान देने के बावजूद ब्रजेश पांडे का नाम नहीं लिया। सीआईडी ने जो एसआईटी बनाई उसकी जांच में एक महीने के बाद लड़की ने एक पार्टी में ब्रजेश पांडे से मिलने और छेड़छाड़ के इल्ज़ाम लगाए।

बिहार के टीवी पत्रकार Santosh Singh ने मामले की तफ्तीश की है। सारे कागज़ निकलवाए और मामले की प्रक्रिया देखी। उन्होंने फेसबुक पर ही सारी जानकारी तारीख के हिसाब से दी है और ये भी लिखा है कि पीड़िता ने ब्रजेश पांडे को फेसबुक पर देखा कि ये निखिल की फ्रेंड लिस्ट में हैं। पीड़िता का कहना है कि इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो। पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल की अवारागर्दी की चर्चा खूब की। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया।

वैसे मैंने भी शिकायतकर्ता लड़की के आरोप सुने हैं। पत्रकार ने पूछा कि सैक्स रैकेट चलाने वाली बात कैसे कह सकती हैं तो उसने कहा कि चूंकि निखिल ने मुझे ब्रजेश के साथ दिल्ली जाने को कहा था तो मुझे उससे लगता है। लड़की ने जो पत्रकार से कहा उससे ये भी मालूम चलता है कि वो निखिल से शादी करना चाहती थी और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तब वो उसके पिता से मिलने पहुंची थी। वैसे लड़की की पहचान नहीं खोलनी चाहिए लेकिन अब चूंकि वो खुद मीडिया में इंटरव्यू दे रही है और बीजेपी नेताओं ने काफी हद तक पहचान खोल दी है तो इतना तो जान ही लीजिए कि उसका बैकग्राउंड कमज़ोर कतई नहीं है, अच्छा खासा पॉलिटिकल है तो संभावनाएं और आशंकाएं खूब हैं। बहरहाल लड़की का मीडिया ट्रायल करना गलत है, भले वो खुद मीडिया तक आई है.. लेकिन उतना ही गलत उस पत्रकार का मीडिया ट्रायल भी है जो खुद इसमें कहीं से शामिल नहीं। हां, अगर किसी को मज़ा ही रवीश कुमार को फंसाने में आ रहा हो तो बात अलग है। केजरीवाल को काबू करने के सिलसिले में जब केंद्र उनके खिलाफ कुछ ना ढूंढ सका तो विधायकों को जिस बेशर्मी से औने-पौने मामलों में जेल भेजा गया वो सबके सामने है.. ये अलग बात है कि ऐसे ही मामलों में फंसे होने के बावजूद ना स्मृति ईरानी को छेड़ा गया और ना ही निहालचंद को।

सोशल मीडिया के चर्चित और जनपक्षधर लेखक नितिन ठाकुर की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

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ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं!

Abhishek Upadhyay : ज़बरदस्ती में भाई लोग एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय के पीछे पड़ गए हैं। अरे भई, हाँ। रवीश कुमार। अब खानदानी नाम रवीश पांडेय है तो क्या हुआ? सेक्युलर हैं। सर्वहारा समाज के प्रतिनिधि हैं। रवीश कुमार ही सूट करता है। अब क्या हो गया जो इन्ही रवीश पांडेय, माफ़ कीजिएगा रवीश कुमार के बड़े भाई ब्रजेश पांडेय बलात्कार के मुकदमे में हैं।

पीड़ित भी कौन? एक दलित लड़की! वो भी नाबालिग? ज़िला मोतिहारी। बिहार। सेक्स रैकेट चलाने का मामला अलग से है! पर इसमें रवीश कुमार का करें?

अब ठीक है, माना कि आसाराम से लेकर स्वामी नित्यानन्द तक ऐसे ही मामलों पर बड़ा शोर मचाए रहे वो। गर्दा झाड़े पड़े थे। तब पीड़ित के साथ खड़े थे। रोज़ ही जलते सवालों की बौछार। स्टूडियो न हुआ था। आग का मैदान हो गया था तब। पर भूलो मत। भाई की बात है। आपस में भले लड़ लें। बाहर सब एक हैं। जब बाहर से विपत्ति आई तो युधिष्ठिर ने कहा था- “वयम पंचादि शतकम।” हम एक सौ पांच हैं। कौरव-पांडव सब एक। अब धर्मराज युधिष्ठिर की भी न सुने रवीश!!!

