राज्यसभा टीवी के प्रधान संपादक के संपादन की योग्यता देखिए!

Zaigham Murtaza : ये Rajyasabha Television के प्रधान संपादक की संपादन योग्यता है। प्रति माह 3 लाख रुपये से ज़्यादा का ख़र्च है इसे पालने का। ये पैसा हमारे आपके टैक्स से जाता है… Continue reading

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गुरदीप सिंह सप्पल ला रहे हैं नया न्यूज चैनल- ‘न्यूज प्लेटफार्म’

राज्यसभा टीवी के संस्थापक गुरदीप सिंह सप्पल एक नया न्यूज चैनल लांच करने जा रहे हैं. नाम है ‘न्यूज प्लेटफार्म’. चर्चा है कि यह न्यूज चैनल इस महीने के आखिर या अगले महीने के पहले सप्ताह तक लांच हो जाएगा.

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आरएसटीवी में कार्यरत डेली वेजेज वीडियो एडिटर्स के साथ भेदभाव क्यों?

आरएसटीवी में कार्य कर रहे फ्रीलांसर / डेली वेजेज वीडियो एडिटर्स भेदभाव के शिकार हैं. इनके साथ अन्याय हो रहा है लेकिन प्रबंधन सब देखकर भी चुप है. जबसे यह आरएसटीवी चैनल शुरू हुआ है तब से वहां वीडियो एडिटर्स को 1300 रुपये प्रतिदिन दिया जाता है. जो अन्य लोग कांर्टैक्ट पर कार्यरत हैं उनकी तनख्वाह हर वर्ष 10 प्रतिशत बढ़ जाती है. Continue reading

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राज्यसभा टीवी के लिए हो रहे इंटरव्यू में उम्मीदवारों का चयन मनमाने तरीके से!

राज्य सभा टीवी में एक्जीक्यूटिव एडिटर, एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर (इनपुट) के लिए इंटरव्यू हो रहे हैं। लेकिन ए़डीशनल सेकेट्री ए.ए.राव ने उम्मीदवारों का चयन मनमाने तरीके से किया है। इस पद के लिए उनको भी छांट दिया गया है जो कि प्रधान संपादक पद के लिए अर्ह थे। Continue reading

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संघ के वैचारिक भौंपू बने RSTV से पत्रकार ज़ैग़म मुर्तज़ा का इस्तीफा, पढ़ें उनकी पीड़ा

Zaigham Murtaza

आख़िर 7 साल कम नहीं होते लेकिन गुज़रने थे सो गुज़र गए और अच्छे से गुज़रे। किसी भी संस्थान में थोड़ी बहुत खींचतान और राजनीति लाज़िमी है मगर आख़िर के कुछ महीनों में काम से ज़्यादा राजनीति से सामना हुआ। इसे राजनीति भी कहना सही नहीं होगा। ये विचारधारा का द्वंद था। उन्हे सावरकर के गाय और धर्म पर विचार रास नहीं आए और हम लिखने से बाज़ नहीं आए। Continue reading

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RSTV : कभी इसे ‘भारत का बीबीसी’ कहा जाता था, आज का ताजा हाल देखें

Om Thanvi : “परम पूज्य” सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत “जी” मंच पर मौजूद?? ये हाल हो गया है राज्यसभा टीवी का। आपके-हमारे पैसे से चलता है, पर चिलम नागपुर की भरता है। कभी चैनल की चर्चा भारत का बीबीसी कहते हुए होती थी, क्योंकि सरकार से पैसा लेकर भी सरकार की जगह दर्शकों के प्रति ज़्यादा वफ़ादार था। मोदी लहर एक-एक कर जाने कितनी संस्थाओं को लील गई है। उनमें अब इस Rstv को भी शरीक कीजिए। Continue reading

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राज्य सभा टीवी- श्रम कानूनों की ऐसी तैसी

बंद दरवाजे के पीछे बहुत परदा है

करीब एक साल बहुत लंबे इंतजार के बाद 7 मई 2018 को राज्यसभा टीवी में बंपर वैकेंसी आयी तो 43 पोस्टों के लिए 2500 से अधिक पत्रकारों ने अर्जी दे डाली। बड़ी संख्या में पत्रकार आखिरी तारीख यानि 21 मई को तालकटोरा स्टेडियम और गुरुद्वारा रकाबगंज रोड पर राज्य सभा टीवी के दफ्तर पहुंचे। अर्जियां और उनके साथ नत्थी योग्यताओं के दस्तावेजों की फोटो कापी के साथ इतनी भीड़ उमड़ी कि पहले तय पांच बजे का समय बढ़ा कर रात आठ बजे करना पड़ा। कुरियर से आवेदन उसके बाद भी दो तीन दिन तक आते रहे। Continue reading

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राज्यसभा टीवी के बाद गुरदीप सिंह सप्पल ने लांच किया नया वेंचर- ‘हिंद किसान’

गुरदीप सिंह सप्पल

आज के दौर में जब मुख्यधारा की मीडिया नान-इशूज पर फोकस कर जनता का ध्यान बुनियादी मुद्दों से हटाने के सत्ता-तंत्र के खेल में पूरी तरह लिप्त हो गया है, कुछ साहसी किस्म के लोग आम जन के प्रति मीडिया की प्रतिबद्धता को जीने में लगे हुए हैं. गुरदीप सिंह सप्पल के नेतृत्व में राज्यसभा टीवी लांच हुआ और देखते ही देखते यह चैनल पत्रकारिता के असल मानकों का प्रतीक बन गया. इंटरव्यूज हों या ग्राउंड रिपोर्टिंग… आदिवासियों का मसला हो या किसानों का जीवन हो… सब कुछ को बेहद संजीदगी और सरोकार के साथ चैनल पर प्रसारित किया गया. कई आईएएस सेलेक्ट हुए छात्रों ने कुबूल किया कि वे सिविल सर्विस की तैयारी के दिनों में न्यूज चैनलों में केवल राज्यसभा टीवी देखते थे.

कई पत्रकार तो राज्यसभा के अपने शोज के जरिए मीडिया के चर्चित चेहरे बन गए.  सीईओ और एडिटर इन चीफ के रूप में गुरदीप सिंह सप्पल ने राज्यसभा टीवी में जो संपादकीय आजादी दी और बहस-विमर्श का जो लोकतांत्रिक माहौल कायम किया, उसकी आज भी मिसाल दी जाती है. फिलहाल नए उप राष्ट्रपति के शपथ लेने के साथ ही गुरदीप सिंह सप्पल ने राज्यसभा टीवी को गुडबॉय बोल दिया और चुपचाप अपने नए वेंचर की तैयारी में लग गए.

गुरदीप सिंह सप्पल कहते हैं-

”ये भारत देश गांवों का देश है. किसानों का देश है. यह डायलाग बोलता तो हर कोई है लेकिन ज्यादातर लोग / संस्थाएं / मीडिया हाउसेज इमानदारी से गांव-किसान की बात नहीं करते. किसान की असल समस्या क्या है. उनकी जमीनी पीड़ा-मुश्किलें-दिक्कतें क्या हैं. इन सब पर आज कोई मीडिया हाउस फोकस नहीं करता. यही कारण है कि हम लोगों ने ‘हिंद किसान’ वेब टीवी शुरू किया है. यह वेब टीवी भविष्य में सैटेलाइट चैनल के रूप में भी लांच हो सकने की संभावना से भरा है. लेकिन अभी हम लोगों का ध्यान सोशल मीडिया पर है. फेसबुक, ट्विटर से लेकर ह्वाट्सअप, यूट्यूब आदि माध्यमों के जरिए हम गांव-गांव तक ‘हिंद किसान’ को पहुंचाएंगे. इस ‘हिंद किसान’ वेब चैनल को सभी का प्यार चाहिए. ये किसी एक व्यक्ति का चैनल नहीं है. यह हर उस शख्स का चैनल है जो दिल से चाहता है कि मीडिया अब बुनियादी मुद्दों पर बात करे, ग्रामीण भारत की बात करे, देश के किसानों-मजदूरों की बात करे. ऐसे में हम सभी का कर्तव्य है कि ‘हिंद किसान’ चैनल के प्रचार-प्रसार में जुट जाएं. इसके फेसबुक पेज, इसके वीडियोज को लाइक शेयर करें. अगले कुछ महीने में हम लोग चैनल को एक ठोस रूप दे पाएंगे, यह विश्वास है.”


‘हिंद किसान’ वेब चैनल को छब्बीस जनवरी यानि गणतंत्र दिवस के दिन लांच करते हुए इसके एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल ने सोशल मीडिया पर हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में जो प्रेस रिलीज जारी की है, वह इस प्रकार है…

दोस्तों,

आज हमारा 69वां गणतंत्र दिवस हैं और इस शुभ दिन हम अपना नया मीडिया मंच शुरू कर रहे हैं। राज्य सभा टीवी के बाद आज हम खबरों की दुनिया में एक नया सफर शुरू कर रहे हैं। महानगर केंद्रित खबरों तक खुद को सीमित रखने वाले मेनस्ट्रीम मीडिया से अलग… हमारा इरादा ग्रामीण और कस्बाई भारत के धूल-धक्कड़ भरे रास्तों पर चलने और देश के दूर-दराज की खबरों को आप तक पहुंचाने का है। हमारा उद्देश्य है ग्रामीण भारत की खूबसूरती और चुनौतियों को समझना और उसके संकट, सम्भावनाओँ, पीड़ा एवं आकांक्षाओं को सामने लाना है। हमारी योजना मीडिया के बुनियादी सिद्धांतों का पालन करते हुए खबर देने, मुद्दों पर चर्चा एवं बहस करने और सरकारों को जवाबदेह बनाने की है। हम उस लोकतांत्रिक मान्यता का अनुकरण करना चाहते हैं, जिसके तहत मीडिया को लोकतंत्र का एक मज़बूत स्तम्भ माना जाता है। हमारा सपना तटस्थ, जिम्मेदार और निडर पत्रकारिता करने का है।

यह हमारे प्रयास का पहला चरण है। इसमें हम सोशल मीडिया की शक्ति और संभावनाओं का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे। आज हम फेसबुक पेज और यू-ट्यूब चैनल शुरू कर रहे हैं। हमारी वेबसाइट का बीटा वर्जन एक फरवरी 2018 को आपके सामने आएगा। अगले कुछ महीनों में हम एक पूर्ण न्यूज वेब टीवी के रूपमें आपके सामने होंगे।
खबरों के इच्छुक सभी भारतवासियों से संवाद करने की आकांक्षा रखते हुए हमने अपनी पहल का नाम – ‘हिंद किसान’ रखा है। यह ग्रामीण भारत से हमारे लगाव और उससे जुड़ी हमारी चिंताओं का संकेत है। आप हमें निम्नलिखित लिंक्स पर फॉलो कर सकते हैं…

Facebook: https://Facebook.com/HindKisan

Twitter: https://twitter.com/hindkisan_in

Dear Friends,

As we celebrate the 69th Republic Day, I want to share the news of our new media venture. After RSTV, we embark upon a new journey in world of news. Unlike the mainstream media, which is largely confined to metro centric issues and narratives, our journey would progress on the dusty pathways and landscapes of rural India and mufassil towns. Our aim is to capture the beauty and the challenges; the distress and the resilience; the pains and the aspirations of rural India.

Abiding by the classical tenets of media, we plan to look for news, discuss & debate issues and work to hold governments accountable. We wish to follow the democratic scheme that defines media as one of the pillars. Neutral, responsible, fearless journalism is our cherished dream.

