जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए

Sushil Upadhyay : राज्यसभा टीवी, केरल, आरफा और हिंदी… कल रात साढ़े आठ बजे राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी का कार्यक्रम देखकर मन खुश हो गया। जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए। खासतौर से, उनकी भाषा को। वे अपनी प्रस्तुति में रवीश कुमार की तुलना में ज्यादा संतुलित, शालीन और बौद्धिक नजर आती हैं। कल वे केरल में थीं, वहां से चुनावी मुहिम पर शो प्रस्तुत कर रही थीं। उनके पैनल के नाम देखकर एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद आज का शो अंग्रेजी में होगा। पैनल में सीपीएम के वी. शिवदासन, आरएसएस के डॅा. के.सी. अजय कुमार, ईटीवी के प्रमोद राघवन, पत्रकार गिलवेस्टर असारी और केरल से प्रकाशित कांग्रेस के दैनिक अखबार के संपादक (जिनका नाम याद नहीं रहा) शामिल थे।

जब आरफा ने कार्यक्रम की भूमिका शुरू की तो मेरी उत्सुकता बढ़ गई क्योंकि जब कोई दक्षिण या पूर्वाेत्तर का व्यक्ति हिंदी कार्यक्रमों का हिस्सा बनता है तो उसे सुनने का मन करता है। मुझे लगा कि ये कार्यक्रम आरफा के लिए चुनौती होगा क्योंकि उनके अलावा पांचों लोग ऐसे हैं जिनकी भाषायी पृष्ठभूमि न हिंदी की है और न ही उत्तर भारत की। वैसे भी जब आरफा बोलती हैं तो उनकी भाषा सुष्ठु, परिष्कृत और प्रांजल (उर्दू में शायद इसे नफीस कह सकते हैं!) होती है। दूर दक्षिण में उनकी भाषा को कौन समझेगा! पर, मैं गलत साबित हुआ। बहस शुरू हुई तो भाषा गौण हो गई। राघवन, असारी और के.सी. अजय कुमार को सुनकर लगा ही नहीं कि वे अपनी मातृ-भाषा से अलग कोई भाषा बोल रहे हैं।

बेहद सधे हुए, प्रभावपूर्ण, तार्किक और खूबसूरत हिंदी बोलने वाले दक्षिण भारतीय लोग पूरे कार्यक्रम में आरफा की बराबरी पर नजर आए। कहीं-कहीं शिवदासन अंग्रेजी-ट्रैक पर चले जाते थे, लेकिन कुछ ही अंतराल में हिंदी पर लौट आते थे। इक्का-दुक्का वाक्यों में लिंग संबंधी दोष दिखता था, लेकिन इससे भाषा के प्रवाह, लयात्मकता और उसकी अंतर-बद्धता पर कोई असर नहीं दिखा। कुछ उच्चारण तो उत्तर भारतीय से बेहद अच्छे थे क्योंकि ज्यादातर उत्तर भारतीय ‘और’ को ‘ओर’ की तरह बोलते हैं। केरल के चुनाव पर केरल के विशेषज्ञों को हिंदी में सुनना अपने आप में सुखद अनुभव रहा। और ऐसा नहीं है कि मैं इसलिए खुश हूं कि, देखो दक्षिण वाले भी हिंदी बोल रहे हैं, मुझे तब भी वैसी ही खुशी होती है, जब कर्नाटक में नौकरी करने गए मेरे एक परिचित धाराप्रवाह कन्नड़ में बात करते हैं। विषयांतर न हो जाए इसलिए इस कार्यक्रम के लिए आरफा खानम शेरवानी को बधाई प्रेषित करता हूं।

सुशील उपाध्याय पत्रकार और मीडिया शिक्षक रहे हैं. इन दिनों सरकारी नौकरी में हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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