एक बात और सुन लो। रवीश कुमार का भाई तो बलात्कारी हो ही नही सकता। ऊपरवाले की फैक्ट्री में कुछ लोगों के चूतड़ों पर नैतिकता का सर्टिफिकेट चिपकाकर। बाकायदा लाल स्याही से ठप्पा मारकर। फिर उन्हें नीचे भेजा जाता है। ऐसे हैं रवीश कुमार। अगर वो अपने भाई के खिलाफ कुछ भी लिख बोल नही रहे हैं तो सीधा मतलब यही है कि भाई दूध का धुला होगा। वो भी अमूल ब्रांड। फुल क्रीम मिल्क का। तुम समझे कि नही? ये पुलिस। ये थाना। ये कानून। वो दलित लड़की। वो महिला पुलिस इंस्पेक्टर जिसने जांच की और इनके भाई का नाम शामिल पाया। सब के सब बिके हुए हैं। सब झूठे हैं। फ्रॉड हैं।

ब्रजेश पांडेय से बड़ा बेदाग़ कौन होगा? उन पर रवीश पांडेय, अरे माफ़ कीजियेगा, रवीश कुमार का हाथ है। मेरी नज़र में ये भाजपाइयों या फिर संघ की साज़िश हो सकती है। Yes, रवीश कुमार के भाई कांग्रेसी नेता हैं। पिछला चुनाव मोतिहारी से लड़े थे। हार गए। सोनिया जी भी आई थीं। रवीश कुमार के भाई हैं। बड़े भाई। जलवा है। किसी ने राजनीतिक साज़िश कर दी होगी!!

अब ये कौन सी बात हुई कि बिहार में तो नितीश कुमार की पुलिस है? भाई साज़िश मत करो रवीश कुमार के खिलाफ। कौन हैं ये नितीश कुमार। बोलो। कौन हैं? अबे, ये बीजेपी के एजेंट हैं। और क्या! रवीश कुमार के ख़िलाफ़ जो भी एक लफ्ज़ बोलेगा, वो बीजेपी का ही एजेंट होगा। जाओ, निकलवाए लो उस दलित लड़की की भी जनम कुंडली। बाप नही तो दादा। दादा नही तो परदादा। या उनके भी दादे। कोई न कोई बीजेपी से सटा रहा होगा। अब बीजेपी तब नही थी तो क्या हुआ!! तुम निकलवाए लो कुंडली। सावरकर और गोलवलकर के साथ कभी घूमे होंगें। इनके दादे-परदादे।

ये वही कम्युनल लोग हैं जो कहते हैं कि रवीश कुमार 2जी मामले में फंसी एनडीटीवी से मिली मोटी तनख्वाह डकारकर रोज़य ईमानदारी का प्रवचन देते हैं। अरे भइया, एनडीटीवी में 2जी मामले के चार्जशीटेड आरोपी टी.आनदकृष्णन ने कई सौ करोड़ का निवेश कर रखा है!!! तो क्या हुआ? कौन सी बिजली गिर गई? रवीश कुमार को इसमें से क्या मिला जा रहा है। हर महीने 5-6 लाख की तनख्वाहै तो मिल रही होगी। और का? अब अगर बगैर रिजर्व बैंक की इजाज़त से। चोरी छिपे। विदेश में बनी अपनी सहयोगी कम्पनियों मे कई सौ करोड़ की रकम डालकर। एनडीटीवी बैठ गई है। तो रवीश कुमार को पर्दे पर ईमानदारी की बात करने से काहे रोक रहे हो? अब वो अगर कुछ और नाही कर पाए रहे हैं। परिवार चलाना है। सो नौकरी भी नाहि छोड़ पाए रहे हैं। तो का ईमानदारी की बात भी न करें। उन्हें कुछ तो करने दो भाई लोगों।

बड़ी गाड़ी। बड़ा बंगला। मोतिहारी में अलग। पटना में अलग। ग़ाज़ियाबाद और कहां कहां!! तो का हुआ? अब ये सोचो कि एयरकंडिशन ज़िन्दगी में रहकर भी कोई। टीवी के पर्दे पर सही। मेहनतकश मजदूर के पसीने के बारे में सोच लेता है। मामूली बात है???