In phase one of our venture, we will try to harness the power and potential of social media to reach out to people. Today we launch our Facebook page and YouTube Channel. The beta version of website will be up on February 1, 2018 and in another few months, we plan to become fully functional News WebTV. Aspiring to communicate with all news lovers in India, we have named our initiative as ‘Hind Kisan’, symbolising our affinity and our concern for rural India. I would like to welcome you all to follow us on:

Facebook: https://Facebook.com/HindKisan

Twitter: https://twitter.com/hindkisan_in

Gurdeep Singh Sappal

एडिटर-इन-चीफ

हिंद किसान


ट्विटर पर ‘हिंद किसान’ वेब टीवी को इंट्रोड्यूस कुछ यूं किया गया है :

Hind Kisan @hindkisan_in : Former Rajya Sabha TV CEO and Editor-in-Chief @gurdeepsappal introduces his new venture. Read his message.


हिंद किसान वेब चैनल के शुरुआती दो वीडियोज देखें….

गणतंत्र के धूमधड़ाके में कहां खड़ा किसान..देखिए हिंद किसान की पहली डिबेट…. नीचे क्लिक करें

https://www.facebook.com/hindkisan/videos/895228003992420/

भारी पड़ा भावान्तर… क्यों फिर से ठगा महसूस कर रहा है मध्य प्रदेश का किसान? क्यों खेती बन चुकी है घाटे का सौदा? क्यों पड़ गया भवान्तर भारी? देखिये इस रिपोर्ट मैं, सीधे प्रदेश के खेतों और मंडियों से ज़मीनी हक़ीक़त…

https://www.facebook.com/hindkisan/videos/895177620664125/

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Know How a Senior Editor is being FORCED to Leave RSTV

Rajya Sabha TV- Deceit, Deception, Dishonesty, Anything but Parliamentary

Rajya Sabha: How to SET Editor-in-Chief selection

The story of war for control at Rajya Sabha TV (RSTV) could make the most intriguing episode of Game of Thrones a run for TRPs. The channel has been in controversy for years now. There have been incessant allegations of misuse of public money, nepotism, corrupt practices in RSTV. There have been reports of CAG objections. Leading media organizations like DNA, Tehelka wrote articles alleging splurging of Rs 1700 crores. It another matter that both the organizations tendered apology for factually incorrect reporting to the Privileges Committee of Rajya Sabha, when nearly all political parties in the House, except BJP, collectively moved privilege motion against wrong reporting.

But after a change of guard at helm in Centre and Rajya Sabha, one would have expected to see some change. But that was perhaps too much to expect. Even months after taking charge as Chairperson Rajya Sabha Venkaiah Naidu has not really shown any inclination towards stemming the extravagance at RSTV or initiating clean and fair processes in hiring.

It is true that Vice President Naidu himself directed a fresh audit of RSTV, after he came to know that all the previous CAG audits had not found anything wrong with RSTV. But his own sources also released to media that the channel’s budget was only Rs 62.5 crore per annum. The news was shamelessly picked by the former CEO Gurdeep Sappal on his own facebook page, who in tongue-in-cheek style thanked the Vice President and wrote ‘Now that it has been officially made clear that RSTV’s expenditure is just ₹62.5 crore a year, out of which ₹25 crore goes to NDMC, the fake news campaign of ₹1700 crore or ₹3000 crore spent stands exposed.’

AS per the newspaper reports, Vice President had also directed to reduce the manpower in the channel and vacate the costly NDMC building at Talkatora Stadium. But unfortunately, his writ stops at RSTV. It is learnt that a scheme has now been approved to allow RSTV to increase its staff by recruiting hundred more employees. Also, surprisingly, instead of Talkatora Stadium building, it’s the Gurudwara Rakabganj Road office which was for free, has been vacated! Talkatora rent continues!

But the real game of intrigue and deceit in the channel is now coming out in open after RSTV initiated the process of appointing new Editor-in-Chief. The channel, falling under direct control of the Chairman Rajya Sabha Venkaiah Naidu, who also happens to be the Vice President of India has been showing utter disregard to established laws, rules and practices.

Sources in the organisation say that the entire process of appointing Editor-in-Chief was done in a way that would benefit certain people. A close look at events prima facie indicate attempts to include some and eliminate some in the selection process by subterfuge.

On 21 October 2017, Vice President Venkaiah Nadu formed a Search & Select Committee for “Appointing” the Editor-in-Chief of RSTV. The committee was headed by A Suryaprakash, Chairman Prasar Bharati Board of India. The committee also has Shashi Shekhar Vempatti, CEO, Prasar Bharati and Swapna Das Gupta, Member Parliament (Rajya Sabha) and Rahul Srivastava, senior journalist.

The “Search & Select” committee was made to search directly a suitable candidate, contact him/her, interview him/her and submit the decision to the Chairman Rajya Sabha for approval. It was done to immediately bring in a new Editor-in-Chief so that the old decision-making set-up, which is still loyal to Hamid Ansari and is full of Left-Congress activists, can be replaced.

But its been three months after the committee was formed and no one has been selected as Editor-in-Chief. The delay seems to be deliberate and mischievous.

To derail the selection process, first an advertisement was issued on 30 November 2017 inviting applications for the post of Editor-in-Chief. It was baffling because the “Search & Select” committee was formed to avoid the lengthy process of calling applications. It was not supposed to issue an advertisement.

It is being said that the Committee, which has nominees of the PMO and Vice President of India, could not agree on a common name due to different directions coming from two most powerful offices in India. So, it decided to call for application. A carefully tweaked advertisement describing “Required” and “Desired” qualities of the ideal candidate was issued.

Professionals from within RSTV and outside applied for the post of Editor-in-Chief. After an “Exhaustive Scrutiny” of the extended list of applicants a shortlist was narrowed down for the final interview.

The shortlist is also an interesting exercise. It had two criteria, ‘experience’ and ‘controversy’. Some candidates were not shortlisted for the final interview, because of their controversial past, even though they had extensive requisite experience. Obviously, it was a clever design to rule out some names.

Among the shortlisted were names like Rahul Mahajan, Sandeep Bamzai, Vibhakar, M K Jha from outside and Rajesh Badal, Arvind Singh, Akhilesh Suman among fairly senior members from RSTV. But even names like Om Prakash, Neelu Vyas Thomas, Amritanshu Rai, Vishal Dahiya etc. from within RSTV were found suitable for appearing in the final interview. And this, sources point, is the actual ‘management’.

One line of powerful RSTV management got in juniors like Vishal Dahiya, who is only a Senior Producer, shortlisted along with seniors like Bamzai, Rahul Mahajan and Vibhkar! The other line got in Rajesh Badal after waiving off age limit, as he was already over-age!

The final interviews were done in two lots. Those appearing from within RSTV were called first and the outsiders were called the next day. Insiders claim that the carefully constructed interviews were also designed to bring out the so called “Taint” in the professional history of the certain candidates and “Lack of Suitability” in others so that their names could be eliminated.

It is learnt that at the end of this exercise the top contender from “Outsiders” were Vibhaker and Rahul Mahajan and from insider was Vishal Dahiya. Another insider lobby was in favour of Rajesh Badal.

But its more than one and a half month now. The ‘Search and Select’ committee has failed to come to any conclusion. The entire matter is stuck between PMO and VP office, while the commies rule the roost.

The PMO is against Vishal Dahiya, because he was a close accomplice of Pankaj Shankar in DD. Pankaj Shankar was close associate of Rahul Gandhi and used to run pressbrief.in, which was the approved website for Rahul for years. Pankaj now seems to be out of favour, but it was he who had brought Dahiya to RSTV through Raibareli -Amethi connection with another congressman Gurdeep Sappal.

But even more curious is the case of “insider” Rajesh Badal, who is currently the Executive Director at RSTV. Normally, it would have been difficult to ignore his candidature because of his experience in the media and also being one of the two senior most Editors in the channel.

So to eliminate his case, a dubious tool of sexual harassment was used. Mysteriously, a new twitter handle, which has only one follower came up! On 8 January 2018, a post appeared on this handle, alleging that a complaint has been filed against Rajesh Badal for ‘women harassment’ in RSTV. The entire Dahiya clique in RSTV signed a petition to the Vice President, accusing Badal of sexual harassment. It was signed by women and men professionals, both!

One must appreciate the courage shown by these women and men to come forward in bringing out the state of affairs in a channel that is expected to maintain the highest levels of morality and ethics. But this has also brought some very serious concerns.

Normally, there should have been an instant response from Chairman, Rajya Sabha’s Office and the person in concern should have been suspended pending enquiry or at least sent on compulsory leave till further action. But so far no one has been suspended or sent on compulsory leave in RSTV despite passage several weeks. Also the complaint was leaked into public domain through twitter.

No one thought of situations that emerged in the channel. The complainants are forced to continue to take orders from the same person against whom they have made complaints. Also, by remaining in position of power, the accused gets direct access to the complainant and can intimidate them in to backing down from their complaints.

On the other hand, the person facing allegations of sexual misconduct is not allowed any platform to put across his version and is being forced to face public humiliation in office, without proper recourse to any instigative process.

It is shameful situation for a division of Rajya Sabha. The sidelining of an authentic harassment complaint or the conspiracy of a fake complaint, both are criminal offences. Society at large must show extreme concern that the highest law-making body is itself failing its women and men employees. One shudders to think the message it is sending to the society.

The insider grapevine is that the RSTV administration has not taken any disciplinary action against Rajesh Badal, because it is working out a deal with him. He is being asked to quietly put in his resignation, so that he can be eliminated from the race of Editor-in-Chief. It would make the way clear for Vishal Dahiya, who has already been elevated to the position of ‘Input Head’, without any due procedure or approval of the Vice President and is now ruling with the help of his clique.

But will the matter end with the resignation of Rajesh Badal? What will happen to the rights of women working in RSTV? Imagine the message that will go down the system through the country if a department of Rajya Sabha, the Upper House of The Parliament, the maker and custodian of laws, were to strike a deal over Right and Honour of Women at RSTV.

On the other hand, if the allegations are false and motivated just to capture a post of Editor-in-Chief, is it not a matter of worry that even the top officials working in Parliament of India can be threatening and pressurised so easily? Certainly, such intrigue is not good for the institution. Sources have told that neither Rajya Sabha Secretariat nor Chairman, Rajya Sabha himself have not given any direction on this matter.

