कितना आसान हो गया है सच लिखने-बोलने वालों को मार देना…

Prashant Mishra : मप्र के भिंड के पत्रकार संदीप शर्मा की हत्या करने के लिए एक्सीडेंट को हथियार बनाया गया. रांग साइड जाकर ट्रक ने उन्हें कुचल दिया. यह एक्सीडेंट है या हत्या सब जानते हैं. इसके लिए दस सेकेंड का सीसीटीवी फुटेज देख लीजिए, सब जाहिर हो जाएगा. संदीप द्वारा कुछ दिन पहले लिखा एक पत्र भी है. उन्होंने हत्या की आशंका जताई थी. रेत माफिया और सरकारी सिस्टम के लोग मिलकर खुलेआम एक पत्रकार की हत्या करवा देते हैं. बिहार में भी दो पत्रकारों की हत्या कर दी गई. कितना आसान हो गया है आवाज़ उठाने वाले को मार देना. कितना आसान हो गया है सच लिखने-बोलने वालों को मार देना. आप भी हर रोज पत्रकार को गरिया देते हैं. लेकिन किसी पत्रकार के पक्ष में आवाज़ उठाने से बचते हैं.  यह लोकतंत्र है. जय हो ऐसे लोकतंत्र की.

Om Thanvi : ग़नीमत है दिल्ली में पत्रकारों से मारपीट भर हुई है। कैमरे तोड़े गए हैं। मध्यप्रदेश में तो पत्रकार को सरे-राह ट्रक से कुचल दिया गया। बिहार में दो पत्रकारों को एसयूवी चढ़ा कर मार डाला। पत्रकारिता में अच्छे दिन तो पहले ही आ चुके थे। अब उन पर क़ानून-व्यवस्था की मेहरबानी है। और इस आड़ में संदेश साफ़ है – जो बोलेगा, मारा जाएगा।

Abhishek Tiwari Cartoonist : दुखी हूँ। क्षुब्ध हूँ। हमारे भिंड के एक युवा पत्रकार संदीप शर्मा ने भिंड शहर में सिटी कोतवाली के सामने अपनी जान गंवा दी। संदीप के परिवार वालों ने सीधे तौर पर इसे सड़क दुर्घटना न मानकर हत्या बताया है। हत्या की आशंका संदीप को थी। अपनी जान की रक्षा की गुहार उसने देश के पीएम से लेकर, मध्यप्रदेश के सीएम और स्थानीय प्रशासन से बार बार की। दअरसल संदीप एक स्थानीय टीवी न्यूज चैनल के लिए काम करते थे। चम्बल से होनेवाले अवैध रेत खनन पर उन्होंने एक स्टिंग किया था। चम्बल में रेत माफिया किस कदर बुलन्द है। यह किसी से छुपा नहीं है। बानमोर एसपी की मौत सबको याद है। संदीप ने पत्रकारिता धर्म निभाया। बदले में उसे क्या मिला? पुलिस ने SIT गठित की है। पुलिस कैसे जांच करती है, कैसे जांच के परिणाम तय करती है। सबको मालूम हैं। फिर भी हम निष्पक्ष जांच की उम्मीद कर रहे हैं। संदीप के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो छोटे बच्चे हैं. संदीप के एक भाई फौज में थे जो अप्रैल 2004 में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे।