तो भइया, हम तो इस लड़ाई में रवीश पांडेय, उफ़ ये ज़ुबान, फिर से माफ़ी, रवीश कुमार के साथ हैं। आप भी साथ आओ। चलो नया नारा गढ़ते हैं-

“ब्रजेश पांडेय को बचाना है

और

उस दलित लड़की को

झूठा साबित करके दिखाना है।”

अब ये कौन साला आ गया है जो तेज़ आवाज़ में लाउडस्पीकर पर बल्ली सिंह चीमा की कविता बजाए जा रहा है? रवीश कुमार को सुनाए जा रहा है-

“तय करो किस और हो तुम
आदमी के पक्ष में हो
या फिर कि आदमखोर हो तुम।”

भगाओ…मारो….साले को… चुप कराओ… यहां नैतिकता का इकलौता ठेकेदार पत्रकार जीवित है!!! वो भी नही देखा जा रहा है इनसे!!!!

इंडिया टीवी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की एफबी वॉल से.

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रवीश के भाई बृजेश पांडेय पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप!

Dayanand Pandey : अब बताईए कि एनडीटीवी वाले अपने रवीश कुमार के भाई बृजेश पांडेय फ़रार हो गए हैं। सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में बिहार पुलिस उन्हें खोज रही है। बृजेश पांडेय बीते बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ कर हार चुके हैं।

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Ashutosh Mishra Panday ji, it’s not good to give your credit, for fake news, because, after few fake Story, your credibility will be zero, at your social life. Be careful about your credibility. I am not supposed to protect any one, only questions on your credibility

Dayanand Pandey इस ख़बर को फर्जी बताने का आप के पास आधार क्या है ? या सिर्फ़ सहानुभूति भरी लफ्फाजी झोंक रहे हैं ?

Sonu Singh ये सत्य और सत्यापित खबर है।

Rizwan Khan अब भाई भागे है रवीश तो नहीं… और, भाइयों को करनी उनके साथ?

जितेंद्र दीक्षित वैसे भाई के कारनामे पर रविश कुमार पर टिप्पणी करना उचित नहीं पर अफसोस यह है कि दीपक तले अंधेरा। गांव-गांव की खाक छान कर स्टोरी करने वाले रविश साहब को अपने भाई की करतूत का संज्ञान नहीं । कहा तो यह भी जा रहा कि बिहार चुनाव में भाई का टिकट रविश ने ही पक्का कराया था।

Praveen Mishra आरोप के चलते नहीं, सिर्फ इस सवाल से घबराकर भागे हैं कि रवीश यह न पूछ लें…. कौन जात हो भाई?

असहिष्णु अरुण कौन जात हैं वे?

Haresh Kumar कान्यकुब्ज ब्राह्मण है और पांडेय टाइटल है। यह मोतिहारी जिला से बिलॉन्ग करता है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इसका भाई चुनाव लड़ चुका है। हम बगल के ही हैं।

Praveen Mishra जहां तक मुझे जानकारी है, भूमिहार हैं लेकिन पांडेय लिखते हैं।

Shailendra Srivastava आप लोग जातिगत मानसिकता से कब उबरेंगे।

Praveen Mishra आप Shailendra Srivastava जी, इस मानसिकता से ऊबर चुके है? सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि रवीश इस सवाल को पूछते हुए सारी हद तोड़ चुके हैं।

Kailash Bajpai पांडेय जी में Rizwan Khan भाईसाहब की बात से पूरी तरह सहमत हूँ, कि भाई के किये का पाप रवीश पर थोपने का कोई औचित्य नहीं… मगर भाई स्वघोषित निष्पछ रविश कुमार जी स्क्रीन ब्लैक करने के और ग्राउंड पर माइक ले जाकर रिपोर्टिंग के माहिर हैं, तो भाई उन्हें भी तथ्यों की पड़ताल ग्राउंड पर जाकर स्क्रीन ब्लैक करनी चाहिए.

आलोक सिंह Rizwan Khan सही कहते हैं कि भाई के किये का पाप रवीश पर थोपने का कोई औचित्य नहीं, क्यूँकि ये गलत है, लेकिन भारत मे होने वाली हर घटना के लिए जब रवीश और उनके अनुयायी मोदी को दोषी ठहरा देते हैं, वो बड़ा क्रान्तिकारी पत्रकारिता होती है।

Vivek Kumar Singh कांग्रेस के बिहार उपाध्यक्ष भी है ।

Kameshwr Pandey कालिख लगाने का मौका चूकना नहीं चाहिए।

Acharya Chandrashekhar Shaastri भूमिहार ब्राह्मण है

Amrendra Ajay भूमिहार नही हैं..

Tarun Kumar Tarun इस पर रवीश से एक खोजी रपट की उम्मीद तो की ही जा सकती है!

Radhey Shyam Maurya रबिश भाई अभी रिपोर्टिंग के लिए भाई को खोज रहे है

Adarsh Shukla बागों में बहार है

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