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अफवाहों-दुष्प्रचारों के बीच राज्यसभा टीवी पर हुए खर्च की हक़ीक़त जानिए

भड़ास तहक़ीक़ात : राज्यसभा टीवी ने पिछले छः साल में एक धारदार और पेशेवर टीवी चैनल की पहचान बनायी है। लेकिन चैनल पर लगातार ख़र्च को ले कर आरोप लगते रहे हैं। WhatsApp पर लगातार मैसेज मिलते रहे हैं कि चैनल ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्च कर दिए। लेकिन पिछले हफ़्ते स्वयं वेंकैय्या नायडू के ऑफ़िस के हवाले से ख़बर आयी कि राज्यसभा टीवी पर सात साल में 1700 करोड़ रुपए नहीं मात्र 375 करोड़ रुपए ख़र्च हुए हैं।

इसी ख़बर ने भड़ास को जाँच के लिए प्रेरित किया और बहुत हैरान कर देने वाली जनकरियाँ मिलीं। भड़ास ने जाँच में पाया कि सात साल में जिन मद में ख़र्च हुआ, वो इस प्रकार है :

25 मई, 2010 से 31 जुलाई, 2017

  1. वेतन पर हुआ ख़र्च : 92.4 करोड़ रुपए
  2. किराए पर हुआ ख़र्च: 111.74 करोड़ रुपए (राज्यसभा टीवी ने NDMC से तालकटोरा स्टेडीयम प्रांगण में बिल्डिंग किराए पर ली हुई है)
  3. चैनल बनाने का कैपिटल ख़र्च: 67.2 करोड़ रुपए (जो सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की संस्था BECIL को दिए गए। इसमें स्टूडियो, न्यूज़ रूम, संसद भवन में राज्यसभा में सीधे प्रसारण का सेटअप और चैनल का तमाम मशीनें, सिविल वर्क शामिल हैं)
  4. OB Van, Optical Fibre, ANI, PTI का ख़र्च : 22.8 करोड़ रुपए
  5. सिक्यरिटी, सफ़ाई, बिजली, जेनरेटर, कम्प्यूटर, फ़ोन, ऑफ़िस, रख रखाव का ख़र्च: 6.67 करोड़ रुपए
  6. प्रोग्रैमिंग का ख़र्च: 75.3 करोड़ रुपए ( जिसमें चैनल के सभी प्रोग्राम, समाचार बुलेटिन, संविधान का निर्माण, रागदेश का निर्माण शामिल है)
  7. कुल ख़र्च (2010-2017): 376.11 करोड़ रुपए

राज्य सभा टीवी जिस तालकटोरा स्टेडियम प्रांगण में स्थित है, उसकी तीन मंज़िल में ‘भारतीय नेवी’ का ऑफ़िस है। नेवी भी NDMC को उसी रेट पर किराया देती है, जिस रेट पर राज्यसभा टीवी को जगह दी गयी है। यही नहीं, Lutyens ज़ोन में NDMC के कई भवन विभिन्न सरकारी ऑफ़िसों को किराए पर दिए गए है, जिसका किराए का रेट स्वयं प्रधानमंत्री ऑफ़िस ने तय किया था। प्रमुख किराएदारों में रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, कस्टम विभाग, इनकम टैक्स विभाग इत्यादि हैं।

राज्यसभा टीवी के ख़र्च को देख कर प्राइवेट चैनलों में काम कर रहे पत्रकार हैरान हैं। ये आम बात है कि किसी भी प्राइवेट चैनल का सालाना ख़र्च कई-कई सौ करोड़ रुपए है। साथ ही बनाने में ही तीन चार सौ करोड़ रुपए की लागत बताई जाती है। राज्यसभा टीवी की क्वालिटी, प्रोग्राम और इन्फ़्रस्ट्रक्चर किसी प्राइवट चैनल से काम नहीं है, लेकिन ख़र्च का हिसाब देख कर पत्रकार हैरान हैं कि क्या इतने काम ख़र्च में भी बेहतरीन चैनल बनाया और चलाया जा सकता है।

चैनल के ख़िलाफ़ लगातार दुष्प्रचार अभी भी जारी है। दो साल पहले DNA अख़बार और तहलका मैगज़ीन ने 1700 करोड़ रुपए ख़र्चे जाने की ख़बर छापी थी। तब राज्य सभा की दस से ज़्यादा राजनीतिक दलों के क़रीब पचास सांसदों ने DNA और तहलका को लोगों को गुमराह करने के ख़िलाफ़ सदन में विशेषाधिकार प्रस्ताव दिया था। बाद में दोनों ने ही ग़लत रिपोर्टिंग के लिए माफ़ी माँग ली और मामला समाप्त मान लिया गया। राज्यसभा की वेबसाइट पर पूरे मामले की रिपोर्ट मौजूद है।

लेकिन इस सब के बावजूद लगातार झूठे मैसेज प्रचारित किए जा रहे हैं। पूरे मामले को एक स्कैम की तरह पेश कर, चैनल को बदनाम करने की कोई बड़ी किवायद चलायी जा रही है।  भड़ास की जाँच में ये भी सामने आया है कि राज्यसभा टीवी में कभी किसी भी पत्रकार या ऑफ़िसर को सरकारी ख़र्च पर विदेश पढ़ने नहीं भेजा गया, जैसा कि प्रचार किया जा रहा है।

यही नहीं, पिछले सात सालों के वजूद के दौरान राज्यसभा टीवी के ख़िलाफ़ कभी भी CAG की कोई रिपोर्ट नहीं आयी है। यही नहीं, जुलाई 2017 तक CAG का कोई भी सवाल राज्य सभा टीवी के पास अनुत्तरित नहीं था। सभी सवालों के जवाब संतोषजनक दिए गए थे और CAG ने उन्हें पूरी तरह स्वीकार किया।

भड़ास ने सोशल मीडिया में लगाए जा रहे झूठे आरोपों पर राज्यसभा टीवी के नए सीईओ शशि शेखर वेमपति से आधिकारिक जवाब के लिए सम्पर्क किया, लेकिन उनका फोन ‘नाट रीचेबल’ बोलता रहा। राज्यसभा टीवी का नया प्रबंधन अगर इस मामले पर चाहे तो अपना पक्ष भड़ास4मीडिया तक Bhadas4Media@gmail.com के जरिए पहुंचा सकता है।

भड़ास4मीडिया के लिए राहुल सिंह की रिपोर्ट.

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RSTV का वार्षिक बजट 62.50 करोड़ था, इसमें से 25 करोड़ रुपये एनडीएमसी को किराया जाता था

Gurdeep Singh Sappal : अब जब ये साफ़ कर दिया गया है कि RSTV का वार्षिक बजट केवल ₹62.50 करोड़ था और उसमें भी ₹25 करोड़ केवल NDMC को जाता था, मुझे उम्मीद है कि ₹1700 करोड़ -₹ 3000 करोड़ ख़र्च का झूठा प्रचार अब थम जाएगा। राज्य सभा टीवी ईमानदार नीयत और निष्ठा से एक असरकारक पब्लिक broadcaster के रूप में स्थापित किया गया था। मैं आशा करता हूँ कि इसकी दूसरी पारी भी शानदार रहेगी।

Now that it has been officially made clear that RSTV’s expenditure is just ₹62.5 crore a year, out of which ₹25 crore goes to NDMC, the fake news campaign of ₹1700 crore or ₹3000 crore spent stands exposed. RSTV was created as robust public broadcaster and with good intentions. I wish it great second innings now.

राज्यसभा टीवी के संस्थापक, सीईओ और एडिटर इन चीफ रहे गुरदीप सप्पल की एफबी वॉल से.

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”RSTV wasn’t possible without you, All the very best Gurdeep sir”

राज्यसभा टीवी के संस्थापक प्रधान संपादक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी गुरदीप सिंह सप्पल ने अपना लंबा-चौड़ा इस्तीफानामा अपने एफबी वॉल पर पोस्ट किया है, जिस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. ज्यादातर लोगों ने गुरदीप सिंह सप्पल को राज्यसभा टीवी जैसा एक चैनल खड़ा करने के लिए बधाई दी और आगे के करियर की लिए शुभकामनाएं. पढ़िए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा…

Amit Ahluwalia The way you and your team managed, sourced and shaped the RS TV … really showed which rather looked unachievable a few years back … Having a News /info/knowledge Channel of our very own …. Indian in spirit … Sir you did beautifully and admirably …. You left a vast media library invaluable in content and incomparable in quality …. Hats off to you and your team …. Your able stewardships will be missed …. Hats off to you. Jai Hind !

Mahendra Mishra आप और आपकी टीम ने इतिहास रचा है। आपने न केवल एक संस्था खड़ी की बल्कि उसने मीडिया के अंधकार युग में उजाला फैलाने का काम किया। उसकी भूमिका ऐतिहासिक रही है। आप ने दिखाया है एक हिमालयी, उम्दा, और सफल संस्थान खड़ा किया जा सकता है। बशर्ते इच्छा शक्ति और विजन हो। बहुत-बहुत शुभकामनाएं भविष्य के लिए।

Fuzail Ahmad Saddened to know about your move..nodoubt you people made this channel amongst the few best in india…now doubt what will happen to this public broadcaster.. All the best sir

Yuvraj Shekhar सर निश्चित तौर पर आपके महत्वपूर्ण व सफल प्रयासों से राज्यसभा टीवी को आज वो पहचान मिली है, जिसकी राह पर अब देश के अन्य मीडिया संस्थान भी चलना चाहते हैं… मेरा ये सौभाग्य रहा कि मुझे भी आपके सानिध्य में काम करने का अवसर मिला.. मैं, भविष्य में आपके और सफल होने की कामना करता हूं…

Shavez Ahmed RSTV wasn’t possible without you… All the very best Gurdeep sir.

Mohan Chauhan बहुत खूब। आपका 6 वर्षों का कार्यकाल सराहनीय रहा। इस दौर में चैनल ने जिन मापदण्डों को गढा है, उम्मीद की जानी चाहिए कि वे आगे भी बरकरार रहेंगे। आपके जज्बे और चीजों को देखने के नजरिए के साथ ही रिश्तों के प्रति संवेदनशीलता और समर्पण से आपका हम सभी मित्रों के बीच एक खास मुकाम हमेशा रहेगा। मुझे आशा है आपने भविष्य के लिए जो भी भूमिका अपने लिए तय की है, उसे भी आप हमेशा की तरह एक नया आयाम देंगे। ढेर सारी शुभकामनायें।

Yogesh Dabra Yes, I agree you changed the face of RS TV. Best of luck for your future assignment.

Vivekanand Singh राज्यसभा टीवी मेरे लिए घर की तरह रहा है। मैं कई चैनल ट्यून करते हुए अक्सर राज्यसभा टीवी पर ठहर जाता हूं। शायद अब ऐसा न हो पाए। सबसे पहले गिरीश सर के जाने का दुख हुआ, फिर अमृता मैम और अब आप भी छोड़ रहे हैं। सरोकार में कई मर्तबा ऑडिएंस में बैठ कर भी आपको सुना। आप सरल और सहज लगे। आपको ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं। हां अभी इरफ़ान सर गुफ्तगू देखने जरूर आऊंगा।

Sumedha Verma Sir u hv been a true inspiration. We had a great learning experience wth you. I wish u all the best for your future.

Virender Singh Khurana Advocate यह अन्त नही शुरूआत है एक नया कदम एक नये मुकाम की ओर। वाहेगुरू जी सदैव आप पर कृपा बनाये रखे और हमेशा ही हम कहते रहे कि गुरदीप सप्पल जी हमारे शहर देहरादून से है। आप देहरादून की शान है। भविष्य मे नयी ऊचाईया इन्तजार मे है छू लो उन मंजिलो को जो सिर्फ आपके इन्तजार में है।
Anand Pandey Sir you have made a brilliant institution, I always get inspired by the contents of RSTV programs…thank you very much. And one last thing, I hope RSTV will grow in the right direction. We’ll miss you sir…

Asif Jah U established RSTV as one of the reputed channel with limited resources tht u have …

Vijay Bhatt मैं स्वयं राज्यसभा टीवी का दर्शक रहा हूँ। आज गोदी मीडिया के ज़माने में तुम्हारे और तुम्हारी टीम के कुशल नेतृत्व में राज्यसभा टीवी ने मेरे जैसे दर्शकों के मन में एक ख़ास जगह बनाई है। अब आगे क्या होगा पता नहीं। ख़ैर नई पारी की शुरूआत के लिये शुभकामनायें।

Babita Dogra U did wonderful things till date now my best wishes for your new journey

Ashutosh Deshmukh एक शानदार पारी खेलने के बाद एक शतकवीर बल्लेबाज़ के चेहरे पर जो संतुष्टि नज़र आती है, वो आपके विदाई संदेश में है। सारे मिथक तोड़ते हुए भारतीय टेलिविज़न में एक नयी कहानी रचने के लिए धन्यवाद। आशा है, विश्वास है और प्रार्थना है कि नए हाथों में भी राज्यसभा टीवी की ऊर्जा और मूल्य बरक़रार रहे। आपके लिए अनन्य शुभकामनाएँ।

Amitaabh Srivastava Good luck for the future Gurdeep Singh Sappal . You are leaving a proud legacy behind.