Paramendra Mohan : अद्भुत संयोग है! मध्य प्रदेश के भिंड में रेत माफिया के खिलाफ स्टोरी करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा को ट्रक ने कुचलकर मार डाला। अपनी जान को खतरा को लेकर दिवंगत संदीप शर्मा ने पुलिस से शिकायत भी दर्ज कराई थी। उधर, बिहार के आरा-सासाराम रोड पर पत्रकार नवीन निश्चल और विजय सिंह स्कॉर्पियो से कुचल कर मार दिए गए। इन्हें एक पूर्व मुखिया पति ने एक स्टोरी को लेकर हाल ही में धमकाया था, संयोग से स्कॉर्पियो उसी की थी। संदेश बहुत सीधा है, पत्रकार वैसी कवरेज न करें, जो अपराधी, रसूखदार न चाहते हों। मीडियाकर्मी ऐसी खबरें न दिखाएं, जो आम लोगों से जुड़ी हों, क्योंकि आम लोगों के हित की खबरों का मतलब ही है राजनीतिक दलों, राजनेताओं, प्रशासनिक संस्थाओं, सत्ता संरक्षित अपराधियों, अपराधियों के खिलाफ खबरें। अगर किसी व्यक्ति को कोई पुलिसकर्मी पीट रहा हो और क्यों पीट रहा है, ये पूछने पर जवाब भी न दे, तस्वीर लेने पर कैमरा भी छीन कर तोड़ दे, महिला पत्रकार होने पर भी बदसलूकी करे, तो बाकी सब भी इससे सबक लेकर पुलिस के हाथों पिटते आम लोग की कवरेज न करे। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भारत दुनिया के भ्रष्टतम देशों की लिस्ट में विकास करता हुआ 79वें से 81वें पर आ पहुंचा है। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार, प्रेस की आज़ादी और पत्रकारों की हत्या के मामले में भारत को फिलीपींस और मालदीव जैसे देशों के समकक्ष बताया गया है। अब चूंकि मीडिया या तो गोदी मीडिया है या देशद्रोही मीडिया है तो पत्रकारों की हत्या हो या पिटाई, किसी को क्या फर्क पड़ता है? लेकिन, हमें फर्क पड़ता है क्योंकि मेरा अभी भी मानना है कि जो पत्रकार होते हैं, वो भी इंसान होते हैं, उनके भी बुजुर्ग माता-पिता होते हैं, उनकी पत्नी भी हत्या के बाद विधवा होती हैं, उनके बच्चे भी पिता की मौत के बाद अनाथ होते हैं। एक बात नोट कर लें कि जिस दिन वाकई मीडिया सौ फीसदी कर्तव्यविहीन और सौ फीसदी मीडियाकर्मी बिकाऊ हो गए, उस दिन जनता के लिए कोई बोलने वाला बचेगा नहीं, सिर्फ राजनेता, सत्ता संरक्षित रसूखदार, अपराधी ही बोलेंगे या फिर उनके समर्थक-विरोधी और वो भी फिक्स्ड क्योंकि तब कवरेज भी सौ फीसदी फिक्स्ड ही होगी। छोटा सा हिंट देता हूं, एक राज्य में एक सत्ताधारी दल का नेता अपने चहेते को ठेका दिलवाता है और विपक्षी दल का नेता ठेका लेने वाली कंपनी में अपने चहेते की ट्रांसपोर्ट कंपनी को माल आवाजाही का काम दिलाता है, दोनों नेता मस्त कमा-खा रहे हैं और दोनों ही एक-दूसरे की आलोचना कर रहे हैं। एक और हिंट, एक सत्ताधारी दल और दूसरा विपक्षी दल दोनों मिलकर विदेशी चंदे के नाम पर करोड़ों का बेहिसाबी गोलमाल करते हैं और इसे कानून का कवच पहना दिया जाता है और ये दोनों भी अपने दल-बल के साथ एक-दूसरे की आलोचना करते हैं। समझना चाहें तो समझें वर्ना पप्पू-गप्पू सीरीज़ तो चल ही रहा है.. चमचे और चम्मचचोर पत्रकारों (पत्तलकारों) का क्या है, मारे जाएं तो अपनी बला से..है कि नहीं?