Yashpal Jagotta RSTV से आपके प्रस्थान का पढ़ कर दुख तो हुआ लेकिन RSTV का regular viewer होने के नाते आपके सफल एवं सुखद भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामना।

Lotty Alaric I just want to say one thing dat it will be difficult for RSTV to fill your shoes. Best wishes for your journey ahead.

Ameeque Jamei हकूमत के हाथ रहते हुये भी आपने फ्री फेयर बनाया, डीडी के सच से आपने इसे आगे निकाला, आपको याद किया जाएगा आईएनए पर आपकी बनवाई फिल्म के लिये भी जो शायद हकूमत के हाथो इतिहास पर आधारित आखरी फिल्म होगी… आगे क्या बनेगा… क्या होगा राज्यसभा टीवी का… हम नहीं जानते… लेकिन नस्लें आप जैसों को याद करेंगी!

Vinod Sharma “दो-दो रुख हैं दोगली है जिंदगी….” one of the line written by Gulzar Sahib for my produced serial दाने अनार के about 25 years ago is still relevant- you are an inspiration to today generation, I have been your silent observer since long, I wish u all the very best, regards Always.

Yogesh Ranta स्टेट फंडिंड चैनल के बारे में हमेशा ये धारणा रही है कि वो सरकार के भोंपू की तरह काम करता है लेकिन आपके नेतृत्व में अब तक के सफर में राज्यसभा चैनल ने आम लोगों की आवाज़ उठाई और संविधान में निहित वैज्ञानिक तर्कशीलता को बढ़ावा देने काम किया। आगे सफर के लिए आपको शुभकामनाएं।

Sohail Hashmi Well done, you built an institution that set several examples, unfortunately the calibans who will be brought in, as they are being brought in everywhere will besmirch this hard earned reputation.

Arun Khare एक ईमानदार फैसला। Gurdeep Singh Sappal जी आपके बेहतर भविष्य के लिए शुभकामनाएं। आप राज्यसभा टीवी के इतिहास का “सुनहरा पन्ना” के रूप में याद रखे जाएंगे।

Onkar Singh I presume Waheguru has sth better for you in the times ahead. and lets not forget the most important goal of the life is to merge with truth. may Guru Nana bless you Sir.

Rajesh Ranjan वाकई राज्यसभा टीवी का कंटेट देखने लायक था। सम्पूर्ण खबर और डिबेट के मामले में पारदर्शिता ही राज्यसभा टीवी की पहचान है। आगे देखते हैं क्या होता है। आपका धन्यवाद सर।

Om Dundy The services you have rendered by you to RSTV will be a foot mark for the followers in coming future….

Jagmohan Bangani मैं आपको अपने अगले उद्यम के लिए शुभकामनाएं देता हूं। मैं जानता हूँ कि आप एक निशान बना रहे होंगे, जहां आप नेतृत्व करेंगे… मेरी सहृदय शुभकामनायें।

Syed Mohd Irfan Thanks for your guidance and also putting faith in all my little efforts. Will always love to work with you. Goodluck.

Subhash Gupta आप इतने सक्षम और योग्य हैं …जिधर चलेंगे मंजिल खुद रास्ता बना देगी।


उपरोक्त कमेंट्स गुरदीप सिंह सप्पल के जिस इस्तीफानामा पर आया है, उसे पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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इतिहास रचने के बाद राज्यसभा के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से गुरदीप सिंह सप्पल ने दिया इस्तीफा

गुरदीप सिंह सप्पल भारतीय मीडिया में एक इतिहास रच चुके हैं. राज्यसभा टीवी के माध्यम से वे सरकारी और निजी, दोनों ब्राडकास्टर्स के लिए एक रोल माडल पेश कर गए हैं कि देखो, ऐसा होता है कोई चैनल. एडिटर इन चीफ और सीईओ के रूप में राज्यसभा टीवी की नींव रखकर उसे प्रतिष्ठा की बुलंदियों तक गुरदीप सिंह सप्पल ने पहुंचाया. उप राष्ट्रपति पद से हामिद अंसारी के इस्तीफा के बाद राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ पद से जीएस सप्पल को जाना ही था.

नए उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू एडिटर इन चीफ और सीईओ के लिए नई नियुक्ति करेंगे. लेकिन जीएस सप्पल ने जो लकीर खींच दी है, उसके पार जा पाना किसी भी दूसरे एडिटर इन चीफ और सीईओ के लिए संभव न होगा. आईएएस में चयनित होने वाले प्रतिभागी जब कहते हैं कि वे राज्यसभा टीवी का ‘बिग पिक्चर’ डिबेट शो देखकर सम-सामयिक मामलों में अपनी सोच-समझ को निर्मित करते हैं, तो समझा जा सकता है कि इस चैनल पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम कितनी गहराई और प्रामाणिकता लिए हुए होते हैं.

गुरदीप सिंह सप्पल की सबसे बड़ी बात, जो उनके साथ काम करने वाले बताते हैं, कि ये आदमी बेहद डेमोक्रेटिक है. वे क्रिएटविटी और एडिटोरियल फ्रीडम को पूरी तरह जीने देते हैं. यही कारण है कि उन्होंने राज्यसभा टीवी के लिए ऐेसे मीडियाकर्मियों का चयन किया जिनके लिए पत्रकारिता जनसरोकार और एक मिशन रही है. गुरदीप सिंह सप्पल का अंदाज और तेवर उनके इस्तीफानामा में भी देखा जा सकता है, जो उन्होंने अपने एफबी वॉल पर पोस्ट किया है. उनका इस्तीफानामा नीचे पढ़ा जा सकता है.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


Gurdeep Singh Sappal : राज्यसभा टीवी से मेरा इस्तीफ़ा….

‘चलो कि इक उम्र तमाम हुई
उठो कि महफ़िल की शाम हुई
जुड़ेंगे नए रिंद, अब नए साज़ सजेंगे
मिलेंगे उस पार, कि नए ख़्वाब बुनेंगे।’

राज्यसभा टीवी के साथ मेरा रिश्ता आज ख़त्म होता है। लेकिन संतोष है कि जो चैनल हमने सजाया है, उसकी चमक दूर से भी दिखायी देती रहेगी। आज मुड़ कर देखूँ तो एक सुखद अहसास ज़रूर है कि जो ज़िम्मेदारी मजबूरी में स्वीकार की थी, वो कुछ हद तक पूरी हुई। सच कहूँ तो ये काम मुश्किल ज़रूर था, लेकिन विश्वास था कि ‘अगर अतीत ब्लैकमेल योग्य न हो, आज कोई भय न हो और भविष्य से कोई आरज़ू न हो’, तो जीवंत संस्थाएँ बनाना सम्भव है।

जब हमने ये चैनल डिज़ाइन किया तो दो टैग लाइन चुनी: Knowledge Channel of India और Democracy at Work. आज छः साल बाद ये एक निर्विवाद सच है कि देशभर में छात्र, प्रशासक, बुद्धिजीवी RSTV देखते हैं। तथ्य तो गूगल सभी दे देता है, लेकिन विश्लेषण, अंत:दृष्टि और हाशिए पर रहे विषयों के लिए राज्य सभा टीवी ने अपनी अलग जगह बनायी है।इसकी डिबेट में सभी राजनैतिक रंग, सभी विचारधाराएँ बराबर खिली हैं। शायद, कुछ हद तक ही सही, हम अपनी दोनों टैग लाइन पर खरे ज़रूर उतरे हैं।

मैं जानता हूँ कि हमारे कुछ आलोचक, या कहूँ कि निंदक भी रहे हैं। लेकिन शायद उनमें से ज़्यादातर हमारा चैनल देखते नहीं थे, क्योंकि उनकी आलोचना के बारे सोचते ही एक शेर बेसाख़्ता याद हो आता था :

‘वो बात जिसका सारे फ़साने में ज़िक्र न था,
वो बात उनको बहुत ही नागवार गुज़री।’

हाँ, इन्फ़ॉर्म्ड आलोचना को हमने हमेशा स्वीकारा और उस पर अमल किया।

ख़ैर, ये दास्ताँ बस इतनी ही। मैं शुक्रगुज़ार हूँ माननीय उपराष्ट्रपति श्री वेंकैय्या नायडू जी का, जिन्होंने मेरा आग्रह मान कर मेरा इस्तीफ़ा स्वीकार किया।

लोग संस्था को गढ़ते हैं और संस्था लोगों को गढ़ती है। मैं चैनल के अपने सभी साथियों का धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने मेरे साथ मिल कर ये चैनल गढ़ा और उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाया। और अंत में, धन्यवाद उस शख़्सियत का, जिसकी निस्वार्थ मौजूदगी, बौद्धिक विश्वास और स्वायत्ता में नैसर्गिक यक़ीन RSTV की बुनियाद रहा। शुक्रिया श्री हामिद अंसारी, भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति का। सम्पादक के पद को वे हमेशा एक महत्वपूर्ण संस्था मानते आए हैं और मुझे ख़ुशी है कि मैं उनके विश्वास पर खरा उतर सका। मेरी कामना है कि आने वाले दिनों में RSTV यूँ ही उत्तरोत्तर तरक़्क़ी के पथ पर आगे बढ़ता रहे।

Resignation from RSTV

Today, as I stand relieved from the posts of CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television, I thank Hon’ble Sh. Venkaiah Naidu, the Vice President of India for accepting my request relieving me from the responsibility. I have always held a principled view that if one has been nominated, rather than having been elected in polls or selected through exams, one must move out with the principal.

As I move ahead in life, I look back in satisfaction at the success we had in creating a vibrant public broadcaster. RSTV, indeed, has made its mark. Having nurtured it since its conception, developing a free and fair public broadcaster was indeed a difficult task. But there was a certain belief that ‘if the past cannot be blackmailed, the present doesn’t scare and there are no expectations from the future’, then it is possible to build robust institutions.

We conceptualised RSTV with two tag lines, viz. ‘Knowledge Channel of India’ and ‘Democracy at Work’. Today, it’s an undisputed fact that students preparing for competitive exams, intellectuals, administrators and thinking population watch the channel. In today’s day and age, facts can all be googled, but RSTV carved a special place for itself by featuring comprehensive analysis & insights and giving space to marginalised, yet significant, subjects. It’s debates gave equal place to views and ideologies of all hues. I believe that we have been able to justify our both tag lines.

I know that we have our share of critics and castigators. But after going through their objections for so many years, I can surely say that most of them don’t watch RSTV regularly. I can only say to them: ‘वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था, वो बात उनको बहुत नागवार गुज़री है।’

Whenever we received constructive criticism, we always took its cognizance and strived to accommodate it. Friends, institutions are crafted by people and then institutions craft them back. I was backed by a wonderful set of professionals, who made RSTV what it is today. I thank them all for being my co-passengers on this roller-coaster ride. I thank my Editorial Team for believing in an idea and delivering it.

I also thank my team in administration, who minimized the lethargy and constraints of our public funded systems and delivered a vibrant institution. And above all, I would like to thank one person whose selfless presence, intellectually driven sense of security and innate faith in autonomy was the foundation of Rajya Sabha Television. I profusely thank Sh. Hamid Ansari, the former Vice President of India. He believed in the institution of the Editor and allowed me to live up to it. I wish the channel a bright future, always 🙂

गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए सैकड़ों कमेंट्स में से कुछ चुनिंदा पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…


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वीपीआई हामिद अंसारी का विदाई समारोह : संजय राउत ने चुटकी ली- ‘राज्यसभा टीवी चलता रहे!’

Shambhu Nath Shukla : हामिद अंसारी साहब बहुत याद आएंगे। पूरे दस साल वे भारत के वाइस प्रेसीडेंट रहे और राज्य सभा में कड़क प्रिंसिपल की तरह। सबको डांटते रहे, लड़ियाते भी रहे। मगर आज विदाई के दिन उन्हें प्रिंसिपल का चोला उतार देना था। आज भी अपने सम्मान में वक्ताओं का समय भी उन्होंने ही तय किया और बीच-बीच में हड़काते भी रहे।

सबसे बढ़िया विदाई भाषण जदयू के अली अनवर अंसारी ने दिया। उन्होंने उप सभापति कूरियन को पवनपुत्र हनुमान बताया और अंसारी साहब को भगवान राम। तुलना मार्मिक थी और भावप्रवण भी। अन्ना द्रमुक के मैत्रेयन ने तो नरेश अग्रवाल को भरे बाजार खींच दिया, यह बता कर कि सुबह नरेश तय कर देता था कि सदन चलने नहीं देना। पर नरेश पाला बदल कर सपा में चला गया और अहलूवालिया भाजपा में। बाद में नरेश जी ने सफाई भी दी पर जमी नहीं।

एनसीपी के मजीद मेमन का भाषण भी अत्यंत भावुक था और सीताराम येचुरी का भी। डेरेक पूर्ववत बंगालियों की तरह उछलते रहे। प्रधानमंत्री का भाषण बेहद संतुलित था। संजय राउत ने चुटकी भी ली और कह गए कि राज्यसभा टीवी चलता रहे। राज्यसभा टीवी वाकई है तो लाजवाब! आज के विदाई भाषण में अटलबिहारी बाजपेई और चंद्रशेखर जैसी गम्भीरता कोई वक्ता नही ला सका। न चचा मुलायम की तरह कोई चुटकी ले सका। जाइए महामहिम आप याद बहुत आएंगे। हामिद अंसारी साहब के भविष्य के प्रति मेरी भी शुभकामनाएं और उनको प्रणाम। उप सभापति कूरियन साहब की तरह मैं भी यही कहूँगा कि कल अच्छा ही होगा।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी उर्फ आईएनए और इसके जांबाजों पर आधारित है फिल्म ‘रागदेश’

The much awaited Tigmanshu Dhulia film ‘Raagdesh’ is all set to release on July 28th, 2017. Expected to be a crossover film, the film marries the historical authenticity with entertaining cinema, a genre much missed in Bollywood. Set in the backdrop of the famous ‘Red Fort Trials’, the film recreates the era of last days of freedom struggle in India, where the battles were being fought on borders, on streets, in media and curiously enough, in the court room.

The film captures the courtroom drama of the trials conducted by the British government in 1945 against the top brass of the Indian National Army, established by Netaji Subhash Chandra Bose. The trials that were observed with great curiosity by the world forces who had won the World War II, as also by the nation who now witnessed another streak of patriotism which was valiant, violent, vociferous and quite different from non-violence practiced by the Congress.

The trials made India aware of the heroic deeds and struggles of the INA, which was till then suppressed by the British authorities through strong armed press censorship. As the trial progressed, the entire nation was galvanized into the final call for independence, leading to Mumbai Naval Mutiny and crumbling of British Empire. The film poignantly portrays the battle travails, border sacrifices and trial of three heroes of INA who changed the course of freedom struggle.

The film is produced by Rajya Sabha Television, who has joined hands with UFO Moviez as its strategic partner for a pan-India release. The film marks the debut of RSTV, which has started an ambitious programme of bringing the exciting events of contemporary history on to the cinema screens.

“India today is a leading nation of the world. There have been people, events and processes that have led to the success of India. RSTV feels that people must know their history in order to preserve their growth. It is the duty of the state and the governments to promote it. Being a public broadcaster, RSTV felt its duty to take history to the people in an entertaining format. We always felt that history has so many fascinating stories to tell and films have been the most powerful and entertaining medium to tell stories”, said Gurdeep Sappal, CEO and Editor-in-Chief of Rajya Sabha Television.

Commenting on the association director Tigmanshu Dhulia said, “This was a great opportunity to showcase a very important chapter of independence struggle. It’s a film about real life heroes, who fought armed war against the mighty British government. It captures the valour, the camaraderie and the heroic struggles of young men who fought and lost the battle, but won the war of independence for India.  It is a one of the most passionate films I have done because I really feel that the nation and the young generation must know about sacrifices of people achieve India’s independence. It’s a film which will certainly make every Indian proud of their legacy.”

Starring Kunal Kapoor, Amit Sadh and Mohit Marwah in the lead roles, Raag Desh is the story of three leading officers of the INA namely Colonel Prem Sehgal, Colonel Gurbaksh Singh Dhillon, and Major General Shah Nawaz Khan, who were captured and imprisoned in the Lal Quila (Red Fort). British wanted to sentence them and hang them in the Red Fort, precisely where Netaji Subhash Chandra Bose wanted to unfurl the Tricolour flag. A trial that the world watched and the nation prayed, eventually turned up as the last message to the British that they would now have to Quit India. The Tricolour flies on the Red Fort since then!

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राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल निर्मित फिल्म ‘रागदेश’ का पोस्टर जारी, रिलीज 28 जुलाई को

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल के नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. उन्होंने फिल्म निर्माण जैसा बड़ा काम कर दिखाया है. बतौर प्रोड्यूसर सप्पल ने जो फिल्म ‘रागदेश’ बनाई है, उसका निर्देशन जाने माने फिल्मकार तिग्मांशु धूलिया ने किया. फिल्म का पोस्टर जारी कर दिया गया है. फिल्म सिनेमाघरों में 28 जुलाई को पहुंचेगी.

The film is on Lal Quila Trial of officers of INA.

फिल्म के पोस्टर को जीएस सप्पल ने अपने एफबी वॉल पर जारी करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है :

Gurdeep Singh Sappal : First look of the poster of our film RaagDesh, releasing all over India in cinema halls near you on July 28, 2017. Presented by: Rajya Sabha Television , Director: Tigmanshu Dhulia , Producer : Gurdeep Sappal, Cinematography: Rishi Punjabi, Featuring: Kunal Kapoor, Amit Sadh, Mohit Marwah, Kenneth Desai, Mridula Murali #raagdeshthefilm

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राज्यसभा टीवी के लिए आज होने वाला इंटरव्यू कैंसल

राज्यसभा टीवी के लिए आज जो इंटरव्यू होना था, वह स्थगित हो गया है. इस बाबत राज्यसभा टीवी की वेबसाइट पर जानकारी प्रकाशित की गई है, जिसका स्क्रीनशाट उपर अपलोड किया गया है. राज्यसभा टीवी चैनल ने पिछले दिनों बड़े पैमाने पर वैकेंसी निकाली थी. उसके लिए आज और कल वॉक-इन-इंटरव्यू होना था. भारी संख्या में मीडियाकर्मियों ने इसके लिए अप्लाई किया था. अब शुक्रवार और शनिवार को होने वाले वॉक-इन-इंटरव्यू स्थगित कर दिए गए हैं.

इस बाबत राज्यसभा टीवी की वेबसाइट पर यह सूचना प्रकाशित की गई है-

Attention is drawn to the advertisement No.RS.1/5/2017-RSTV/XIX dated 06-06- 2017 for Walk-in-Interviews/ Skill Tests for various professional positions in RSTV which were scheduled to be held on 16th & 17th June, 2017. It is hereby informed that all Walk-in-Interviews/ Skill Tests scheduled to be held on 16th & 17th June, 2017 stand postponed.

मूल खबर….

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मोदी सरकार का यह मास्टर स्ट्रोक है : गुरदीप सिंह सप्पल

Gurdeep Singh Sappal : मोदी सरकार का यह मास्टर स्ट्रोक है। जिन भी बड़ी कम्पनी, राजनीतिक दल, भ्रष्ट अधिकारियों, बड़े व्यापारियों के पास बड़ा कैश जमा है, वे दिक़्क़त में आ गए हैं। बड़ी रक़म बैंक में जमा नहीं करा सकते, क्यूँकि सवाल उठेगा कि उस धन को पिछली Income Decleration Scheme में घोषित क्यूँ नहीं किया। साथ ही, अब केस भी चल सकेगा।

छोटे और मध्यम वर्गीय लोगों का काला धन आम तौर पर कैश में नहीं, प्रॉपर्टी और सोने में लगा होता है। उस काले धन पर कोई सीधा ख़तरा नहीं है।हाँ, प्रॉपर्टी की क़ीमतें ज़रूर गिर जाएँगी। अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा, ये अनिश्चित है। हालाँकि कुछ समय के लिये तो सब हिल जाएगा।

काला धन सिर्फ़ सरकारी या राजनीतिक भ्रष्टाचार से नहीं उपज रहा था। आम आदमी भी जो भी लेन देन बिना टैक्स अदा किए कर रहा था, वह भी काला धन पैदा कर रहा था। मार्केट से कैश का गायब होना और GST का कुछ ही महीनों में आना, ये मिल कर क्या दिशा देंगे, ये देखना मज़ेदार रहेगा।

वैसे ये वक़्त फिर से इतिहास के पन्ने पलटने का भी है। एक बार पहले भी, जनवरी 1978 में ₹1000, ₹ 5000 और ₹ 10000 के नोट यूँ ही रातों रात अमान्य कर दिए गए थे। तब भी वजह काले धन को नियंत्रित करना ही थी। मोरारजी देसाई प्रधान मंत्री थे। पहले वित्त मंत्री भी रहे थे। कठोर निर्णय लेने के लिए जाने जाते थे। तब उनके इस क़दम का अर्थव्यवस्था पर तात्कालिक और दीर्घकालिक क्या असर पड़ा था, ये फिर से समझने का वक़्त है।

राज्यसभा टीवी के सीईओ और एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल की एफबी वॉल से.

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राज्यसभा टीवी के पांच साल होने पर चैनल के एडिटर इन चीफ गुरदीप सिंह सप्पल क्या कह रहे, पढ़िए

FIVE YEARS OF RSTV

Gurdeep Singh Sappal

Today we complete five years of Rajya Sabha Television. It’s been a satisfying journey. We have been able to set a benchmark in public broadcasting, despite all the usual constraints. In this journey, my colleagues, fellow editors, executive producers, anchors, guest participants and invisible faces working behind cameras and at the desk have contributed in equal measure. I thank all of them in persevering and working against odds and earning a name for the institution.

While developing RSTV, we were always conscious to establish the classical role of the institution of Editor, ensure the freedom exercised by individual journalist, bring in objectivity & candour in discussions and strive for non-sensational, serious journalism. We hope, you too will agree that we have achieved it to some degree of satisfaction.

Now, as we continue to carve a niche space for ourselves, we have moved into documenting history of contemporary India through films and series. We are confident that just like our series Samvidhan, the fruits of this effort will also find a privileged place on the bookshelves of thinking people for the decades to come.