Pushya Mitra : बिहार में फिर दो पत्रकारों की हत्या हो गयी। इस बार दो पत्रकारों को एक मुखिया द्वारा स्कार्पियो से कुचल कर मारने की बात सामने आ रही है। पत्रकार बाइक पर थे। कल की घटना को मिला दें तो पिछले डेढ़-दो साल में इस तरह पत्रकारों की हत्या के मामले दहाई में पहुंच गए होंगे। इस लिहाज से बिहार पत्रकारों के लिये संभवतः देश का सबसे खतरनाक राज्य बन गया है। अब चुकी इनमें से ज्यादातर पत्रकारों की हत्या राजनीतिक कारणों से नहीं होती, मतलब मोदी विरोध या लालू- नीतीश विरोध के कारण तो यह बड़ा सवाल नहीं बनता। जबकि बस्तर की छोटी-छोटी घटनाएं भी दिल्ली के प्रेस क्लब के आंदोलन का मसला बन जाती है।

मगर सच यह भी है कि ये पत्रकार भी सत्ता के विरोध में पत्रकारिता करते हुए मारे जा रहे हैं। जिलों और प्रखंडों में मुखिया, कोई बड़ा नेता, विधायक भी आखिरकार सत्ता का प्रतीक ही है। पत्रकार जब उनसे टकराता है तो वे इन्हें सबक सिखाते हैं। पिछले साल ही एक टेप भी वायरल हुआ था, जिसमें एक विधायक एक पत्रकार को कुत्ते की तरह गालियां दे रहा था। जिलों और कस्बों के पत्रकार यहां लगातार ऐसे लोगों के निशाने पर रहते हैं। मगर इनके लिये कोई सुरक्षा नहीं है।

यह एक कड़वा सच है कि बिहार के ग्रामीण एवं कस्बाई पत्रकारों के जीवन पर खतरे की एक बड़ी वजह यहां के समाचार समूह हैं। इन्हें पत्रकारिता के साथ-साथ विज्ञापन वसूलने के काम के लिये भी बाध्य किया जाता है। अब चुकी इनका वेतन इतना कम होता है कि कमीशन के लालच में इन्हें यह काम करना ही पड़ता है। वरना घर कैसे चले।

और यह काम इन्हें खतरों की जद में डाल देता है, क्योंकि आपको जिसके खिलाफ खबर लिखना है उसी से विज्ञापन भी वसूलना है। और एक बार जब आप किसी मुखिया, प्रमुख या विधायक से विज्ञापन ले लेते हैं तो वह अपेक्षा करता है कि आप उसके खिलाफ खबरें न लिखें। उसकी बड़ी से बड़ी चूक और अपराध पर चुप्पी साध लें। मगर एक संवेदनशील पत्रकार के लिये यह मुमकिन नहीं। उसे अपने पाठक समाज को जवाब भी देना होता है, उसकी अपनी भी इंटिग्रिटी होती है। लिहाजा वह खबर तो लिख ही देता है। मगर बाद में उसे कीमत चुकानी पड़ती है।

इस लिहाज से राजधानियों के पत्रकार सुरक्षित हैं। एक तो उनके जिम्मे विज्ञापन का काम नहीं है। दूसरा वह सरकार के खिलाफ जरा भी टेढ़ी खबर लिखे वह खबर संपादक के विचार सूची में कैद हो जाती है। वर्षों उस पर विचार और मंथन चलता रहता है। इस बीच अखबार में गुणगान छपता रहता है। लिहाजा हम पत्रकारों को फेसबुक पर उल्टी करने के अलावा और कुछ नहीं आता। और फेसबुक की सूचनाओं की वजह से जान खतरे में नहीं पड़ती।

यह बिहार की पत्रकारिता का नंगा सच है। और पत्रकारिता किस तरह यहां खतरे में है, इसे समझने का रास्ता। बहरहाल हमारे पास अपने इन दोनों साथियों को श्रद्धाजंलि देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। कल स्कार्पियो को जला ही दिया गया है। कुछ कानूनी कार्रवाईयां होंगी, मगर न कोई नतीजा निकलेगा, न हालात बदलेंगे। दिवंगत साथी को श्रद्धांजलि

सौजन्य : फेसबुक

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