This journey wouldn’t have been possible without complete autonomy granted by the Vice President of India. It was his intellectual depth and conviction, as also the innate belief in values and principles, that set the stage and direction for us to deliver.

Also, the autonomy could be realised in practice only due to unqualified support of the successive Secretary Generals of Rajya Sabha, viz. Dr. VK Agnihotri & Shumsher Sheriff and the Secretary Dr. DB Singh. Credit also goes to my colleagues in administration, who continuously innovated to make best use of government rules and regulations in favour of exercising the autonomy. I thank all of them.

I also got full support of all parties in Rajya Sabha and almost all prominent leaders, as well as, successive Deputy Chairmen viz. K Rehman Khan and Prof. PJ Kurien. Their appreciation is the best reward we have for our collective labour and application.

But above all this, I would thank our viewers who have kept us going. We started with a belief to built a credible media institution. Now as we stand amongst the most popular YouTube channels in news and current affairs category and are daily featured in the WhatsApp groups of lakhs of students preparing for civil and other exams, we know that we have been able to do something right.

Our policy of allowing everyone to use all our content for free has led to sharing of our programmes on innumerable websites and channels. This free and often unacknowledged sharing of our content does not add to our viewer count, but as a public broadcaster, it helps us to fulfil our mission.

Our decision to provide highest time share amongst all channels to areas dealing with culture, science, foreign policy and security forces etc. has won us a dedicated viewership and we thank you all with complete gratitude.

In the end, I would like to use the opportunity to share my response with those who keep on asking what makes RSTV tick despite the constraints of government rules and general pressures. It is because we do believe that robust institutions can only be developed ‘when we have no past to hide, no self interest in present and no expectations from future’, coupled with clarity of conviction and self-belief.

Thanking you all,

Gurdeep Singh Sappal
CEO & Editor-in-Chief
Rajya Sabha Television

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प्रसार भारती के संघी अध्यक्ष सूर्य प्रकाश को राज्यसभा टीवी के पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने दिया करारा जवाब

Arvind K Singh : राज्य सभा की भूमिका पर सवाल… प्रसार भारती के अध्यक्ष श्री ए.सूर्य प्रकाश ने दैनिक जागरण में राज्य सभा की भूमिका पर सवाल खड़ा किया है। तथ्यात्मक लेख है। वे संसदीय मामलों के जानकार हैं लेकिन इस लेख में जान बूझ कर तमाम तथ्यों को छिपाया है। विपक्ष को भरोसे में न ले पाना यह सरकार की कमजोरी हो सकती है। लेकिन इस आधार पर किसी सदन को समाप्त करने का विचार अलोकतांत्रिक है। संभव है कि उन्होंने प्रधानमंत्री को खुश करने के लिए ऐसा लिखा हो। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कभी भी इसकी आलोचना नहीं की है।

यह सही है कि दूसरे सदन को बनने की प्रक्रिया में तमाम सवाल उठे थे। तो भी जब 13 मई 1952, को राज्य सभा की पहली बैठक में उस दौर के सभापति और देश के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने जो वक्तव्य दिया था उसे सूर्यप्रकाशजी को जरूर कोट करना चाहिए था। वह था- ”नई संसदीय व्यवस्था के तहत दूसरे सदन के साथ हम पहली बार शुरुआत कर रहे हैं और इस देश की जनता के सामने ये न्यायोचित ठहराने के लिए हमें अपनी पूरी शक्ति से कोशिश करनी चाहिए, कि दूसरा सदन कानूनों को जल्दबाजी में बनाए जाने से रोकने के लिए जरूरी है। जो प्रस्ताव हमारे सामने रखे जाएं, उन पर हमें निरपेक्ष और तटस्थ होकर चर्चा करनी चाहिए।”

अगर इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा वही काम कर रही है जो उसे सौंपा गया था। कोई भी कानून जल्दबाजी में क्यों पास होना चाहिए। इस नाते भूमिका पर सवाल खड़ा करने वाले जरा अपने गिरेबां में भी झांके। यह टिप्पणी इस नाते नहीं लिख रहा हूं कि मैं राज्य सभा टीवी में काम करता हूं। बल्कि इस नाते कि एक पत्रकार हूं और जानता हूं कि संसद की पूर्णता दोनों सदनों से है और किसी एक के साथ छेड़छाड़ करने का विचार भी रखना वास्तव में संविधान की आत्मा से खिलवाड़ होगा।

राज्यसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Rajesh Khare बहुत शानदार। आप जैसे पत्रकारों ने ही पत्रकारिता को ज़िंदा रखा हुआ है वरना आजकल तो पत्रकारिता के नाम पर कुछ और ही हो रहा है।

Narender Singh Bisht The Rajya Sabha or the council of states is the upper house of the parliament of India, in Indian federal structure Rajya Sabha is a representative of the states in the union legislature, Hence Rajya Sabha is granted powers that protected the rights of states against the union. It is fine, but nowadays the soul of the Rajya Sabha to take care of the state’s interest is in the back seat, Rajya Sabha is now look alike an appeasement house, who gets the ticket ? those who are defeated in Lok Sabha election or big names have nothing to do with state’s interest . PAID SEAT ……. PHEW !!!!

Arvind K Singh प्रिय मित्र बिष्ट जी, आपने जिस बीमारी की बात की है वह राज्य सभा तक ही सीमित नहीं। बाकी सदनों में और भी खराब हालत है। राज्य सभा में तो ऐसे चंद नाम ही लिए जा सकते हैं। लेकिन कई दल तो टिकट ही पैसे लेकर देते हैं। उनकी सरकार भी बनती है।तो क्या लोकतंत्र को समाप्त कर राजशाही वापस लायी जाये। या फिर समस्या का निदान निकालने की तरफ ध्यान दिया जाये।

Narender Singh Bisht आदर सहित नमस्कार अरविंद जी , आप ने राज्यसभा की बात की है जो सीधा जनप्रतिनिधि नहीं है , कौन हैं ये लोग लोकसभा चुनाव में हारे हुए , बड़े नाम जो किसी काम के नहीं, और हद तो तब हो जाती है जब लोकसभा चुनाव में नकारे गए लोग मंत्री और प्रधानमत्री तक बन जाते हैं लगता है नियम सुवधानुसार लागू होते है ये लोकतंत्र का मज़ाक नहीं है क्या?  रही बात लोकसभा की ज़्यादा गंदगी है बिकुल सही है मगर जनता ने चुना है कुछ कह भी नहीं सकते ……….. सर आप ज़्यादा गुण व्यक्ति हैं मुझसे आधिक जानते है.

Arvind K Singh चुनाव सुधार राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग के बीच का विषय है। लेकिन इसके नाम से किसी संस्था को कैसे कठघरे में खड़ा किया जा सकता है। कुछ लोगों की गलतियों के लिए पूरी संस्था तो जिम्मेदार नहीं हो सकती मित्र.

Satyendra Pratap Singh मेरे विचार भी अब तक नरेंद्र सिंह बिष्ट जी से मेल खाते थे लेकिन आपका पोस्ट और खासकर डॉ राधाकृष्णन का बयान पढ़कर मेरा विचार बदल गया।

Jai Pandey लोकसभा में फूलन देवी जी और शहाबुद्दीन जी के चुने जाने का यह अर्थ तो नहीं कि कल हममे से कोई लोकसभा भंग करने की मांग कर दे. कहा भी तो गया है, प्रजातंत्र मूर्खों का शासन है.

Obaid Nasir PM jo nahi kahna chahte apne bhakton se kahla dete hain Jab pahle leader of opposition aur ab leader house (RS) Arun Jaitly kahte hain ke unelected elected pe apni marzi thopna chahte hai to samajh lijiye inke nazdeek upper house ki kya auqaat hai. Actually by nature fascist virodh bardasht nahi kar sakte.Kal jab courts aur CAG Congress sarkar ka virodh out of way ja kar kar rahe the tab yehi dhoort baghlein baja rahe the.

Anil Sinha ekdam sahi! satta ke galiyaron se hokar aanewali patrakarita loktantra ko bhi daau par lagane ko taiyar ho jati hai!

Madhurendra Kumar सर……राज्यसभा के औचित्य पर सवाल निराधार है लेकिन उसकी कार्यप्रणाली सवालों में है और उसकी प्रमुख वजह है इस सदन के सदस्यों की संदिग्ध भूमिका, अनैतिक तरीके से उच्च सदन में उनकी एंट्री और फिर अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए संवैधानिक प्रक्रिया में रोड़ा बनना.

Arvind K Singh मधुरेंद्रजी..कार्यप्रणाली पर एकदम सवाल उठाना चाहिए। आपकी बात से सहमत हूं मैं.

Shalini Rai Rajput दरसल जो लोग चुनाव नही जीत पा रहे हैं उन्हे सत्ता में मंत्री पद देने के लिए राज्यसभा के माध्यम से बैकडोर एन्ट्री गलत है. लोकतंत् र का मजाक उडता है. मनमेहन सिंह जैसी प्रतिभा को लाना अलहदा बात है और टीवी अदाकारा को लाना अलग वो भी शिक्षामंत्री बनाने के लिए.

रवि शंकर पूर्णतः सहमत हूँ। मेरा तो मानना है कि संविधान सभा का भी पुनर्गठन किया जाना चाहिए।संविधान संशोधन का अधिकार संसद के पास नहीं होना चाहिए। जिस संविधान के तहत संसद का गठन होता है, उसी संसद को संविधान संशोधन का अधिकार देना ही तानाशाही व्यवस्था का स्वरूप है। इस लिहाज से तीन सभाएं होनी चाहिए।

Nirmal Pathak चिंता मत कीजिए । अभी जब सत्ता से बाहर होंगे तो यही लोग राज्यसभा का औचित्य समझायेंगे।

Atal Behari Sharma अरविन्द भाई सिद्धान्त तौर पर हमारे बुजुर्गो ने जो बात रखी वो उचित थी। और राज्य सभा का खात्मा लोकतन्त्र के हित में नही है। पर जो कुछ राज्यसभा में मोदी सरकार आने के बाद तमाशा हो रहा है उसको नजर अंदाज नही किया जा सकता सभापति के तौर पर उपराष्ट्रपति महोदय का वर्तन भी निष्पक्ष और तटस्थ नही है। इस स्थिति को लोकतंत्र को मजबूत करने वाला तो कतई नहीं कहा जा सकता। इसे जनता के सामनेे न्यायोचित नही ठहराया जा सकता। लोकसभा की निरंकुशता को रोकने और कानून बनाने में संतुलन बनाये रखने के लिए , कानूनों को जल्दबाजी में बनाए जाने से रोकने के लिए राज्यसभा जरूरी है। जो प्रस्तावो परं निरपेक्ष और तटस्थ होकर चर्चा करनी चाहिए। अगर इस लिहाज से देखें तो राज्य सभा यह काम नही कर रही है। इस कारण इसकी भूमिका पर सवाल खडे हो रहे हैं।

आलोक कुमार सही कहा आपने- कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, कोई यूं ही बेवफा नहीं होता।

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जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए

Sushil Upadhyay : राज्यसभा टीवी, केरल, आरफा और हिंदी… कल रात साढ़े आठ बजे राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी का कार्यक्रम देखकर मन खुश हो गया। जो लोग एनडीटीवी पर रवीश कुमार के मुरीद हैं, उन्हें एक बार राज्यसभा टीवी पर आरफा खानम शेरवानी को भी देखना चाहिए। खासतौर से, उनकी भाषा को। वे अपनी प्रस्तुति में रवीश कुमार की तुलना में ज्यादा संतुलित, शालीन और बौद्धिक नजर आती हैं। कल वे केरल में थीं, वहां से चुनावी मुहिम पर शो प्रस्तुत कर रही थीं। उनके पैनल के नाम देखकर एक पल के लिए मुझे लगा कि शायद आज का शो अंग्रेजी में होगा। पैनल में सीपीएम के वी. शिवदासन, आरएसएस के डॅा. के.सी. अजय कुमार, ईटीवी के प्रमोद राघवन, पत्रकार गिलवेस्टर असारी और केरल से प्रकाशित कांग्रेस के दैनिक अखबार के संपादक (जिनका नाम याद नहीं रहा) शामिल थे।

जब आरफा ने कार्यक्रम की भूमिका शुरू की तो मेरी उत्सुकता बढ़ गई क्योंकि जब कोई दक्षिण या पूर्वाेत्तर का व्यक्ति हिंदी कार्यक्रमों का हिस्सा बनता है तो उसे सुनने का मन करता है। मुझे लगा कि ये कार्यक्रम आरफा के लिए चुनौती होगा क्योंकि उनके अलावा पांचों लोग ऐसे हैं जिनकी भाषायी पृष्ठभूमि न हिंदी की है और न ही उत्तर भारत की। वैसे भी जब आरफा बोलती हैं तो उनकी भाषा सुष्ठु, परिष्कृत और प्रांजल (उर्दू में शायद इसे नफीस कह सकते हैं!) होती है। दूर दक्षिण में उनकी भाषा को कौन समझेगा! पर, मैं गलत साबित हुआ। बहस शुरू हुई तो भाषा गौण हो गई। राघवन, असारी और के.सी. अजय कुमार को सुनकर लगा ही नहीं कि वे अपनी मातृ-भाषा से अलग कोई भाषा बोल रहे हैं।

बेहद सधे हुए, प्रभावपूर्ण, तार्किक और खूबसूरत हिंदी बोलने वाले दक्षिण भारतीय लोग पूरे कार्यक्रम में आरफा की बराबरी पर नजर आए। कहीं-कहीं शिवदासन अंग्रेजी-ट्रैक पर चले जाते थे, लेकिन कुछ ही अंतराल में हिंदी पर लौट आते थे। इक्का-दुक्का वाक्यों में लिंग संबंधी दोष दिखता था, लेकिन इससे भाषा के प्रवाह, लयात्मकता और उसकी अंतर-बद्धता पर कोई असर नहीं दिखा। कुछ उच्चारण तो उत्तर भारतीय से बेहद अच्छे थे क्योंकि ज्यादातर उत्तर भारतीय ‘और’ को ‘ओर’ की तरह बोलते हैं। केरल के चुनाव पर केरल के विशेषज्ञों को हिंदी में सुनना अपने आप में सुखद अनुभव रहा। और ऐसा नहीं है कि मैं इसलिए खुश हूं कि, देखो दक्षिण वाले भी हिंदी बोल रहे हैं, मुझे तब भी वैसी ही खुशी होती है, जब कर्नाटक में नौकरी करने गए मेरे एक परिचित धाराप्रवाह कन्नड़ में बात करते हैं। विषयांतर न हो जाए इसलिए इस कार्यक्रम के लिए आरफा खानम शेरवानी को बधाई प्रेषित करता हूं।

सुशील उपाध्याय पत्रकार और मीडिया शिक्षक रहे हैं. इन दिनों सरकारी नौकरी में हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है.

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राज्यसभा टीवी में ढेर सारे पदों पर सीधे इंटरव्यू से होगी नियुक्ति, देखें विज्ञापन

राज्यसभा टीवी ने कैमरामैन, जूनियर कैमरामैन, जूनियर वीडियो एडिटर, सीनियर ग्राफिक्स डिजाइनर, ग्राफिक्स डिजाइनर विज आरटी एंड वर्चुवल स्टूडिया, ग्राफिक्स डिजाइनर, जूनियर ग्राफिक्स डिजाइनर, पैनल प्रोड्यूसर, ट्रांसपोर्ट कोऑर्डिनेटर के पदों पर तैनाती के लिए विज्ञापन निकाला है. इन पदों पर तैनाती डायरेक्ट इंटरव्यू के जरिए की जाएगी. अगर आप भी इन पदों में से किसी के लिए हैं दावेदार और आपकी उम्र 21 से 58 साल के बीच है तो वॉक-इन-इंटरव्यू के लिए हो जाइए तैयार.

राज्यसभा टीवी के मुताबिक इन सभी पदों के लिए इंटरव्यू 9 मई से 13 मई 2016 तक चलेंगे. हर पद के लिए अलग तारीख और अलग समय पर इंटरव्यू किए जाएंगे. जो लोग सफल घोषित किए जाएंगे उन्हें दो साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाएगा. इंटरव्यू के लिए आपको अपना पूरा भरा हुआ आवेदन पत्र ले जाना होगा. इंटरव्यू राज्यसभा टीवी के आफिस में होगा जिसका पूरा पता है : Rajya Sabha Television, 3rd Floor, Talkatora Stadium Annexe Building, New Delhi-11000

बाकी उपरोक्त पदों के संबंध में अन्य डिटेल नीचे दिए गए राज्यसभा टीवी के साइट के लिंक पर क्लिक कर प्रकाशित विज्ञापन के जरिए जान सकते हैं…

अधिक जानकारी के लिए राज्यसभा पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

RSTV Job Interview

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हामिद अंसारी ने किया राज्यसभा टीवी के नए कलेवर का अनावरण

उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने विज्ञान भवन में राज्यसभा टीवी के नए कलेवर का अनावरण किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश में अभी भी अंधविश्वास और कुरीतियां हैं,जिन्हें दूर करने में विज्ञान और मीडिया बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उपराष्ट्रपति ने देश में विज्ञान प्रसार के लिए नया टीवी चैनल लाने पर ज़ोर दिया।

इस मौके पर उपराष्ट्रपति  ने विज्ञान से जुड़ी ‘मोमेंट्स ऑफ यूरेका’ और साइन्टिफिकली योर्स नाम की पुस्तकों का विमोचन भी किया…ये पुस्तकें राज्य सभा टीवी के विज्ञान पर आधारित यूरेका कार्यक्रम में शामिल वैज्ञानिकों के साक्षात्कार पर आधारित है । कार्यक्रम में सांइटिफिक टेम्पर पर परिसंवाद भी हुआ, जिसमें कई मशहूर वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रो आर वेंकटरमन रामकृष्णन ने भारतीय भाषाओं में विज्ञान को बढ़ावा देने पर जोर दिया। परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष अनिल काकोड़कर ने तकनीक के बेहतर इस्तेमाल की वकालत की।

वैज्ञानिक प्रोफेसर इंदिरा नाथ ने तार्किकता को जरूरी बताया। वहीं प्रोफेसर आर गडगकर ने वैज्ञानिक और गैर वैज्ञानिकों के बीच अंतर खत्म करने की बात कही। इस मौके पर राज्यसभा टीवी के सीईओ गुरदीप सिंह सप्पल ने कहा कि विज्ञान, कला और संस्कृति के क्षेत्र में राज्यसभा टीवी ने अपने शुरुआत से ही काफी काम किया है और आगे भी इस दिशा में काम करता रहेगा।

उन्होंने कहा कि राज्यसभा टीवी समाज में विज्ञान के क्षेत्र में जागृति फैलाने के लिए आर्य भट्ट, होमी जहांगीर भाभा जैसे मशहूर वैज्ञानिकों पर फ़िल्म भी बना रहा है। राज्यसभा टीवी के कार्यकारी निदेशक राजेश बादल ने समारोह में आए वैज्ञानिकों और श्रोताओं का आभार जताया। उन्होंने कहा, समाज में वैज्ञानिक चेतना के लिए राजयसभा टीवी काम करता रहेगा।

कार्यक्रम की तस्वीरें देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

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राज्यसभा टीवी के इंटरव्यू में एक महिला प्रतिभागी पर अपना नाम वापस लेने का दबाव डाला गया!

इसी साल सितंबर महीने में राज्यसभी टीवी में हुए Consultant Anchor के वॉक इन इंटरव्यू के लिए मैं पहुंचा राज्यसभी टीवी के दफ्तर। कई दूसरे प्रतिभागी भी वहां पहुंचे। सभी मीडिया जगत के ही साथी थे। एक-एक कर हमारे सीवी को छांटा गया। फिर जो सभी पैमानों पर उनके विज्ञापन पर खरे उतरे, उन्हें रुकने को कहा गया। बाकी सबको धन्यवाद कह दिया गया। मेरी भी सीवी सिलेक्ट हो गई। मैं काफी समय से मेनस्ट्रीम मीडिया में नौकरी करता आया हूं और अभी भी करता हूं।

खैर, बारी-बारी हम सबको इंटरव्यू के लिए भेजा गया। 6 मठाधीशों का पैनल बंद कमरे में प्रतिभागियों की योग्यता का फैसला कर रहा था। सभी को इंटरव्यू के दौरान पता चला कि केवल अंग्रेज़ी एंकरों को ही इस पद के लिए योग्य समझा जा रहा है। बड़ी बात है कि इस बात का ज़िक्र विज्ञापन में कहीं भी नहीं किया गया था। मज़ेदार बात है कि अंग्रेज़ी चैनल से कोई एंकर पहुंचा ही नहीं था। शायद वो सभी अपने-अपने संस्थानों में बेहद खुश हैं और इन सरकारी पचड़ों से दूर ही रहना चाहते हैं।

मेरी बारी आई तो यही बात कहकर मुझे भी टरका दिया गया। लेकिन हद तो तब हो गई जब एक महिला प्रतिभागी को एक मठाधीश जो कि एक सरदार हैं, उसने कहा कि आप अपना नाम इस इंटरव्यू से वापस ले लें। बिना सवाल पूछे ही उनसे कह दिया गया कि उन्हें ज़ीरो नंबर दिए गए हैं और उनकी उम्र को देखते हुए ये अच्छा नहीं लगेगा कि उनके मार्क्स को सार्वजनिक किया जाए। तय था कि किसे इस पद के लिेए रखा जाएगा, इसका चयन पहले ही कर लिया गया था और इंटरव्यू का नाटक केवल आंखों में धूल झोंकने के लिए किया गया था।

अब सवाल उठता है कि हम कब तक ऐसे मठाधीशों को सरकारी दफ्तरों को उनके बाप का जागीर बने रहने दें। क्या हम और आप में इन सरकारी दफ्तरों में नौकरी करने की योग्यता नहीं है और ये कौन तय करेगा कि किसमें कितनी योग्यता है। कब तक सिफारिश के दम पर इन पदों पर नियुक्ति की जाती रहेगी। क्या समय नहीं आ गया कि हम एकजुट होकर इसके खिलाफ आवाज़ उठाएं, अदालत का दरवाज़ा खटखटाएं। चलिए हम सब मिलकर एक मुहिम चलाएं मीडिया साथियों, ताकि इन बाबुओं को दिखा सकें की आम आदमी की ताकत कुर्सी की ताकत से ज्यादा होती है। चलिए एक बेहतर भारत बनाए जहां मुझे कोई पद मिले या ना मिले, जो उसके योग्य हो उसे ज़रूर मिले।

धन्यवाद।

साभार,
सन्नी सिंह
sunnysinghmika@gmail.com

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मोदी की नाक के नीचे राज्यसभा चैनल की नियुक्तियों में भारी खेल चल रहा है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही कितनी भी पारदर्शिता की बात कर लें, लेकिन सरकार की नाक के नीचे नियुक्तियों में भारी खेल चल रहा है। उसे वे नहीं रोक पा रहे हैं। ताजा उदाहरण राज्यसभा टीवी चैनल का है। सितंबर माह में चैनल ने कुछ पदों के लिए विज्ञापन दिया था, जिनमें चार अंग्रेजी एंकर के पदों का इंटरव्यू 27 अक्टूबर को हुआ। मजेदार बात यह है कि इस इंटरव्यू में कई ऐसे प्रतिभागी भी बुलाए गए हैं, जिन्होंने कभी अंग्रेजी की एंकरिंग नही की।

ऐसे ही एक एंकर दंपत्ति, इस समय एक डूबते हुए मीडिया हाउस में एंकर हैं, वे भी इसमें शामिल हुए। इन्हें अंग्रेजी बिल्कुल नहीं आती। फिर भी इन्हें कुल बुलाए गए 70 प्रतिभागियों में से टॉप-10 में चयन कर लिया गया है। इसके पीछे योग्यता नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक पार्टी से जुड़े राजनेताओं की सिफारिश है। लोग इस मामले को लेकर आरटीआई लगाने की तैयारी कर रहे हैं।

भोपाल से भेजे गए एक पत्रकार के पत्र पर आधारित.

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मीडियाकर्मियों के लिए राज्यसभा टीवी में बंपर वैकेंसी, करें आवेदन

राज्यसभा टीवी में मीडियाकर्मियों के लिए बहुत सारी वैकेंसी है. करीब 45 पदों को लेकर भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है. नियुक्ति स्थल नई दिल्ली है. कैमरा असिस्टेंट के कुल 10 पद हैं तो स्टूडियो असिस्टेंट के 07 पद. मेकअप आर्टिस्ट के 06 पद खाली हैं तो फ्रंट ऑफ़िस एग्जिक्यूटीव के 05 पद रिक्त हैं.

कुल तीन कंसल्टंट एंकर (अंग्रेजी) चाहिए. एक सीनियर गेस्ट को-ऑर्डिनेटर चाहिए. सीनियर वीडियो लाइब्रेरियन का भी एक पद है. दो एंकर (अंग्रेजी) चाहिए. ग्रॉफिक्स डिजाइनर (विजर्ट/वर्चुअल स्टूडियो) के लिए तीन पद हैं. वीडियो लाइब्रेरियन के 04 पद हैं. ग्रॉफिक्स डिजाइनर के कुल 03 पद हैं.

उपरोक्त सभी पदों की योग्यता जानने के लिए नीचे लिखे गए Next पर क्लिक करें>>

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Carried live coverage of all major Yoga Day functions : RSTV

New Delhi : Rajya Sabha TV termed baseless a social media campaign that it blacked out International Yoga Day celebrations. 

CEO of the Rajya Sabha Television Gurdeep Singh Sappal said it carried live coverage of all major Yoga Day functions. It carried live two  functions attended by Prime minister Narendra Modi, from Rajpath and Vigyan Bhavan. The channel also aired the UN  function attended by  External Affairs Minister Sushma Swaraj. All these programs and special shows on yoga are available on you tube also . 

“The campaign against RSTV is motivated”,said channel CEO Gurdeep Singh  Sappal.

“Apart from live coverage of important functions, RSTV ‘s Yoga Day fare also had three documentaries on Yoga and a Special Report on Ayush”, said  shri  Sappal.

The channel website,  www.rajyasabhatv.com, carries links to all programmes aired on the occasion of International Yoga Day.  

The channel management said it is going to air several programmes tomorrow on Yoga.  It will have a RSTV Vishesh on Yoga Day  celebrations and some other programs.

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Freedom of Media and Privileges of Parliament

New Delhi : A privilege motion has been moved by 60 MPs of 14 major parties in Rajya Sabha in a matter related to RSTV. This extraordinary step is bound to raise a debate on freedom of media and privileges of Parliament. We, in RSTV, have practiced the highest ethical and professional standards of unbiased journalism and find ourselves morally suited to address the debate. I thank you for patronizing the channel and being our partner in the endeavour.

But first, a news item in a newspaper that reads ‘The privilege motion against the two publications takes the debate further by suggesting that not just members of House but also employees of Parliament are covered by “privilege” and, hence, entitled to special treatment.’ Therein lies the sting. The motion nowhere refers to ‘privileges of employees of Parliament’ and nowhere demands special treatment for them!

So either the reporter has penned the news without reading the privilege motion or else has deliberately attempted to obfuscate the matter. It is this tendency that is at the core of debate on freedom of media.

What is this particular privilege about? It centres around two primary issues. The publications challenged had insinuated financial extravagance and irregularities in RSTV and questioned the relevance of a decision of Rajya Sabha to have its own TV channel, based on a non-existent CAG report. Besides, the publications neither ascertained the version of RSTV nor bothered to publish the facts that were officially put in the public domain.

This privilege motion will be fiercely contested and rightfully so. Media’s right to criticize anyone, more so the holy cows, needs to be protected. Who understands it better than us in RSTV, who have cherished and practiced it against all odds.

But any criticism must draw upon arguments that stand on their own legs. It cannot employ false facts and forged documents to further its point. Criticism has to be dialectical and not diabolical.

Criticism also cannot hide behind half-truths, in a la- Ashwatthama mode. Lets remember that one singular incident of half truth robbed the sheen off ‘Dharam Purush’ Yudhishthira. Media is supposed to act as the metaphorical ‘Dharam Purush’ in modern democracy. It has already lost its sheen to quite an extent in public eye, which is quite perceptive and discerning in hindsight.

What is freedom of media? Is it merely the right to inform and express views? In RSTV we don’t limit the definition to such a simplistic understanding. Freedom of media extends to providing platform to conflicting views, which at times can also seem baseless or illogical or against the current popular notions. It must provide space to ideas that can be conventional or futuristic, truthful or hypocritical, honest or motivated or even downright irreverent or insulting. But whenever it does so, it must either back it with insight based on facts or else, just limit itself to being a platform that gives space to conflicting views whenever they are available.

If media chooses to don the role of a judge, then it has to follow the principles of natural justice! It can not sit in judgement without doing full homework, without marshalling facts and satisfying itself with their authenticity and without granting everyone the right to be heard.

Media can also set an agenda, shape an agenda and lead an agenda, provided it is convinced of adhering to classical tools of journalism. All this is perfectly valid and desirable, too.

The freedom of media is its right, but like any other right it has to be safeguarded not just from external suppression but also from internal waywardness. The custodians of any independence have it incumbent upon themselves that independence does not infringe upon the intrinsic rights of others- individual rights, as well as, community rights. Or else, a stage might come when others challenge and dilute the independence.

Sadly, the media’s institutional watchdogs have largely been oblivious to the digression of media. There is little self-correction. Media has vociferously advocated for grievance redressal forums in social, judicial and governance areas. But the concept of grievance redressal is virtually non-existent in media forums. There seems to be a conspiracy of silence, reeking of professional nepotism.

Media has the honour of being the fourth pillar of democracy. But it is the only pillar that has commercial interests. There is an inherent contradiction between commerce and larger public good. Besides, there are also internal contradictions along political and ideological lines within media. These contradictions are irresolvable. A balancing act can only be performed by strong public sector media or media owned through social contract of journalists. The possibility of latter is remote. In RSTV, we are attempting to develop into strong and ethical public broadcaster.

We have always practiced media freedom and stand staunchly in favour of it. But media freedom cannot be selective, defamatory and without effective grievance redressal. Let this privilege motion reopen the debate. The country is passing through a redefining phase of media- technologically, ethically, commercially and purpose-wise. Parliamentary Committee may soon be seized of the matter. Let us in media also debate it internally, in the larger interest of nation and media itself.

Gurdeep Singh Sappal CEO & Editor-in-Chief Rajya Sabha Television.

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राज्यसभा टीवी में मनमानी की पोल खुली, प्रशांत भूषण ने दायर की याचिका

नियंत्रक-महालेखा परीक्षक यानि कैग की जांच रिपोर्ट में राज्‍यसभा टीवी के बारे में में कहा गया है कि इस चैनल के पास अपना कोई रोडमैप ही नहीं है. राज्यसभा के लिए अलग से चैनल की सार्थकता पर भी प्रश्‍न चिह्न लगाया गया है. कैग रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2011 में शुरू होने के बाद से चैनल पर अब तक 1700 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. इस चैनल में फरवरी 2012 तक एग्जिक्‍यूटिव डायरेक्‍टर और एग्जिक्‍यूटिव एडिटर्स की यात्राओं पर 60 लाख रुपये खर्च किए गए. चैनल को कोई रेवेन्‍यू नहीं मिल रहा। यहां भर्ती में नियमों का पालन नहीं हुआ। साथ ही इस चैनल की दर्शक संख्‍या भी नहीं है.

वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण ने राज्‍यसभा सचिवालय और इसके चैनल में वरिष्‍ठ पदों पर हुई नियुक्तियों में अनियमितता का आरोप लगाते हुए जनहित याचिका (PIL) के माध्‍यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण का आरोप है कि राज्‍य सभा में जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के पदों पर नियुक्ति में काफी अनियमितता बरती गई हैं, जिनमें उपराष्‍ट्रपति हामिद अंसारी के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) और RSTV के CEO की नियुक्ति शामिल है.

अपनी याचिका में प्रशांत भूषण ने clause 6 (A) of the Rajya Sabha Secretariat (Methods of Recruitment and Qualifications for Appointment) Order, 2009 की वैधता पर सवाल उठाए हैं और राज्‍य सभा सचिवालय में वर्ष 2008 से अब तक हुई नियुक्तियों की जांच कराने की मांग की है. हालांकि चीफ जस्टिस एचएल दत्‍तू की खंडपीठ ने प्रशांत भूषण की याचिका खारिज करते हुए उन्‍हें हाईकोर्ट में अपील करने के लिए कहा है. इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि वहां उनकी अपील खारिज हो जाती है, इसके बाद उन्‍हें शीर्ष अदालत का रुख करना चाहिए.

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राज्यसभा टीवी पर कब्जा करने के लिए केंद्र सरकार प्लांट करा रही निगेटिव न्यूज?

वरिष्ठ पत्रकार और कवि विमल कुमार का मानना है कि राज्यसभा टीवी के खिलाफ निगेटिव खबरें एक बड़ी साजिश का हिस्सा है. उन्होंने फेसबुक पर इस बारे में लिखा है कि केंद्र सरकार अपने लोगों को इस चैनल पर काबिज कराने के लिए चैनल को लेकर नकारात्मक खबरें छपवा रही है. विमल कुमार ने जो कुछ लिखा है, उसे पढ़िए…

Vimal Kumar : राज्यसभा टीवी कई मायने में अच्छा चैनल है लेकिन केंद्र सरकार उसे अपने कब्जे में लेने के लिए और अपने खास लोगों को नियुक्त करने के लिए उसके खिलाफ स्टोरी प्लांट करवा रही है, मुझे ऐसा लगता है. राज्यसभा में मोदी का बहुमत नहीं है. डीएनए और टाइम्स कितने अच्छे हैं, ये हम भी जानते हैं. क्या राज्यसभा चैनल को इंडिया टीवी या जी टीवी बनाना चाहते हो.

मूल खबर…

राज्यसभा टीवी ने कैग के आरोपों को गलत करार दिया, अब तक 1700 करोड़ ठिकाने लगाने का था आरोप

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